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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

यदि चोरी करने पर चोर पश्चात्ताप की आग में जलता हुआ व मुक्तकेश
अवस्था में चारों ओर दौड़ता हुआ, उच्च स्वर में अपने पाप को सार्वजनिक रूप से
घोषित करता है और रुदन करता हुआ राजा के पास जाता है तथा दण्ड के लिए
अपने आपको प्रस्तुत करता है, तो ऐसे चोर को सुधरने का अवसर देना चाहिए।
अपने मुख से ही अपने पाप को स्वीकार करने, अपने कृत्य पर लज्जित होने, दण्ड
के लिए अपने को प्रस्तुत करने वाले के प्रति राजा को सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण
अपनाते हुए उसे क्षमा कर देना चाहिए तथा अपने हाथ के स्पर्श से उसे पवित्र बना
देना चाहिए।
टिप्पणी—राजा के हाथ का स्पर्श पतित को पवित्र बनाने वाला माना गया
है।
राजाभिर्धृतदण्डास्तु कृत्वा पापानि मानवाः।
निर्मलाः स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा॥ 48॥
यदि पापाचारी व्यक्ति अपने पापों के लिए प्रायश्चित्त करते हैं, राजा के समक्ष
अपने आपको दण्ड के लिए प्रस्तुत करते हैं तथा राजा द्वारा प्रदत्त दण्ड को सहर्ष
स्वीकार करते हैं, तो वे भी पापमुक्त एवं शुद्ध होकर सन्तों के समान मरणोपरान्त
स्वर्गलोक में जाने के अधिकारी बन जाते हैं।
शासनाद्वा विमोक्षाद्वास्तेनो मुच्यति किल्बिषात्।
अशासनात्तु तद्राजा स्तेनस्याप्नोति किल्बिषम्॥ 49॥
राजा द्वारा अपने सामने उपस्थित चोर पर अनुग्रह करने, अर्थात् बिना दण्ड
दिये मुक्त करने अथवा समुचित दण्ड देने पर चोर पाप-मुक्त हो जाता है। राजा को
यह नहीं भूलना चाहिए कि चोर को दण्ड दिये बिना छोड़ देने पर, अर्थात् किसी
प्रकार का पश्चात्ताप करने पर चोर के पाप का फल स्वयं राजा को भुगतना पड़ता
है।
गुरुरात्मवतां शास्ता शास्ता राजा दुरात्मनाम्।
अतः प्रच्छन्नपापानां शास्ता वैवस्वतो यमः॥ 50॥
विवेकहीन सज्जनों के शासक तो उनके गुरुजन होते हैं और दुष्ट आततायियों
पर राजा का ही शासन रहता है। अभिप्राय यह है कि बुद्धिमान् व्यक्तियों द्वारा
अपराध हो जाने अथवा किये जाने पर गुरुओं द्वारा उन्हें समझाना पर्याप्त होता है।
वे प्रबोधन से ही अपराधवृत्ति का त्याग कर सन्मार्ग ग्रहण कर लेते हैं, परन्तु दुष्ट
व्यक्ति समझाने-बुझाने की भाषा को नहीं समझते—‘लातों के भूत बातों से नहीं
मानते’—उन्हें सन्मार्ग पर लाने का एकमात्र उपाय दण्ड ही है और यह कार्य राजा
ही कर सकता है।
इन दोनों—प्रकट सज्जनों और प्रकट दुर्जनों—के अतिरिक्त, भीतर से दुर्जन,
272 / नारदस्मृति

अष्टापाद्यं तु शूद्रस्य स्तेये भवति किल्बिषम्।

परन्तु ऊपर से सज्जन बने, अर्थात् प्रच्छन्न धूर्तों को सुधारने का दायित्व तो विवस्वान्
(सूर्य) के पुत्र यमराज ही करते हैं, अर्थात् वे ही ऐसे दुष्ट-कपटी जनों को अनेक
प्रकार की नरक यातनाएं देकर उन्हें सचेत करते रहते हैं।
अष्टापाद्यं तु शूद्रस्य स्तेये भवति किल्बिषम्।
द्विराष्टापाद्यं वैश्यस्य द्वात्रिंशत् क्षत्रियस्य तु॥ 51 ॥
ब्राह्मणस्य चतुःषष्टीत्येवं स्वायम्भुवोऽब्रवीत्।
विद्यापि च विशेषेण विद्वत्स्वभ्यधिकं भवत्॥ 52 ॥
महर्षि मनु के अनुसार मूर्खों द्वारा किये गये अपराध का दण्ड समझदारों द्वारा
किये जाने वाले अपराध के दण्ड की तुलना में कम होता है। मूर्ख तो मूर्ख है।
उसके द्वारा किया अपराध मूर्खता है। उसे तो अच्छे-बुरे की परख ही नहीं, परन्तु
विवेकशील व्यक्ति भी मूर्खों के समान आचरण अथवा उनका अनुसरण करता है,
तो निश्चित है कि उसे अधिक दण्ड मिलना चाहिए। मूर्खों द्वारा किये अपराध का
तो कोई समर्थन नहीं करता, परन्तु विवेकशील व बुद्धिमानों द्वारा किया ग़लत-सही
कार्य तो दूसरों के लिए उदाहरण बन जाता है। यही कारण है कि मनु महाराज ने
एक ही अपराध के लिए विभिन्न वर्णों के लोगों के लिए भिन्न-भिन्न दण्ड की
व्यवस्था दी है। उदाहरणार्थ, चोरी के लिए शूद्र से चोरी के सामान का आठ गुणा,
वैश्य से सोलह गुणा, क्षत्रिय से बत्तीस गुणा और ब्राह्मण से चौंसठ गुणा दाम दण्ड
के रूप में वसूल करना चाहिए; क्योंकि विद्या-विवेकसम्पन्न बुद्धिमानों का अपराध
और दण्ड अधिक ही होता है।
शारीरश्चार्थदण्डश्च दण्डस्तु द्विविधः स्मृतः।
शारीरं दशधा प्रोक्तमर्थदण्डस्त्वनेकधा ॥ 53 ॥
अपराध के लिए दिये जाने वाले दण्ड के दो रूप हैं- 1. शारीरिक तथा
2. आर्थिक। शारीरिक दण्ड के दस और आर्थिक दण्ड के अनेक रूप-भेद हैं।
काकिण्यादिस्त्वर्थदण्डः सर्वस्वान्तस्तथैव च।
शारीरः सन्निरोधादिर्जीवितान्तस्तथैव च॥ 54 ॥
बन्दी बनाने से लेकर मृत्यु-दण्ड देने तक मारना-पीटना आदि यातनाएं
शारीरिक दण्ड के अन्तर्गत आती हैं तथा कौड़ी से लेकर सर्वस्व (सारी सम्पत्ति)
का हरण आर्थिक दण्ड है।
काकिण्यादिस्तु यो दण्डः स तु भाषावरः स्मृतः।
भाषावराद् योऽयं प्रोक्तः कार्षापणपरस्तु सः॥ 55 ॥
उत्तर भारत में लेन-देन में काकिणी अथवा वराटिका (कौड़ियों) का प्रचलन
है, परन्तु दक्षिण भारत में लेन-देन के रूप में प्रचलित मुद्रा कार्षापण (लोहे का
सिक्का) कहलाती है। वैसे काकिणी से अधिक मूल्य की मुद्रा माष और माष से
नारदस्मृति / 273

