नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
- हाथ में शस्त्र लिये रहने पर पकड़ा जाने वाला हत्यारा है।
- हाथ में स्त्री के सिर के केश, वस्त्र, गन्ध आदि लिये रहने वाला परस्त्रीगामी
है। - तोड़-फोड़ के औज़ारों के साथ पकड़ा जाने वाला सेतुभञ्जक है।
- कुल्हाड़ी आदि के साथ पकड़ा जाने वाला वृक्षों को काटने वाला है तथा
- तमतमाये चेहरे वाला दूसरों से मार-पीट करने वाला है।
इस प्रकार के चिह्नों को देखकर किसी अन्य साक्ष्य की अपेक्षा किये बिना
इन अपराधियों को तत्काल यथोचित दण्ड देना चाहिए।
कुद्दालपाणिर्विज्ञेयः सेतुभेत्ता समीपगः।
तथाकुठारपाणिश्च वनच्छेत्ता प्रकीर्तितः ॥ 174 ॥
स्मृतिकार इस सम्बन्ध में कुछ सावधानी बरतने की चेतावनी देते हुए कहता
है—कभी-कभी फावड़ा हाथ में लिये किसी पुल के पास दीखने वाला व्यक्ति
पुलिया का रक्षक—टूट-फूट की मरम्मत करने वाला—और कुल्हाड़ी हाथ में
लिये रहने वाला वृक्षों को काटने वाला समझ लिया जाता है। यह धारणा सही हो
भी सकती है और सही नहीं भी हो सकती है। अतः सत्य के निर्णय के लिए
सतर्कता अपेक्षित रहती है।
प्रत्यक्षचिह्नो विज्ञेयो दण्डपारुष्यकृन्नरः।
असाक्षिप्रत्यया ह्येते पारुष्ये तु परीक्षणम् ॥ 175 ॥
वस्तुतः अपराधी के चेहरे के हाव-भावों, उसकी चेष्टाओं व उसके छिपने के
प्रयास आदि प्रत्यक्ष चिह्नों से उसके अपराधी होने का अनुभव हो जाता है, फिर भी
सत्य को सुनिश्चित करने के लिए थोड़ी-बहुत पूछताछ अवश्य करनी चाहिए।
'असत्य के पांव नहीं होते' उक्ति के अनुसार अपराध को छिपाना सम्भव
नहीं होता और वास्तविकता सामने आ ही जाती है, फिर भी कुछ लोग जहां अपेक्षा
से अधिक चतुर होते हैं, वहां कुछ लोग अत्यधिक भोले और सीधे-सादे होते हैं।
अतः जांच-परख करना आवश्यक हो जाता है।
कश्चित्कृत्वाऽऽत्मनश्चिह्नं द्वेषात् परमुपद्रवेत्।
हेत्वर्थगतिसामथ्र्यैस्तत्र युक्तं परीक्षणम् ॥ 176 ॥
कभी-कभी ऐसा भी होता है कि कुछ चतुर एवं धूर्त लोग द्वेषवश किसी को
फंसाने के लिए अपने शरीर पर कुछ कृत्रिम चिह्न बना देते हैं अथवा प्रताड़ित-
पीड़ित सरीखी चेष्टाएं अथवा प्रदर्शन करने लगते हैं। इस स्थिति में वास्तविकता
का निर्णय करने के लिए हेतु (कारण), प्रयोजन, सामर्थ्य और गति के आधार पर
जांच करनी चाहिए, अर्थात् यह देखना चाहिए कि अपराध का कारण क्या हो
सकता है ? उद्देश्य अथवा प्रयोजन क्या हो सकता है ? अपराधी में अपराध करने
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का सामर्थ्य भी है अथवा नहीं ? इसके अतिरिक्त अपराध का स्वरूप क्या है ? क्या
सचमुच शिकायत करने वाले को किसी प्रकार की शारीरिक क्षति—सूजन, अंगभंग,
रक्त प्रवाह, घाव आदि—पहुंची भी है अथवा नहीं ?
इन सब तथ्यों पर विचार करने से अनुमान लगाना सम्भव हो जाता है कि
अपराधी ने सचमुच अपराध किया है अथवा उस पर मिथ्या आरोप लगाया जा रहा
है ?
नार्थसम्बन्धिनो नाप्ता न सहाया न वैरिणः ।
न दृष्टदोषाः प्रष्टव्याः साक्षिणः प्रतिदूषिताः ॥ 177 ॥
निम्नोक्त व्यक्तियों के वक्तव्य को सत्य के निर्णय के लिए प्रमाण के रूप में
ग्रहण नहीं किया जा सकता, अर्थात् ऐसे लोगों की सत्यनिष्ठा सन्देह के घेरे में आ
जाने से इनकी विश्वसनीयता खण्डित हो जाती है और वे साक्षी बनने के योग्य नहीं
रहते—
- कार्य-व्यापार में वर्तमान में सहभागी (पार्टनर) अथवा भूत में रह चुका
व्यक्ति। - निकट सम्बन्धी अथवा घनिष्ठ मित्र।
- अधीनस्थ कर्मचारी।
- शत्रु, जिससे कभी मन-मुटाव अथवा झगड़ा-फ़साद हो चुका है।
- किसी अन्य व्यवहार में मिथ्या साक्ष्य देने के लिए लाञ्छित नहीं है।
- लोक में तथा समाज में मिथ्यावादी के रूप में कुख्यात।
दासनैकृतिकाश्राद्धवृद्धस्त्री बाल चाक्रिकाः ।
मत्तोन्मत्तप्रमत्तार्त्तकितव ग्रामयाजकाः ॥ 178 ॥
महापथिकसामुद्रवणिक् प्रव्रजितातूराः ।
व्यङ्गैकश्रोत्रियाचारहीनक्लीवकुशीलवाः ॥ 179 ॥
नास्तिक व्रात्य दाराग्नित्यागिनोऽयाज्ययाज्यकाः ।
एकस्थालीसहायारिचरज्ञाति सनाभयः ॥ 180 ॥
प्राग्दृष्टदोषशैलूषविषजीव्याहिनुण्डिकाः ।
गरदाग्निदकीनाशशूद्रापुत्रौपपातिकाः ॥ 181 ॥
क्लान्तसाहसिकश्रान्तनिर्धनान्त्यावसायिनः ।
भिन्नवृत्तासमावृत्तजडतैलिकमूलिकाः ॥ 182 ॥
भूताविष्टनृपद्विष्टवर्ष नक्षत्रसूचकाः ।
अघशंस्यात्मविक्रेतृहीनाङ्गभगवृत्तयः ॥ 183 ॥
कुनखी श्यामदन्तश्च मित्रध्रुक्शठशौण्डिकाः ।
ऐन्द्रजालिकलुब्ध्रोग्रश्रेणीगणविरोधिनः ॥ 184 ॥
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वधकश्चर्मकृत् पङ्गु पतितः कूटकारकः ।
कुहकः प्रत्यवसितस्तस्करो राजपुरुषः ॥ 185 ॥
मनुष्यपशुमांसास्थिमधुक्षीराम्बुसर्पिषाम् ।
विक्रेता ब्राह्मणश्चैव द्विजो वार्धुषिकश्च यः ॥ 186 ॥
च्युतः स्वधर्मात् कुलिकः स्तावको हीनसेवकः ।
पित्रा विवदमानश्च भेदकृच्चेत्यसाक्षिणः ॥ 187 ॥
निम्नोक्त व्यक्ति साक्षी बनने के योग्य नहीं होते, अतः इन्हें साक्षी नहीं बनाना
चाहिए-
- दास, 2. छल-कपट से व्यवहार करने वाले के रूप में प्रसिद्ध, 3. श्राद्ध के
अयोग्य घोषित, अर्थात् आचारभ्रष्ट एवं पतित ब्राह्मण, 4. वृद्ध पुरुष, अर्थात् इन्द्रिय-
शक्ति की क्षीणता के कारण असमर्थ बना व्यक्ति अथवा परोपजीवी, 5. स्त्री, - बालक, 7. चक्रजीवी-तेली, रथकार तथा शकट-चालक आदि, 8. मत्त-
मदिरा आदि के प्रभाव में ग्रस्त, 9. उन्मत्त, अर्थात् विक्षिप्त, 10. प्रमत्त-प्रमादग्रस्त,
आलसी, सुस्त, 11. आर्त्त-विपत्ति-ग्रस्त, 12. द्यूतकार, 13. अशिक्षितों एवं ग्रामीणों,
अर्थात् निम्न लोगों (अन्त्यजों) का पुरोहित, 14. महापथिक-दूसरे देशों की यात्रा
करने वाला, 15. समुद्रजीवी, अर्थात् समुद्र में मिलने वाले जीवों, शंख-सीपी आदि
से अपनी आजीविका चलाने वाला-ऐसा व्यक्ति समुद्र में मल-मूत्र विसर्जित
करने वाला होने से म्लेच्छ होता है, 16. संन्यासी-उसका कोई निश्चित ठिकाना
ही नहीं होता, 17. रोगी, अर्थात् जीवन से निराश, 18. विकलांग-अन्धा, काणा,
