निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
प्रारंभिक पृष्ठ एवं निघण्टु पञ्चाध्यायी मूल पाठ
॥ श्रीः ॥
हिन्दी-निरुक्त
निघण्टु और यास्क मुनि प्रणीत निरुक्त
मूल ग्रन्थ सहित ।
पण्डित सीताराम शास्त्रि-सम्पादित
HINDI NIRUKTA.
With Nighantu and Yaska Muni's Nirukta
EDITED AND ANNOTATED
BY
PANDIT SITARAM SHASTRI
प्राप्ति-स्थान
मुन्शीराम मनोहरलाल
प्रकाशक-पुस्तक विक्रेता
पोस्ट बॉक्स ११६५, नई सड़क, दिल्ली-६
श्रीहरिः शरणम् ।
हिन्दी-निरुक्त ।
भाष्यकार की प्रतिज्ञा
( नि० ) समाम्नायः समाम्नातः, स व्या-
ख्यातव्यः ।
समाम्नायका समाम्नान या क्रमपूर्वक संग्रह हो चुका है, इस-
से उसका व्याख्यान होना चाहिये—
'समाम्नाय' नाम "गो" आदि "देवपत्न्यो" पर्यन्त १७७० शब्दों
है, जो पांच अध्यायोंमें पढ़े गये हैं, यद्यपि 'समाम्नाय' नाम वेद
ही प्रसिद्ध है, तथापि व्युत्पत्तिके बलसे उन साधारण शब्दों
लिये भी यह शब्द आसक्ता है, जो किसी मर्यादासे पढ़े गये हों।
समाम्नायते मर्यादयाऽभ्यस्यते इति समाम्नायः ।
"अग्निमीळे" इत्यादि वेदके शब्दोंका पाठ कल्पकल्पाऽन्तरोंमें
न बदलकर एकही क्रमपर रहता है। इसीसे (क्रमकी महिमा
[क]रण ही) उनमें समाम्नाय शब्द योग वशसे आकर भी रूढ़
या, सुतराम् वैदिक शब्दोंको समाम्नाय शब्दसे व्यवहार करना
चित ही है, किन्तु इन साधारण शब्दोंका पाठ संग्रहकर्ताओंकी
नुसार समय समय पर भिन्न भिन्न मर्यादाओंसे होता है, इस-
इन शब्दोंमें योगार्थभावसे ही समाम्नाय शब्द आता है।
अतिरिक्त यह भी एक बात है कि इस समाम्नायमें जितने शब्द
अं० १ पा० १ ख० १ ।
संग्रह किये गये हैं वे सब वेदके मध्यसे चुने गये हैं। इससे
वेदके ही अङ्गभूत होनेसे उससे भिन्न नहीं और उसके समाम्ना'
नामके भागी भी बनते हैं ।
व्याख्यानयोग्य शब्द ।
भाष्यकार केवल उन्हीं शब्दोंकी व्याख्या करना नहीं चाहते,
पञ्चाध्यायी या निघण्टुमें ही पठित हैं, बल्को उनकी भी, जो इनसे
अतिरिक्त मन्त्रोंमें ही पढ़े हुए हैं, या अन्य निरुक्तोंमें संग्रह कि
गये हैं।
यदि आचार्य्य अन्य शब्दोंकी व्याख्या करना नहीं चाहते,
निर्वचन का लक्षण नहीं करते, तथा "मृग" "कर्ण" और "दक्षिण।
आदि शब्दोंका निर्वचन नहीं करते । इसीसे उनकी व्याख्या
करने की इच्छा विस्तृत विषयको अवलम्बन करती है, ऐसा प्र
होता है ।
पठनीय शब्दोंका संग्रह क्यों नहीं ?
जब कि १७७० शब्द के अतिरिक्त बहुत शब्द ऐसे हैं जिन
व्याख्या करनी चाहिये, तो उन शब्दोंका इस समाम्नायमें संग्रह
नहीं किया ?
ऐसे शब्द जिनकी कि व्याख्या होनी चाहिए, अनन्त या संक
रहित हैं, इसीसे उनके संग्रहकी इच्छासे प्रवृत्ति की जावे तो ग्रन्थ
समाप्ति ही न होगी, और उनका अध्ययन अथवा श्रवण भी न
हो सकेगा, सर्वथा ऐसी प्रवृत्ति निष्प्रयोजन होती है ।
भाव यह है कि वे मेधावी छात्र—जिन्होने वेद पढ़ लिए
जो तपस्वी और लक्षण, विनियोग, अर्थ, छन्द तथा दैवत
निदान या रहस्यके जान नेवाले हों, लक्षण व कुछ कठिन इ
उदाहरण से ही अन्य शब्दोंके अथ की ऊहा भी कर सकेंगे, **
इतने परिमित शब्द ही संग्रह किये हैं।
हिन्दी निरुक्त ।
व्याख्यानमें दिखाई जानेवाली बातें ।
निघण्टुके शब्दोंकी व्याख्यामें ये बातें दिखाई जावेंगी, जैसे
ये नाम हैं, ये आख्यात हैं, एवम् ये उपसर्ग ये निपात, यह
सामान्य लक्षण, यह विशेष लक्षण, ये एकार्थ शब्द, ये अनेकार्थ
शब्द तथा यह अभिधान (नाम) यह अभिधेय ( अर्थ ) है । इसीको
यहां व्याख्या कहते हैं, क्यों कि शब्दोंकी इन्हीं बातोंके जाननेसे,
मनुष्य शब्दज्ञ बन जाता है ।
इस समाम्नाय का दूसरा नाम ।
नि० ) तमिमं समाम्नायं निघण्टव इत्याचक्षते।
जो शब्द अबतक किसीने भी मन्त्रोसे अलग संग्रह नहीं किये
किन्तु मन्त्रोंमें ही स्थित हैं, वे, और जो दूसरे २ निरुक्तोंमें संग्रह
किये गये हैं अथवा इस पञ्चाध्यायीरूप ग्रन्थमे पठित है, उन सब
वेदक शब्दोंका “निघण्टु” यह नाम है । यह वैदिक शब्दोंकी रूढ़ी
ख्यायीसंज्ञा है ।
( नि०) निघण्टवः कस्मात् ।
क्यों ये शब्द 'निघण्टु' कहे जाते हैं ?