भी अधिक मूल्य की मुद्रा कार्षापण है। एक प्रकार से कार्षापण का मूल्य साठ
अथवा अस्सी काकिणी है।
कार्षापणावराद् यस्तु चतुः कार्षापणावरः।
द्व्यवरोऽष्टापरश्चान्यस्त्र्यवरो द्वादशोत्तरः॥५६॥
इस प्रकार विभिन्न अपराधों के लिए निर्दिष्ट एक, दो, तीन तथा चार कार्षापणों
से क्रमशः बीस, चालीस, अस्सी तथा एक सौ साठ काकिणी समझना चाहिए।
कार्षापण के मूल्य में न्यूनाधिकता मान्य होने के कारण अपराध विशेष के लिए
निर्दिष्ट दण्ड कार्षापण का सवाया अथवा ड्योढ़े, 2 का 2½, 3, 4 का 5, 6 तथा
8 का 12 किया जा सकता है, इससे अधिक नहीं।
कार्षापणो दक्षिणस्यां दिशि रौप्यः प्रवर्तते ।
पणैर्निबद्धः पूर्वस्यां विंशतिस्तु पणाः स तु ॥ ५७ ॥
दक्षिण भारत (आन्ध्र, कर्नाटक, तमिलनाडु तथा केरल) में कार्षापण का
मूल्य चांदी का एक रुपया है। पूर्व भारत (बिहार, बंगाल, उड़ीसा तथा असम) में
सवा रुपया (बीस आने) को (बीस-पच्चीस वर्ष पूर्णदशमलव पद्धति नहीं अपनाये
जाने पर रुपये के सोलह आने और तौल में सेर की सोलह छटांकें मान्य एवं
प्रचलित थीं) कार्षापण माना जाता है।
माषो विंशतिभागस्तु ज्ञेयः कार्षापणस्य तु।
काकिणी तु चतुर्थांगी माषस्य च पणस्य च ॥ ५८ ॥
कार्षापण का बीस आना मूल्य मानने पर उसके बीसवें भाग को माष
(आना) कहा जाता है और एक माष की चार काकिणी (पैसे) होते हैं।
पञ्चनद्याः प्रदेशे तु संज्ञा या व्यावहारिकी ।
कार्षापणप्रमाणं तु निबद्धमिह नेतया ॥ ५९ ॥
पञ्चनद प्रदेश-आज तो पूर्वी पंजाब के पाकिस्तान में चले जाने से पांच
नदियों का प्रदेश तीन नदियों वाला रह गया है। इसके अतिरिक्त उसके भी तीन
भागों-पंजाब, हरियाणा तथा हिमाचल हो गये हैं- में तो सोलह आने मूल्य के
कार्षापण का लोकव्यवहार में पर्याप्त प्रचलन है। इसलिए उसे लिपिबद्ध करना
आवश्यक नहीं समझा गया।
कार्षापणोऽन्तिका ज्ञेया ताश्चतस्त्रस्तु धानकः ।
तद्द्वादश सुवर्णस्तु दीनारण्यः स एव च ॥ ६०॥
सबसे बड़ा सिक्का कार्षापण है, चार कार्षापणों के योग का नाम धानक है।
बारह धानकों का योग सुवर्ण कहलाता है और इसी सुवर्ण का नाम दीनार है।
वार्तां तु यां चाप्यथ दण्डनीतिम्
राजाऽनुवर्त्तेत सदाऽप्रमत्तः ।
274 / नारदस्मृति

हन्यादुपायैर्निपुणैर्गृहीतान्
तथैव शास्तावन्निगृह्य पापान् ॥ 61 ॥
राजा को विवेक से कार्य लेते हुए प्रयोगों और अनुभवों से सुपरीक्षित एवं
व्यावहारिक दृष्टि से उपयोगी सिद्ध दण्डात्मक उपायों से पापियों तथा अपराधियों
को पकड़कर व बन्धन में डालकर रखना चाहिए तथा देश में वार्ता- कृषि,
वाणिज्य और पशुपालन--के विकास के अवसर जुटाकर प्रजा को समृद्ध बनाना
चाहिए।
देश की समृद्धि एवं सम्पन्नता में सहायक सिद्ध होने वाली दण्ड नीति का
प्रयोक्ता राजा ही प्रजा का अनुराग तथा सम्मान, यश एवं प्रतिष्ठा पाने में सफल होता
है।
॥ नारदस्मृति समाप्त ॥
नारदस्मृति / 275

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श्लोकानुक्रमणिका

श्लोकानुक्रमणिका

[अ]

अदण्ड्या हस्तिनोऽश्वाश्च 4/11/32
अदत्तं तु भयक्रोध 4/4/9
अदुष्ट्यकदारस्य 4/12/61
अकन्येति तु यः कन्यां 4/12/34
अदुष्टार्थमश्रुतार्थं 4/1/141
अक्षवध्रशलाकाद्यैः 4/16/1
अदेयमथ देयं च 4/4/2
अक्षित्सोमयोबीजाभ्यां 4/12/16
अधनस्य ह्यपुत्रस्य 4/1/22
अगम्यागामिनश्चास्ति 4/12/77
अधनास्त्रय एवोक्ताः 4/5/41
अग्निवर्णमयः पिण्डं 4/1/289
अधिक्रियतं इत्यादिः 4/1/124
अग्रं नवभ्यः सप्तभ्यः 4/17/34
अनन्तरः स्मृतः पुत्रः 4/12/103
अचौरै बोधितो मोषं 4/18/20
अनयन् भाटयित्वा तु 4/6/7
अच्छलेनैव चान्विच्छेत् 4/2/11
अनयन्वाहकोऽप्येवं 4/6/8
अजडश्चेदपोगण्डो 4/1/80
अनर्थशीलां सततं 4/12/93
अजाविके तथा रुद्धे 4/6/15
अनाकालभृतो दास्यात् 4/5/31
अज्ञातदोषेषोढा या 4/12/96
अनागमं तु यो भुंक्ते 4/1/87
अज्ञातपितृको यश्च 4/13/18
अनावेद्य तु यो राज्ञे 1/46
अतोऽन्यथा क्लेशभाक् स्यात् 4/11/22
अनियुक्तो नियुक्तो वा 3/2
अतोऽन्यथा वर्तमानः 4/12/88
अनिर्दिष्टस्तु यो राज्ञा 4/16/7
अतोऽप्रवृत्ते रजसि कन्यां 4/12/27
अनिर्दिष्टस्तु साक्षित्वे 4/1/161
अतः परं प्रवक्षामि 4/1/285
अनिर्देश्यावनिन्दौ 4/17/12
अतः परं प्रवक्षामि 4/1/304
अनुकूलामवाग्दुष्टा 4/12/95
अतः परं प्रवक्षामि 4/1/327
अनुत्पन्नप्रजायास्तु 4/12/80
अतः परं प्रवक्षामि 4/1/318
अनुभूय च तास्तीव्राः 4/1/219
अतः परं प्रवक्षामि 4/1/343
अनुशास्यश्च गुरुणा 4/5/13
अतः परीक्ष्यमुभयं 1/70
अनेन विधिना कार्यः 4/1/300
अतः पारशवश्चैव 4/12/104
अनेन सर्वपालानां 4/6/17
अत्र शक्तिविहीनः स्यात् 4/1/131
अनेना भवति स्तेनः 4/18/47
अथ चेदनृतं ब्रूयुः 4/11/7
अनेनायमिदं प्रोक्तः 4/1/293
अथवा कालनियमः 4/1/170
अन्तिमा स्वैरिणीनां या 4/1/24
अथवा कितवा राज्ञे 4/16/8
अन्धो मत्स्यानिवाश्नाति 3/14

नारदस्मृति / 277

अन्यक्षेत्रोपजातानां 4/11/14 अर्थिनां संनियुक्तो वा 2/22
अन्यत्र ब्राह्मणेभ्यः स्यात् 4/13/52 अर्थेष्वधिकृतो यः स्यात् 4/5/24
अन्यत्र रजकव्याध 4/1/19 अर्धक्षयात्तु परतः 4/9/9
अन्यथा न विशुद्धः स्यात् 4/1/312 अर्धश्छेदपचीयेत 4/8/5
अन्यद्रव्यव्यवहितं 4/2/5 अवनिष्ठीवतो दर्पात् 4/15/27
अन्यप्रकारादुचितात् 4/17/48 अवस्करस्थलश्वभ्र 4/11/15
अन्यवादी क्रियाद्वेषी 2/33 अविक्रेयाणि विक्रीणन् 4/1/67
अन्यस्या यो मनुष्यः स्यात् 4/12/18 अविद्यमाने पित्र्यर्थे 4/13/34
अन्याक्षरनिवेशन 2/17 अविशेषेण सर्वेषां 4/14/9
अन्यायेनापि यद्भुक्तं 4/1/91 अव्यायच्छन्न विक्रोशन् 4/6/13
अन्यार्थमर्थहीनं च 2/8 अशक्तप्रेतनेष्टेषु 4/11/23
अन्योन्यं त्यजतो रागं 4/12/90 अशक्तौ भेषजस्यार्थे 4/1/66
अन्वाहितं याचितकं 4/4/4 अशास्त्रोक्तेषु चान्येषु 4/17/7
अन्वाहितं हृत न्यस्त 4/1/92 अशिरः पुरुषः कार्यः 4/18/45
अपत्यमुत्पादयितुः 4/12/54 अशिरांस्यपि दिव्यानि 4/1/270
अपत्यार्थं स्त्रियः सृष्टाः 4/12/19 अशुचिर्वचनाद्यस्य 4/17/52
अपराधं परिज्ञाय 4/18/38 अशुद्धः कितवो नान्यत् 4/16/5
अपात्रे पात्रमित्युक्ते 4/4/11 अश्वमेध सहस्रं च 4/1/211
अप्रकाशाश्च विज्ञेयाः 4/18/4 अष्टभिर्मण्डलैरेवं 4/1/286
अप्रवृत्तौ तु भूतानां 4/12/101 अष्टाङ्गोऽष्टादशपदः 1/9
अप्राप्तव्यवहारश्च 1/54 अष्टापाद्यं तु शूद्रस्य 4/18/51
अप्राप्तव्यवहारश्चेत् 4/1/31 अष्टौ वर्षाण्युदीक्षेत 4/12/98
अभावे तु दुहितॄणां 4/13/51 अष्टौ विवाहा वर्णानां 4/12/38
अभिज्ञातैश्च वल्मीक 4/11/5 असत्याः सत्यशंशाकाः 1/71
अभियुक्तोऽभियोगस्य 2/26 असत्सु देवरेषु स्त्री 4/12/48
अभीक्ष्णं चोद्यमानो यः 4/1/237 असद्व्ययात् पूर्वचौर्यात् 4/18/11
अभूतमप्यभिहितं 1/64 असाक्षिणो ये निर्दिष्टा 4/1/188
अभ्युपेत्य च शुश्रूषां 4/5/1 असाक्षिप्रत्ययास्त्वन्ये 4/1/172
अमुमर्थं च पत्रस्थं 4/1/295 असाक्ष्यपि हि शास्त्रेऽस्मिन् 4/1/157
अम्बष्ठोग्रौ तथा पुत्रौ 4/12/107 असामान्यतमां गत्वा 4/12/75
अयुक्तं साहसं कृत्वा 4/1/245 अस्वतन्त्राः प्रजाः सर्वाः 4/1/33
अयोनौ वा समाक्रामेत् 4/6/19 अस्वतन्त्राः स्त्रियः पुत्राः 4/1/34
अरण्ये निर्जने रात्रौ 2/30 अस्वामिकमदायादं 4/3/18
अरण्ये निर्जने रात्रौ 4/1/241 अस्वाम्यनुमताद्दासात् 4/7/3
अर्थानां सार्वभौमोऽयं 4/1/105 अहोढान्विमृशेच्चौरान् 4/18/8
अर्थिनां भूरिभावाच्च 4/17/41 अहोरात्रोषिते स्नाते 4/1/268
278 / नारदस्मृति

