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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृथिवी पर इनका प्रतिनिधि होता है और इसीलिए उसका तेज अपरिमित होता है।
कारणादनिमित्तं वा यदा क्रोधवशं गतः।
प्रजा दहति भूपालस्तदाग्निरभिधीयते ॥ २७ ॥
अकारण क्रुद्ध होकर निर्दोष, निरपराध एवं असहाय प्रजाजनों को पीड़ित
करने वाला राजा अग्नि-रूप कहा जाता है।
यदा तेजः समालम्ब्य विजिगीषुरुदायुधः ।
अभियाति परान् राजा तदेन्द्रः स उदाहृतः ॥ २८ ॥
अपनी तेजस्विता का स्मरण कर और आयुधों से सन्नद्ध होकर शत्रुओं के
दमन करने को कटिबद्ध राजा इन्द्र-रूप कहलाता है।
विगतक्रोधसन्तापो हृष्टरूपो यदा नृपः।
प्रजानां दर्शनं याति सोम इत्युच्यते तदा ॥ २९ ॥
क्रोध, शोक और सन्ताप आदि का परित्याग कर प्रसन्नचित्त होकर उल्लसित
भाव से प्रजाजनों से भेंट करने वाला राजा सोम-रूप कहलाता है।
धर्मासनगतः श्रीमान्दण्डं धत्ते यदा नृपः।
समः सर्वेषु भूतेषु तदा वैवस्वतः स्मृतः ॥ ३० ॥
न्यायाधीश के रूप में न्यायपीठ पर विराजमान होकर तटस्थ भाव से विवादों
को सुनने और वास्तविक अपराधी को दण्ड देने के लिए उद्यत तथा सभी प्रजाजनों
के प्रति समदृष्टि रखने वाला राजा विवस्वान् (यम) कहलाता है।
यदा त्वर्थिगुरुप्राज्ञभृत्यादीन् पृथिवीपतिः ।
अनुगृह्णाति दानेन तदा स धनदः स्मृतः ॥ ३१ ॥
आवश्यकता वालों, अभावग्रस्तों, भृत्यों, याचकों, गुरुजनों और विद्वानों को
दान-मान आदि देकर अनुग्रह प्रकट करने वाला राजा कुबेर-रूप होता है।
तस्मात्तं नावजानीयान्नाक्रोशेश्च विशेषतः ।
आज्ञायां चास्य तिष्ठेत् मृत्युः स्यात्तद्व्यतिक्रमात् ॥ ३२ ॥
इस प्रकार पांच देवों के अंशधारी पांच रूपों वाले राजा की आज्ञा का पालन
करना प्रजाजनों को अपने लिए अनिवार्य धर्म मानना चाहिए। राजाज्ञा के अतिक्रमण
का दण्ड तो निश्चित रूप से मृत्यु ही है।
तस्य धर्मः प्रजारक्षा वृद्धप्राज्ञोपसेवनम्।
दर्शनं व्यवहाराणामुत्थानं च स्वकर्मसु ॥ ३३ ॥
राजा अनेक रूपों में प्रजा का बहुत उपकार करता है—

  1. वह प्रजा के प्राण, सम्मान और सम्पत्ति आदि की रक्षा करता है। राजा
    जागता है, तभी प्रजाजन निश्चिन्त होकर सोते और अपना व्यापार-धन्धा करते हैं।
  2. राजा साधनहीन वृद्धों और विद्वानों को आर्थिक अनुदान प्रदान करके
    नारदस्मृति / 257

उनका पालन-पोषण करता है।
3. राजा ही प्रजाजनों में उठने वाले विवादों (व्यवहारों) को सुनता है,
सत्य-असत्य का निर्णय करता है तथा अपराधी को दण्ड देता है।
4. राजा ही प्रजाजनों की आर्थिक समृद्धि के लिए विविध योजनाएं बनाता है
और उन योजनाओं की पूर्ति के लिए साधन जुटाता है तथा धन की व्यवस्था करता
है।
ब्राह्मणानुपसेवेत नित्यं राजा समाहितः।
संयुक्तं ब्राह्मणैः क्षात्रं मूलं लोकाभिवृद्धये॥ ३४॥
राजा को ब्राह्मणों के सम्मान की रक्षा के लिए नित्य-प्रति अत्यन्त सावधान
रहना चाहिए। उसे यह कदापि नहीं भूलना चाहिए कि ब्राह्मणों की कृपा बने रहने
पर ही राजा अपने क्षत्रिय-धर्म का सफलतापूर्वक निर्वाह कर सकता है। ब्राह्मणों
के रुष्ट होने पर तो राजा के लिए अपनी सत्ता को बचा पाना ही सम्भव नहीं होता।
ब्राह्मणस्यापरीहारो राजन्यासनमग्रतः।
प्रथमं दर्शनं प्रातः सर्वेभ्यश्चाभिवादनम्॥ ३५॥
विचारक के रूप में न्यायपीठ पर बैठते समय राजा को ब्राह्मणों—बुद्धिजीवी
शास्त्रज्ञ विद्वानों—को अपने से ऊंचे आसन पर बिठाना चाहिए। इसके अतिरिक्त
राजा को प्रतिदिन प्रातःकाल राज्यसभा में जाने से पूर्व ब्राह्मणों का दर्शन, उन्हें
प्रणाम करना और उनका आशीर्वाद लेना चाहिए।
अग्रं नवभ्यः सप्तभ्यः मार्गदानं च गच्छतः।
भैक्षहेतोः परागारे प्रवेशस्त्वनिवारितः॥ ३६॥
राजमार्ग, नौकायन तथा अन्य वाहन मार्गों पर संकरा मार्ग आ जाने पर
ब्राह्मणों—भले ही वह सात हों अथवा नौ, अर्थात् अधिक संख्या में ही क्यों न हों
और इसके लिए दूसरे यात्रियों को असुविधा, कष्ट और विलम्ब ही क्यों न होता
हो—को पहले जाने देना चाहिए। इसके अतिरिक्त भिक्षा मांगने वाले ब्राह्मण को
किसी भी घर में प्रवेश करने से नहीं रोकना चाहिए।
समित्पुष्पोदकादानेष्वस्तेयं स्वपरिग्रहम्।
अनपेक्षः परमेभ्यः सम्भाषणञ्च परस्त्रिया॥ ३७॥
अपने यज्ञ-भोग तथा पूजा-पाठ के लिए समिधाएं, पुष्प और जल आदि
इनके स्वामी से बिना पूछे अपने आप लेने वाले ब्राह्मण पर चोरी का आरोप नहीं
लगाया जा सकता। इसी प्रकार परमुखापेक्षी न बनने की इच्छा से पर स्त्री से
भाषण करने वाले ब्राह्मण की विरोधियों द्वारा भी निन्दा नहीं की जा सकती; क्योंकि
आचारनिष्ठ और चरित्रवान् होना तो ब्राह्मणत्व का प्रथम लक्षण है।
258 / नारदस्मृति

नदीष्ववेतनस्तारः पूर्वमुत्तारणं तथा।
तरेष्वशुल्कदानं च वाणिज्यायां भवेत् स्थितिः ॥ ३८ ॥
नदी पार कराने पर ब्राह्मण से शुल्क नहीं लेना चाहिए और उसे नौका में
सबसे पहले उत्तम स्थान पर बिठाना और सबसे पहले उतारना चाहिए। ब्राह्मण
द्वारा वाणिज्य व्यापार की वस्तुओं की ख़रीद पर भी उससे सीमा-शुल्क तथा
बिक्रीकर आदि वसूल नहीं करने चाहिए।
वर्तमानोऽध्वनि श्रान्तो गृह्णान्नशनः स्वयम्।
ब्राह्मणो नापराधी स्याद् द्वाविक्षू द्वे च मूलके ॥ ३९ ॥
मार्ग चलते और थकने से विश्राम करते ब्राह्मण द्वारा क्षुधा-निवृत्ति के लिए
समीपस्थ खेत से फल, मूल, कन्द आदि ले लेने पर उसे अपराधी नहीं मानना चाहिए।
नाभिशस्तान्न पतितान्न द्विषो नापि नास्तिकात्।
नावसन्नान्निर्मिमित्तं दातारं न प्रपीड़य च ॥ ४० ॥
राजा को निम्नरोक्त व्यक्तियों को पीड़ित एवं भयभीत नहीं करना चाहिए—