( नि०) निगमा इमे भवन्ति ।
निगम होनेसे ही ये शब्द निघण्टु होते हैं । प्रयोजन यह कि—
निगम ऐसे शब्दको कहते हैं, जो उदाहरण का कार्य्य देता हो,
हरण दृष्टान्तमात्र होता है, जिसके जाननेसे उसके समान अनेक
अर्थ जाने जा सकें । इसी प्रकार “गौः” आदि “देवपत्नी” पर्यन्त
शब्द उदाहरणका कार्य्य देनेसे निगम और निघण्टु कहाते हैं,
तु अपने द्वारा मन्त्रोंके अन्य २ शब्दोंके अर्थके ही जनानेसे ये
अनिघण्टु कहाते हैं । • इनमें ऐसा क्या विशेष है, जो ये ही अन्य
के अर्थों को जनाते हैं, किन्तु और नहीं ? ।
अ० १ पा० १ ख० १ ।
(नि०) छन्दोभ्यः समाहृत्य समाहृत्य समाम्नाताः ।
जिससे कि—ये शब्द छन्दों या मन्त्रोंसे चुनचुनकर क्रमसे
संग्रह किये हैं, इससे येही अन्य शब्दोंके अर्थोंके जनानेमें समर्थ हैं।
मन्त्रोंसे येही शब्द क्यों संग्रह किये हैं ?
मन्त्रोंसे इन्हीं शब्दोंका चुनाव इस•लिए किया गया कि ये
शब्द मन्त्रार्थके जाननेके लिये प्रवृत्त हुए पुरुषको मन्त्रोंमें अवश्य
मिलते है, ये ऐसे अतिपरोक्षवृत्ति या अतिगूढार्थ हैं, जिनके
कारण मेधावी तपस्वी तथा लक्षण, विनियोग, ऋषि, छन्द और
देवताओंके निदानके जाननेवाले विद्वान् भी मन्त्रार्थ के जाननेमें
असमर्थ हो जाते हैं । जब इन शब्दोंके अर्थका परिज्ञान होजाता
है, तो वैसे पुरुषोंकी बुद्धि विना किसी रुकावटके ही मन्त्रार्थमें
प्रवेश कर जाती है ।
अपने मतमें दूसरे आचार्य की सम्मति—
(नि०) ते निगन्तव एव सन्तो निगमनान्निघण्टव
उच्यन्ते, इत्यौपमन्यवः ।
औपमन्यव आचार्य मानते हैं कि—इन शब्दोंका मन्त्रोंसे उद्धार
या•अलग करनेके पश्चात् निघण्टु नाम नहीं पड़ा और न गवादि-
देवपत्नी–पर्यन्त ग्रन्थके रूपमें होनेसे ही यह उनका नाम है बल्कि,
इनमें जो निगमन या अर्थके जनाने की शक्ति है, उसीके कारण
नित्य अपने स्थान ( मन्त्रो ) में स्थित ही निघण्टु हैं, चाहे वे किसी
निरुक्तमें संग्रह किये गये हों, अथवा अब तक मन्त्रोंमें ही पढ़े
जाते हों ।
उपमन्यु या जिसका क्रोध निवृत्त हो गया, ऐसे ऋषिके पुत्रको
औपमन्यव कहते हैं ।
औपमन्यव आचार्यने जैसी व्युत्पत्ति का ह, उससे प्रतीत होता
हिन्दी निरुक्त । ५
है, कि गवादि शब्दों का केवल संग्रहमात्र है। ये कोई नवीन शब्द
नहीं हैं, क्योंकि, मन्त्रोंके ये नित्यशब्द हैं, अर्थात् मन्त्रस्थ शब्दों के
पर्याय बाहरी शब्द नहीं हैं, यहां जिन शब्दों का संग्रह है और जो
शब्द मन्त्रों में ही हैं वे दोनों ही प्रकार के शब्द निघण्टु कहे जाते
हैं, क्योंकि ये मन्त्रों के अर्थके निगमयितृ या निगन्तु या जनानेवाले
हैं।
'निघण्टु' शब्द अतिपरोक्षवृत्ति
'निगन्तु' शब्द परोक्षवृत्ति और
'निगमयितृ' शब्द प्रत्यक्षवृत्ति है।
अतिपरोक्षवृत्ति शब्द से परोक्षवृत्ति शब्द मिलता जुलता होता
है, और परोक्षवृत्ति से प्रत्यक्षवृत्ति।
जिस अतिपरोक्षवृत्ति शब्द की व्याख्या करनी होगी, उसके
साथ परोक्षवृत्ति शब्द मिलाया जायगा, और फिर परोक्षवृत्ति
के साथ प्रत्यक्षवृत्ति शब्द। जैसे-आधी रातके गाढ़ अन्धकार
को सूर्यनारायण क्रम से दूर करके मध्यान्ह समय लाते हैं, वैसे ही
अतिपरोक्षवृत्ति शब्दोंमें उक्त क्रमसे अर्थ का विकाश किया जाता
है।
शब्दके परिवर्तन का क्रम ।
निगन्तु शब्दमें 'ग' के स्थानमें 'घ' और 'त' के स्थानमें 'ट'
बदलनेसे निघण्टु शब्द बन जाता है। कहीं कहीं अतिपरोक्षवृत्ति
शब्दोंमें आदि अक्षरोंका भी परिवर्तन होता है, यह शब्दकी प्रवृत्ति
के अनुसार यथासम्भव जानना होगा।