text
[ आ ] इत्यादि कृतश्रावणं 4/1/282
इत्येते शपथाः प्रोक्ता 4/1/250
इष्टतः स्वामिनश्चाङ्गैः 4/5/7
[ ई ]
आगतश्च शरग्राही 4/1/311
आगमवर्जितं दोषं 2/12 ईर्ष्याषण्ढश्च सेव्यश्च 4/12/13
आगमः प्रथमं कार्यः 1/36 ईर्ष्याषण्ढादयो येऽन्ये 4/12/15
आगमेन विशुद्धेन 4/1/85 ईर्ष्यासूयसमुत्थे तु 4/12/89
आचार्यः शिक्षयेदेनं 4/5/17 [ उ ]
आज्ञालेखः पट्टकः शासनं वा 2/38
आतृतीयात्तथा वर्षात् 4/1/169 उत्कृष्टं चापकृष्टं च 4/1/58
आध्यं पूर्वपक्षस्य 4/1/164 उत्कोचद्यूतदौत्यार्ति 4/1/47
आधिस्तु द्विविधः प्रोक्तः 4/1/139 उत्क्रम्य तु वृत्तिं यत्र 4/11/28
आधिः सीमा बालधनं 4/1/81 उत्क्रोशातां जनानां च 4/14/20
आनुलोम्येन तत्रैका 4/12/105 उत्तमस्त्वायुधीयोऽत्र 4/5/23
आनुलोम्येन वर्णानां 4/12/102 उत्तमे साहसे दण्डः 4/14/8
आनुलोम्येन वर्णानां 4/12/109 उन्मत्तः पतितः क्लीबः 4/12/37
आ पञ्चमात्तथा 4/1/168 उपकारक्रियाकेलिः 4/12/66
आपत्स्वनन्तरावृत्तिः 4/1/56 उपकृश्य तु राजानं 4/15/30
आपत्स्वपि हि कष्टासु 4/4/5 उपस्थमुदरं जिह्वा 4/18/37
आपदं निस्तरेद्वैश्यः 4/1/111 उपस्थानाय दानाय 4/1/118
आपदं ब्राह्मणस्तीर्त्वा 4/1/59 उपहन्येत वा द्रव्यं 4/8/6
आयुधान्यायुधीयानां 4/17/10 उपानयेद् गां गोपाय 4/6/11
आर्षश्चैव हि दैवश्च 4/12/39 उपायैर्विविधैः सर्वैः 4/14/17
आविद्याग्रहणाच्छिष्यः 4/5/8 उभयानुमतो यः स्यात् 4/1/192
आष्टमाद् वत्सरात् सिद्धिः 4/1/168 उल्काहस्तस्तोऽग्निदो ज्ञेयः 4/1/173
आसप्तमात्पञ्चमाद्वा 4/12/7 [ ऊ ]
आसामन्यतां गत्वा 4/12/75
आसेधकाल आसिद्ध 1/51 ऊनं वाप्यधिकं वार्थं 4/1/234
आस्वेव तु भुजिष्यासु 4/12/79 ऊर्ध्वं यस्य द्विसप्ताहात् 4/1/331
आहर्तैर्वाभियुक्तः स्यात् 4/1/90 ऊर्ध्वं विभागाज्जातस्तु 4/13/44
आहितोऽपि धनं दत्वा 4/5/32 [ ऋ ]
आहूय साक्षिणः पृच्छेत् 4/1/198
[ इ ]
इच्छन्ति पितरः पुत्रान् 4/1/5 ऋज्वी घटतुलाकार्या 4/1/263
इच्छन्तीमिच्छतः प्राहुः 4/12/42
नारदस्मृति / 279

ऋणं तु सोदयं दत्वा 4/5/33
ऋणं देयमदेयं च 4/1/1
ऋणादानं पञ्चविंशतिः 1/21
ऋणादानं ह्युपनिधिः 1/16
ऋणिकः सधनो यस्तु 4/1/132
ऋणिष्वप्रतिकुर्वत्सु 4/1/119
ऋत्विक्तु त्रिविधो दृष्टः 4/3/10
ऋत्विग्याज्यमदुष्टं 4/3/9
ऋत्विनां व्यसनेऽप्येवं 4/3/8
┌───┐
│ ए │
└───┘
एकजाति द्विजातींस्तु 4/15/22
एकमेवाद्वितीयं तत् 4/1/210
एकश्चेदुन्नयेत् सीमां 4/11/10
एकस्य चेत्स्याद्व्यसनं 4/3/7
एकादशविधः साक्षी 4/1/149
एतानि सततं पश्येत् 4/17/55
एतान्येव प्रमाणानि 4/1/27
एतेनैव गृहोद्यान 4/11/12
एवं पश्यन् सदा राजा 1/74
एवं विधानि काष्ठानि 4/1/265
एवं सम्बन्धनात्तस्मात् 4/1/206
एष एव विधिर्दृष्टः 4/2/14
एष धारयते च त्वां 4/1/294
एष वृद्धिविधिः प्रोक्तः 4/1/110
एषामेव प्रभेदोऽन्यः 1/20
एषां तु धर्म्याश्चत्वारः 4/12/44
एषां षड्बन्धदायादाः 4/13/47
┌───┐
│ ओ │
└───┘
ओघवाताहतं बीजं 4/12/56
┌───┐
│ औ │
└───┘
औरसः क्षेत्रजश्चैव 4/13/45
┌───┐
│ क │
└───┘
कक्षाछेदे तुलाभङ्गे 4/1/284
कन्या नर्तुमपेक्षेत 4/12/25
कन्यायाममकामायां 4/12/71
कन्यायां दत्तशुल्कायां 4/12/30
कन्यैवाक्षतायोनिर्या 4/12/46
कर्तृनथो साक्षिणश्च 1/13
कर्माकुर्वन् प्रतिश्रुत्य 4/6/5
कर्मापि द्विविधं ज्ञेयं 4/5/5
कश्चिच्चेत् संचरन् देशान् 4/3/16
कश्चित्कृत्वोऽमनः चिह्नं 4/1/166
काकिण्यादिस्तु यो दण्डः 4/18/55
काकिण्यादिस्त्वर्थ दण्डः 4/18/54
काणमप्यथवा खञ्जं 4/15/18
कानीनश्च सहोढश्च 4/13/17
कामक्रोधाभिभूतार्तं 4/1/40
कामात् क्रोधाच्चलोभाच्च 1/26
कायाविरोधिनी शश्वद् 4/1/104
कारणप्रतिपत्या च 2/31
कारणादनिमित्तं वा 4/17/27
कार्येष्वभ्यन्तरो यः स्यात् 4/1/152
कार्षापणावराद्यस्तु 4/18/56
कार्षापणोऽन्तिका ज्ञेया 4/18/60
कार्षापणो दक्षिणस्यां 4/18/57
कालिका कारिता चैवं 4/1/102
काष्ठकाण्डतृणादीनां 4/18/22
कितवेष्वेव तिष्ठेरन् 4/16/4
किन्तु राज्ञा विशेषेण 1/68
कुटुम्बं विभृयाद्भ्रातुः 4/13/10
कुटुम्बभरणाद्द्रव्यं 4/4/6
कुटुम्बार्थेषु यश्चोक्तः 4/13/35
कुद्दालपाणिर्विज्ञेयः 4/1/174
कुनखी श्यामदन्तश्च 4/1/184
कुलजे वृत्तसम्पन्ने 4/2/2
कुलानि श्रेणयश्चैव 1/7
280 / नारदस्मृति