  1. लोक में निन्दित व अपने चरित्र के कारण दूषित।
  2. पतित, अर्थात् भ्रष्ट आचरण के कारण जाति से बहिष्कृत।
  3. घोषित एवं सर्वजनविदित शत्रु।
  4. नास्तिक, अर्थात् वेदों की अपौरुषेयता तथा ईश्वर की सत्ता में विश्वास न
    रखने वाला।
  5. अवसन्न, अर्थात् एक के बाद दूसरे संकट, शोक और दुःखादि का
    शिकार बना व्यक्ति तथा
  6. विशेष निमित्त के बिना, अर्थात् प्रतिदिन दान करने वाला उदार मनस्वी।
    इन लोगों पर लगे सच्चे-झूठे, छोटे-मोटे अपराध के लिए इन्हें पीड़ित करने
    से राजा कलंकित हो जाता है।
    अर्थिनां भूरिभावाच्च देयत्वाच्च महात्मनाम्।
    श्रेयान् परिग्रहो राज्ञां सर्वेषां ब्राह्मणादृते ॥ ४१ ॥
    राजा को याचकों को प्रतिदिन दान देने वाले उदार धनिकों, महात्माओं तथा
    ब्राह्मणों को छोड़कर शेष सभी प्रजाजनों से कर वसूल करने और धन लेने का पूरा-
    पूरा अधिकार है।
    ब्राह्मणश्चैव राजा च द्वावप्येतौ दृढव्रतौ।
    नानयोरन्तरं किञ्चित् प्रजा धर्मेण रक्षतोः ॥ ४२ ॥
    अपने अपने धर्म और कर्तव्य का दृढ़ता से पालन करने वाले तथा निर्दिष्ट
    मार्ग से कभी च्युत न होने वाले दोनों—राजा और ब्राह्मण—अभिनन्दनीय होते हैं।
    इन्हीं दोनों पर प्रजा की रक्षा का और प्रजा को समुचित मार्ग दिखाने का दायित्व
    नारदस्मृति / 259

होता है। अपने इस दायित्व को निभाने वाले ये दोनों ही श्रेष्ठ होते हैं।
धर्मज्ञस्य कृतज्ञस्य रक्षार्थं शासतोऽशुचीन्।
मेध्यमेव धनं प्राहुस्तीक्ष्णस्यापि महीपतेः ॥ 43 ॥
धर्मनिष्ठ, कर्तव्यपालक, दीन-दुखियों की सेवा-सहायता के प्रति समर्पित,
दुर्बलों-असहायों के रक्षक तथा दुष्ट-अपराधियों का दमन करने वाले राजा के धन
जुटाने व कर वसूल करने में उग्र होने पर भी उसका धन पवित्र होता है।
यो राज्ञः प्रतिगृह्णाति लुब्धस्योच्छास्त्रवर्तिनः।
स पर्यायेण यातीमान्नरकानेकविंशतिम् ॥ 44 ॥
लोभवश शास्त्र-मार्ग को छोड़कर राजा से छल-कपट, द्रोह एवं मक्कारी
करने वाला दुष्ट व्यक्ति क्रमानुसार इक्कीस नरकों की यातना को झेलता है।
शुचीनामशुचीनां च सन्निपातो यथाम्भसाम्।
समुद्रे समतां याति तद्वद्राज्ञो धनागमः॥ 45 ॥
जिस प्रकार पवित्र अथवा दूषित जल समुद्र में गिरकर समुद्र का भाग,
अर्थात् पवित्र बन जाता है, उसी प्रकार सज्जन से अथवा दुर्जन से, पापकर्मा व्याध
से अथवा वधिक से वसूल किया गया धन राजकोष में जाते ही पवित्र हो जाता है।
टिप्पणी—लगता है कि नारदस्मृति की रचनाकाल तक गंगा का महत्त्व
स्थापित नहीं हो पाया था, अन्यथा हिन्दी के कृष्णभक्त कवि सूरदास की पंक्तियां
'नारदस्मृति' में प्रतिध्वनित होतीं—
प्रभु जी मेरे औगुन चित्त न धरो।
समदरसी प्रभु नाम तिहारो चाहो तो पार करो ॥
अपने कथन का समर्थन सूरदास इन शब्दों में करते हैं—
इक नदी एक नार (नाला) कहावत, मैला ही नीर भर्यो।
गंग में मिलि दोउ गंग भयो है, भेद कछू न रह्यो॥
यथा ह्यग्नौ स्थितं दीप्ते शुद्धिमायाति काञ्चनम्।
एवं धनागमाः सर्वे शुद्धिमायान्ति राजसु ॥ 46 ॥
जिस प्रकार अग्नि में डालने पर स्वर्ण शुद्ध हो जाता है, उसी प्रकार राजकोष
में आने पर सभी प्रकार का (काला अथवा सफ़ेद) धन शुद्ध-पवित्र हो जाता है।
य एव कश्चित् स्वद्रव्यं ब्राह्मणेभ्यः प्रयच्छति।
तद्राज्ञाप्यनुमन्तव्यमेष धर्मः सनातनः ॥ 47 ॥
ब्राह्मणों को दान-पुण्य करने वाले उदार धनिकों को इसके लिए राजा से पूर्व
अनुमति लेनी चाहिए और राजा को इसकी सहर्ष स्वीकृति देनी चाहिए—यही
सनातन व्यवस्था है।
टिप्पणी—आज की भाषा में, यदि धनिक अपने काले धन को ब्राह्मणों को
260 / नारदस्मृति