प्रत्यक्षवृत्ति आदि शब्दोंका विशेष ।
प्रत्यक्षवृत्ति शब्दोंमें क्रिया स्पष्टरूपसे कही हुई होती है, परोक्ष-
वृत्ति शब्दोंमें भीतर लय हुई क्रिया प्रतीत होती है और अतिपरोक्ष
६ अ० १ पा० १ ख० १ ।
वृत्ति शब्दोंमें अत्यन्त अस्पष्ट ( बेमालूम ) क्रिया होती है। इससे
उन्हींके निर्वचनका यत्न यहां किया गया है।
निरुक्तमें निर्वचनके पांच उपाय।
१—शब्दमें किसी अपेक्षित अक्षरको ऊपरसे जोडना।
२—शब्दके अक्षरोंको प्रयोजनानुसार उलट पलट कर लेना।
३—शब्दमें किसी अक्षरके स्थानमें कोई दूसरा अक्षर कर देना।
४—शब्दमें किसी अनावश्यक अक्षरको उसमेंसे हटा देना।
५—शब्दमें अर्थके अनुसार धातुके अर्थको कल्पित कर लेना।
जिस प्रकार निगन्तु शब्दसे निघण्टु शब्दका निर्वचन दिखाया
गया, उसी प्रकार अन्य अतिपरोक्षवृत्ति शब्दोंका भी निर्वचन जानना
होगा। व्याकरणके उणादिगणमें अतिपरोक्षवृत्ति शब्द ही व्युत्पा-
दित होते हैं। वहां जिन शब्दोंका लक्षण नही किया है, उन शब्दोंका
शब्दके अनुसार यहां लक्षण कल्पित करना होगा क्यो कि—"उणादि
शब्द अपरिसमाप्त है" यह शब्दतत्वके लक्षण जाननेवालोंने प्रति-
ज्ञा की है। सर्वथा ही जिन शब्दोंमें कोई कल्पना नहीं हो सकती
हो, उनकी सिद्धि व्याकरणके पृषोदरादिगणमें पाठ माननेसे जाननी
होगी। क्यों कि, वहां जिस रूपमें जो शब्द पढे गये हैं, वे उसी
रूपमें साधु वा शुद्ध माने गये हैं, यही लक्षणके जाननेवालोंका
सिद्धान्त है।
प्रकारान्तरसे निर्वचनः—
(नि०) अपि वा हननादेव स्युः ।
अथवा आहनन या पठन क्रियाके सम्बन्धसे ही ये शब्द निघण्टु
हो सकते हैं। अर्थात् पञ्चाध्यायी ग्रन्थके रूपमें पठित होनेसे ही
ये निघण्टु हैं। कैसे ?
(नि०) समाहता भवन्ति ।
समाहताः समाहन्तवः निघण्टवः ।
यहां 'समाहत' शब्द प्रत्यक्षवृत्ति 'संमाहन्तु' शब्द परोक्षवृत्ति
हिन्दी निरुक्त। ७
और 'निघण्टु' शब्द अतिपरोक्षवृत्ति है। अर्थ यह हुआ कि इस
पञ्चाध्यायी रूप ग्रन्थमें ये गवादि शब्द मर्यादासे पढ़े हुये हैं। इसीसे
समाहत समाहन्तु या निघण्टु कहे जाते हैं। समाहत शब्दसे समा-
हन्तु और उससे निघण्टु शब्द बन गया है। अर्थात् 'सम्' उपसर्गके
बदलेमें 'नि' उपसर्ग 'आङ्' (आ) उपसर्ग का लोप और 'हन्'-
धातुके 'ह' को 'घ' होना विशेष है। इस पक्षमें 'आङ्' का अर्थ
मर्यादा और 'हन्' का अर्थ पढ़ना है। धातुओंके अनेक अर्थ होते हैं,
इससे ऐसा अर्थ करना अनुचित नहीं है। इसके अतिरिक्त लोकमें
भी 'आङ्' पूर्वक 'हन्' धातुका पठन अर्थ में प्रयोग देखा जाता है।
जैसे: -
१-ब्राह्मणे इदमाहतम्—ब्राह्मण (ग्रन्थ) में यह कहा है।
२-सूत्रे इदमाहतम् सूत्र में यह कहा है।
इन दोनों वाक्योंमें 'आहत' शब्द उक्त या पठित शब्दका पर्याय है।
'निघण्टु' शब्दकी पहिली व्याख्यामें जो कि--निगन्तु शब्दके
द्वारा की गई है, व्याख्येय 'निघण्टु' शब्दमें व्याख्यान 'निगन्तु'
शब्दकी अक्षरों और अर्थ दोनोंसे ही तुल्यता है, इससे वह व्याख्या
उभयप्रधान कही जासकती है, किन्तु इस द्वितीय व्याख्यामें
'निघण्टु' शब्दके साथ 'समाहत' शब्दकी अर्थसे ही समता है,
वर्णसमता का बिलकुल ही अभाव है, इसलिये इसी व्याख्याको
अर्थ-प्रधान समझी जायेगी। निरुक्त शास्त्रमें उक्त दोनो ही
प्रकार की व्याख्या मानी गई है, उभयप्रधान व्याख्याके अभावमें
अर्थ-प्रधान व्याख्या कीजावेगी अथवा किसी आवश्यकता पर—
अन्य प्रकार की व्याख्या।
(नि०) यद्वा समाहृता भवन्ति ।
अथवा समाहरण (इकट्ठा करना) क्रियाके सम्बन्धसे ये शब्द
निघण्टु हैं। कैसे?