कुलीना ऋजवः शुद्धाः 4/1/153
कुले ज्येष्ठास्तथाश्रेष्ठ 4/1/42
कुले तदवशेषे हि 4/12/83
कुसीदकृषिवाणिज्य 4/1/46
कूटाक्षदेविनः पापात् 4/16/6
केशेषु गृह्णतो हस्तौ 4/15/28
कोटिशते तु सम्पूर्णे 4/1/8
कोशान्तानि तुलादीनि 4/1/336
कौमरं पतिमुत्सृज्य 4/12/47
क्रमागतं प्रीतिदायः 4/1/51
क्रमागतेष्वेष धर्मः 4/3/11
क्रमाद्व्याहतं प्राप्तं 4/1/4
क्रमाद्धोते प्रपद्येरन् 5/13/49
क्रासत्यन्निभृतोऽकस्मात् 4/1/194
क्रियते धर्मतत्त्वज्ञैः 4/1/317
क्रियापि द्विविधा प्रोक्ता 2/28
क्रियोपकरणं चैषां 4/6/4
क्रीत्वा नानुशयं कुर्यात् 4/9/16
क्रीत्वा मुक्तं चतुर्भेदम् 1/23
क्रीत्वा मूल्येन यः पण्यं 4/9/1
क्रीत्वा मूल्येन यः पण्यं 4/9/2
क्रूरं धनुः सप्तेशतं 4/1/307
क्रेता पण्यं परीक्षेत 4/9/4
क्रेतारश्चैव भाण्डानां 4/18/14
क्लान्तसाहसिक श्रान्त 4/1/182
क्षत्तारं क्षत्रिया शूद्रात् 4/12/112
क्षत्रिया षट् समास्तिष्ठेत् 4/12/99
क्षेत्रं त्रिपुरुषं यत्स्यात् 4/11/27
क्षेत्रजेष्वपि पुत्रेषु 4/13/14
क्षेत्रसीमाविवादेषु 4/11/2
क्षेत्रिकस्य यदज्ञातं 4/12/55
क्षेत्रिकानुमते बीजं 4/12/58

┌──────┐
│ ख │
└──────┘
खादिर कारयेत्तं च 4/1/264

┌──────┐
│ ग │
└──────┘
गणवृद्धायस्त्वन्ये 4/11/8
गन्धमादनसंस्थस्य 2/16
गन्धमाल्यमदत्तं तु 2/35
गरीयसि गरीयांसम् 4/18/35
गर्भस्थसदृशो ज्ञेयः 4/1/35
गवां प्रचारे गोपालाः 1/53
गवां शताद्भवत्सतरी 4/6/10
गवादिषु प्रणष्टेषु 4/14/22
गहनत्वाद्दिवादानां 1/44
गावस्तु गोभिना देयाः 4/11/39
गुरुतल्पे भगः कार्यः 4/18/44
गुरुरात्मवतां शास्ता 4/18/50
गृह्यमानस्तुवैचित्यात् 4/1/246
गृहक्षेत्रं च दृष्टे 4/11/42
गृहद्वाराशुचिस्थाने 4/5/6
गृहीत शिल्पः समये 4/5/20
गृहीत्वापि स्थले द्रव्यं 4/1/72
गृहीत्वोपगतं दद्यात् 4/1/114
गृहे जातस्तथा क्रीतः 4/5/26
गृहे वै मुषिते राजा 4/18/18
गृह्णात्यदत्तं यो लोभात् 4/4/12
गोचरे यस्य मुष्येत 4/18/16
गोभिस्तु भक्षितं धान्यं 4/11/38
गोभूहिरणयस्त्रीस्तेय 1/45
गोषु ब्राह्मणसंस्थासु 4/18/33
गौः प्रसूता दशाहे च 4/11/30
ग्रहीतुः सह योऽर्थेन 4/2/9
ग्रामसीमासु च बहिः 4/11/3
ग्रामे व्रजे विविक्ते वा 4/14/23
ग्रीमेष्वन्वेषणं कुर्युः 4/14/26
ग्रामोपान्ते च यत् क्षेत्रं 4/11/40
ग्राहको यदि नष्टः स्यात् 4/1/13
ग्रीष्मे तु सलिलं प्रोक्तं 4/1/334

नारदस्मृति / 281

घ
घटोऽग्निरुदकं चैव ४/१/२५२
घृतेनाभ्यर्च्य गात्राणि ४/१२/८२
च
चतुर्दशविधः शास्त्रे ४/१२/११
चतुर्विंशावरः पूर्वः ४/१८/३०
चतुर्हस्ता घटतुला ४/१/२६२
चाण्डालो जायते शूद्रात् ४/१२/११३
चैलकौशेयचर्मास्थि ४/१/६३
चोदना प्रतिकालं च ४/१/२३६
चोदना प्रतिघाते तु ४/१/२३८
चौरहृतं प्रपद्यैव ४/१८/२१
चौरैर्हृतं जले मग्नम् ४/२/१२
चौराणां भक्तदा ये स्युः ४/१८/१३
चौरापहृतविक्रीता ४/५/३८
च्युतः सर्वधर्मात् कुलिकाः ४/१/१८७
छ
छायानिवेशिसतो रक्ष्यः ४/१/३२६
छिन्नभागे गृह क्षेत्रे ४/१३/४८
छिन्नभिन्नहतोन्मृष्ट ४/१/१४६
ज
जाता ये तु नियुक्तायां ४/१३/१९
जात्यैव लोहकारो यः ४/१/२८८
जारजातमरिक्थीयं ४/१२/८५
ज्ञात्वैताननृते दोषां ४/१/२२०
ज्येष्ठायांशोऽधिको देयः ४/१३/१३
त
तण्डुलानां प्रवक्ष्यामि ४/१/३३७
तण्डुलान् कारयेच्छुक्लान् ४/१/३३८
तण्डुलान् भक्षयित्वा तु ४/१/३४१
तत्पुनर्द्वादशविधं ४/१/५०
तत्पुनस्त्रिविधं ज्ञेयं ४/१४/३
तत्पुनस्त्रिविधं ज्ञेयं ४/१/४४
तत्रातिष्ठः स्मृतो धर्मः ३/६
तत्प्राज्ञेन विनीतेन ४/१/२५८
तत्र पूर्वश्चतुर्वर्गः ४/५/२९
तत्र शिष्टं छलं राजा १/३१
तत्र सत्ये स्थितो धर्मः १/११
तत्राद्यावप्रतिकारौ ४/१२/१४
तत्रेष्टावदेयानि ४/४/३
तत्सत्यं वद कल्याणि ४/१/२८०
तथान्यस्मै तु विक्रीतं ४/८/८
तथारूढविवादस्य ४/१/९३
तदपि त्रिविधं प्रोक्तं ४/१४/१३
तदष्टभागापचयात् ४/११/२५
तदेतत्त्रिविधं ज्ञेयं ४/१/७४
तदा तु न सकुल्याः ४/१/११३
तपः क्रीताः प्रजा राज्ञा ४/१७/२५
तपस्वी चाग्निहोत्री च ४/१/९
तयोरनियतं प्रोक्तं ४/१२/३
तयोरपि पिता श्रेयान् ४/१/३७
तलवद्दृश्यते व्योम १/७२
तवाह्मितिचात्मानं ४/५/४०
तवाह्मित्युपगतः ४/५/३४
तस्मात्तं नावजानीयात् ४/१७/३२
तस्मात्प्रत्यक्षदृष्टोऽपि १/७३
तस्मात्सभ्यः सभां प्राप्य ३/१५
तस्माद्देशे च काले च ४/८/१२
तस्माद्धर्मासनं प्रप्य १/३४
तस्मिन्नेव समारूढे ४/१/२७७
तस्य दण्डः क्रियापेक्षः ४/१४/७
तस्य धर्मः प्रजारक्षा ४/१७/३३
तस्य वर्षशते पूर्णे ४/१/२०५
तस्यापि दृष्टं त्रैविध्यं ४/१५/५
282 / नारदस्मृति