दान आदि देने के रूप में सफ़ेद करना चाहता है और कर में छूट पाने का इच्छुक
है, तो उसे प्रशासन द्वारा दानियों को आयकर में छूट की अनुमति-प्राप्त संस्थाओं से
सम्पर्क स्थापित करना चाहिए।
अन्यप्रकारादुचिताद् भूमेः षड्भागसंज्ञितात्।
बलिः स तस्य विहितः प्रजापालनवेतनम्॥ 48 ॥
भूमि की उपज का षष्ठांश (1/6वां भाग) भूमि-कर के रूप में राजा को
चुकाना किसानों-भू-स्वामियों का कर्तव्य-कर्म है। वस्तुतः प्रजापालन करने में
तथा राजा की निजी आवश्यकताओं की पूर्ति पर व्यय होने वाले धन की पूर्ति प्रजा
को ही तो करनी होती है।
शक्यं तत् पुनराहतुं यन्न ब्राह्मणसात्कृतम्।
ब्राह्मणेभ्यस्तु यद्दत्तं न तस्याहरणं पुनः॥ 49 ॥
ब्राह्मणों को देने का संकल्प करके उन्हें न देने वालों से संकल्पित धन
ब्राह्मणों को दिलाया तो जा सकता है, परन्तु एक बार ब्राह्मणों को दिया गया धन
किसी भी स्थिति में वापस नहीं लिया जा सकता।
दानमध्ययनं यज्ञः कर्मास्योक्तं त्रिलक्षणम्।
याजनाध्यापने वृत्तिस्तृतीयाश्च प्रतिग्रहः॥ 50 ॥
वेदों का अध्ययन, यज्ञ-यागादि सम्पन्न करना तथा दान देना ब्राह्मण के
नित्यकर्म हैं। इसमें इच्छा-अनिच्छा का प्रश्न ही नहीं उठता। ये तीनों तो अनिवार्य
रूप से ब्राह्मण को प्रतिदिन करने ही हैं। हां, यज्ञ करना, विद्या-अध्यापन तथा दान
लेना—ये तीनों उसकी वृत्ति से जुड़े हैं। इन तीनों को अपनी सुविधा, आवश्यकता
और रुचि के अनुरूप अपनाने-न अपनाने को वह पूर्ण स्वतन्त्र है।
स्वधर्मे ब्राह्मणस्तिष्ठेद्वृत्तिमाहारयेन्नृपात्।
नासद्भ्यः परिगृह्णीयाद्धर्णेभ्यो नियमे सति॥ 51 ॥
यदि अपने व्रत-नियम का पालन करने वाले आचारवान् ब्राह्मण का सज्जनों
के दान आदि से निर्वाह नहीं हो पाता, तो उसे राजा से वृत्ति पाने के लिए प्रयास
करना चाहिए, परन्तु किसी असद्वृत्ति वाले—काला धन्धा करने वाले—व्यक्ति से
कभी धन ग्रहण नहीं करना चाहिए।
अभिप्राय यह है कि ब्राह्मण को केवल धर्म और न्याय से अर्जित धन का ही
दान लेना चाहिए। जीवन-निर्वाह के लिए ऐसे धन के अपर्याप्त होने पर नौकरी कर
लेनी चाहिए, परन्तु किसी भी रूप में दूषित धन को ग्रहण करने के लिए उद्यत नहीं
होना चाहिए।
अशुचिर्वचनाद् यस्य शुचिर्भवति मानवः।
शुचिश्चैवाशुचिः सम्यक् कथं राजा न दैवतम्॥ 52 ॥
नारदस्मृति / 261

जिस राजा के कथन पर अपवित्र व्यक्ति पवित्र और पवित्र व्यक्ति अपवित्र
माना जाता है, ऐसे राजा को भला देवता कैसे नहीं मानना चाहिए।
टिप्पणी—राजा जिसे सम्मानित पुरस्कृत करता है, लोक और समाज उसे
यशस्वी और प्रतिष्ठित मानकर सिर आंखों पर बिठाता है। इसके विपरीत प्रशासन
द्वारा अपमानित अथवा दण्डित व्यक्ति समाज में मुख दिखाने के योग्य नहीं रहता।
समाज को राजा की कार्यवाही पर विश्वास रहता है। इस प्रकार प्रजाजनों के
सम्मान-अपमान, यश-अपयश के आधारभूत राजा को देवस्वरूप माना जाता है।
2. आज तो 'राजा' की संस्था नेपाल, भूटान आदि तथा दो-चार मुस्लिम
देशों में ही जीवित है। अधिकांश देशों ने तो अन्यान्य शासन-प्रणालियां अपना ली
हैं।
विदुर्य एव देवत्वं राज्ञो ह्यमिततेजसः।
तस्य ते प्रतिगृह्णन्तो न लिप्यन्ते कथञ्चन॥ 53 ॥
राजा को अमित तेजस्वी तथा देव-स्वरूप मानने वाले व्यक्ति उसकी अवज्ञा
करने अथवा उसे धोखा देने की कभी कल्पना तक नहीं करते।
लोकेऽस्मिन्मङ्गलान्यष्टौ ब्राह्मणो गौर्हुताशनः।
हिरण्यं सर्पिरादित्य आपो राजा तथाष्टमः ॥ 54 ॥
इस संसार में निम्नोक्त आठ द्रव्यों को अत्यन्त पवित्र, पूज्य एवं मङ्गलसूचक
माना जाता है—1. ब्राह्मण, 2. गाय, 3. अग्नि, 4. सुवर्ण, 5. घृत, 6. सूर्य, 7. जल
तथा 8. राजा।
इन आठों की अवज्ञा घोर पाप है।
एतानि सततं पश्येन्नमस्येदर्चयेत् स्वयम्।
प्रदक्षिणं च कुर्वीत यथास्यायुः प्रवर्धते ॥ 55 ॥
अपनी आयु-वृद्धि, सुख-समृद्धि तथा स्वास्थ्य-शान्ति को सुनिश्चित करने
के लिए इन आठों का नित्यप्रति दर्शन, अर्चन व नमन करने के अतिरिक्त इनकी
प्रदक्षिणा, अर्थात् पूजन भी करना चाहिए।
॥ चतुर्थ अध्याय का सप्तदश प्रकरण समाप्त ॥
262 / नारदस्मृति

  1. परिशिष्ट
    भांति-भांति के तस्करों के प्रकार
    द्विविधास्तस्करा ज्ञेयाः परद्रव्यापहारिणः ।
    प्रकाशाश्चाप्रकाशाश्च तान् विद्यादात्मवान्नृपः ॥ 1 ॥
    दूसरे के द्रव्य का अपहरण करने वाले तस्कर—चोर, डाकू—कहलाते हैं।
    विवेकशील राजा को जान लेना चाहिए कि ये तस्कर दो प्रकार के होते हैं—1. गुप्त
    अथवा प्रच्छन्न तस्कर तथा 2. प्रकाश-तस्कर, अर्थात् सर्वजनविदित।
    प्रकाशवञ्चकास्ते तु कूटमानतुलाश्रिताः।
    उत्कोचकाः साहिसकाः कितवाः पण्ययोषितः ॥ 2 ॥
    प्रकाश-तस्करों के कुछ रूप-भेद इस प्रकार हैं—
  2. माप-तौल में छल-कपट द्वारा न्यूनाधिक करना।
  3. किसी कार्य को पूरा करने-कराने के लिए घूस लेना।
  4. किसी उचित-अनुचित कार्य को करने के लिए दूसरे को विवश करना,
    अपनी शक्ति का दुरुपयोग करना, साहसिक पग उठाना, अर्थात् वध करने व अंग
    भंग करने-जैसी धमकी देकर काम निकालना।
  5. द्यूत-क्रीड़ा में लिप्त होना तथा हेरा-फेरी करना।
  6. वेश्या—सम्पन्न युवकों को चरित्रभ्रष्ट करने वाली—नगरवधू।
  7. अपनी बौद्धिक चातुरी से नकली वस्तु को असली बताकर बेचना तथा
  8. भोले-भाले लोगों के हितचिन्तक बनकर उन्हें ठगना, मूर्ख बनाना और
    इस प्रकार अपनी आजीविका चलाना।
    प्रतिरूपकराश्चैव मङ्गलादेशवृत्तयः।
    इत्येवमादयो ज्ञेयाः प्रकाशलोकतस्कराः ॥ 3 ॥
    निम्नोक्त ढंग से चोरी-हेराफेरी करने वाले धूर्त व्यक्ति प्रच्छन्न-तस्कर (छिपे
    चोर-डाकू—गुप्त रूप से काम-धन्धा करने वाले) कहलाते हैं।
  9. स्वयं घर, दुकान आदि के बाहर रहकर, दूसरों को भीतर घुसाकर अथवा
    दूसरों को बाहर रखवाली के लिए खड़ा कर स्वयं भीतर प्रविष्ट होकर चोरी करना।
  10. स्वामी की अनुपस्थिति में अथवा उसका ध्यान बंटाकर अथवा उसकी
    नारदस्मृति / 263