बहरा, लंगड़ा, 19. एकाकी, मोहमाया से रहित अथवा समाज से निरपेक्ष होने से
निराश एवं उदासीन, 20. श्रोत्रिय-वेदपाठी ब्राह्मण-इन पछड़ों को अवाञ्छनीय
समझने वाला, 21. आचारहीन, 22. क्लीव (नपुंसक), 23. कुशीलव-नृत्य,
गीत, वाद्य, आदि से आजीविका चलाने वाला, अर्थात् दूसरों का मनोरंजन करने
वाला, 24. नास्तिक-वेदनिन्दक, 25. जाति-भ्रष्ट-जिसका यज्ञोपवीत संस्कार
नहीं हुआ, विद्या का अनधिकारी, 26. अपनी पत्नी का त्याग करने वाला-पालन
न कर सकने वाला अथवा क्लीव अथवा निर्मोही अथवा उत्तरदायित्व के निर्वहण
को महत्त्व न देने वाला, 27. अग्नि-त्यागी-यज्ञ-यागादि न करने वाला, - अयाज्य-याजक, यज्ञ के अनधिकारियों का पुरोहित बनने वाला, 29. एक ही
पात्र में भोजन करने वाला, अर्थात् स्वाद, शालीनता आदि से विमुख, 30. अपने
मित्र का शत्रु, 31. सन्देशवाहक अथवा गुप्तचर, 32. जाति-बन्धु-बुआ, मासी,
चाचा तथा मामा की सन्तति, 33. दृष्टदोष-पूर्व से ही दुष्ट के रूप में ज्ञात, - नर्तक, 35. विषजीवी-विषैले द्रव्यों का व्यापारी, 36. सर्प आदि भयंकर
जीवों को पकड़ने अथवा उनसे आजीविका चलाने वाला, 37. विषदाता-दूसरों
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को विष देकर-खिलाकर उनकी हत्या करने वाला, 38. दूसरों की सम्पत्ति (घर,
दुकान) को आग लगाने वाला, 30. पशुओं की हिंसा से आजीविका चलाने वाला,
40. शूद्रा का पुत्र, 41. छोटे-बड़े पाप करने वाला, 42. खिन्न, निराश तथा अशान्त
मन वाला, 43. डाकू-लुटेरा, 44. थका मांदा रहने वाला, 45. चाण्डाल आदि,
46. निर्धन, अभावग्रस्त, 47. अपने वंश परम्परागत व्यवसाय को छोड़कर दूसरे
किसी व्यवसाय को अपनाने वाला, 48. असमावृत्त-अपने स्तर से भिन्न, उच्च
अथवा निम्न वृत्ति को अपनाने वाला, 49. जड़-अविकसित बुद्धि,
50. तैलिक-घी, तेल आदि का क्रय-विक्रय करने वाला, 51. विद्याचोर, अर्थात्
गुरुकुल में प्रवेश लिये बिना और शुल्क चुकाये बिना गुप्त रूप से विद्या ग्रहण करने
वाला, 52. भूत-प्रेत से घिरा, 53. राजद्रोही, 54. ग्रह-नक्षत्रों को बताकर आजीविका
कमाने वाला-फलित ज्योतिषी, 55. अप्रासंगिक-ऊटपटांग बोलने वाला,
56. अपने को बेचने वाला-दासवृत्ति को अपनाने वाला, 57. अंगविहीन-एक
हाथ, एक टांग आदि का न होना, 58. पेट भरने के लिए पत्नी से वेश्यावृत्ति कराने
वाला, 59. मैला-कुचैला रहने वाला, गन्दे नाखूनों वाला, 60. तम्बाकू आदि के
अधिक सेवन से काले हो गये दांतों वाला, 61. मित्रद्रोही, 62. शठ-दुष्ट प्रकृति,
धूर्त, 63. मद्यविक्रेता, 64. जादूगर, 65. लोभी, 66. कठोर एवं निर्मम प्रकृति,
67. जाति-पांति का विरोधी, 68. समाज में प्रतिष्ठित वर्ण-व्यवस्था का विरोधी,
69. हत्यारा, 70. चर्म-व्यवसायी, 71. पंगु, 72. पतित, 73. कूटकर्म करने वाला,
अर्थात् चोरी-छिपे लोगों की हत्या करने वाला, 74. जादू-टोना करने वाला,
75. तस्कर-अवैध व्यापारी, 76. राजपुरुष-सरकारी कर्मचारी, 77. मनुष्य के
मांस का विक्रेता, 78. पशुमांस विक्रेता-क़साई, 79. अस्थि-व्यापारी, 80. मधुविक्रेता
81. क्षीरविक्रेता, 82. जलविक्रेता, 83. घृतविक्रेता, 84. वेद विक्रयी-धन लेकर
वेद पढ़ाने वाला, 85. ब्याज लेने वाला-ब्याज को आजीविका का साधन बनाने
वाला-द्विज, 86. धर्मभ्रष्ट, 87. शिल्पी, 88. सूत, मागध आदि आश्रयदाताओं की
स्तुति करने वाला, 89. हीन (अयोग्य, शूद्र अथवा पतित) की सेवा करने वाला,
90. पिता के साथ विवाद करने वाला, 91. परिवार में फूट डालने वाला।
ये सब विवश अथवा पतित अथवा भ्रष्ट होने के कारण अविश्वसनीय होते
हैं, अतः इनका साक्ष्य सर्वथा निरपेक्ष एवं सत्य पर आश्रित नहीं माना जा सकता।
बिकने वाले अथवा खरीदे जा सकने वाले व्यक्ति से सत्य पर टिकने की आशा को
ही नहीं जा सकती।
असाक्षिणो ये निर्दिष्टा दासनैकृतिकादयः ।
कार्यगौरवमासाद्य भवेयुस्तेऽपि साक्षिणः ॥ 188 ॥
ऊपर दासों और भ्रष्ट चरित्र व्यक्तियों के साक्षी न होने का उल्लेख किया
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गया है, परन्तु प्रचलित कहावत—'कीचड़ में कमल भी उत्पन्न होता है' अथवा
'कोयले की खान में कभी-कभी हीरा भी मिल जाता है,' अर्थात् छोटे अथवा बुरे
व्यक्तियों में भी अपवाद-रूप में भी चारित्रिक उत्कर्ष देखने को मिल जाता है। ऐसे
अपवाद बने सेवक और कुख्यात व्यक्ति भी विशेषतया अन्य साक्षियों के अभाव में
साक्षी बनाये जा सकते हैं और इनके साक्ष्य को मान्यता दी जानी चाहिए।
साहसेषु च सर्वेषु स्तेयसंग्रहणेषु च।
पारुष्ययोश्चाप्युभयोर्न परीक्षेत साक्षिणः ॥ 189 ॥
व्यक्तिगत चरित्र के अतिरिक्त एक अन्य विचारणीय तथ्य यह भी है कि
चोरी, डाका, छीना-झपटी, गाली-गलौच और मारपीट के मामलों के साक्षी तो
वहां उपस्थित रहने वाले चोर-डाकू आदि ही हो सकते हैं। भले आदमी तो ऐसी
घटनाओं से दूर रहने में ही अपना हित समझते हैं। वे तो घटनास्थल के समीप
फटकते ही नहीं। अतः इस प्रकार के मामलों में साक्षी बनने वाले व्यक्तियों के
चरित्र की परीक्षा नहीं करनी चाहिए, अन्यथा साक्ष्य का उपलब्ध होना ही दुर्लभ हो
जायेगा।
तेषामपि न बालः स्यान्न स्त्री नैको न कूटकृत्।
न बान्धवो न चारातिब्रूयुस्ते साक्ष्यमन्यथा ॥ 190 ॥
उपर्युक्त चोरी, डाका आदि मामलों में बालक, स्त्री, अपराधी मनोवृत्ति का
होने से आंख चुराने वाला, सामना न कर सकने वाला, बन्धु-बान्धव और शत्रु
आदि साक्षी नहीं बन सकते। इनके साक्ष्य की अप्रामाणिकता के कारण का उल्लेख
अगले पद्य में किया गया है।
बालोऽज्ञानादसत्यात्स्त्री पापाभ्यासाच्च कूटकृत्।
बिब्रूयाद्बान्धवः स्नेहाद्वैरनिर्यातनारिः ॥ 191 ॥
बालक लगभग अनजान होता है, स्त्रियों में असत्य-भाषण की प्रवृत्ति होती
है तथा वे स्वभाव से भीरु होती हैं, कूटाचारी का जीवन पापमय होता है, उसे तो
सत्य-असत्य का विचार ही नहीं रहता, उसे दूसरों को लड़ाने-भिड़ाने में ही