text
तस्यामेव तु यो वृत्तौ 4/1/60 दाप्यः पणमेकोऽपि 4/1/15
तस्यैव भेदः स्तेयं स्यात् 4/14/12 दायभागे तु एकोना 1/24
तान्तवस्य च संस्कारे 4/9/13 दायादेऽसति बन्धुभ्यः 4/3/17
ताम्रे पञ्चपलं विद्यात् 4/9/12 दासनैकृतिकाश्राद्ध 4/1/178
तिष्ठतिष्ठेति वा ब्रूयात् 4/12/67 दिवाकृते कार्यविधौ 2/29
तीरितं चानुशिष्टं च 1/65 दिव्यान्द्यप्यप्रमाणानि 1/30
तुलयित्वा नरं पूर्वं 4/1/275 दीयमानं न गृह्णाति 4/8/9
तुलाधरिममेयानां 4/18/25 दीर्घकुत्सितरोगार्त्ता 4/12/36
तुलिता यदि वर्धेत 4/1/283 दीर्घतीव्रामयग्रस्ताः 4/13/22
तृतीयतापप्तं तं 4/1/290 दुर्द्दष्टे व्यवहारे तु 1/66
तेन क्रयोविक्रयश्च 4/1/48 दुहिताचार्यभार्या च 4/12/74
तेषामपि न बालः स्यात् 4/1/190 दूतीप्रस्थापनैर्वापि 4/12/64
त्रयःस्वतन्त्रा लोकेऽस्मिन् 4/1/32 दृश्यते शोणितं यस्य 4/1/342
त्रिंशांशो रोमबद्धस्य 4/9/15 देवासुरमनुष्याणां 4/1/279
त्रिविधं क्षत्रियस्यापि 4/1/53 देशकालं दिशं जातिं 4/18/9
त्रिविधस्यास्य दृष्टस्य 4/1/76 देशकाल फल द्रव्य 4/1/71
त्र्यहाद्दोहं परीक्षेत 4/9/5 देशकालवयोद्रव्य 4/1/233
त्वक्छेदकः शतं दण्ड्यः 4/15/29 देशग्रामगृहघ्नांश्च 4/18/5
स्वमग्ने सर्वदेवानां 4/1/291 देशजातिकुलादीनां 4/15/1
त्वरमाण इवाकस्मात् 4/1/196 देशधर्मों निरपेक्ष्य स्त्री 5/12/52
त्वं विषं ब्रह्मणः पुत्रः 4/1/325 देशाचाराविरुद्धं यत् 4/1/136
त्वं वेत्सि सर्वभूतानां 4/1/278 देवतस्करराजभ्यः 4/3/6
दोषवत् कारणं यत् स्यात् 4/10/7
द्यूताह्वयं चैकभेदं 1/27
द द्रव्यप्रमाणहीनं यत् 2/11
दत्तमूल्यस्य पण्यस्य 4/8/10 द्रव्यमस्वामिविक्रीतं 4/7/2
दत्त्वा द्रव्यमसम्प्यग् यः 4/4/1 द्वयभियोगस्तु विज्ञेयः 1/27
दत्त्वा न्यायेन यः कन्यां 4/12/32 द्वयोरापन्नयोस्तुल्यं 4/15/10
दद्यात्पुत्रविधवा 4/1/17 द्वयोर्विवदतोर्थे 4/1/163
दद्युस्ते बीजिनो पिण्डं 4/13/20 द्वावंशौ प्रतिपद्येत 4/13/12
दर्पाद्वा यदि वा मोहात् 4/12/169 द्विकं त्रिकं चतुष्कं च 4/1/100
दर्शितं प्रतिकालं यत् 4/11/140 द्विकं शतं वा गृहीत 4/1/101
दशस्थानानि दण्डस्य 4/18/36 द्विगुणं त्रिगुणं वापि 4/1/106
दस्युवृत्ते यदि नरे 4/18/12 द्वितीयेऽह्नि ददत्क्रेता 4/9/3
दानग्रहणपश्वन्न 4/13/38 द्विपदामर्धर्धमासः स्यात् 4/9/6
दानमध्ययनं यज्ञः 4/17/50 द्विरभ्यस्ताः पतन्त्यक्षाः 4/16/3
नारदस्मृति / 283

द्विरामुष्यायणादद्युः 4/13/23 न त्वेवाधो सोपकारे 4/1/129
द्विविधास्तस्करा ज्ञेयाः 4/18/1 नदीनां संगमे तीर्थेषु 4/12/63
द्वे भार्ये क्षत्रियस्यान्थे 4/12/6 नदीषु नातिवेगासु 4/1/305
नदीष्वेवेतनस्तारः 4/17/38
[ध] नदीसन्तारकान्तार 1/49
न परेण समुद्दिष्टं 4/1/165
धनमूलाः क्रियाः सर्वाः 4/1/43 न पुत्रणं पिता दद्यात् 4/1/10
धनस्त्रीहारिपुत्राणां 4/1/23 न बान्धवा न सुहृदः 4/1/211
धर्मज्ञस्य कृतज्ञस्य 4/17/43 न भोक्तव्यो बलादाधिः 4/1/127
धर्मशास्त्रं पुरस्कृत्य 1/35 न मज्जनीयं स्त्रीबालं 4/1/313
धर्मशास्त्रविरोधे तु 1/40 न मित्रकारणाद्राज्ञा 4/11/3
धर्मज्ञास्त्रार्थकुशलाः 3/5 नरकेषु च ते शश्वत् 4/1/217
धर्मशास्त्राथंशास्त्राभ्यां 1/37 न लिप्यते यथा वह्निः 4/17/18
धर्मश्च व्यवहारश्च 1/10 नवभेदा अश्रुश्रूषा 1/22
धर्मश्चार्थश्च कीर्तिश्च 1/33 न वृद्धिः प्रीतिदत्तानां 4/1/108
धर्मस्यार्थस्य यशसो 1/14 न शीते तोयशुद्धिः स्यात् 4/1/259
धर्मासनगतः श्रीमान् 4/17/30 न शूद्रायाः स्मृतः कालाः 4/12/100
धर्मेण व्यवहारेण 4/1/122 नष्टंविनष्टं कृमिभिः 4/6/14
धर्मेणोद्धरतोराज्ञो 1/32 नष्टा भग्ना च लग्ना च 4/11/33
धर्मैकतानाः पुरुषाः 1/1 नष्टे धर्मे मनुष्याणाम् 1/2
धर्मोपदेशं दर्पेण 4/15/24 नष्टे मृते प्रव्रजिते 4/12/97
धान्य दशभ्यः कुम्भेभ्यः 4/18/26 न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः 3/18
धारयेदुत्तरे पार्श्वे 4/1/272 न स्त्री पतिकृतं दद्यात् 4/1/16
न स्यात् क्षेत्रं बिना सस्यं 4/12/59
[न] न स्याद्द्रव्य परीमाणं 4/1/134
न कथञ्चन कुर्वीत 4/1/57 न हि प्रत्यर्थिनि प्रेते 4/1/95
न किल्विषेणापवदेत् 4/15/19 नाकरिष्यद्यदिस्रष्टा 4/1/70
न गच्छेदगर्भिणीं निन्द्यां 4/12/84 नातिक्रूरेण धनुषा 4/1/306
न गृहीतागमं क्रेता 4/7/4 नादुष्टां दूषयेत् कन्यां 4/12/31
नग्नो मुण्डः कपालेन 4/1/201 नानियुक्तेन वक्तव्यं 3/1
नग्नो मुण्डः कपालेन 4/1/202 नानुकूलं यद्राज्ञा 4/10/4
न च भार्याकृतमृणं 4/1/18 नान्तरेणोदकं सस्यं 4/11/19
न च मिथ्याभियुञ्जीत 1/57 नान्यपत्यं परगृहे 4/12/60
न चेद्दद्यात्तु निक्षेप्तुः 4/2/4 नापराह्ने न सन्ध्यायां 4/1/320
न जातु ब्राह्मणं हन्यात् 4/18/41 नाभिमात्रे जलेस्थाप्य 4/1/308
न त्वेहोढान्विताश्चौराः 4/18/6 नाभियुक्तोऽभियुञ्जीत 1/55
284 / नारदस्मृति