दृष्टि बचाकर दूसरे के सामान को उड़ा लेना।
३. देश, ग्राम अथवा भवन में गुप्त रूप से तोड़-फोड़ करना, आग लगाना
तथा सेंध मारना आदि।
४. यज्ञ-विध्वंस करना।
५. तारों, रज्जुओ आदि के जोड़ों (गांठों) को क्षति पहुंचाना तथा
६. असावधान अथवा सोये हुए लोगों पर आक्रमण करना, उन्हें धर-दबोचना
अथवा गुप्त रूप से हत्याएं करना आदि।
अप्रकाशाश्च विज्ञेया बहिरभ्यन्तराश्रिताः।
मुष्यां प्रसस्तांश्च नरा मुष्णन्त्याक्रम्य चैव ते ॥ ४॥
देशग्रामगृहघ्नाश्च यज्ञघ्ना ग्रन्थिमोचकाः।
इत्येवमादयो ज्ञेयाः अप्रकाशाश्च तस्कराः॥ ५॥
न त्वहोढान्विताश्चौरा वध्या राज्ञा ह्यनागसः।
सहोढान् स्तेयकरणात् क्षिप्रं चौरान् प्रशासयेत् ॥ ६॥
चोरी हुए सामान के न मिलने पर सन्देह में पकड़े गये चोर को दण्डित नहीं
करना चाहिए तथा चोरी के सामान के साथ पकड़े गये चोर को दण्डित करने में
किसी प्रकार की ढील नहीं करनी चाहिए।
स्वदेशघातिनो ये स्युस्तथा यज्ञावरोधिनः।
तेषां सर्वस्वमादाय भूयो निन्दां प्रकल्पयेत्॥ ७॥
अपने देश में तोड़-फोड़ करने वालों, अराजकता फैलाने वालों तथा यज्ञ-
यागादि में विघ्न-बाधा डालने वालों का सर्वस्व (सारी सम्पत्ति) छीनकर उन्हें
सार्वजनिक रूप से निन्दित-अपमानित करना चाहिए।
आज की भाषा में सार्वजनिक स्थान पर उनके फ़ोटो सहित इश्तहार लगवाने
चाहिए, जिसमें उनके कारनामों का वर्णन रहना चाहिए। समाचार-पत्रों में उनकी
निन्दा प्रकाशित करवानी चाहिए। इस प्रकार उन्हें समाज में मुंह दिखाने योग्य नहीं
रहने देना चाहिए।
अहोढान्विमृशेच्चौरान् गृहीतान् यदि शङ्कया।
भयोपधाभिश्चिन्ताभिर्ब्रूयुस्तथा यथा कृतम्॥ ८॥
चोरी के सामान को अपने पास न रखने वाले धूर्त एवं चतुर व्यक्ति को डरा
धमकाकर तथा पिटाई करके उससे सत्य उगलवाना चाहिए।
देशं कालं दिशं जातिं नामं वा सम्प्रतिश्रयम्।
कृतं कर्मकरा वा स्युः प्रष्टव्यास्ते विनिग्रहे ॥ ९॥
264 / नारदस्मृति

चोर से सत्य उगलवाने के लिए निम्नोक्त रूप से प्रश्न पूछने चाहिए—

  1. चोरी के समय तुम कहां थे ?
  2. चोरी का स्थान तुम्हारे निवास से कितनी दूर है ?
  3. क्या चोरी के समय तुम चोरी के स्थान की दिशा में थे अथवा किसी अन्य
    दिशा में थे ?
  4. तुम्हारा वास्तविक नाम क्या है ? क्या तुम सभी स्थानों पर इसी नाम से
    जाने जाते हो ?
  5. तुम्हारी जाति क्या है ?
  6. तुम्हें आश्रय देने वाले कौन-कौन से लोग हैं और तुम्हारा उनसे क्या
    सम्बन्ध है ?
  7. तुम्हारे नौकर-चाकर कौन-कौन से हैं और कहां हैं ?
    इसके अतिरिक्त चोर पर दबाव बनाये रखने के लिए उसके बन्धु-बान्धवों
    तथा नौकर-चाकरों को बांधकर रखना चाहिए।
    वर्णस्वराकारभेदात् संसदि त्वनिवेदनात्।
    अदेशकालदृष्टत्वाद्वासस्याप्यविशोधनात् ॥ 10 ॥
    असद्व्ययात् पूर्वचौर्यादसत्संसर्गकारणात्।
    लेख्यैरप्यवगन्तव्या न होढेनैव केवलम् ॥ 11 ॥
    चोरी के सामान के मिलने के अतिरिक्त निम्नोक्त अन्य लक्षणों से व्यक्ति के
    चोरी में लिप्त होने का अनुमान लगाना चाहिए—
  8. चेहरे के रंग का उड़ना, फीका व पीला पड़ना।
  9. स्वर का बदलना, कांपना, घबराहट होना।
  10. चेहरे का ऊपर न उठा पाना, अर्थात् अपराध-बोध से ग्रस्त होना।
  11. सभा में बोल न पाना, जिह्वा का लड़खड़ाना, वाणी का अवरुद्ध हो जाना।
  12. ग़लत स्थान—सुनसान, खण्डहर, जंगल, बाग़, क़िला, श्मशान आदि में
    ग़लत समय—गरमी की दोपहरी या रात के अंधेरे में घूमता-भटकता दीखना।
  13. भद्दी हंसी हंसना।
  14. अनाप-शनाप और बेकार की वस्तुओं पर ख़र्च करना।
  15. व्यसनों—जुआ, शराब, वेश्यागमन—में ग्रस्त होना।
  16. कलंकित (बदनाम) चोरों के साथ सम्बन्ध रखना तथा
  17. चोरी से सम्बद्ध किसी लेख का मिल जाना।
    दस्युवृत्ते यदि नरे शङ्का स्यात्तस्करेऽपि वा।
    यदि स्पृशेत् लेशेन कार्यः स्याच्छपथं ततः ॥ 12 ॥
    राजा को समाज के किसी भी व्यक्ति से चोरी-डाके से सम्बन्धित व्यक्ति के
    नारदस्मृति / 265

विरुद्ध उपलब्ध किसी भी साक्ष्य अथवा प्रमाण को अत्यन्त गम्भीरता से लेना
चाहिए तथा सन्दिग्ध व्यक्ति से शपथपूर्वक गहरी पूछताछ करनी चाहिए।
चौराणां भक्तदा ये स्युस्तथाप्युदकदायकाः ।
आवासदा देशिकाश्च तथैवोत्तरदायकाः ॥ 13 ॥
क्रेतारश्चैव भाण्डानां प्रतिग्राहिण एव च।
समदण्डाः स्मृतास्ते तु ये च प्रच्छादयन्ति तान् ॥ 14 ॥

