निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशस्य (ब्रीहि = धान आदि) और समा (संवत्सर)
'देवीजोष्ट्री' हैं, यह कात्थक्य आचार्य मानते हैं।
“तयोः०” उन दोनों का यह सम्प्रैष (यजुः) है-
॥ ७ (४१) ॥
( खं० ८ )
निरु०- “देवीजोष्ट्री वसुधिती ययोरन्याघा
द्वेषांसि यूयव दन्यावक्षद्वसु वार्याणि यजमानाय
वसुवने वसुधेयस्य वीतां यज ॥” [ य० वा० सं०
२८, १५] ॥
‘देवीजोष्ट्री’ देव्यौ जोषयित्र्यौ ‘वसुधिती’
वसुधान्यौ। ययोः अन्या अघानि द्वेषांसि अवया-
वयति । आवहति अन्या वसूनि वननीयानि
यजमानाय वसुधानाय च ‘वीतां’ पिबेताम्,
कामयेतां वा। ‘यज’ इति सम्प्रैषः ॥
‘देवी ऊर्जाहुती’ देव्यौ ऊर्जाह्वान्यौ। द्यावा-
पृथिव्यौ-इति वा। अहोरात्रे-इति वा।
‘शस्यं च समा च’-इति कात्थक्यः ॥
तयोः-एष संप्रैषो भवति- ॥८ (४२) ॥
अर्थः- “देवीजोष्ट्री०” 'देवीजोष्ट्री' (देव्यौ जोषयित्र्यौ)
सब जगत्को तृप्तकरने वाली देविएं ‘वसुधिती’ (वसुधान्यौ)
धन और धान्य अथवा वसुओं को धारण करने वालीं,
‘ययोः’ जिन दोनों में ‘अन्या’ एक ‘अघानि’ (अघानि)