अ० १ पा० १ खं० १ ।
समाहृताः समाहर्तवः निघण्टवः ।
यहां 'सम्' 'आङ्' ( आ ) उपसर्ग 'हृ' धातु और 'तु' प्रत्ययके
योगसे निघण्टु शब्द बनता है । यहांपर भी पहिलेके समान 'आङ्'
उपसर्ग अर्थके लिये ऊपरसे लिया जाता है । इस व्युत्पत्तिमें
समाहरण ( चुनना ) क्रियाके सम्बन्धसे निघण्टु शब्द अपने अर्थ
( गवादि शब्द) पर गया हुआ है । अर्थात् गो आदि शब्द मन्त्रोंसे
चुन चुनकर इस पञ्चाध्यायी ग्रन्थमें संग्रह किये गए हैं । इसीसे
इनका निघण्टु नाम होता है ।
यद्यपि जिन गो आदि शब्दोंका निघण्टु नामहै, उनमें निगमन
समाहनन और पठन तीनों ही क्रियाएं विद्यमान हैं, तथापि सभी
व्युत्पत्तियोंमें उन सबका लेना आवश्यक नहीं है, किन्तु जिस
धातुसे शब्दकी व्युत्पत्ति कीजाय केवल उसकी क्रियाकी सत्ता
देखनी होती है। क्यों कि जिस अर्थके लिये जो शब्द बोला जाता
है, उस शब्दके निर्वचनमें वही क्रिया बताना आवश्यक है, जिसके
कारण वह शब्द वहांपर रहता है ।
इस एक निघण्टु शब्द में अनेक धातुओंके अर्थ द्वारा निर्वचन
करनेका जो अतिमहान् यत्न किया है, उसका यह प्रयोजन है कि
जिस सिद्धान्तमें सभी नाम आख्यातसे उत्पन्न माने गये हैं । उसमें
जब परोक्षवृत्ति या अतिपरोक्षवृत्ति शब्दोंका निर्वचन करेंगे, तो
निघण्टु शब्दके उदाहरण पर कर सकेंगे, या करना होगा । अर्थात्
इसी प्रकार जिस रूढि शब्दमें जिस धातुके अक्षर मिलतेहों, तथा
उसके अर्थमें उसकी क्रिया देखी जाती हो, उसी धातुसे उसका
निर्वचन करना होगा । इस रीति पर निर्वचनका स्थल, और भी
विशाल होजाता है, कि—एक रूढि शब्दमें स्वतन्त्र-स्वतन्त्र एक
एक धातुका चिन्ह प्रतीत हो, तो वहां एक एक धातुसे ही स्वतन्त्र
स्वतन्त्र निर्वचन करना चाहिये । और यदि अनेक धातुओंके चिन्ह
हिन्दी निरुक्त। [पृष्ठ ६]
मिलित होकर प्रतीत हों, और उन धातुओकी क्रियाओ का उसके
अर्थमें सम्बन्ध भी हो, तो उस शब्दका निर्वचन अनेक धातुओंसे
एक साथही करना—
ऐसा ही वार्तिककार ने कहा है:—
“यावतामेव धातूनां लिङ्ग रूढिगतं भवेत् ।
अर्थश्चाप्यभिधेयस्य-स्तावद्भिर्गुणविग्रहः”
जितने धातुओका लिङ्ग ( चिन्ह ) रूढि शब्दमें पाया जाय, और
अभिधेयमें उनका अर्थ हो, उतने ही धातुओसे उसकी व्युत्पत्ति
करना ।
यदि धातुके अक्षर रूढि शब्दमें हों, और उसकी क्रिया उसके
वाच्यया अर्थमें न हो, तो उस धातुसे उस रूढि शब्दका निर्वचन
( व्याख्यान ) न हो सकेगा ।
देखो, निगमन समाहनन और समाहरण तीनो ही क्रियाएं गमे
आदि शब्दोंमें ( जो निघण्टु शब्दके वाच्य हैं ) विद्यमान हैं, उनके
वाचक, 'गम्' 'हन्' और 'हृ' धातु निघण्टु शब्दके निर्वचन
करनेके समय अहम्पूर्विकासे आगे बढकर कहते हैं कि-मेरे समान
है, मुझसे इसका निर्वचन कर, मुझसे इसका निर्वचन कर ।
यहां निघण्टु शब्दमें 'गम्' धातु अपने गकारको घकार रूपमें
देखता है, तथा 'हन्' और 'हृ' धातु अपने हकारको घकार बना
हुआ देखते हैं । इसी कारणसे अनेक धात्वर्थों द्वारा निघण्टु
शब्दका निर्वचन किया गया है कि ऐसे ही अन्यनामोंका निर्वचन
कर लिया जाय ।
समाम्नायका अर्थतत्व ।
समाम्नाय शब्दका पर्याय ( समानार्थक ) निघण्टु शब्द है, तथां
निघण्टु शब्द, जो पर्यायके प्रसङ्गमें आया हुआ है, उसकी इस
१० अ० १ पा० १ ख० १ ।
इस प्रकारकी व्युत्पत्ति होती है, इत्यादि बातें कही गई हैं, किन्तु
समाम्नाय शब्दके अर्थतत्वका विवेचन नहीं हुआ जैसा कि शास्त्रीय
रीतिसे होना चाहिये, इस लिये अब विशेष रूप से समाम्नायार्थ
निरूपण कियाजाता है ।—
“तद्यान्येतानि चत्वारि.पद-जातानि
नामाख्याते चोपसर्गनिपाताश्च”