  1. चोरों को अन्न, जल तथा आवास जुटाने वालों।
  2. चोर से पूछे प्रश्नों का उसकी ओर से उत्तर देने वालों।
  3. चोरी के सामान का क्रय-विक्रय करने वालों।
  4. चोरों अथवा चोरी के समान को छिपाने वालों तथा
  5. चोरों को उसकी खोज के लिए सरकार द्वारा उठाये जा रहे पगों की सूचना
    देने वालों को भी चोर समझना तथा चोरों के लिए निर्धारित दण्ड से दण्डित करना
    चाहिए।
    राष्ट्रेषु राष्ट्राधिकृताः सामन्ताश्चैव चोदिताः।
    अभ्याघाते तु मध्यस्था यथा चौरास्तथैव तेः ॥ 15 ॥
    राजा द्वारा चोरों को पकड़ने के लिए नियुक्त तथा सूचना मिलने पर त्वरित
    कार्यवाही न करने वाले सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों को, चोरी की
    जानकारी रखने वाले चोरों के पड़ोसियों को तथा चोरी का पता चलने पर 'बचाओ'
    की गुहार सुनने पर वहां से भाग खड़े होने वालों को भी चोर समझना और चोर के
    लिए निर्धारित दण्ड देना चाहिए।
    गोचरे यस्य मुष्येत तेन चौराः प्रयत्नतः ।
    मृग्या दाप्योऽप्यथवा मोषं पदं यदि न निर्गतम् ॥ 16 ॥
    गोचारण क्षेत्र में हुई चोरी के लिए उस क्षेत्र की नाकाबन्दी कर देनी चाहिए,
    अर्थात् चोर को बाहर निकलने-भागने ही नहीं देना चाहिए। यदि चोर भागने की
    चेष्टा नहीं करता है, चोरी का सामान स्वामी को लौटा देता है और अपने अपराध
    के लिए क्षमा-याचना करता है, तो उसकी प्रताड़ना करने के पश्चात् उसे छोड़ देना
    चाहिए।
    निर्गते तु यदा यस्मिन्नष्टेऽन्यत्र न पातयेत्।
    सामन्तान्मार्गपालांश्च दिक्पालांश्चैव दापयेत् ॥ 17 ॥
    चोर के गोचारण क्षेत्र से बाहर निकलकर भाग जाने पर आस-पास चारों
    ओर नियुक्त रक्षकों को चोर को ढूंढ़ने का दायित्व सौंपना चाहिए। रक्षकों के
    विफल होने पर उनसे ही चोरी के सामान की भरपाई करानी चाहिए।
    266 / नारदस्मृति

गृहे वै मुषिते राजा चौरग्राहकांस्तु दापयेत्।
आरक्षकान् राष्ट्रिकांश्च यदि चौरो न लभ्यते ॥ 18 ॥
घर में हुई किसी चोरी के अपराधी चोर के न पकड़े जाने पर गृहस्वामी को
चोर को पकड़ने के लिए व चोरी न होने देने के लिए नियुक्त सिपाहियों—
चौकीदारों, सीमा पर नियुक्त प्रहरियों तथा राज्य-रक्षा के लिए नियुक्त अधिकारियों—
से चोरी के सामान की भरपाई करनी चाहिए।
यदि वा दोषकर्तैष तस्मिन्मोषे तु संशयः।
मुषितः शपथं दाप्यो मोषे वै शुद्धिकारणात् ॥ 19 ॥
चोरी की रिपोर्ट के झूठा होने का सन्देह उत्पन्न होने पर रिपोर्ट लिखाने वाले
को आड़े हाथों लेना चाहिए और सत्य की गहरी छानबीन करनी तथा सम्बद्ध
व्यक्ति से शपथपत्र (ऐफ़िडेविट) लिखवाना चाहिए। रिपोर्ट के झूठा सिद्ध होने पर
सम्बद्ध व्यक्ति को अभियुक्त मानकर दण्डित करना चाहिए।
अचौरै बोधितो मोषं चौरो वै शुद्धकारणात्।
चौरे लब्धे लभेयुस्ते द्विगुणं प्रतिपादिताः ॥ 20 ॥
चोर न होने पर, सन्देह के कारण चोरी के आरोप में पकड़े गये व्यक्ति को
अपने को निर्दोष सिद्ध करने के लिए प्रमाण जुटाना पड़ता है। वास्तविक चोर के
पकड़े जाने पर सन्देह में पकड़े गये व्यक्ति को क्षतिपूर्ति के रूप में चुराये द्रव्य के
मूल्य का दुगुना दिया जाता है।
चौरहृतं प्रपद्यैव स्वरूपं प्रतिपादयेत्।
तदभावे तु मूल्यं स्याद्दण्डं दाप्यश्च तत्समम् ॥ 21 ॥
चोरी का माल जिस रूप में पकड़ा जाता है, उसी रूप में सरकार के सामने
प्रस्तुत करना चाहिए। चोर के पकड़े जाने पर, परन्तु चोरी के माल के न मिलने पर
चोर से चोरी के माल का दाम और उतना ही जुर्माना वसूल करना चाहिए।
काष्ठकाण्ड तृणादीनां मृण्मयानां तथैव च।
वेणुवैणवभाण्डानां वेतसस्यास्थिचर्मणोः ॥ 22 ॥
शाकहरितमूलानां हारणे तृणपुष्पयोः।
गोरसेक्षुविकाराणां तथा लवणतैलयोः ॥ 23 ॥
पक्वान्नानां कृतान्नानां मद्यानामामिषस्य च।
सर्वेषामल्पमूल्यानां मूल्यात् पञ्चगुणो दमः ॥ 24 ॥
निम्नोक्त अल्पमूल्य वस्तुओं की चोरी करने वालों के पकड़े जाने पर उनको
चुरायी वस्तु के दाम का पांच गुना अर्थ-दण्ड (जुर्माना) के रूप में चुकाना पड़ता
है—

  1. लकड़ी, 2. घास-फूस, 3. कुश और काना—लेखनी के रूप में प्रयोग में
    नारदस्मृति / 267

आने वाला मजबूत तिनका, 4. मिट्टी के बरतन, मूर्तियां, खिलौना आदि, 5. बांस
अथवा बांस से बनी टोकरी, पिटारी, कुर्सी आदि, 6. बेंत, 7. चमड़ा अथवा चमड़े
से बना सामान—जूता, मशक आदि, 8. शाक तथा हरी सब्जियां-गाजर, आलू,
मूली, शकरकन्दी आदि, 9. फल-फूल, 10. दूध, 11. गन्ना तथा उसके रस से
बना गुड़ आदि, 12. नमक, 13. तेल, 14. पका भोजन, 15. गेहूं, 16. मदिरा तथा
17. मांस आदि।
तुलाधरिम्मेयानां गणिमानां च सर्वतः।
एभ्यस्तूत्कृष्टमूल्यानां मूल्यादष्टगुणो दमः ॥ 25 ॥
उपर्युक्त अल्पमूल्य के सत्रह पदार्थों से अपेक्षाकृत अधिक मूल्य वाले निम्नोक्त
पदार्थों को चुराने वाले चोर से सामान के मूल्य का आठ गुना दण्ड के रूप में वसूल
करना चाहिए—
तराजू, पलड़े, बाट, मापने का फ़ीता, गज़ आदि तथा गिनने का सामान-
कौड़ियां आदि।
धान्य दशभ्यः कुम्भेभ्यो हरतोऽभ्यधिकं वधः।
न्यूनं वैकादशगुणं दण्डं दाप्योऽब्रवीन्मनुः ॥ 26 ॥
मनु के अनुसार दस मटकों से अधिक परिमाण में धान्य चुराने वाले को
शारीरिक दण्ड देना चाहिए। इससे कम परिमाण के धान्य की चोरी के लिए चुराये
गये अन्न के मूल्य का ग्यारह गुना जुर्माने के रूप में वसूल करना चाहिए।
सुवर्णरजतादीनामुत्तमानां च वाससाम्।
रत्नानां चैव मुख्यानां शतादभ्यधिके वधः ॥ 27 ॥
सुवर्ण, रजत, उत्तम वस्त्रों, मुख्य रत्नों—हीरा, पन्ना, पुखराज—आदि की
चोरी करने वाले से इन मूल्यवान् पदार्थों के दाम का सौगुना अर्थ-दण्ड वसूल
करना चाहिए।
पुरुषं हरतः पात्यो दण्ड उत्तमसाहसः ।
सर्वस्वं स्त्रीं तु हरतः कन्यां तु हरतो वधः ॥ 28 ॥
पुरुष के अपहरण का दण्ड उत्तम साहस, स्त्री (विवाहिता) के अपहरण का
दण्ड अपहर्ता के सर्वस्व पर अधिकार तथा कन्या के अपहरण के लिए मृत्यु-दण्ड
देना चाहिए।
महापशूंस्तु नयतो दण्ड उत्तमसाहसः ।
मध्यमो मध्यमपशून् पूर्वः क्षुद्रपशुं हरन् ॥ 29 ॥
गधा, भेड़, बकरी आदि छोटे पशुओं, गाय, बैल और भैंस आदि मध्यम स्तर
के पशुओं तथा अश्व, ऊंट और हाथी आदि बड़े पशुओं को चुराने का क्रमशः पूर्व
साहस, मध्यम साहस तथा उत्तम साहस दण्ड देना चाहिए।
268 / नारदस्मृति