नाभिशस्तान्न पतितान्न ४/१७/४० पथि क्षेत्रेवृत्तिः कार्या ४/११/४१
नामजातिग्रहं त्वेषां ५/१५/२३ पदे प्रमूढे भग्ने वा ४/१४/२४
नार्त्तानां तोयशुद्धिः स्यात् ४/१/२५५ परं पवित्रममृतं ४/१/३४७
नार्थसम्बन्धिनो नाप्ता ४/१/१७७ परक्षेत्रस्य मध्ये तु ४/११/१७
नार्वाक् संवत्सरद्विंशात् ४/१/१४ परगात्रेष्वभिद्रोहः ४/१५/४
नासन्दिग्धः प्रतिष्ठेत ४/५/१० परतो व्यवहारज्ञः ४/१/३६
नास्तिकव्रात्यदाराग्नि ४/१/१८० परपूर्वाः स्त्रियस्त्वन्याः ४/१२/४५
नास्ति सत्यात् परोधर्मः ४/१/२२६ परस्त्रियां सहाऽकाले ४/१२/६२
निक्षिप्तं वा परद्रव्यं ४/७/१ पराजिरे गृहं कृत्वा ४/६/२०
निखेयो निश्चलः कार्यः ४/१/२६६ परिक्षीणे पतिकुले ४/१३/२९
निम्नगापहतोत्सृष्ट ४/११/६ परिभुक्तं च यद्दासः ४/९/७
निरुत्साहान् रुजा क्लिष्टान् ४/१/३१४ परीक्ष्य पुरुषः पुंस्त्वे ४/१२/८
निर्गते तु यदा यस्मिन् ४/१८/१७ परेण निहितं लब्ध्वा ४/७/६
निर्णिक्तव्यवहारेषु १/६२ पलायते य आहूतः २/३२
निर्दिष्टेष्वर्थजातेषु ४/१/२३२ पलायते य आहूतः १/५९
निर्दोषं दर्शयित्वा तु ४/८/७ पशुयोनावतिक्रामन् ४/१२/७६
निर्बलोऽपि यथा स्त्रीणां ४/१७/२२ पाणौ यश्च निगृह्णीयात् ४/१२/६७
निर्वेष्टकामो रोगार्त्तः १/५२ पातयेन्न तमप्राप्य ४/१/२९७
निसर्गषण्ढोविभ्रश्च ४/१२/१२ पादोऽधर्मस्य कर्त्तारम् ३/१२
निष्ठुराश्लीलतीव्रत्वातदपि ४/१५/२ पारुष्य दोषावृत्तयोः ४/१५/८
नैकः समुन्नयेत् सीमां ४/११/९ पाषण्डिनैगमश्रेणी ४/१०/२
न्यायापेतं यदन्येन ४/१७/९ पाषण्डिनैगमादीनां ४/१०/१
[ प ] पितरस्त्ववलम्बन्ते ४/१/२२२
पक्वान्नानां कृतान्नानां ४/१८/२४ पितुर्युपरते पुत्राः ४/१/२
पक्षद्वयाभिसम्बन्धात् १/२८ पितुर्यूर्ध्वं गते पुत्राः ४/१३/२
पक्षानुत्सार्य तु सभ्यैः २/४२ पिता दद्यात् स्वयं कन्यां ४/१२/२०
पञ्चपश्यन्नृते हन्ति ४/१/२०८ पितापुत्रविवादश्च ४/१७/३
पञ्चरूपाणि राजानः ४/१७/२६ पिता रक्षति कौमारे ४/१३/३१
पञ्चानद्या प्रदेशे तु ४/१८/५९ पितुरेव नियोगाद्यः ४/१/११
पञ्चाशद्ब्राह्मणो दण्ड्यः ४/१५/१६ पितृद्विट् पतितः षण्ढः ४/१३/२१
पणौ यश्च निगृहीयात् ४/१२/१६७ पितृव्येनाविभक्तेन ४/१/३
पण्यमूल्यं भृतिर्न्यासो २/३६ पितैव वा स्वयं पुत्रान् ४/१३/४
पण्यमूल्यं भृतिस्तुष्टनां ४/४/८ पित्रैव तु विभक्ता ये ४/१३/१५
पतितं पतितेत्युक्त्वा ४/१५/२१ पुत्रापराधे न पिता ४/१५/३२
पुत्राभावे तु दुहिता ४/१३/५०
पुत्रिणी तु समुत्सृज्य ४/१/२०
नारदस्मृति / 285

पुत्रेणापि कृतं कार्यं 4/1/30 प्राग्दृष्टदोषशैलूषः 4/1/181
पुनर्भूवां विधिरस्त्वेष 4/12/53 प्रतिलोम्येन वर्णानां 4/12/110
पुरप्रदानं सम्भेदः 4/17/2 प्राप्ता देशाद्धनक्रीता 4/12/51
पुरागैर्धर्मवचनैः 4/1/200 प्रीतिदत्तं तु यत्किञ्चित् 4/1/109
पुरुषं हरतः पात्यः 4/18/28
पुुरुषाः सन्ति ये लोभात् 1/69 [ फ ]
पूजनीयास्त्रयोऽतीताः 4/1/6 फलमूलोदकादीनां 4/14/4
पूर्वपक्षश्रुतार्थस्तु 2/2 फल हेतोरुपायेन 4/3/2
पूर्वपादे हि लिखितं 2/27
पूर्वप्रवर्तमुत्सन्नं 4/11/20 [ ब ]
पूर्वमाक्षारयेद्यस्तु 4/15/9
पूर्ववादं परित्यज्य 2/24 बह्वश्चेत् प्रतिभुवः 4/1/120
पूर्वाह्णे सोपवासस्य 4/1/328 बालमूढास्वतन्त्रार्त 4/4/10
पूर्वोक्तेन विधानेन 4/12/87 बालोऽज्ञानादसत्यात् 4/1/191
पृथग्गणांश्च ये भिन्द्युः 4/10/6 ब्रह्मघ्नस्य तु ये लोकाः 4/1/225
पौनर्भवोऽपविद्धश्च 4/13/46 ब्रह्मचारी चरेद्भैक्षं 4/5/9
प्रकाशवञ्चकास्ते तु 4/18/2 ब्राह्मणक्षत्रियविशां 4/12/4
प्रकीर्णके पुनज्ञेयः 4/17/1 ब्राह्मणश्चैव राजा च 4/17/42
प्रज्ञा तेजः पार्थिवानां 4/17/19 ब्राह्मणस्य चतुःषष्ठी 4/18/52
प्रतिगृह्णाति पोगण्डं 4/2/15 ब्राह्मणस्य तु यद्देयं 4/1/112
प्रतिगृह्य च यः कन्यां 4/12/24 ब्राह्मणस्य तु विक्रेयं 4/1/64
प्रतिगृह्य तु यः कन्यां 4/12/35 ब्राह्मण स्यानुलोम्येन 4/12/5
प्रतिग्रहो द्विजातीनां 4/3/15 ब्राह्मणस्यापराधेेषु 4/18/43
प्रतिमासं स्रवन्तो या 4/1/103 ब्राह्मणस्यापरिहारः 4/17/35
प्रतिरूपकराश्चैव 4/18/3 ब्राह्मणानुपसेवेत 4/17/34
प्रत्यक्षचिह्नो विज्ञेयः 4/1/175 ब्राह्मणाः क्षत्रियाः वैश्याः 4/1/154
प्रत्यक्षपरिभोगात्तु 4/1/82 ब्राह्मणोऽपि निधिं लब्ध्वा 4/7/7
प्रथमारोपणे ग्राह्यं 4/1/273 ब्राह्मण्यं ब्राह्मणो जह्यात् 4/17/15
प्रथमे ग्रन्थिभेदानां 4/18/32 ब्राह्मादिषु विवाहेषु 4/12/29
प्रदेशिन्यक्षता यस्य 4/1/348
प्रमाणानि प्रमाणस्थैः 4/1/68 [ भ ]
प्रमादाद्धनिनस्तद्वत् 4/1/126 भक्तस्योपेक्षणात् सद्यः 4/5/36
प्रमादाद्धनिनो यत्र 4/1/235 भक्तदासश्च विज्ञेयः 4/5/28
प्रमादान्नाशितं दाप्यः 4/3/5 भक्तावकाशदातारः 4/14/19
प्रसह्य हरणादुक्तः 4/12/43 भग्नं च चरितं चैव 4/1/321


286 / नारदस्मृति

भरणं चास्य कुर्वीरन् ४/१३/२६ मला ह्येते मनुष्येषु ४/१५/१४
भर्त्राप्रीतेन यद्दत्तं ४/१/२८ महापथिकसामुद्र ४/१/१७९
भाण्डपिण्डव्ययोद्धार ४/३/४ महापराधे दिव्यानि ४/१/२४९
भाण्डं व्यसनमागच्छेत् ४/६/९ महापराधे निर्धर्मे ४/१/३३२
भार्या स्नुषा च भृत्या च ४/१/२५ महापशूंस्तु नयतः ४/१८/२९
भाषाया उत्तरं यावत् २/७ महोक्षो जनयेद्वत्सा ४/१२/५७
भिद्यते मुखवर्णोऽस्य ४/१/१९५ मागधायोगवौ तद्वद् ४/१२/१११
भुज्यतेऽनागमं यत्तु ४/१/८८ माता त्वभाव सर्वेषां ४/१२/२१
भुज्यमानान् परर्थान् ४/१/७८ माता मातृनिर्विशेषश्वश्रूः ४/१२/७३
भूतच्छलानुसारित्वात् १/२९ मातृनिवृत्ते रजसि ४/१३/३
भृत्यानां वेतनस्योक्तः ४/६/१ मात्रा च स्वधनं दत्तं ४/१३/७
भूताविष्टनृपद्विष्ट ४/१/१८३ माषं गां दापयेद् दण्डं ४/११/३१
भूधर्र्यति सत्येन ४/१/२१३ माषो विंशतिभागस्तु ४/१८/५८
भृतकस्त्रिविधो ज्ञेयः ४/५/२२ मांसौदन तिलक्षौम ४/१/६२
भृति षड्भागमादद्यात् ४/६/६ मिथः संघातकरणं ४/१०/५
भृत्याय वेतनं दद्यात् ४/६/२ मिथ्या च विपरीतं च २/६
भृत्यावनिश्चितायां तु ४/६/३ मिथ्याभियोगिनो ये २/३७
भृशं न ताडयेदेनं ४/५/१४ मिथ्या सम्प्रतिपत्तिर्वा २/४
भोगं केवलतो यस्तु ४/१/८६ मिथ्यैतन्नाभिजानामि २/५
भ्रमत् पतितायामन्तः ४/१/३४६ मूल्याष्टभागो हीयते ४/९/८
भ्रष्टं तु दुखितं यत्स्यात् २/१४ मृताः स्युः साक्षिणो यत्र ४/१/१३८
भ्रातृणामप्रजाः प्रेयात् ४/१३/२५ मृते तु स्वामिनि पुनः ४/११/२१
भ्रातृणामविभक्तानां ४/१३/३७ मृते भर्त्तरि सम्प्राप्तान् ४/१२/५०
मृते भर्तर्यपुत्रायाः ४/१३/२८
मृद्भाण्डासनखट्वास्थि ४/१४/१४
मोक्षितो महतश्चार्तात् ४/५/२७
[ म ]
मणयः पद्मरागाद्याः २/३४
मण्डलस्य प्रमाणं तु ४/१/२९९
मत्ताभियुक्तस्त्रीबाल ४/१/१३७
मध्यमं तु शरं गृह्य ४/१/३१० [ य ]
मनसाहमपि ध्यातः २/१० य एव कश्चित् स्वद्रव्यं ४/१७/४७
मनुष्यपशुमांसास्थि ४/१/१८६ यच्च यस्योपकरणम् ४/१७/११
मनुष्यमारणं स्तेयं ४/१४/२ यच्छिष्टं पितृदायेभ्यः ४/१३/३२
मध्यगन्ध्यावाह्निकं ४/१३/८ यज्ञार्थं साधयेत्तेन ४/२/८
मर्दितैस्तैर्दि नो दग्धः ४/१/३०३ यत्किञ्चिद्दशवर्षाणि ४/१/७९
मर्यादातिक्रमे सद्यो ४/१५/१२ यत्पुनर्न विभाव्येते ४/१/३०२
यत्र धर्मो ह्यधर्मेण ३/८
नारदस्मृति / 287