आनन्द आता है, बन्धु-बान्धवों से अनुराग और आसक्ति के कारण तथा विरोधी
शत्रु के द्वेष-भाव रखने के कारण तथा शत्रु को यातना देने को तत्पर होने के कारण
दोनों से यथार्थ कथन की अपेक्षा की ही नहीं जा सकती। रोग अथवा द्वेषग्रस्त
व्यक्ति निरपेक्ष हो ही नहीं सकता।
उभयानुमतो यः स्याद्द्वयोर्विवदमानयोः ।
असाक्षिकोऽपि साक्षित्वे प्रष्टव्यः स्यात् स संसदि ॥ 192 ॥
न्यायाधिकारी को साक्ष्य के लिए सर्वथा अनुपयुक्त एवं अपात्र, परन्तु विवाद
नारदस्मृति / 113
भूमिं लिखति पादाभ्यां बाहू वासो धुनोति च॥ 194॥
में उलझे दोनों पक्षों को एक समान मान्य व्यक्ति से मामले के सम्बन्ध में पूछताछ
करनी चाहिए और उसके साक्ष्य को यथोचित महत्त्व देना ही चाहिए।
यस्त्वात्मदोषभिन्नत्वादस्वस्थ इव लक्ष्यते।
स्थानात् स्थानान्तरं गच्छेदैकैकं चानुधावति॥ 193॥
क्रासत्यनिभृतोऽकस्मादभीक्ष्णं निश्वसत्यपि।
भूमिं लिखति पादाभ्यां बाहू वासो धुनोति च॥ 194॥
भिद्यते मुखवर्णोऽस्य ललाटं विद्यते तथा।
शोषमागच्छतश्चोष्ठादूर्ध्वं तिर्यक् च वीक्षते॥ 195॥
त्वरमाण इवाकस्मादपृष्टो बहु भाषते।
कूटसाक्षी स विज्ञेयस्तं पापं विनयेन्नृपः॥ 196॥
कूटसाक्षी को परिभाषित करते हुए स्मृतिकार का कथन है—
- अपने दोष के प्रकट हो जाने की आशंका से भयभीत होना।
- किसी एक स्थान पर टिक न पाने तथा इधर-उधर भटकने वाला होना।
- अस्वस्थ एवं असंयत दीखना।
- एक-एक व्यक्ति की टोह लेना।
- लोगों के मौन से घबराना।
- क्षण-प्रतिक्षण दीर्घ श्वास लेना, पैरों से धरती को कुरेदना और धरती पर
कुछ लिखना।
7.अकारण ही अपनी भुजाओं और वस्त्रों को ऊपर-नीचे करते रहना। - चेहरे के रंग का उड़ना।
- माथे पर पसीना आना।
- कण्ठ शुष्क हो जाना।
- पागलों के समान दीखना।
- बुद्धि में चञ्चलता का भाव आना।
- छोटे से प्रश्न का लम्बा चौड़ा उत्तर देना।
उपर्युक्त लक्षणों वाले व्यक्ति को कूटसाक्षी—झूठी गवाही देने वाला—समझना
चाहिए और राजा अथवा सम्बद्ध अधिकारी द्वारा उसे ऐसा कठोर दण्ड देना
चाहिए, जिससे दूसरे ऐसे दुस्साहसपूर्ण दुष्कर्म के सम्बन्ध में सोच भी न सकें।
श्रावयित्वा तथान्येभ्यः साक्षित्वं यो विनिह्नुते।
स विनेयो भृशतरं कूटसाक्ष्यधिको हि सः॥ 197॥
साक्ष्य के लिए अपनी सहमति-स्वीकृति देने के उपरान्त साक्ष्य के समय
इनकार करने वाला, अकारण अनुपस्थित रहने वाला अथवा टालमटोल एवं बहानेबाज़ी
करने वाला कूटसाक्षी से भी बड़ा अपराधी होता है। राजा को ऐसे दुष्ट व्यक्ति को
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भी अनुशासन बनाये रखने के लिए अत्यन्त कठोर दण्ड देना चाहिए।
आहूय साक्षिणः पृच्छेन्नियम्य शपथैर्भृशम्।
समस्तान् विदिताचारान् विज्ञातार्थान् पृथक् पृथक् ॥ 198 ॥
साक्षियों के सच्चरित्र तथा उनकी सत्यनिष्ठा से भली प्रकार परिचित होने पर
भी न्यायाधिकारी को प्रत्येक साक्षी को अलग अलग बुलाकर और घुमा-फिराकर
उनसे प्रश्न पूछने चाहिए। यहां तक कि उन्हें सत्य बोलने की शपथ दिलाकर
वास्तविकता को सुनिश्चित करने की अपनी ओर से भरसक चेष्टा करनी चाहिए।
कभी कभी सदाचारी व्यक्ति भी किसी विवशता—भय, लोभ, मोह, राग,
द्वेष तथा प्रतिशोध की भावना—के कारण असत्य भाषण करने लगता है। अच्छी
तरह न टटोले जाने पर उसे अपने उच्च चरित्र का अनुचित लाभ मिल जाता है।
अतः किसी व्यक्ति के सच्चरित्र होने के झांसे में आकर उसके वक्तव्य पर सहसा
विश्वास नहीं कर लेना चाहिए।
सत्येन शापयेद्विप्रं क्षत्रियं वाहनायुधैः।
गोबीजकाञ्चनैर्वैश्यं शूद्रं सर्वैस्तु पातकैः ॥ 199 ॥
साक्ष्य के लिए उपस्थित होने वाले ब्राह्मण को सत्य की, क्षत्रिय को अश्व,
गज, रथ आदि वाहनों तथा धनुष, खड्ग आदि आयुधों की, वैश्य को गाय आदि
पशु, धान्य तथा स्वर्ण आदि की और शूद्र को सभी पापों से आविष्ट होने की शपथ
दिलानी चाहिए। उदाहरणार्थ, ब्राह्मण को इस प्रकार शपथ लेनी चाहिए—मैं अपना
साक्ष्य सत्यनिष्ठा से प्रस्तुत करूंगा, मेरे मिथ्या भाषण करने पर मैं सत्य से पतित हो
जाऊं। इसी प्रकार क्षत्रिय को कहना चाहिए—मैं अपने वाहनों और आयुधों की
शपथ लेता हूं कि साक्ष्य में जो कहूंगा, सत्य कहूंगा, सत्य के अतिरिक्त कुछ नहीं
कहूंगा। मेरे असत्य-भाषण का अर्थ मेरा वाहनों और आयुधों से वञ्चित होना होगा।
इसी प्रकार वैश्य और शूद्र को भी शपथ लेनी चाहिए, अर्थात् सत्य-भाषण के प्रति
समर्पित होने का संकल्प प्रकट करना चाहिए।
पुराणैर्धर्मवचनैः सत्यमाहात्म्यकीर्तनैः।
अनृतस्यापवादैश्च भृशमुत्रासयेदिमान् ॥ 200 ॥
न्यायाधीश द्वारा साक्ष्य के लिए उपस्थित व्यक्तियों को सत्य भाषण से यश,
सम्मान और गौरव की वृद्धि सम्बन्धी तथा इसके विपरीत भाषण से अपयश,
लोकनिन्दा तथा मानहानि होने सम्बन्धी, कुछ प्राचीन इतिहास, पौराणिक आख्यान
तथा अन्यान्य कथापरक उद्धरण एवं उदाहरण आदि सुनाकर उन्हें असत्य भाषण
के लिए निरुत्साहित एवं सत्य भाषण के लिए प्रेरित प्रोत्साहित करना चाहिए।
नग्नो मुण्डः कपालेन भिक्षार्थी क्षुत्पिपासितः।
अन्धः शत्रुगृहं गच्छेद् यः साक्ष्यमनृतं वदेत् ॥ 201 ॥
न्यायाधिकारी को साक्ष्य के लिए उपस्थित व्यक्तियों को चेतावनी के स्वर में
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प्रबोधित करते हुए कहना चाहिए-मिथ्या साक्ष्य देने वाले को नंगा, गंजा, भूखा
और प्यासा होकर दुःख भोगना पड़ता है, उसे अपनी क्षुधा-निवृत्ति के लिए हाथ में
कपाल लेकर भीख मांगने को विवश होना पड़ता है। झूठी गवाही देने वाले को
अन्धा होना पड़ता है और यहां तक कि शत्रु के घर की चाकरी तक करनी पड़
जाती है।
नग्नो मुण्डः कपालेन परद्वारे बुभुक्षितः ।
अमित्रान् भूयशः पश्येद्यः साक्ष्यमनृतं वदेत् ॥ 202 ॥
मिथ्या साक्ष्य देने वाले को अभावग्रस्त जीवन जीना पड़ता है, उसे वस्त्रहीन
(नंगा) सिर मुंडा फ़क़ीर बनकर अपनी भूख मिटाने के लिए शत्रु के घर से भीख
मांगने को विवश होना पड़ता है। ऐसे दुर्दशाग्रस्त व्यक्ति को पग-पग पर अपने