चतुर्विंशावरः पूर्वः परं षण्णवतिर्भवेत्।
चतुःशतपरो यश्च मध्यमो द्विशतावरः ॥ ३० ॥
सहस्त्रं तूत्तमो ज्ञेयः परः पञ्चशतावरः।
त्रिविधः साहसेष्वेवं दण्डः प्रोक्तः स्वयम्भुवा ॥ ३१ ॥
महर्षि मनु द्वारा अपनी स्मृति में किये गये निर्देश-उल्लेख के अनुसार-
नक़द 24-96 पणों (रुपयों) की (सौ पणों तक की), 200-400 पणों की तथा
500-1000 पणों की चोरी करने वाले को क्रमशः पूर्व साहस, मध्यम साहस तथा
उत्तम साहस दण्ड देना चाहिए।
प्रथमे ग्रन्थिभेदानामङ्गुल्यङ्गुष्ठयोर्वधः।
द्वितीये चैव तज्ज्ञेयं दण्डः पूर्वस्तु साहसः ॥ ३२ ॥
पहली बार जेब काटने का दण्ड चोर की अंगुलि और उसके अंगूठे को काट
देना है। इस अपराध को दुहराने वाले, अर्थात् दूसरी बार जेब काटने वाले को पूर्व
साहस दण्ड देना चाहिए।
गोषु ब्राह्मणसंस्थासु स्थूरायाश्छेदनं भवेत्।
दासीं तु हरतो नित्यमर्धपादविकर्तनम् ॥ ३३ ॥
ब्राह्मणों के स्वामित्व वाली गायों के हरण करने का दण्ड चोर के दोनों घुटनों
को नकारा कर देना है तथा ब्राह्मणों के स्वामित्व वाली दासी के अपहरण का दण्ड
चोर के पैरों को अधकटा बना देना है।
येन येन यथाङ्गेन स्तेनो नृषु विचेष्टते।
तत्तदेवावच्छेत्तव्यं तन्मनोरनुशासनम् ॥ ३४ ॥
चोर अपने जिस-जिस अंग से चोरी करता है, उसके उस-उस अंग को काट
देना ही उसके अपराध का दण्ड है। यही मनु की भी व्यवस्था है।
गरीयसि गरीयांसमगरीयसि वा पुनः।
स्तेने निपातयेद्दण्डं न यथा प्रथमे तथा ॥ ३५ ॥
देश-काल के अनुसार अपराध की गुरुता और लघुता के अनुरूप ही राजा
को गुरु तथा लघु दण्ड का विधान करना चाहिए। उदाहरणार्थ, सुभिक्ष में अन्न की
चोरी के लिए जिस दण्ड का विधान है, दुर्भिक्ष में उसी अपराध के लिए वही दण्ड
न्यायोचित नहीं है।
दश स्थानानि दण्डस्य मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत्।
त्रिषु वर्णेषु यानि स्युर्ब्राह्मणस्त्वक्षतः सदा ॥ ३६ ॥
मनु ने तीन-क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र-वर्णों के लोगों के द्वारा चौर्यादि के
लिए दण्ड का विधान किया है। ब्राह्मण को तो सर्वथा अदण्ड्य माना है। तीनों वर्णों
के अपराधियों के निम्नोक्त दस अंगों पर प्रहार किया जाना चाहिए।
नारदस्मृति / 269

उपस्थमुदरं जिह्वा हस्तौ पादौ च पञ्चमम्।

उपस्थमुदरं जिह्वा हस्तौ पादौ च पञ्चमम्।
चक्षुर्नासा च कर्णौ च धनं देहस्तथैव च॥ 37॥
दस प्रहरणीय अंग है—1. लिंग (जननेन्द्रिय), 2. उदर, 3. जिह्वा, 4. दोनों
हाथ, 5. दोनों पैर, 6. चक्षु, 7. नासिका, 8. दोनों कान, 9. धन तथा देह।
टिप्पणी—यहां चूतड़ों, टांगों और पीठ का उल्लेख नहीं हुआ। प्रायः बेतों
का प्रहार इन्हीं तीन अंगों पर किया जाता है। 'देह' से स्मृतिकार का अभीष्ट स्पष्ट
नहीं है।
लिंग, आंख, नाक, कान तथा नासिका आदि कोमल अंगों पर तो प्रहार
वर्जित होना चाहिए।
अपराधं परिज्ञाय देशकालौ च तत्त्वतः।
सारानुबन्धावालोक्य दण्डानेतान् प्रकल्पयेत्॥ 38॥
देश और काल के सन्दर्भ में अपराधी की मानसिकता तथा उसके चरित्र
आदि की समीक्षा करने के उपरान्त ही उपर्युक्त दस स्थानों पर दण्ड देने का आदेश
देना चाहिए। उदाहरणार्थ, सुशिक्षित एवं सच्चरित्र व्यक्ति द्वारा प्रयत्न करने पर भी
नौकरी न पाने से निराश तथा अपने भूखे बच्चे को बिलखता न देख सकने के
कारण चोरी करने को विवश होने पर उसके प्रति सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण ही
अपनाना चाहिए। आंख मींचकर दण्ड संहिता का पालन करना उचित नहीं।
न मित्रकारणाद्राज्ञा विपुलाद्वा धनागमात्।
उत्सृष्टव्यः साहसिकस्त्यक्तात्मा मनुरब्रवीत्॥ 39॥
मनु महाराज का यह भी स्पष्ट कथन है कि पकड़े गये चोर-डाकू के राजा का
सम्बन्धी होने पर अथवा उसके द्वारा भारी घूस का प्रस्ताव किये जाने पर, उसे
किसी भी स्थिति में छोड़ नहीं देना चाहिए। पक्षपात करने वाला राजा अथवा
राज्यकर्मचारी नरकगामी होते हैं।
यावानबध्यस्य वधे तावान् बध्यस्य मोक्षणे।
भवत्यधर्मो नृपतेर्धर्मस्तु विनियच्छतः॥ 40॥
जिस प्रकार अवध्य का वध करना और वध्य का वध न करके उसे छोड़ देने
से राजा को महापाप लगता है, उसी प्रकार विचारपूर्वक घोषित अपराधी मनोवृत्ति
के चोर डाकू के प्रति पक्षपात करने, उसके प्रति अनुग्रह दिखाने पर भी राजा पाप
का भागी होता है। जिस प्रकार निरपराध को दण्ड देना पाप है, उसी प्रकार
अपराधी को दण्ड न देना भी पाप है।
न जातु ब्राह्मणं हन्यात् सर्वपापेष्वपि स्थितम्।
निर्वास्यं कारयेत् काममिति धर्मो व्यवस्थितः॥ 41॥
राजा को किसी भी प्रकार के छोटे-बड़े अपराध करने पर ब्राह्मण को कभी
270 / नारदस्मृति