[ नि० १ अ० १ पा० १ खं ]
वही समाम्नाव या निघण्टु पदार्थ है, जो ये चार पद
समूह हैं, वे ये ही चार पद समूह है, जोकि—नाम, आख्यात, उप-
सर्ग और निपात हैं। यह बात पहिले कही गई है कि गोआदि
देवपत्नी पर्यन्त शब्दसमूह निघण्टु नामसे बोला जाता है,
वह भी यावत् शब्दसमूहका उपलक्षण समझना चाहिये ।
निरुक्त शास्त्रके मतमें शब्दमात्र कुल चार भागोंमें बटे हुए हैं,
जैसे कि नाम, आख्यात, उपसर्ग और निपात ।
अर्थात् नैरूक्तोंके मतमें इस प्रकार चार पद होते है, इससे
अल्प या अधिक नहीं ।
अन्य आचार्यों के मतमें पदविभाग ।
(१) इन्द्र एक महावैयाकरण हुए हैं, उनके मतमें “अर्थः
पदम्” अर्थही पद है ।
प्रयोजन यह है कि-सब शब्दोंमें अर्थत्व रूपसे अर्थ एक
ही है, उसमें भेद नहीं। अर्थात् उक्त महावैयाकरण अर्थबोधक
सब शब्दोंको एक जातीय ही मानता है, किन्तु शब्द में अवान्तर
अनेक जातियां नहीं स्वीकार करता, इसलिये उस के मतमें एक ही
पद है और अर्थ ही उसका लक्षण है ।
हिन्दी निरुक्त । ११
(२) प्रसिद्ध भगवान् पाणिनि मुनि जिनका अनुशासन वर्त्त-
मानमें भी संस्कृत भाषाके लिये जगद्व्यापी है, दो, पदं
मानते हैं—
“सुप्तिङन्तं पदम्” सुबन्त और तिङन्त ।
जिन पदोंमें सुप् विभक्ति हो वे सुबन्त पद होते हैं, और जिन-
में तिङ् विभक्ति हो वे तिङन्त पद होते हैं । अर्थात् उनके
मतमें नाम और आख्यात दो विभागोंमें समस्त शब्द आजाते हैं ।
(३) कुछ आचार्य तीन पद मानते हैं—
(क) सुबन्त,
(ख) तिङन्त,
(ग) निपात और उपसर्ग ।
(४) कोई कोई आचार्य—सुबन्त (१) तिङन्त (२) निपात
(३) गति (४) और कर्मप्रवचनीय (५) इस प्रकार पाँच
पद मानते हैं और कोई इनमें उपसर्गको पृथक् गिन् कर
छः तक मानते हैं ।
पदों के प्रभेद ।
(१) नाम पद तीन प्रकारके होते हैं, जैसे स्त्री लिङ्ग, पुलिङ्ग और
नपुंसक लिङ्ग ।
(२) आख्यात पदोंके भी तीन भेद होते हैं, जैसे कर्तृवचन,
भाववचन, और कर्मवचन ।
(३) उपसर्ग पदोंमें आङ् (आ) नि, अधि इत्यादि कुछ
पद हैं ।
(४) निपात पदसमूहमें भी इव, न, चित् इत्यादि पद हैं । प्रथम
अध्यायके प्रथम पादके अन्तमें उपसर्ग और द्वितीय तृतीय
पादोंमें निपातोंका विशेष रूपसे निरूपण होगा ।
अ० १ पा० १ ख० १ ।
चारों पदोंमें गौण और प्रधान ।
इन नाम आदि चारों प्रकारके पदोंमें कौन पद प्रधान या
मुख्य है, और कौन गौण अथवा अमुख्य है, यह निर्णय भाष्य-
कारने साक्षात् न कहकर उनकी गणनाके क्रमसे ही जना दिया
है, जिस का अभिप्राय टीकाकार ने स्पष्ट कह दिया है
भाष्य - "नामाख्याते चोपसर्गनिपाताश्च"
[ १ अ० १ पा० १ ख० ]
यास्क आचार्य्य अपने अभिमत चार पदोंमे दो दोको मिला
कर दो भाग करते हैं। नाम और आख्यात एक भाग, उपसर्ग
और निपात दूसरा भाग। इसी से उन्होंने-
"नामा-ख्याते" उपसर्ग-निपाता:"—दो दो
नामोंको द्वन्द्वसमाससे जोड दिया है।
प्रथमभागकी प्रधानता ।
(१) नाम और आख्यातके भागकी प्रधानता इसलिये प्रतीत
होती है कि-आचार्यने उसे पहिले कहा है। क्योंकि
लोकमें जो प्रधान होता है, उसका नाम पहिले लिया
जाता है।
(२) नाम और आख्यात उपसर्ग और निपातकी सहायताके
बिना भी अपने अर्थको कह देते हैं, किन्तु उपसर्ग और
निपात उनके सामीप्य के बिना अपना अर्थ प्रकाशित नहीं
करते, इसीसे नाम और आख्यात दोनों प्रधान और उप-
सर्ग एवं निपात अप्रधान हैं।
हिन्दी निरुक्त । १३
(३) नाम और आख्यात वाच्य अर्थसे अर्थवाले है तथा
उपसर्ग और निपात द्योत्य अर्थसे। इससे पहिला समु-
दाय प्रधान और दूसरा गौण है।
वाच्य अर्थ अपना निजका अर्थ होता है और द्योत्य अर्थ