यत्र विप्रतिपत्तिः स्यात् 1/39 यस्य नोपहता बुद्धिः 4/1/171
यत्र सभ्योजनः सर्वः 3/17 यस्यां रात्रावजनिष्ठा 4/1/224
यत्र स्यात्संशयो लेख्ये 4/1/143 यः स्वकं साधयेदर्थं 4/1/123
यथाकालमधीयीत 4/5/11 याच्यमानं न दीयेत 4/1/7
यथा दासकृतं कार्यं 4/1/29 याच्यमानस्तु यो दात्रा 4/2/7
यथा पक्वेषु धान्येषु 1/63 या तस्य दुहिता तस्याः 4/13/27
यथा मृगस्य विद्धस्य 1/38 या तु सप्रधनैव स्त्री 4/1/21
यथाविधेन द्रव्येण 4/1/49 यात्यचोरोऽपि चौरत्वं 1/42
यथा शल्यं भिषग्विद्वान् 3/16 या नष्टाः पालदोषेण 4/11/35
यथा ह्यग्नौ स्थितं दीप्ते 4/17/46 यां रात्रिमधिविन्ना स्त्री 4/1/203
यथोक्तेन विधानेन 4/1/333 यावतो बान्धवांस्तस्मिन् 4/1/207
यदा तु न सकुल्याः स्युः 4/11/113 यावन्तश्चर्त्तवस्तस्याः 4/12/26
यदा तु नैव कश्चित् स्यात् 4/12/22 यावन्मात्रं समुद्दिष्टं 4/1/319
यदा तेजः समालम्ब्य 4/17/28 यावानबध्यस्य वधे 4/18/40
यदा त्वर्थिगुरुप्राज्ञ 4/17/31 युक्तरूपं वदन् सभ्यः 3/3
यदा साक्षी न विद्यते 4/1/247 युक्तिष्वप्यसमर्थासु 4/1/239
यदि च न स्युर्ज्ञातारः 4/11/11 ये तु सभ्याः सभां प्राप्य 3/11
यदि नो लेखयेद्दत्तं 4/1/115 येन येन यथाङ्गेन 4/18/34
यदि राजा न सर्वेषां 4/17/14 येनाङ्गेनावरोवर्णः 4/15/25
यदि वा दोषकर्त्तैष 4/18/19 येषां तु न कृताः पित्रा 4/13/33
यदृणादिषु सर्वेषु 4/1/97 येषामेताः क्रियालोके 4/13/40
यद्बालः कुरुते कार्यं 4/1/39 येऽर्थः श्रावयितव्यः स्यात् 4/1/162
यद्भक्तः सोऽभियुक्तः स्यात् 4/11/329 यो धर्मः कर्मयच्चैषां 4/10/3
यद्येकजाता बहवः 4/13/42 यो न भ्राता न च पिता 2/23
यमन्तर्धारयन्त्यापो 4/1/240 यो निक्षेपं नार्पयति 4/2/13
यमर्थं प्रतिभूर्दद्यात् 4/1/121 यो यथा निक्षिपेद्धस्ते 4/2/3
यमर्थमभियुञ्जीत 1/56 यो यो वर्णोऽपहीयेत 4/17/6
यमेव ह्यतिवर्तेत 4/15/13 यो राज्ञः प्रतिगृह्णाति 4/17/44
यवीयसो वा यो ज्यायान् 4/12/86
यश्चैषां स्वामिनं कश्चित् 4/5/30 ┌───┐
यः परार्थे प्रहिणुयात् 4/1/227 │ र │
यस्तु दोषवतीं कन्यां 4/12/33 └───┘
यस्तु पातयतेत्रासात् 4/1/298 रक्षाधिकारादीशत्वात् 4/17/21
यस्त्वात्मदोषभिन्नत्वात् 4/1/193 रक्षार्थमाहूतैर्लोके 4/1/267
यः स्वामिनाभ्यनुज्ञातं 4/1/128 रक्ष्यामाणोऽपि यत्राधिः 4/1/130
यस्य त्रैवार्षिकं वित्तं 4/4/7 रागादज्ञानतो वापि 1/67
रागादीनां यदेकेन 2/18
288 / नारदस्मृति

राजकुलावबोधाय २/१९ लोकेऽस्मिन् द्विविधं द्रव्यं ४/८/२
राजग्राहगृहीतो वा ४/११/३६ लोहानामपि सर्वेषां ४/९/१०
राजनि प्रहरेद्यस्तु ४/१५/३१
राजप्रत्यक्ष दृष्टानि १/५० [ व ]
राजा तु धार्मिकान् सभ्यान् ३/४
राजा त्ववहितः सर्वान् ४/१७/५ वक्तव्येऽर्थे न तिष्ठन्तं १/४७
राजा भवत्यनेनास्तु ३/१३ वणिक् प्रभृतयो यत्र ४/३/१
राजाभिर्धृतदण्डास्तु ४/१८/४८ वधकश्चर्मकृत् पङ्गुः ४/१/१८५
राजा सत्पुरुषः सभ्याः १/१५ वन्ध्यां स्त्रीजननी निन्द्यां ४/१२/९४
राजा स्तेनेन गन्तव्यः ४/१८/४६ वरं कूपशताद्वापी ४/१/२१२
राजेति संचरत्येष ४/१७/२० वर्णसंकर दोषश्च ४/१७/४
राज्ञा परिगृहीतेषु ४/१/१६० वर्णस्वराकारभेदात् ४/१८/१०
राज्ञा प्रवर्तितान् धर्मान् ४/१७/१३ वर्णानां प्रातिलोम्येन ४/५/३९
राज्ञामाज्ञाभयाद्यस्मात् ४/१७/२३ वर्तमानोऽध्वनि श्रान्तः ४/१७/३९
राज्ञामेव तु दासः स्यात् ४/५/३५ वर्षासु बहिरित्युक्तः ४/१/२५४
रात्रि-सञ्चारिणो य च ४/१४/२६ वर्षासु षड् यवा मात्रा ४/१/३२४
राष्ट्रेषु राष्ट्राधिकृताः ४/१८/१५ वसिष्ठविहितां वृद्धिं ४/१/९९
रेतोऽस्योत्प्लवते नाप्सु ४/१२/१० वसेयुर्यै दशाब्दानि ४/१३/४१
रोधयन्ति तु ये मोहात् ४/११/१६ वस्त्रगोमिथुनाभ्यां तु ४/१२/४१
[ ल ] वस्त्रैराभरणैर्माल्यैः ४/१२/४१
वाक्पारुष्यं तथैवोक्तं १/१९
लब्धव्यं येन यस्मात् २/९ वाच्यार्थ नियताः सर्वे ४/१/२२८
लाभार्थं वणिजां सर्वं ४/८/११ वादिभ्यामभ्यनुज्ञातं २/२०
लिखितं बलवन्नित्यं ४/१/७५ वादिभ्यां लिखिताच्छेषं २/२१
लिखितं लिखितेनैव ४/१/१४५ वार्त्ता तु यां चाप्यथ
लिखितं साक्षिणश्चैव १/३ दण्डनीतिम् ४/१८/६१
लिखितं साक्षिणोभुक्तिः ४/१/६९ वासः कौशेयवज्रं च ४/१४/१५
लिखितं स्याद्बहुच्छिद्रं ४/१/७३ वासः पश्वन्नपानानां ४/१४/५
लिखितः स्मारितश्चैव ४/१/१५० विकृष्यमाणे क्षेत्रे चेत् ४/११/२४
लेख्यं तु द्विविधं ज्ञेयं ४/१/१३५ विक्रीणीते य आत्मानं ४/५/३७
लेख्यं दद्याद्विशुद्धर्णे ४/१/११६ विक्रीय पण्यं मूल्येन ४/८/४
लेख्यं यच्चान्यनामाङ्कं ४/१/१४४ विक्रीय पण्यं मूल्येन ४/८/१
लेख्ये देशान्तरन्यस्ते ४/१/१४२ विक्रेता स्वामिनेऽर्थं स्वं ४/७/५
लोकेऽस्मिन्मङ्गलान्यष्टौ ४/१७/५४ विगतक्रोधसन्तापः ४/१७/२९
लोकेऽस्मिन् द्वाववक्तव्यौ ४/१५/२० विधुष्यापहृतं चौरैः ४/६/१६
विचार्य धर्मनिपुणैः ४/१/२६०
नारदस्मृति / 289