दण्ड नहीं देना चाहिए। राजा को अधिक-से-अधिक किल्विषी (पापकर्मा) ब्राह्मण
को अपने देश से निर्वासित कर देना चाहिए।
सर्वस्वं वा हरेद्राजा चतुर्थं वाऽवशेषयेत्।
एतेभ्योऽनुस्मरन्धर्मं प्राजापत्यमिति स्थितिः॥ 42 ॥
राजा को प्रयत्न करने पर भी न सुधरने वाले और देश से निकलने को
असहमत ब्राह्मण की सम्पत्ति छीन लेनी चाहिए अथवा उसकी सम्पत्ति का चौथा
भाग उसके निर्वाह के लिए छोड़कर शेष पर अपना अधिकार कर लेना चाहिए।
ऐसा करते समय राजा को दुखी मन से यह कहना चाहिए कि प्रजापति द्वारा विहित
धर्म की रक्षा के लिए, उसे न चाहते हुए भी ऐसा करना पड़ रहा है-देवता उसे
क्षमा करें।
ब्राह्मणस्यापराधेसु चतुर्ध्वङ्को विधीयते।
गुरुतल्पे सुरापाने स्तेयं ब्राह्मणहिंसने ॥ 43 ॥
ब्राह्मण द्वारा सुरापान, गुरुपत्नी-गमन, स्तेय तथा ब्रह्महत्या आदि निकृष्ट एवं
जघन्य कार्यों के किये जाने पर भी उसके शरीर पर इन अपराधों के सूचक चार
प्रकार के चिह्नों को अंकित करना चाहिए। इसके अतिरिक्त उसे अन्य किसी प्रकार
का आर्थिक अथवा शारीरिक दण्ड नहीं देना चाहिए।
गुरुतल्पे भगः कार्यः सुरापाने ध्वजः स्मृतः।
स्तेये तु श्वपदं कृत्वा शिशिपितेन पूरयेत्॥ 44 ॥
सुरापान करने वाले ब्राह्मण के मस्तक पर ध्वजा का, गुरुपत्नी-गमन करने
वाले के मस्तक पर भग का तथा चोरी करने पर कुत्ते के पद का चिह्न बनाना
चाहिए। कुरेदे हुए चिह्न के भीतर मोरपित्त-मोरपंख की राख-भर देनी चाहिए,
जिससे ऐसा चिह्न कभी मिट अथवा लुप्त न हो सके, अपितु स्थायी रूप से सबको
दीखता रहे, ताकि लोग उसका बहिष्कार करने में भूल-चूक न कर सकें।
अशिरः पुरुषः कार्यो ललाटे ब्रह्मघातिनः।
असम्भाष्यश्च कर्त्तव्यस्तन्मनोरनुशासनम् ॥ 45 ॥
ब्रह्महत्या करने वाले ब्राह्मण के मस्तक पर उसके इस पाप के सूचक
मस्तकविहीन (सिरकटे) पुरुष का चिह्न अंकित किया जाता है। महाराज मनु का
स्पष्ट निर्देश है कि इन चारों प्रकार के अपराधी ब्राह्मणों का सामाजिक बहिष्कार
कर देना चाहिए। यहां तक कि उनके साथ बातचीत भी नहीं करनी चाहिए।
राजा स्तेनेन गन्तव्यो मुक्तकेशेन धावता।
आचक्षाणेन तत्स्तेयमेवंकर्मास्मि शाधि माम् ॥ 46 ॥
अनेना भवति स्तेनः स्वकर्मप्रतिपादनात्।
राजा तत्स्पृशेदेनमुत्सृजेत्तु ह्यकिल्बिषम् ॥ 47 ॥
नारदस्मृति / 271

यदि चोरी करने पर चोर पश्चात्ताप की आग में जलता हुआ व मुक्तकेश
अवस्था में चारों ओर दौड़ता हुआ, उच्च स्वर में अपने पाप को सार्वजनिक रूप से
घोषित करता है और रुदन करता हुआ राजा के पास जाता है तथा दण्ड के लिए
अपने आपको प्रस्तुत करता है, तो ऐसे चोर को सुधरने का अवसर देना चाहिए।
अपने मुख से ही अपने पाप को स्वीकार करने, अपने कृत्य पर लज्जित होने, दण्ड
के लिए अपने को प्रस्तुत करने वाले के प्रति राजा को सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण
अपनाते हुए उसे क्षमा कर देना चाहिए तथा अपने हाथ के स्पर्श से उसे पवित्र बना
देना चाहिए।
टिप्पणी—राजा के हाथ का स्पर्श पतित को पवित्र बनाने वाला माना गया
है।
राजाभिर्धृतदण्डास्तु कृत्वा पापानि मानवाः।
निर्मलाः स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा॥ 48॥
यदि पापाचारी व्यक्ति अपने पापों के लिए प्रायश्चित्त करते हैं, राजा के समक्ष
अपने आपको दण्ड के लिए प्रस्तुत करते हैं तथा राजा द्वारा प्रदत्त दण्ड को सहर्ष
स्वीकार करते हैं, तो वे भी पापमुक्त एवं शुद्ध होकर सन्तों के समान मरणोपरान्त
स्वर्गलोक में जाने के अधिकारी बन जाते हैं।
शासनाद्वा विमोक्षाद्वास्तेनो मुच्यति किल्बिषात्।
अशासनात्तु तद्राजा स्तेनस्याप्नोति किल्बिषम्॥ 49॥
राजा द्वारा अपने सामने उपस्थित चोर पर अनुग्रह करने, अर्थात् बिना दण्ड
दिये मुक्त करने अथवा समुचित दण्ड देने पर चोर पाप-मुक्त हो जाता है। राजा को
यह नहीं भूलना चाहिए कि चोर को दण्ड दिये बिना छोड़ देने पर, अर्थात् किसी
प्रकार का पश्चात्ताप करने पर चोर के पाप का फल स्वयं राजा को भुगतना पड़ता
है।
गुरुरात्मवतां शास्ता शास्ता राजा दुरात्मनाम्।
अतः प्रच्छन्नपापानां शास्ता वैवस्वतो यमः॥ 50॥
विवेकहीन सज्जनों के शासक तो उनके गुरुजन होते हैं और दुष्ट आततायियों
पर राजा का ही शासन रहता है। अभिप्राय यह है कि बुद्धिमान् व्यक्तियों द्वारा
अपराध हो जाने अथवा किये जाने पर गुरुओं द्वारा उन्हें समझाना पर्याप्त होता है।
वे प्रबोधन से ही अपराधवृत्ति का त्याग कर सन्मार्ग ग्रहण कर लेते हैं, परन्तु दुष्ट
व्यक्ति समझाने-बुझाने की भाषा को नहीं समझते—‘लातों के भूत बातों से नहीं
मानते’—उन्हें सन्मार्ग पर लाने का एकमात्र उपाय दण्ड ही है और यह कार्य राजा
ही कर सकता है।
इन दोनों—प्रकट सज्जनों और प्रकट दुर्जनों—के अतिरिक्त, भीतर से दुर्जन,
272 / नारदस्मृति