दूसरे शब्द का होता है तथा दूसरे शब्दसे प्रकाशित
होता है। वाचक शब्द अपने अर्थ का कहने वाला होता
है, और द्योतक शब्द दूसरे शब्दके अर्थ को केवल प्रका-
शित करता है, वस्तुतः उसका कोई अर्थ नहीं होता,
जैसे “सर्प का बिल और हिन्दुस्तानमें कंजरका घर" इस
वाक्य का।
दो दोको समस्त करने का हेतु।
(१ नाम आख्यात)
(१) नाम और आख्यात परस्पर आकांक्षा रखते है, इसीसे
आचार्यने इनका समस्त निर्देश किया है। जैसे—'यज्ञदत्तः'
यह नाम शब्द तभी तक साकांक्ष है, जब तक 'पचति'
'पठति' इत्यादि आख्यात उसके सामने जोड़ कर उसकी
आकांक्षा न मिटाई जावे।
तथा 'पचति' यह आख्यात शब्द तभी तक सापेक्ष है, जब
तक 'यज्ञदत्तः' यह नाम शब्द उसकेसाथ नहीं जोड़ा जावे।
अर्थात् व्यवहारमें दोनों साथ ही रहते है, जैसे—पचति
यज्ञदत्तः ओदनम् । इसलिये इनके इस नित्य सम्बन्धको
सूचन करनेके लिये इनका समास निर्देश किया।
(२) नाम और आख्यात दोनों ही वाच्य अर्थसे अर्थवान् होते
हैं, इनके इस सादृश्यको जतानेके लिये इनका समास
किया गया है, अन्यथा अलग अलग भी कहे जा सकते थे।
१४ अ० १ पा० १ खं० १ । ०
( २ उपसर्ग निपात )
“उपसर्ग --निपाताः” यह उपसग और निपात दोनोंका
समास निर्देश है, इनका पृथक् एक समासमें संयोजन
‘इस प्रयोजन से किया गया है कि ये दोनो नाम और
आख्यातके अर्थ विशेषके द्योतन( प्रकाशन ) रूप समान
कार्य्य को करते हैं ।
एक एकके पूर्वापरका निर्णय ।
( १ नाम )
पहिले निश्चित हो चुका है कि चारोंमें दो नाम और
आख्यात प्रधान है, इसलिये ये दो सबमें पहिले कहे गये,
किन्तु इनमें भी नाम पदके प्रथम प्रयोगका कारण
अल्पस्वरता है। जिस शब्द मे स्वर कम होते हैं, वह पद
द्वन्द्वसमासमें पूर्व रहता है। यह व्याकरण का नियम है।
( २ आख्यात )
'आख्यात' पद 'नाम' पदके अनन्तर इस कारण किया
गया कि वह नामके कारक रूप अर्थ में रहने वाली
क्रियाको कहता है ।
( ३ उपसर्ग )
आख्यातका सहयोगी होने से उपसर्ग का पाठ आख्यातके
अनन्तर किया गया है ।
( ४ निपात )
परिशेषसे निपातका पाठ या प्रयोग सबसे पीछे हुआ । इन
युक्तियोंके बल पर यास्क मुनिने इन सबको।
हिन्दी निरुक्त । १५
“नामाख्याते चोपसर्गनिपाताश्च”
इस क्रमसे कहा है ।
आख्यात का लक्षण ।
“तत्रैतन्नामाख्यातयो र्लक्षणं प्रदिशन्ति,
भावप्रधान-माख्यातम्” ।
(क) आख्यात जो 'पचति' 'पठति' इत्यादि क्रिया रूप है, उस
में द्रव्य और क्रिया दो अर्थ रहते हैं। जैसे-'पचति' मे पाक और
पकानेवाला, तथा 'पठति' मे पढ़ना और पढनेवाला। यहां
पाक ओर पढ़ना क्रियाएं हैं और पाक करनेवाला तथा
पढ़नेवाला पुरुष आदि द्रव्य होता है। इन दोनों मे क्रियां
या भाव प्रधान (विशेष्य) होता है, और द्रव्य अप्रधान या
विशेषण होता है। इसीसे आख्यातको भाव-प्रधान कहते हैं,
और यह भाव-प्रधानताही उसका लक्षण या पहिचान है।
अर्थात् जहां इस प्रकारसे भाव-प्रधानता होगी वह आख्यात
होगा।
आख्यायते प्रधानभावेन क्रिया (भावः),
गौणत्वेन द्रव्यं च यत्र तदाख्यातम् ।
(ख) जिस पदमें गौण भावसे क्रिया और उस पर प्रधान
भावसे भाव कहा जावे, उसको आख्यात कहते हैं। इस मतमें
पूर्व मतसे यह विशेष है कि-उसमें कारक या द्रव्यकी अपेक्षा
से भावकी प्राधनता है, और इसमें क्रियाकी अपेक्षा से भावकी प्रधा-
नता है। पूर्व मतमें क्रिया और भावका अभेद है और यहां भेद है।
क्रिया नाम व्यापारका है, वह सदा ही परिच्छिन्न द्रव्यमें
आश्रित रहती है। क्रियासे सम्बन्ध रखनेवाले द्रव्यको कारक
१६ अ० १ पा० १ ख० १ ।
कहते हैं, उसके कर्त्ता, कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान, अधिकरण.