शत्रुओं का सामना करना पड़ता है, अर्थात् उसे लज्जित एवं अपमानित होना पड़ता
है।
यां रात्रिर्माधविन्नास्त्री यां चैवाक्षपराजितः ।
यां च भाराभितप्ताङ्गो दुर्विवक्ता स तां वसेत् ॥ 203 ॥
जिस प्रकार पुरुष द्वारा दूसरी स्त्री को अपनाने पर उसकी पत्नी असह्य वेदना
से व्यथित हो उठती है, अर्थात् उसकी आंखों से नींद ग़ायब हो जाती है, उसके
लिए रात्रि का एक-एक पल बिताना एक समस्या का रूप ले लेता है, वह जल
बिन मछली के समान तड़पती है, जिस प्रकार द्यूत में सब कुछ हार चुके व्यक्ति की
सुख-शान्ति काफ़ूर हो जाती है, ऋण उतारने की चिन्ता उसे कहीं का नहीं रखती,
जिस प्रकार सामर्थ्य से अधिक भार उठाने वाले श्रमिक के लिए एक-एक पग
चलना और लक्ष्य पर पहुंचना कष्टसाध्य हो जाता है, उसी प्रकार झूठा साक्ष्य देने
वाला कभी सुख-शान्ति का जीवन नहीं जी सकता। उसका अपराध-बोध उसे
कहीं चैन से बैठने नहीं दे सकता।
साक्षी साक्ष्ये समुद्दिशन् गोकर्णशिथिलं वचः।
सहस्रं वारुणान् पाशान् भुङ्क्त स बन्धाद् ध्रुवम् ॥ 204 ॥
जो भी व्यक्ति साक्ष्य के लिए न्यायालय में उपस्थित होकर दृढ़ता और
विश्वास के साथ अपना साक्ष्य न देकर शिथिलता बरतता है, गाय के कान के
समान केवल उपस्थिति दर्ज कराता है, 'हां' 'न' में उत्तर देकर साक्ष्य को स्पष्ट
वाणी नहीं देता, ऐसा व्यक्ति वरुणदेव की दृष्टि में अपराधी है। वरुणदेव उसे अपने
हज़ारों पाशों से बांधकर असीम दुःख देते हैं।
तस्य वर्षशते पूर्णे पाश एव प्रमुच्यते ।
तदा पाशाद्विनिर्मुक्तः स्त्री सम्भवति मानवः ॥ 205 ॥
मिथ्या-साक्ष्य देने वाला वरुण के क्रोध का पात्र बनता है और सौ वर्षों तक
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उनके कठोर पाशों में बंधा विषम दुःख भोगता है। इस अवधि के उपरान्त भी वह
पाशमुक्त होने के लिए स्त्री की योनि में उत्पन्न होकर पराधीनता के कष्टपूर्ण जीवन
को बिताने पर विवश होता है।
एवं सम्बन्धनात् तस्मान्मुच्यते नियताच्च सः।
पशुगोऽश्वपुरुषाणां हिरण्यं भूर्यथाक्रमम्॥ २०६॥
पशु—गौ, अश्व—आदि, मनुष्य, स्वर्ण तथा भूमि सम्बन्धी विवाद में मिथ्या-
साक्ष्य के लिए मनुष्य को परलोक में कौन-कौन से दण्ड भुगतने पड़ते हैं—इसकी
चर्चा अगले पद्यों में की जा रही है। इतना तो निश्चित ही है कि मिथ्यासाक्षी
वरुणदेव के पाशों में बंधकर दीर्घकाल तक असह्य वेदना का शिकार बनता है।
यावतो बान्धवांस्तस्मिन् हन्ति साक्ष्येऽनृतं वदन्।
तावतः सम्प्रवक्ष्यामि शृणु सौम्यानुपूर्वशः॥ २०७॥
मिथ्यासाक्षी अपने पाप से अपने वंश के कितने पूर्वजों को, किस प्रकार
कलंकित करता है, उन्हें नरक-यातना सहन करने का उत्तरदायी बनाता है, इसका
विवरण कुछ इस प्रकार से है—
पञ्च पश्वनृते हन्ति दश हन्ति गवानृते।
शतमश्वानृते हन्ति सहस्रं पुरुषानृते॥ २०८॥
बकरी आदि पशु सम्बन्धी विवाद में मिथ्या-साक्ष्य देने के अपराध के दण्ड
के रूप में उसके पांच बान्धवों—माता, पिता, पत्नी, सन्तान तथा स्वयं वह—की
मृत्यु हो जाती है। गाय के विषय में मिथ्या-साक्ष्य का दण्ड तो दस बान्धवों—पांच
वर्तमान—माता, पिता आदि तथा पांच पूर्वपुरुषों—को भुगतना पड़ता है। अश्व के
विवाद में झूठी गवाही का दण्ड सौ सम्बन्धियों का पतन तथा पुरुष—दास, स्त्री
आदि—के विवाद में मिथ्या-साक्ष्य का दण्ड हज़ार सम्बन्धियों का नरकवास है।
हन्ति जातानजातांश्च हिरण्यार्थेऽनृतं वदन्।
सर्वं भूम्यनृते हन्ति मा स्म भूम्यनृतं वदीः॥ २०९॥
इसी प्रकार स्वर्ण सम्बन्धी विवाद में मिथ्या-साक्ष्य का दण्ड झेलना पड़ता
है। भूमि-सम्बन्धी विवाद में तो पूरे वंश का सर्वनाश हो जाता है। अतः भूमि के
विषय में तो कभी मिथ्या साक्ष्य का सोचना तक नहीं चाहिए।
एकमेवाद्वितीयं तत् प्राहुः पावनमात्मनः।
सत्यं स्वर्गस्य सोपानं पारावारस्य नौरिव॥ २१०॥
जिस प्रकार नदी को पार करने का एकमात्र सुनिश्चित साधन नौका है, उसी
प्रकार आत्मा को पवित्र करने वाला साधन सत्य है, सत्य ही स्वर्ग का सोपान है।
अतः व्यक्ति को राग-द्वेष तथा लोभ मोह आदि किसी भी कारणवश सत्य का
नारदस्मृति / 117
परित्याग कभी नहीं करना चाहिए; क्योंकि यही एकमात्र अद्वितीय और सुनिश्चित
सम्बल है।
अश्वमेधसहस्रं च सत्यं च तुलया धृतम्।
अश्वमेधसहस्रात्तु सत्यमेव विशिष्यते॥ 211॥
यदि तुला के एक पलड़े पर सैकड़ों अश्वमेधादि यज्ञों के फल को रखा जाये
और दूसरे पलड़े में सत्य को रखा जाये, तो निश्चित समझिये कि सत्य का पलड़ा
ही भारी पड़ेगा। इस प्रकार सत्य भाषण का फल अश्वमेध यज्ञ को सम्पन्न करने
से भी कहीं अधिक है।
वरं कूपशताद्वापी वरं वापीशतात् क्रतुः।
वरं क्रतुशतात् पुत्रः सत्यं पुत्रशताद् वरम्॥ 212 ॥
सौ कूपों को खुदवाने की अपेक्षा एक वापी का खुदवाना अधिक उत्तम है,
सौ वापियों की अपेक्षा वेदविहित यज्ञ को सम्पन्न करने का फल अधिक है, सौ
यज्ञों को सम्पन्न करने की अपेक्षा एक पुत्र को जन्म देना अधिक सार्थक है और सौ
पुत्रों का पिता बनने की अपेक्षा सत्य का दृढ़ता से पालन करना अधिक फलदायक है।
भूर्धारयति सत्येन सत्येनोदेति भास्करः।
सत्येन वायुः प्लवते सत्येनापः स्रवन्ति च ॥ 213॥
सत्य के बल पर ही पृथिवी जगत् को धारण करती है, सत्य की शक्ति से सूर्य
उदित है, वायु प्रवाहित होता है तथा जल नीचे की ओर सरकता है। सत्य की
महिमा अनन्त एवं अपार है।
सत्यमेव परं दानं सत्यमेव परं तपः।
सत्यमेव परो धर्मो लोकानामिति नः श्रुतम्॥ 214 ॥
महर्षियों एवं सिद्ध महात्माओं ने सत्य को ही सर्वोत्तम दान, श्रेष्ठ तप एवं
उत्कृष्ट धर्म माना है। श्रुति ने भी इस तथ्य का समर्थन किया है।
सत्यं देवाः समासेन मनुष्यास्त्वनृतं स्मृतम्।
इहैव तस्य देवत्वं यस्य सत्ये स्थिता मतिः॥ 215 ॥
सत्य की महिमा को संक्षेप में तथा निष्कर्ष रूप में कहना चाहें, तो यही
कहा जा सकता है कि देवता सत्य रूप हैं और मनुष्य असत्य रूप है। सत्य के
कारण ही देवों का देवत्व है और मनुष्यलोक की अपेक्षा देवलोक की महत्ता एवं