अष्टापाद्यं तु शूद्रस्य स्तेये भवति किल्बिषम्।

परन्तु ऊपर से सज्जन बने, अर्थात् प्रच्छन्न धूर्तों को सुधारने का दायित्व तो विवस्वान्
(सूर्य) के पुत्र यमराज ही करते हैं, अर्थात् वे ही ऐसे दुष्ट-कपटी जनों को अनेक
प्रकार की नरक यातनाएं देकर उन्हें सचेत करते रहते हैं।
अष्टापाद्यं तु शूद्रस्य स्तेये भवति किल्बिषम्।
द्विराष्टापाद्यं वैश्यस्य द्वात्रिंशत् क्षत्रियस्य तु॥ 51 ॥
ब्राह्मणस्य चतुःषष्टीत्येवं स्वायम्भुवोऽब्रवीत्।
विद्यापि च विशेषेण विद्वत्स्वभ्यधिकं भवत्॥ 52 ॥
महर्षि मनु के अनुसार मूर्खों द्वारा किये गये अपराध का दण्ड समझदारों द्वारा
किये जाने वाले अपराध के दण्ड की तुलना में कम होता है। मूर्ख तो मूर्ख है।
उसके द्वारा किया अपराध मूर्खता है। उसे तो अच्छे-बुरे की परख ही नहीं, परन्तु
विवेकशील व्यक्ति भी मूर्खों के समान आचरण अथवा उनका अनुसरण करता है,
तो निश्चित है कि उसे अधिक दण्ड मिलना चाहिए। मूर्खों द्वारा किये अपराध का
तो कोई समर्थन नहीं करता, परन्तु विवेकशील व बुद्धिमानों द्वारा किया ग़लत-सही
कार्य तो दूसरों के लिए उदाहरण बन जाता है। यही कारण है कि मनु महाराज ने
एक ही अपराध के लिए विभिन्न वर्णों के लोगों के लिए भिन्न-भिन्न दण्ड की
व्यवस्था दी है। उदाहरणार्थ, चोरी के लिए शूद्र से चोरी के सामान का आठ गुणा,
वैश्य से सोलह गुणा, क्षत्रिय से बत्तीस गुणा और ब्राह्मण से चौंसठ गुणा दाम दण्ड
के रूप में वसूल करना चाहिए; क्योंकि विद्या-विवेकसम्पन्न बुद्धिमानों का अपराध
और दण्ड अधिक ही होता है।
शारीरश्चार्थदण्डश्च दण्डस्तु द्विविधः स्मृतः।
शारीरं दशधा प्रोक्तमर्थदण्डस्त्वनेकधा ॥ 53 ॥
अपराध के लिए दिये जाने वाले दण्ड के दो रूप हैं- 1. शारीरिक तथा
2. आर्थिक। शारीरिक दण्ड के दस और आर्थिक दण्ड के अनेक रूप-भेद हैं।
काकिण्यादिस्त्वर्थदण्डः सर्वस्वान्तस्तथैव च।
शारीरः सन्निरोधादिर्जीवितान्तस्तथैव च॥ 54 ॥
बन्दी बनाने से लेकर मृत्यु-दण्ड देने तक मारना-पीटना आदि यातनाएं
शारीरिक दण्ड के अन्तर्गत आती हैं तथा कौड़ी से लेकर सर्वस्व (सारी सम्पत्ति)
का हरण आर्थिक दण्ड है।
काकिण्यादिस्तु यो दण्डः स तु भाषावरः स्मृतः।
भाषावराद् योऽयं प्रोक्तः कार्षापणपरस्तु सः॥ 55 ॥
उत्तर भारत में लेन-देन में काकिणी अथवा वराटिका (कौड़ियों) का प्रचलन
है, परन्तु दक्षिण भारत में लेन-देन के रूप में प्रचलित मुद्रा कार्षापण (लोहे का
सिक्का) कहलाती है। वैसे काकिणी से अधिक मूल्य की मुद्रा माष और माष से
नारदस्मृति / 273

भी अधिक मूल्य की मुद्रा कार्षापण है। एक प्रकार से कार्षापण का मूल्य साठ
अथवा अस्सी काकिणी है।
कार्षापणावराद् यस्तु चतुः कार्षापणावरः।
द्व्यवरोऽष्टापरश्चान्यस्त्र्यवरो द्वादशोत्तरः॥५६॥
इस प्रकार विभिन्न अपराधों के लिए निर्दिष्ट एक, दो, तीन तथा चार कार्षापणों
से क्रमशः बीस, चालीस, अस्सी तथा एक सौ साठ काकिणी समझना चाहिए।
कार्षापण के मूल्य में न्यूनाधिकता मान्य होने के कारण अपराध विशेष के लिए
निर्दिष्ट दण्ड कार्षापण का सवाया अथवा ड्योढ़े, 2 का 2½, 3, 4 का 5, 6 तथा
8 का 12 किया जा सकता है, इससे अधिक नहीं।
कार्षापणो दक्षिणस्यां दिशि रौप्यः प्रवर्तते ।
पणैर्निबद्धः पूर्वस्यां विंशतिस्तु पणाः स तु ॥ ५७ ॥
दक्षिण भारत (आन्ध्र, कर्नाटक, तमिलनाडु तथा केरल) में कार्षापण का
मूल्य चांदी का एक रुपया है। पूर्व भारत (बिहार, बंगाल, उड़ीसा तथा असम) में
सवा रुपया (बीस आने) को (बीस-पच्चीस वर्ष पूर्णदशमलव पद्धति नहीं अपनाये
जाने पर रुपये के सोलह आने और तौल में सेर की सोलह छटांकें मान्य एवं
प्रचलित थीं) कार्षापण माना जाता है।
माषो विंशतिभागस्तु ज्ञेयः कार्षापणस्य तु।
काकिणी तु चतुर्थांगी माषस्य च पणस्य च ॥ ५८ ॥
कार्षापण का बीस आना मूल्य मानने पर उसके बीसवें भाग को माष
(आना) कहा जाता है और एक माष की चार काकिणी (पैसे) होते हैं।
पञ्चनद्याः प्रदेशे तु संज्ञा या व्यावहारिकी ।
कार्षापणप्रमाणं तु निबद्धमिह नेतया ॥ ५९ ॥
पञ्चनद प्रदेश-आज तो पूर्वी पंजाब के पाकिस्तान में चले जाने से पांच
नदियों का प्रदेश तीन नदियों वाला रह गया है। इसके अतिरिक्त उसके भी तीन
भागों-पंजाब, हरियाणा तथा हिमाचल हो गये हैं- में तो सोलह आने मूल्य के
कार्षापण का लोकव्यवहार में पर्याप्त प्रचलन है। इसलिए उसे लिपिबद्ध करना
आवश्यक नहीं समझा गया।
कार्षापणोऽन्तिका ज्ञेया ताश्चतस्त्रस्तु धानकः ।
तद्द्वादश सुवर्णस्तु दीनारण्यः स एव च ॥ ६०॥
सबसे बड़ा सिक्का कार्षापण है, चार कार्षापणों के योग का नाम धानक है।
बारह धानकों का योग सुवर्ण कहलाता है और इसी सुवर्ण का नाम दीनार है।
वार्तां तु यां चाप्यथ दण्डनीतिम्
राजाऽनुवर्त्तेत सदाऽप्रमत्तः ।
274 / नारदस्मृति

हन्यादुपायैर्निपुणैर्गृहीतान्
तथैव शास्तावन्निगृह्य पापान् ॥ 61 ॥
राजा को विवेक से कार्य लेते हुए प्रयोगों और अनुभवों से सुपरीक्षित एवं
व्यावहारिक दृष्टि से उपयोगी सिद्ध दण्डात्मक उपायों से पापियों तथा अपराधियों
को पकड़कर व बन्धन में डालकर रखना चाहिए तथा देश में वार्ता- कृषि,
वाणिज्य और पशुपालन--के विकास के अवसर जुटाकर प्रजा को समृद्ध बनाना
चाहिए।
देश की समृद्धि एवं सम्पन्नता में सहायक सिद्ध होने वाली दण्ड नीति का
प्रयोक्ता राजा ही प्रजा का अनुराग तथा सम्मान, यश एवं प्रतिष्ठा पाने में सफल होता
है।
॥ नारदस्मृति समाप्त ॥
नारदस्मृति / 275

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