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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1042

हिन्दी निरुक्त ( २७६ ) ६ अ० ४ पा० ७ खं०
उन दोनों की यह ऋचा है ॥ ६ (४०) ॥
( खं० ७ )
निरु०-‘शुनासीराविमां वाचं जुषेथां यद्दिवि
चक्रथुः पयः । तेनेमामुपसिञ्चतम् ॥” [ऋ० सं०
३, ८, ९, ५ । य० वा० सं० १२, ६९] । (अथ०
सं० ३, १७, ७) ॥
इति सा निगदव्याख्याता ॥
‘देवीजोष्ट्री’ देव्यौ जोषयित्र्यौ । द्यावापृथिव्यौ
इति वा । अहोरात्रे इति वा ।
‘शस्यं च समा च’- इति कात्थक्यः ॥
तयोः- एष सम्प्रैषो भवति ॥ ७ (४१) ॥
अर्थः-“शुनासीरा०” इस ऋचा का वामदेव ऋषि
है । शुनासीर्ये में विनियोग है ।
हे ‘शुनासीरौ’ वायु- और आदित्य ! (युवाम्) तुम
दोनो ‘इमाम्’ इस ‘वाचम्’ वाणी को = स्तुति को ‘जुषेथाम्
सेवन करो । ‘यत्’ जो ‘दिवि’ द्युलोकमें ‘पयः’ जल चक्रथुः
तुमने किया है, ‘तेन’ उस जल से ‘इमाम्’ इस पृथ्वी को
‘उपसिञ्चतम्’ सींचो । यह ऋचा अपने उच्चारण से ही व्या-
ख्यान की हुई है ।
‘देवी जोष्ट्री’ ( ३५ ) क्यों ? ‘जोषयित्र्यौ’ सबको तृप्त
करने वाली हैं । वे कौन ? अथवा द्यावापृथिवी = द्युलोक
और पृथिवी लोक । अथवा अहोरात्र = दिन और रात्रि ।