प्रतिष्ठा है। सत्य में मति होने के कारण ही देवता मनुष्यों से ज्येष्ठ श्रेष्ठ हैं।
सत्यं ब्रूहनृतं त्यक्त्वा सत्येन स्वर्गमेष्यसि।
उक्त्वानृतं महाघोरं नरकं प्रतिपत्स्यसे॥ 216॥
यह सब सुनाने के उपरान्त न्यायाधीश को साक्ष्य के लिए उपस्थित व्यक्तियों
118 / नारदस्मृति
को सम्बोधित करते हुए कहना चाहिए-सज्जनो! आप लोग असत्य का तथा
छल कपट का, किसी प्रकार के गोपन के प्रयास का सर्वथा परित्याग करके
सत्य-यथाश्रुत एवं यथादृष्ट, अर्थात् यथार्थ--का वर्णन करें। सत्य को धारण करने
से आप लोगों के मन को शान्ति मिलेगी और मरणोपरान्त स्वर्गलोक के रूप में
सद्गति होगी। इसके विपरीत मिथ्या-भाषण करने का अर्थ न्याय की हत्या करना
होगा। इस अपराध का दण्ड मानसिक शान्ति की समाप्ति, लोक में अपकीर्ति, न्याय
न पाने वाले की हाय और मरणोपरान्त दुर्गति-नरकगमन-होगा।
नरकेषु च ते शश्वज्जिव्हामुत्कृत्य दारुणाः।
असिभिः शातयिष्यन्ति बलिनो यमकिङ्कराः ॥ 217 ॥
शास्त्र के इस वचन को कभी नहीं भूलना कि यमराज के निर्मम, बलवान्,
भयंकर एवं आतंककारी सेवक झूठ बोलने वालों की जीभ काट डालते हैं और
तलवार से उनके शरीर को काटकर भरता बना देते हैं।
शूलैर्भैत्स्यसि चाक्रम्य क्रोशन्तमपरायणम् ।
अवस्थितं समुत्कृत्य क्षेप्स्यन्ति त्वां हुताशने ॥ 218 ॥
यमराज के क्रूर एवं आततायी सेवक झूठ बोलने वालों को शूलों से बींधकर
और उन्हें खण्ड-खण्ड करके कुछ टुकड़े गिद्धों कौओं को फेंक देते हैं और कुछ
टुकड़े आग में फेंक देते हैं।
अनुभूय च तास्तीव्राश्चिरं नरकवेदनाः।
रह यास्यसि पापासु गृध्रकाकादियोनिषु ॥ 219 ॥
मिथ्या-साक्ष्य देने वाले दुष्ट व्यक्ति नरक में दीर्घकाल तक अनेक घोर एवं
विषम कष्टों को भोगने के उपरान्त गिद्ध, कौए आदि निकृष्ट पक्षियों की योनि में
जन्म लेते हैं और दुःख झेलते हैं।
ज्ञात्वैताननृते दोषान् ज्ञात्वा सत्ये च सद्गुणान् ।
सत्यं वदोद्धरात्मानं नात्मानं पातय स्वयम् ॥ 220 ॥
अतः बन्धुओ! सत्य के गुणों और असत्य के दोषों को भली प्रकार समझ कर
असत्य का परित्याग करो और सत्य को दृढ़ता से ग्रहण करो। अपनी आत्मा का
उद्धार करना अथवा अपने को पतन के गर्त में डुबोना आपके अपने ही हाथ में है।
न बान्धवा न सुहृदो न धनानि महान्त्यपि ।
अलं धारयितुं शक्तास्तमस्युग्रे निमज्जतः ॥ 221 ॥
असत्य-भाषण करके स्वयं अपने आपको गहरे अन्धकार में धकेलने वाले
की उसके आत्मीय बन्धु-बान्धव, हित चिन्तक मित्र तथा विपुल धन सम्पदा तथा
समृद्ध-साधन आदि कुछ भी सहायता नहीं कर सकते। उसके उद्धार में किसी
प्रकार समर्थ नहीं हो सकते।
नारदस्मृति / 119
पितरस्त्ववलम्बन्ते त्वयि साक्षित्वमागते।
तारयिष्यति किं तस्मात् किं चायं पातयिष्यति ॥ २२२ ॥
साक्ष्य के लिए उपस्थित आप लोगों की ओर आपके पितर बड़ी उत्सुकता से
देख रहे हैं कि हमारी सन्तति हमारे नाम को उज्ज्वल करती है कि हमें अपमानित
करती है। आपके सत्य बोलने से आपके पितर प्रसन्न होंगे और उन्हें सुख मिलेगा।
इसके विपरीत आपके मिथ्या-भाषण से वे भी आत्मग्लानि तथा लज्जा से अपना
सिर झुकाने को विवश होंगे। आपके पितर निकृष्ट आचरण वाली पीढ़ी को देखकर
दुखी और खिन्न होंगे। अब यह आपके अपने हाथ में है कि आप अपने पितरों को
तृप्त करते हैं कि सन्तप्त करते हैं।
सत्यमात्मा मनुष्यस्य सत्ये सर्वं प्रतिष्ठितम्।
सत्यमुक्त्वात्मनात्मानं श्रेयसा सन्नियोजय ॥ २२३ ॥
अपनी आत्मा की ध्वनि को सुनिये। आत्मा सत्स्वरूप परमात्मा का अंश होने
से सत्य है। सत्य के बल पर ही धरती स्थिर है। सत्य-भाषण के द्वारा आप अपनी
आत्मा को श्रेय के साथ जोड़कर अपना ही हित करेंगे। आप लोग मिथ्या-भाषण
करके अपने पांवों पर कुल्हाड़ी मारने की भूल कदापि न कीजिये।
यस्यां रात्रावजनिष्ठा यस्यां रात्रौ मरिष्यसि।
वृथा तदन्तरं तुभ्यं साक्ष्यं चेदन्यथा कृथाः ॥ २२४ ॥
आपके द्वारा मिथ्या-भाषण का अर्थ—अमूल्य मानव-जीवन को सर्वथा नष्ट
करना होगा। जन्म से मृत्यु की मध्यावधि में किये गये आपके सभी शुभकर्म
आपके मिथ्या-साक्ष्य देते ही तत्क्षण भस्म हो जायेंगे और आप घोर पापी बन
जायेंगे।
ब्रह्मघ्नस्य तु ये लोका ये च स्त्री बालघातिनाम्।
ये च लोकाः कृतघ्नस्य ते ते स्युर्ब्रुवतो यथा ॥ २२५ ॥
इस तथ्य का कभी विस्मरण नहीं करना चाहिए कि मिथ्या साक्ष्य देने वालों
को ब्रह्महत्या करने वाले, अबला का वध करने वाले, अबोध बालक की हत्या
करने वाले और कृतघ्न व्यक्तियों को मिलने वाले घने अन्धकार से घिरे अत्यन्त
दुर्गन्धित नरकों की प्राप्ति होती है।
नास्ति सत्यात् परो धर्मो नानृतात् पातकं परम्।
साक्षिधर्मे विशेषेण सत्यमेव वदेदतः ॥ २२६ ॥
सत्य से बड़ा कोई दूसरा धर्म और असत्य से बड़ा कोई दूसरा पाप इस धरती
पर है ही नहीं। साक्षियों के लिए तो सत्य भाषण का विशेष महत्त्व है, अतः मेरा
आपसे सत्य बोलने का पुनः पुनः अनुरोध है।
टिप्पणी—इस सम्बन्ध में पुराण में कहा गया है—
120 / नारदस्मृति
साक्षी साक्ष्य देते समय सत्य-भाषण करता है अथवा असत्य बोलता है—
इसे कुबेर, आदित्य, वरुण, इन्द्र तथा वैवस्वत आदि देवता तथा सभी लोकपाल
अपनी दिव्य दृष्टि से देखते रहते हैं। अतः व्यक्ति इस लोक के प्राणियों से भले ही
वास्तविकता को छिपा ले, परन्तु अन्तर्यामी, सर्वज्ञ परमात्मा एवं उसके दिव्य पुत्रों-
देवों आदि से तो कुछ भी छिपाना सम्भव नहीं। इस तथ्य को जानने के उपरान्त भी
मिथ्या-साक्ष्य देने वाले को तो निपट मूर्ख ही मानना होगा।
यः परार्थे प्रहिणुयात् स्वां वाचं पुरुषार्थमः।
आत्मार्थे किं न कुर्यात् स पापो नरकनिर्भयः ॥ २२७ ॥
दूसरों के लिए अपनी वाणी को कलुषित करने वाले को नीच, विवेकहीन
और अधम पुरुष न कहा जाये, तो क्या कहा जाये? यहां यह भी विचारणीय हो
जाता है कि दूसरों के लिए पापाचरण करने वाला भला अपने हित-साधन के लिए
किस प्रकार निकृष्ट कार्य नहीं कर सकता? ऐसे आदमी पर भला कौन भरोसा
करेगा?