ये छः भेद होते हैं। एक ही क्रिया सम्बन्धके भेदसे अनेक
कारकविशेषोंका हेतु हो जाती है। जैसे—एक स्त्री सम्बन्धके
भेदसे पति और पुत्र आदि विशेष नामोंका कारण बन जाती है।
जो उसमें गर्भ रखता है वह पति और जो उसका या उसमें
गर्भ है वह पुत्र, इसी प्रकार पाक क्रियामें जो पकाता है, वह
कर्त्ता, जो पकाया जाता है वह कर्म, जिसमें तण्डुल रखकर
पकाया जाता है, वह अधिकरण और जिसके लिए पकाया जावे
वह सम्प्रदान इत्यादि रीतिसे कारक-भेद हो जाते हैं।
पचनानुकूल क्रिया एक ही समयमे पाचक (पकानेवाला)
ओदन (भात) और स्थाली (बटलोई) में भिन्न २ सम्बन्धसे उन
की कर्त्ता, कर्म और अधिकरण संज्ञाको उपपन्न करतो है। और
वह समान कालमें ही इस तरह विभक्त रहती हुई ओदनमें
पाक रूप भावको उत्पन्न करनेके लिए उन्मुखो प्रतीत होती है।
वहाँ पाक रूप फलकी प्रधानता और कारणभूत जो पाकानुकूल
क्रिया है, उसकी गौणता प्रतीत होती है।
क्रिया पर भावकी प्रधानता ।
आख्यातमें भावकी अपेक्षा से क्रियाकी गौणता इस लिए
है, कि वह भावकी सिद्धि ही के लिए आत्म लाभको धारण
करती या उत्पन्न होती है, जब वह तण्डुल आदिमें पाक नामक
भावको उत्पन्न कर देती है, तो अपना प्रयोजन पूरा हो जानेसे
एक देश (चावलका वह भाग जो सबसे पीछे गलता है) में ही
अन्तर्द्धान हो जाती है। जिसका जिसके लिए आत्मलाभ
(उत्पत्ति) होता है, वह उसका गुणभूत या विशेषण होता है।
भाव सिद्धिके लिए ही क्रियाका आत्मलाभ होता है। इसी से
हिन्दी निरुक्त । १७
वह गुणभूता है, और उसका भाव सिद्धिसे ही परोक्ष होने पर
अनुमान होता है ।
क्रियाकी परोक्षता ।
इन्द्रियोंमें किसी इन्द्रियसे भी अपने स्वरूपमें रहती हुई
क्रिया भी प्रत्यक्ष नहीं होती। किन्तु उसके अन्तमे जो भाव
सिद्धि होती है, उस से वह अनुमित होती है-(अनुमान) निश्चय ही
क्रिया हो चुकी, जिससे कि यह भाव सिद्ध हो गया । यदि
क्रिया न होचुकी होती तो जैसे कि-पहिले इस क्रियाके बिना
यह भाव कभी नहीं हुआ था, ऐसे ही अब भी नहीं होता, और
अब यहां भाव है, इससे क्रिया होचुकी, यह अनुमिति होती है ।
फलितार्थ ।
यद्यपि आख्यात क्रिया और भाव दोनोंका वाचक है, तथापि
भाव के ही लिए क्रिया होती है, इससे भावकी प्रधानता मानी
जाती है ।
भाव-प्रधानताका व्याख्यान्तर ।
कोई आचार्य भावप्रधान शब्दका प्रकृत्यर्थ प्रधान अर्थ करते
हैं । अर्थात्, आख्यातमें दो भाग होते हैं, प्रकृति और प्रत्यय,
प्रकृतिका अर्थ जो भाव है वह प्रधान, और प्रत्ययका अर्थ जो
साधन या कारक हैं, वे गौण रहते हैं । इस मतमें भाव, कर्म,
क्रिया और धात्वर्थ एक ही वस्तु है । (यह व्याख्या पहिली
व्याख्याका स्पष्टीकरणमात्र है) ।
व्युत्पत्ति ।
आख्यायन्ते स्त्रीपुन्नपुंसकानि,
क्रियागुणभावेन वर्तमानानि अनेन,
क्रिया च तेषामुपरि प्राधान्येन
वर्तमाना-इत्याख्यातम् ॥
३
१८ अ० १ पा० १ खं० १ । •
आख्यातमें स्त्रीलिङ्ग, पुंलिङ्ग और नपु सकलिङ्ग अर्थात् कारक
द्रव्य क्रियाके गुणभूत रूपसे और क्रिया उन के ऊपर प्रधानता-
से रहती हुई कही जाती है।
कारकोंपर क्रियाकी प्रधानता !
