सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 1037, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1037

हिन्दी निरुक्त ( २७१ ) ६ अ० ४ पा० ४ खं०
(खंड४)
निरु०-“द्यावा नः पृथिवी इमं सिध्र मद्य दिवि-
स्पृशम्। यज्ञं देवेषु यच्छताम्॥[ऋ०सं०२,८,१०,५]
द्यावापृथिव्यौ नः इमं साधनम् अद्य दिविस्पृशं
यज्ञं देवेषु नियच्छताम् ॥
‘विपाट् शुतुद्रचौ’ व्यारुङ्गाते ।
तयोः एषा भवति ॥४ (३८)॥
अर्थः-“द्यावानः०” ( ये एते ) जो ये ‘द्यावापृथिवी’
द्युलोक पृथिवी लोक देखते हैं, सो ‘नः’ हमारे ‘इमम्’ इस
‘दिविस्पृशम्’ द्यु (आकाश = द्युलोक) को स्पर्श करने वाले
‘सिध्रम्’ (साधन) साधने वाले ‘यज्ञम्’ यज्ञ को ‘अद्य’ आज
‘देवेषु’ देवताओं में ‘यच्छताम्’ (नियच्छताम्( देवे’ ॥
‘विपाट् शुतुद्रयौ’ (३२) (विपाशा और शुतुद्री नदिये’)
उपख्यान की जाचुकी हैं [ ] ॥
“तयोः०” उन दोनों ( विपाशा और शुतुद्री ) की यह
ऋचा है ॥ ४ (३८)॥
व्याख्या ।
विपाशा (व्यास) और शतद्रू ( सतलुज ) :
पंजाब शिक्षा विभाग के “पंजाबभूगोल”नामपुस्तक
में जो इस देशकी चतुर्थ कक्षा की पाठ्य पुस्तक है, इन दोनों
नदियों का वर्णन इस प्रकार है ।
“व्यासा - इसको पंजाबी लोग वियाह कहते हैं,यह नदी
एक झील में से निकलती हैं, जिसको व्यास कुंड कहते हैं,