वाच्यर्था नियताः सर्वे वाङ्मूला वाग्विनिस्सृता।
यो हि तां स्तेनयेद्वाचं ससर्वस्तेयकृन्नरः ॥ २२८ ॥
विश्व के सभी व्यापार—लेन-देन, सम्बन्ध-योजना, शिक्षा-दीक्षा तथा शाप
वरदान आदि-वाणी के ही विषय हैं। वाणी से उच्चरित शब्दों में ही अर्थ निहित
रहते हैं। मनुष्य के मन के भाव वाणी द्वारा ही निकलते-प्रकट होते हैं। इस प्रकार
वाक्इन्द्रिय का अन्य इन्द्रियों की अपेक्षा विशेष महत्त्व है। इस वाक्इन्द्रिय का
दुरुपयोग करने वाला, अर्थात् मिथ्या-भाषण करने वाला सभी पदार्थों के हरण के
पाप का भागी होता है।
साक्षिविप्रतिपत्तौ तु प्रमाणं बहवो यतः।
तत्साम्ये शुचयो ग्राह्यस्तत्साम्ये स्मृतिमत्तराः ॥ २२९ ॥
साक्षियों के साक्ष्य में अन्तर पाये जाने पर सत्य के निर्णय के लिए प्रमाणों का
निरीक्षण परीक्षण करना चाहिए। प्रमाणों में एकरूपता मिलने पर ही साक्ष्य की
पवित्रता को स्वीकार करना चाहिए। प्रमाण उपलब्ध न होने पर सुप्रसिद्ध पवित्र
आचरण वालों की स्मरणशक्ति को आधार बनाकर सत्य पर पहुंचने का प्रयास
करना चाहिए।
स्मृतिमत्साक्षिसाम्यं तु विवादे यत्र दृश्यते।
सूक्ष्मत्वात् साक्षिधर्मस्य साक्ष्यं व्यावर्तते ततः ॥ २३० ॥
तीव्र स्मृति वाले सदाचारी साक्षियों के कथन में एकरूपता पाये जाने पर सत्य
के निर्णय में सुविधा होती है। क्षीण स्मृति वाले लोगों को साक्षी बनने का अधिकार
ही नहीं। ऐसे लोगों को साक्ष्य देने के पचड़े में पड़ना ही नहीं चाहिए; क्योंकि वे
नारदस्मृति / 121
तो इसके पात्र ही नहीं। जब उन्हें ठीक से कुछ याद ही नहीं रहता, तो फिर वे सही
तथ्यों को प्रस्तुत ही कैसे कर सकते हैं ?
स्वसाक्षिवर्जितो यस्तु दैववादी कथञ्चन।
उद्धारं तस्य नेच्छन्ति दिव्यैनापि मनीषिणः ॥ 231 ॥
साक्षी को साक्ष्य देने से रोकने वाले व्यक्ति को धर्म पर आस्था और ईश्वर पर
विश्वास रखने वाला माना ही नहीं जा सकता; क्योंकि साक्ष्य तो विवाद-निर्णय में
सहायक होने के कारण धर्मकार्य है और उसमें बाधा डालना तो बड़ा भारी पाप है।
धर्म और न्याय इस पापकर्म की अनुमति नहीं देते, अपितु इसे दण्डनीय अपराध
मानते हैं।
निर्दिष्टेष्वर्थजातेषु साक्षी चेत् साक्ष्य आगते।
न ब्रूयादक्षरसमं न तन्निगदितं भवेत् ॥ 232 ॥
निर्दिष्ट विषयों में साक्ष्य देने के लिए उपस्थित व्यक्ति अपने वक्तव्य की
सत्यता को सिद्ध करने के लिए समुचित प्रमाण नहीं जुटा पाता। ऐसे साक्षी की
उपस्थिति को भी अनुपस्थिति के रूप में ही लेना चाहिए; क्योंकि ऐसे व्यक्ति ने
आकर भी विवाद-निर्णय में कुछ सहयोग नहीं किया।
देशकालवयो द्रव्य प्रमाणाकृतिजातिषु।
यत्र विप्रतिपत्तिः स्यात् साक्ष्यं तदपि चान्यथा ॥ 233 ॥
साक्षी द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य में और वास्तविक रूप में सम्बद्ध घटना के घटित
होने के स्थान, समय, सम्बद्ध व्यक्ति की आयु, जाति तथा आकृति और विवाद का
विषय बनी धन-राशि के परिमाण आदि के सम्बद्ध में उलट-फेर मिलने पर साक्ष्य
को असिद्ध और अमान्य घोषित कर देना चाहिए; क्योंकि ऐसे साक्ष्य को वास्तविकता
से परिचित माना ही नहीं जा सकता।
ऊनं वाप्यधिकं वार्थं प्रब्रूयुर्यत्र साक्षिणः।
तदप्यनुक्तं विज्ञेयमेष साल्यविधि स्मृतः ॥ 234 ॥
साक्ष्य स्वीकृति का यह भी नियम अथवा विधान है कि लेन-देन में आयी
और विवाद का विषय बनी धन-राशि के परिमाण को यथार्थ रूप में बताने के
स्थान पर न्यूनाधिक बताने वाले साक्षी के वक्तव्य को भी पूर्णतः अमान्य एवं
असिद्ध घोषित कर देना चाहिए।
प्रमादाद्धनिनो यत्र न स्याल्लेख्यं न साक्षिणः।
अर्थ चापह्नुते वादी तत्रोक्तस्त्रिविधो विधिः ॥ 235 ॥
उत्तमर्ण धनिक ने अधमर्ण को ऋण देते समय प्रमादवश न तो लिखा-पढ़ी
की है और न ही किसी को साक्षी बनाया है, विश्वास पर धन दे दिया है और अब
अधमर्ण ने विश्वास भंग करते हुए ऋण लेने को नकार दिया है। इस स्थिति में
122 / नारदस्मृति
उत्तमर्ण के विवाद की सत्यता को सिद्ध करने की निम्नोक्त तीन विधियां हैं।
चोदना प्रतिकालं च युक्तिलेशस्तथैव च।
तृतीयः शपथः प्रोक्तस्तैरेवं साधयेत् क्रमात्॥236॥
प्रथम विधि है—ऋण के लेन देन का ठीक ठीक समय—यदि उस समय
अधमर्ण ने ऋण नहीं लिया, तो वह कहां था और क्या कर रहा था—के विषय में
गहरी पूछताछ करनी चाहिए।
द्वितीय विधि है—ऋण की याचना करते समय अधमर्ण द्वारा प्रस्तुत कारण
अथवा उद्देश्य—यदि ऋण नहीं लिया गया, तो निर्दिष्ट उद्देश्य की पूर्ति कैसे और
कहां से हो गयी—के सम्बन्ध में टटोलना चाहिए।
तृतीय विधि है—धर्म, ईश्वर, न्यायवृत्ति तथा पुत्र पौत्रादि की शपथ देकर
उसे सत्य बोलने के लिए प्रेरित करना चाहिए।
अभीक्ष्णं चोद्यमानो यः प्रतिहन्यान्न तद्वचः।
त्रिचतुः पञ्चकृत्वो वा परतोऽर्थं सदापयेत्॥237॥
बार-बार पूछे जाने और अधमर्ण द्वारा एक ही उत्तर देने पर उससे पांच छह
ही नहीं, दस बार भी पूछा जाना चाहिए; क्योंकि बार-बार पूछे जाने पर कभी-
कभी सत्य मुंह से निकल ही पड़ता है, अपराधी द्वारा सत्य को निरन्तर छिपाना
कठिन हो जाता है।
यहां यह उल्लेखनीय है कि प्रतिवादी अनेक बार वही एक प्रश्न पूछे जाने के
सम्बन्ध में किसी प्रकार की आपत्ति नहीं कर सकता। उससे जितनी बार पूछा जाये,
उतनी बार उसे उत्तर देना ही होता है और यदि उसके किसी उत्तर में कहीं बदलाव
आता है, तो इस आधार पर उसे आड़े हाथों लिया जा सकता है।
चोदना प्रतिघाते तु युक्तिलेशैस्तमन्वियात्।
देशकालार्थसम्बन्धपरिमाणक्रियादिभिः ॥238॥
सामान्य पूछताछ की अवहेलना करने वाले प्रतिवादी से देश, काल, अर्थ,
सम्बन्ध, परिमाण और लेन-देन की क्रिया आदि से सम्बन्धित प्रश्नों को घुमा-
फिरा कर पूछना चाहिए।
युक्तिष्वप्यसमर्थासु शपथैरैनं मर्दयेत्।
देशकालबलापेक्षमग्न्यम्बुसुकृतादिभिः ॥239॥
युक्ति से कार्य न बनने पर तथा देश, काल और सम्बन्ध आदि की पूछताछ