विदुर्य एव देवत्वं ४/७/५३ शालीनस्यापि धृष्टस्त्री ४/१२/१७
विद्धे धर्मे ह्यधर्मेण ३/९ शासनाद्वा विमोक्षाद्वा ४/१८/४९
विद्यमानेऽपि लिखिते ४/१/७७ शिक्यद्वयं समासाज्य ४/१/२७१
विधिः पञ्चविधस्तूक्तः ४/१५/७ शिक्षयन्तमदुष्टं यः ४/५/१८
विन्दुमात्रविहीना वा २/१३ शिक्षितोऽपि कृतं कालं ४/५/१९
विभागधर्मसन्देहे ४/१३/३६ शिरसौ मुण्डनं दण्डः ४/१४/१०
विभागोऽर्थस्य पित्र्यस्य ४/१३/१ शिरोपस्थायिनि नरे ४/१/२६९
विभृयाद्वेच्छतः सर्वान् ४/१३/५ शिरोवर्त्ती यदा न स्यात् ४/१/२५७
विवादे सोत्तरपणे १/५ शिष्यान्तेवासिदासस्त्री ४/१/१२
विवाहादिविधिः स्त्रीणां ४/१२/१ शिष्यान्तेवासिभृतकाः ४/५/३
विश्रम्भहेतू द्वावत्र ४/१/११७ शुचीनामशुचीनां च ४/१७/४५
विषस्य पलषड्भागात् ४/१/३२३ शुद्धं चैव विजानासि ४/१/२८१
वृद्धे जनपदे राज्ञः ४/११/४३ शुद्धेषु व्यवहारेषु ३/७
वेतनं वा यदि कृतं ४/५/२१ शुभकर्मकरास्त्वेते ४/५/२५
वेतनस्यानपाकर्म १/१७ शुल्कं गृहीत्वा पण्यस्त्री ४/६/१८
वैद्योऽवैद्याया नाकामः ४/१३/११ शुल्कस्थानं परिहरन् ४/३/१३
वैशेषिकं धनं ज्ञेयम् ४/१/५२ शुल्कस्थानं वणिक् प्राप्तः ४/३/१२
वैशेषिकं धनं ज्ञेयम् ४/१/५४ शुश्रूषकः पञ्चविधः ४/५/२
वैश्यं तु सलिलं देयं ४/१/३३५ शूद्रायां क्षत्रियात्तद्वत् ४/१२/१०८
वैश्यवृत्त्या चाविक्रेयं ४/१/६१ शूलैर्भैत्स्यसिचाक्रम्य ४/१/२१८
व्यभिचारे स्त्रियां मौण्ड्यं ४/१२/९१ शौर्यभार्याधने चोभे ४/१३/६
व्यवहारमुखं चैतत् २/४४ श्रावयित्वा तथान्येभ्यः ४/१/१९७
व्याघ्रादिभिर्हतो वापि ४/११/३७ श्रावितश्चातुरेणापि ४/१/९६
व्याधितः कुपितश्चैव ४/१३/१६ श्रुतशौर्यतपः कन्या ४/१/४५
व्यापादो विषशस्त्राद्यैः ४/१४/६ श्रुतिस्मृतिविरुद्धं यत् ४/१७/८
श्रेणीषु श्रेणीपुरुषाः ४/१/१५५
[ श ] श्रेण्यादिपु च सर्वेषु ४/१/१५६
श्रोत्रियास्तापसा वृद्धाः ४/१/१५८
शक्यं तत् पुनराहर्त्तुं ४/१७/४९ श्वपाकमेदचण्डालव्यङ्गेषु ४/१५/११
शतं ब्राह्मणमाक्रुश्य ४/१५/१५ श्वो लेखनं वा स लभेत् २/३
शपथा ह्यपि देवानां ४/१/२४३
शरप्रक्षेपणस्थानात् ४/१/३०९ [ ष ]
शाकहरितमूलानां ४/१८/२३
शारीरश्चार्थदण्डश्च ४/१८/५३ षडेते पुनरुद्दिष्टा ४/१/१५१
शार्ङ्गं हैमवतं शस्तं ४/१/३२२ षड्विधस्तस्य तु बुधैः ४/८/३


290 / नारदस्मृति

[स] समक्षदर्शनात् साक्षी 4/1/148
समयस्यानपाकर्म 1/18
संसृष्टानां तु यो भागः 4/13/24 समयैः परिगृह्यार्थं 4/1/276
सकामायाां तु कन्यायाम् 4/12/72 समवर्णैर्द्विजातीनां 4/15/17
सकृद्दंशो निपतति 4/12/28 समावृत्तश्च गुरवे 4/5/15
स च तां प्रतिपद्यते 4/12/81 समित्पुष्पोदकादाने 4/17/37
स चतुष्पाच्चतुःस्थानः 1/8 समुन्नयेयुस्ते सीमां 4/11/4
संजात्यतिशये पुंसां 4/12/70 समूलसस्यघाते तु 4/11/29
सतामनुग्रहो नित्यं 4/17/17 समेऽध्वनि द्वयोर्यन्त्र 4/14/25
सत्कृत्याहूय कन्यां तु 4/12/40 समोऽतिरिक्तो हीनो वा 4/3/3
सत्यं देवाः समासेन 4/1/215 सम्भोगो दृश्यते यत्र 4/1/84
सत्यं वाहनशस्त्राणि 4/1/248 सम्यक् प्रणिहितं चार्थ 1/60
सत्यं ब्रूह्यनृतं त्यक्त्वा 4/1/216 सम्वत्सरेणार्धखिलं 4/11/26
सत्यमेव परं दानं 4/1/214 सर्वस्वं वा हरेद्राज्ञा 4/18/42
सत्यमात्मानमनुष्यस्य 4/1/223 सर्वेषामेव वर्णानां 4/1/55
सत्यानृतविभागस्य 4/1/316 सर्वेष्वपि विवादेषु 2/25
सत्यानृते च जिह्वायाः 4/1/292 सवर्णमनुरूपं च 4/12/23
सत्या भाषा न भवति 2/15 स व्रतानां भृशार्त्तानां 4/1/256
सत्येन शापयेद्विप्रं 4/1/199 ससंकराः श्वपाकाद्यास्तेषां 4/12/106
सदा श्रोत्रियवर्ज्याणि 4/3/14 सहसा क्रियते कर्म 4/14/1
सद्य श्रोत्रिय वर्ज्याणि 4/3/14 सहसं तूत्तमो ज्ञेयः 4/18/31
सन्ति ज्ञातार इत्युक्त्वा 1/61 सहासनमभिप्रेप्सुः 4/15/26
सन्तोऽपि प्रमाणं स्युः 4/1/94 सहोढग्रहणात्स्तेयं 4/14/18
सन्दिग्धेऽर्थेऽभियुक्तानां 4/1/251 साक्षाताभिः सपुष्पाभिः 4/5/43
सन्दिग्धेऽर्थेऽभियुक्तानां 4/1/253 साक्षिकदूषणे कार्य 2/39
सन्दिग्धेषु च कार्येषु 4/1/147 साक्षित्वं प्रातिभाव्यं च 4/13/39
सन्नानां द्विगुणः प्रोक्तः 4/11/34 साक्षिविप्रतिपत्तौ 4/1/229
स पुनर्द्विविधः प्रोक्तः 4/1/125 साक्षिसम्यासन्नानां 2/40
स पुनर्द्विविधः प्रोक्तः 4/2/6 साक्षी साक्ष्ये समुद्दिशन् 4/1/204
सप्तर्षयस्तथेन्द्रेण 4/1/244 साक्षेपनिष्ठुरं 4/15/3
सप्ताश्वत्थस्य पत्राणि 4/1/287 साक्ष्युद्दिष्टो यदि प्रेयात् 4/1/166
सप्ताहाभ्यन्तरे यस्य 4/1/330 सा चेद् गौर्व्यसनं गच्छेत् 4/6/12
सभायां न प्रवेष्टव्यं 3/10 सापदेशं हरन्कार्ल 1/58
सभिकः कारयेद्द्यूतं 4/16/2 सामाद्युपायसाध्यत्वात् 1/12
सभ्यैरेव जितः पश्चात् 2/43 सामान्यस्वस्वतन्त्रत्वम् 4/5/4
नारदस्मृति / 291