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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 224, कुल 668 में से

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पृष्ठ 224

एकादशोऽध्यायः ११३
धनुष के चार कार्य (करण) प्रयुक्त होते हैं। यथा—(१) परिमार्जन
(धनुष चलाने की तैयारी करना), (२) आदान (बाणों का हाथ में लेना),
(३) सन्धान (बाण को धनुष पर चढ़ाना) तथा (४) मोक्षण (छोड़ देना) । ९३-६४।
'प्रमार्जनं परामर्श आदानं ग्रहणक्रिया ॥ ९४ ॥
सन्धानं शरविन्यासो विक्षेपो मोक्षणं भवेत् ।
धनुष का (बाण छोड़ने के लिए) झुकाना 'परिमार्जन', बाण को छोड़ने
के लिए ले लेना 'आदान', धनुष पर बाण को चढ़ाना 'सन्धान' तथा छोड़
देना 'मोक्षण' जानो ॥ ९४-६५ ॥
व्यायाम विधि—
तैलाभ्यक्तेन गात्रेण १यवागूमृदितेन च ॥ ९५ ॥
व्यायामं कारयेद् श्रीमान् भित्ताव आकाशिके तथा ।
(अङ्गहार तथा चारी के अभ्यासार्थ) पृथ्वी पर या ऊँचे दुमंजिले
भवन (आकाशिके) में व्यायाम करना चाहिए। इस समय अभिनेता
शरीर पर तिल के तेल या जौ की पीठी से मालिश करे ॥ ९५-९६ ॥
२योग्या या मातृकाभिस्तिस्तस्माद् भित्तिं समाश्रयेत् ॥ ९६ ॥
३भित्तौ प्रसारिताङ्गन्तु व्यायामं कारयेन्नरम् ।
व्यायाम के लिए 'भूमि' अधिक उपयुक्त होती है। इसलिए व्यायाम
भूमि पर ही किया जाए। पृथ्वी पर शरीर को फैला कर व्यायाम करना
चाहिए ॥ ९६-९७ ॥
बलार्थञ्च निषेवेत ४नस्यं बस्तिविधिं तथा ॥ ९७ ॥
५स्निग्धान्यन्नानि च तथा रसकं ६पानकन्तथा ।
आहाराधिष्ठिता प्राणाः प्राणे योग्या प्रतिष्ठिताः ॥ ९८ ॥
तस्माद् ७योग्यप्रतिष्ठार्थमाहारे यत्नवान् भवेत् ।
शरीर को शक्तिसम्पन्न रखने के लिए नस्य तथा बस्तिविधि (जैसे
आयुर्वेदशास्त्र के अनुसार कथित प्रयोगों) का उपयोग करे तथा पुष्ट अन्न,
मांस तथा (द्राक्षा आदि) फलों के रसों का भी सेवन करे ।
क्योंकि 'प्राण' (शक्ति-सम्पन्नता) आहार पर निर्भर है और व्यायाम
१. युवा श्वासोदितेन च—ग०।
२. योग्यायां—ख०-ग०। ३. भित्तौ प्रसारितायां तु—ख०।
४. नस्यं च त्रिविधं—ग०। ५. स्निग्धान्यशनिताथा—ख०।
६. पानकानि च—ख०। ७. प्रसिद्धयर्थं—ख०-ग०।
८ ना० शा० द्वि०