का भी कुछ परिणाम न निकलने पर, उसे अग्नि, जल और उसके पुण्यों की शपथ
देकर सत्य बोलने के लिए प्रेरित-प्रोत्साहित करना चाहिए। सत्य को नकारने वाले
को धर्म और ईश्वर का भय दिखाकर तथा असत्य और बेईमानी के दुष्परिणाम का
अतिरञ्जित वर्णन करके, उसे सत्य को उगलने के लिए बाध्य करना चाहिए।
नारदस्मृति / 123
यमन्तर्धारयन्त्यापो दीप्तोऽग्निर्न दहत्यपि।
शापयत्यभिशापं तं किल्विषी स्यादतोऽन्यथा॥ २४० ॥
असत्यवक्ता से कहना चाहिए—यदि तुम सत्य पर स्थित हो, तो अग्नि का
स्पर्श करो, अग्नि तुम्हें नहीं जलायेगी, जल हाथ में लो, जल स्थिर रहेगा, देवों को
साक्षी मानकर कहो, यदि तुम्हारा कथन सत्य होगा, तो तुम्हें उनका शाप उद्विग्न
नहीं करेगा। यदि तुम ऐसा नहीं करते हो अथवा अग्नि आदि द्वारा जलाये जाते हो,
तो निश्चित है कि तुम पापी हो।
अरण्ये निर्जने रात्रावन्तर्वेश्मनि साहसे।
न्यासस्यापह्नवे चैव दिव्या सम्भवति क्रिया ॥ २४१ ॥
निर्जन वन में, रात के अन्धकार में तथा घर के भीतर अकेलेपन में किये गये
साहसिक बलात्कार—डाका, शीलहरण—आदि को उगलवाने के लिए तथा धरोहर
में रखी वस्तु को लौटाने के लिए दिव्य-क्रिया—अग्नि, जल, इन्द्र, वरुण तथा यम
आदि की शपथ दिलाना, मृत्यु के उपरान्त भीषण नरक-यातना झेलना आदि—का
प्रयोग करना चाहिए।
स्त्रीणां शीलाभियोगेषु स्तेयसाहसयोरपि ॥
एष एव विधिर्दृष्टः सर्वार्थापह्नवेषु च ॥ २४२ ॥
इसी प्रकार स्त्रियों के शील-भंग, बलात्कार अथवा अपमान सम्बन्धी विवाद
में, चोरी-डकैती के अभियोग में तथा धरोहर को नकारने-हड़पने के व्यवहार में
दैवी प्रयोगों—सत्य न बोलने पर मरने के बाद अग्नि तुम्हारे देह को जलायेगी नहीं,
तुम्हें अन्न-जल सुलभ नहीं होगा, देवों का प्रकोप तुम्हारे वंश को लील लेगा,
दरिद्रता तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ेगी, तुम्हें कोढ़ लग जायेगा आदि शपथों—का
प्रयोग करना चाहिए।
शपथा ह्यपि देवानाम्ऋषीणामपि च स्मृताः।
वसिष्ठः शपथं शेपे यातुधानेन शङ्कितः ॥ २४३ ॥
स्मृतियों के आधार पर शपथ लेने की प्रथा का देवों और ऋषियों में भी
प्रचलन सिद्ध होता है, अर्थात् ऋषि अपने को सत्यनिष्ठ सिद्ध करने के लिए शपथ
लेते थे तथा देव शपथ लेकर उच्चरित वचन की सत्यता पर पूर्ण विश्वास करते
थे—इतिहास इसका साक्षी है। एक समय जब एक राक्षस ने वसिष्ठजी को घेर
लिया था, तो उन्होंने इसी प्रकार शपथ—ऋषि का शाप तुम्हें अनन्तकाल तक
भटकाता रहेगा—देकर उसके अत्याचार से मुक्ति पायी थी।
अभिप्राय यह है कि दैवी उपायों का व्यक्ति पर अनुकूल और निश्चित प्रभाव
पड़ता है—इसमें किसी प्रकार का कोई सन्देह नहीं है।
124 / नारदस्मृति
सप्तर्षयस्तथेन्द्रेण पुष्करार्थेन शङ्किताः ।
शेपुः शपथमव्यग्राः परस्परविशुद्धये ॥ २४४ ॥
इसी प्रकार पुष्कर के विषय में इन्द्र द्वारा डराये गये सप्तर्षियों ने भी दैवी
प्रयोग का आश्रय लिया था। सप्तर्षियों ने इन्द्र को दुर्गति का पात्र बनने, नरक
भोगने, पतित होने जैसे शाप के रूप में चेताया था और इन्द्र ने इसे गम्भीरता से
लेते हुए अपनी भूल को स्वीकार किया था और पश्चात्ताप करते हुए भविष्य में
कभी ऐसा औद्धत्य न करने का आश्वासन देते हुए क्षमायाचना का निवेदन किया था।
अयुक्तं साहसं कृत्वा प्रत्यापत्तिं भजेत् यः ।
ब्रूयात् स्वयं वा सदिति तस्यार्धविनयः स्मृतः ॥ २४५ ॥
अकरणीय एवं अवाञ्छनीय दुष्कर्म अथवा साहसिक कर्म करके स्वयं ही
अपनी भूल को स्वीकार करने वाले, पश्चात्ताप करने वाले तथा दण्ड के लिए
आत्मसमर्पण करने वाले को उसके अपराध के लिए निर्धारित दण्ड का आधा दण्ड
देना चाहिए।
वस्तुतः दण्ड का उद्देश्य व्यक्ति को सुधारना और सत्पथ पर लाना है।
सुधारकों और मनोवैज्ञानिकों ने दण्ड के भय से सुधार की सम्भावना में अपनी
आस्था प्रकट नहीं की। उनके अनुसार भय किसी भी बुराई को मिटाने का प्रभावी
एवं स्थायी समाधान नहीं। इसकी अपेक्षा शिक्षा एवं उपदेश अधिक उपयोगी हैं।
इस सन्दर्भ में अपना अपराध स्वीकार करने वाला तो क्षमा का पात्र है; क्योंकि
उसने दण्ड से पूर्व ही दण्ड के उद्देश्य को पूरा कर दिया तथा न्याय-प्रक्रिया को
जांच-परख के झंझट से बचा दिया। निष्कर्षतः दण्ड में न्यूनता लाने का स्मृतिकार
का मत व्यावहारिक एवं युक्तिसंगत है।
गृह्यमानस्तु वैचित्र्याद्यदि पापः स जीयते।
सभ्यास्तस्य न तुष्यन्ति तीव्रो दण्डश्च पात्यते ॥ २४६ ॥
विचित्र ढंग से अनोखी चर्चा करके न्याय-प्रक्रिया को भटकाने की चेष्टा
करने वाले अपराधी मनोवृत्ति के वादी अथवा प्रतिवादी अथवा साक्षी के असन्तुष्ट
एवं खिन्न सभ्यों (न्यायाधिकारियों) को उसे उसके अपराध के लिए निर्धारित
दण्ड से दुगुना दण्ड देकर भली प्रकार अनुशासित करना चाहिए।
यदा साक्षी न विद्येत विवादे वदतां नृणाम्।
तदा दिव्यैः परीक्ष्येत शपथैश्च पृथग्विधैः ॥ २४७ ॥
विवाद करने वाले वादी-प्रतिवादी के साक्षीविहीन होने पर शपथों तथा दिव्य
उपायों-धर्म और ईश्वर को साक्षी मानकर सत्य बोलने का अनुरोध, असत्य
बोलने पर दैवी प्रकोप का भय दिखाना तथा वंश-नाश की आशंका आदि द्वारा
यथार्थ को जानने और तदनुरूप निर्णय पर पहुंचने का प्रयास करना चाहिए।
नारदस्मृति / 125
देवतापितृपादांश्च दत्तानि सुकृतानि च ॥ 248 ॥
सत्यं वाहनशस्त्राणि गोबीजकनकानि च।
देवतापितृपादांश्च दत्तानि सुकृतानि च ॥ 248 ॥
साक्ष्य सुलभ न होने पर अभियुक्त से सत्य उगलवाने के लिए वाहन, शस्त्र
आदि तथा गाय, बीज, कनक, देवता, पितर और सुकृत (पुण्य) आदि की शपथ
दिलानी चाहिए। इनका अभीष्ट परिणाम निकलता है—इसमें किसी प्रकार का
सन्देह नहीं।
महापराधे दिव्यानि दापयेत्तु महीपतिः ।
अल्पेषु तु नृपश्रेष्ठ शपथैः श्रावयेन्नरम् ॥ 249 ॥
राजाओं से जब कभी जाने अनजाने कोई महान् अपराध हो गया है, तो
उन्होंने पश्चात्ताप के रूप में देवों की आराधना की है, दिव्य प्रयोगों का आश्रय