(क) आख्यात में कारकों के ऊपर क्रियाकी प्रधानता इस
लिए है, कि यहां क्रिया शब्दसे वाच्य होती है, और कारक
अर्थात् से लिए जाते हैं। इसीसे क्रियाकी प्रधानता और
कारकों की गौणता है।
[विशेष-प्रत्ययाधानात्]
•क्रियाकी प्रधानताका दूसरा यह भी कारण है कि ‘पचति’
इत्यादि आख्यात शब्द पचि क्रियामें ही विशेष बुद्धिको उत्पन्न
करता हैं। यद्यपि वहां पकानेवाले आदि साधन, जिनमें कि वह
क्रिया रहती है, और जो कि अनेक क्रियाओंमें शक्ति भी रखते हैं,
प्रतीत होते हैं, किन्तु गौणतासे। जो शब्द जिस अर्थमें विशेष
रूपसे रहता है, वही उसका प्रधान अर्थ है। इस न्यायसे
आख्यात भी क्रिया और कारक दोनों अर्थोंमें रहता है, किन्तु
क्रियामें विशेष रूपसे और कारकमें सामान्य रूपसे रहता है,
इससे यह भावप्रधान है, यह सिद्ध हुआ। इसी बातको इस
तरह भी समझ सकते हैं, कि किसीने किसीसे क्रियाके जानने के
लिये ही पूछा कि-किं करोति देवदत्तः ? क्या करता है देवदत्त ?
इस पर क्रियाके बताने के ही अभिप्रायसे उत्तर देता है—‘पचति’
पाक करता है, किन्तु ‘ओदनम्’ यह पद पहिले कह कर उसके पीछे
‘पचति’ ऐसा नहीं कहता ।
तात्पर्य ।
जो शब्द जिस वस्तु के बोध करानेमें दूसरे शब्दकी अपेक्षा से
करता है, वह उस पदार्थमें विशेष•प्रत्ययाधान या विशेष रूप
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बुद्धिको उत्पन्न करता है। जैसे—'देवदत्त पाक करता है' इस
अर्थको कोई पुरुष वाक्यके द्वारा प्रकट करना चाहता है। इसलिये
यदि वह 'देवदत्तः' ऐसा कहता है, तो देवदत्तका केवल बोध होता
है, किन्तु जिस क्रियाको वह कर रहा है, उसका ज्ञान अभी नहीं
होता, इससे जाना गया कि —देवदत्त शब्द पाकानुकूल क्रियाके
बतानेमें असमर्थ होकर 'पचति' पदकी अपेक्षा कर रहा है। इससे
उस (देवदत्त) शब्दका देवदत्त नामवाले मनुष्यमें ही विशेष
प्रत्ययाधान है। किन्तु उस क्रियामें नहीं। यदि वह 'पचति'
पदका ही प्रयोग करता है, तो 'पकाता है' इतना ही अर्थ प्रतीत
होता है, किन्तु वह कौन है ? यह प्रतीत नहीं होता। सुतराम्,
उसे देवदत्त-जो पाक क्रियाको कर रहा है, उसके बतानेवाले
देवदत्त शब्दमें आकांक्षा बनी हुई है, इससे 'पचति' पद पाका-
नुकूल क्रिया ही में विशेष प्रत्ययाधान करता है, किन्तु द्रव्यमें
नहीं। जो शब्द जिसमें विशेष प्रत्ययाधान करता है, उस शब्दका
वही मुख्य अर्थ है, अथवा वह शब्द तदर्थ-प्रधान होता है। इसी
न्यायसे "भावप्रधान-माख्यातम्" यह सिद्धान्त सिद्ध होता है।
आख्यात में ।
हम जिस क्रियाकी प्रधानताका निरूपण कर रहे हैं, वह अमूर्त
है, उसका स्वतन्त्र शरीर नहीं है। जब कभी उसको दिखाना
चाहेंगे, तो पाचक, भात, तथा बटलोई आदि साधनोंमें जब
होती है, उनके द्वारा ही उसका निर्देश करेंगे, अर्थात् उन्हीं में
रधनेके समय कहेंगे कि—यह पाक क्रिया है अन्यथा उस
शरीर-रहित क्रियाको नहीं दिखा सकते। इस लिये ही आख्यात
पदके साथ 'ओदनम्' 'देवदत्तः,--इत्यादि कारक जो उसकी
क्रियासे सम्बन्ध रखते हैं, बोले जाते हैं।
यदि आख्यात में क्रियाकी प्रधानता न होती, किन्तु किसी
द्रव्य आदिकी होती, तो आख्यात पद ( 'पचति' आदि) के साथ