लिया है और साधारण अथवा छोटा-मोटा अपराध हो जाने पर दुःख प्रकट करते
हुए भविष्य में ऐसा न करने की शपथ ली है।
इस प्रकार देवाराधन और शपथों से उन्हें विहित अपराधों के दण्ड-भोग से
निवृत्ति मिली है। अतः अपराध-बोध की भावना से ग्रस्त होकर प्रायश्चित्त भी
दण्ड-भोग का रूप बन जाता है।
टिप्पणी—महर्षि याज्ञवल्क्य ने निम्नोक्त को परमपवित्र मानते हुए इनकी
शपथ लेने का विधान किया है। झूठी शपथ लेने का अर्थ होता है—इनसे वञ्चित
होना, देवों के प्रकोप को आमन्त्रित करना तथा अपना सर्वनाश सुनिश्चित करना—
सत्यं वाहनमस्त्राणि गोबीजकनकानि च।
देवब्राह्मणपादांश्च पुत्रदारशिरांसि च॥
अर्थात् वाहन—रथ, अश्व, गज आदि, अस्त्र—धनुष, बाण, भाला आदि
गाय, बीज, स्वर्ण, देव, ब्राह्मण के चरण, पुत्र, पत्नी तथा अपने सिर की झूठी
क़सम कभी नहीं खानी चाहिए।
इत्येते शपथाः प्रोक्ता मनुना स्वल्पकारणे ।
पातकेऽष्टाभियोगे च विधिर्दिव्यः प्रकीर्त्तितः ॥। 250 ।।
मनु आदि स्मृतिकारों ने छोटे-मोटे अपराधों के लिए शपथों का विधान किया
है, अर्थात् भविष्य में ऐसा अपराध न करने की शपथ लेने को पर्याप्त माना है, परन्तु
बड़े तथा जान-बूझकर किये गये अपराधों में तो दिव्य प्रयोग—घोर प्रायश्चित्त—
का करना ही अपेक्षित है।
सन्दिग्धेऽर्थेऽभियुक्तानां प्रच्छन्नेषु विशेषतः ।
दैवं पञ्चविधं ज्ञेयमित्याह भगवान्मनुः ॥ 251 ॥
भगवान् मनु ने सन्दिग्ध, विशेषतः आपराधिक मामलों में, अभियुक्त से सत्य
उगलवाने तथा यथार्थ का पता लगाने के लिए निम्नोक्त पांच प्रकार के दिव्य उपाय
बतलाये हैं।
126 / नारदस्मृति
घटोऽग्निरुदकं चैव विषं कोशश्च पञ्चमः।
उक्तान्येतानि दिव्यानि विशुद्ध्यर्थं महात्मनाम् ॥ 252 ॥
महात्माओं की विशुद्धि के निर्णय के लिए घट, अग्नि, उदक, विष और
कोश की शपथ ही पांच दिव्य प्रयोग हैं।
सन्दिग्धेऽर्थेऽभियुक्तानां विशुद्ध्यर्थं दुरात्मनाम्।
प्रोक्तानि नारदेनेह सत्यानृतविशुद्धये ॥ 253 ॥
सन्देह के आरोप में घिरे दुर्जन अभियुक्तों की वास्तविकता—सच्चा है अथवा
झूठा—को जानने के लिए निम्नोक्त दिव्य प्रयोग अपनाने चाहिए।
वर्षासु वह्निरित्युक्तः शिशिरे तु घटः स्मृतः।
ग्रीष्मे सलिलमित्युक्तं विषं काले तु शीतले ॥ 254 ॥
वर्षा ऋतु में अग्नि दिव्य का, शिशिर ऋतु में घट दिव्य का, ग्रीष्म ऋतु में
जल दिव्य का तथा शीतकाल में विष दिव्य का प्रयोग करना चाहिए।
अभिप्राय यह है कि वर्षा ऋतु में अभियुक्त को अग्नि प्रकट करने को कहना
चाहिए। प्राचीनकाल में अरणि-मन्थन से अग्नि प्रकट की जाती थी। वर्षा ऋतु में
लकड़ियां गीली होती हैं, अतः अग्नि का प्रकट होना दुष्कर होता है। यदि अभियुक्त
सच्चा है, तो अग्निदेव प्रकट हो जायेंगे, अग्नि को प्रकट करने में विफलता का अर्थ
उसका झूठा होना है। इसी प्रकार अन्य दिव्य प्रयोगों से सत्यासत्य का निष्कर्ष
निकालना चाहिए।
नार्तानां तोयशुद्धिः स्यान्न विषं पित्तरोगिणाम्।
श्वित्र्यन्धकुनखानां च नाग्निशुद्धिर्विधीयते ॥ 255 ॥
रोगपीड़ित अभियुक्तों की सत्यता-असत्यता के निर्णय के लिए जल दिव्य
का प्रयोग करना चाहिए, अर्थात् उन्हें जल में एक निश्चित समय के लिए खड़ा
रखना चाहिए। उनके सच्चा होने पर शीतल जल से उन्हें कोई हानि नहीं पहुंचेगी
और झूठा होने पर कंपकंपी होने लगेगी। इसी प्रकार पित्तरोगियों पर विष का प्रयोग
करना चाहिए। सच्चे व्यक्ति को विष के सेवन से कोई हानि नहीं पहुंचेगी और झूठा
अभियुक्त मृत्यु का ग्रास बन जायेगा। कुष्ठरोगी, अन्धे और गन्दे नाखून वालों को
अग्नि दिव्य का प्रयोग करना चाहिए। यदि वे सच्चे हैं, तो अग्नि की दाहकता
अपना प्रभाव नहीं दिखायेगी, अन्यथा वे ज्वलन की विषम वेदना से तड़पते दिखाई
देंगे।
टिप्पणी—आज के युग में इन दिव्य प्रयोगों की प्रासंगिकता स्वीकार नहीं
की जा सकती। इन्हें तो अमानवीय और अवाञ्छनीय ही कहा जायेगा। पता नहीं,
क्या प्राचीनकाल में सचमुच सच्चे व्यक्ति के लिए अग्नि शीतल बन जाती होगी ?
नारदस्मृति / 127
वह अपना दाहक धर्म त्याग देती होगी ? आज का प्रबुद्ध व्यक्ति इस मान्यता पर
विश्वास कर सकेगा—इसमें सन्देह ही है।
सव्रतानां भृशार्तानां व्याधितानां तपस्विनाम् ।
स्त्रीणां च न भवेद्दिव्यं यदि धर्मस्त्ववेक्षते ॥ 256 ॥
धर्म की रक्षा में तत्पर राजा—न्यायाधिकारी—को व्रतशीलों, आचार परायण
व्यक्तियों, रोग-पीड़ितों, शोकग्रस्त लोगों, तपस्वियों तथा स्त्रियों को कभी दिव्य
प्रयोगों के लिए नहीं कहना चाहिए।
टिप्पणी—रामायण के अनुसार श्रीराम ने लंकाविजय के उपरान्त सीता को
अपना सतीत्व सिद्ध करने के लिए अग्निपरीक्षा देने का निर्देश दिया था।
रजक के कथन पर परित्यक्ता सीता ने पुनः अपना सतीत्व सिद्ध करने के
लिए धरती से फट जाने का अनुरोध किया था।
इन दो उद्धरणों से प्राचीनकाल में इस प्रकार के दिव्य प्रयोगों का प्रचलन
सिद्ध होता है।
शिरोवर्ती यदा न स्यात्तदा दिव्यं न दीयते ।
कारणैः सहितं प्रोक्तं न दिव्यं चार्थिनान्नृणाम् ॥ 257 ॥
अभियुक्त के अपराधी सिद्ध न होने तक उसे दिव्य प्रयोगों का दण्ड कदापि
नहीं देना चाहिए; क्योंकि दिव्य प्रयोगों का अकारण प्रवर्तन सर्वथा अनुचित है,
उनका तो केवल सकारण प्रयोग ही वाञ्छनीय होता है।
तत्राज्ञेन विनीतेन धार्मिकेण विजानता।
उभयानुमते देयं दिव्यं सर्वं प्रयत्नतः ॥ 258 ॥
दिव्य दण्ड देना न्यायाधिकारी का एकाधिकार कदापि नहीं है। इस प्रयोग
को दोनों—वादी तथा प्रतिवादी—की स्वीकृति लेकर तथा विवेकसम्पन्न, बुद्धिमान्,
विनीत, धार्मिक, उदार तथा राग द्वेष से मुक्त न्यायशास्त्रियों और सभ्यों द्वारा भली
प्रकार सोच-विचार के उपरान्त ही करना चाहिए।
न शीते तोयशुद्धिः स्यान्नोष्णकालेऽग्निशोधनम् ।
न प्रावृषि विषं दद्यात् प्रवाते न तुलां नृणाम् ॥ 259 ॥
शीतकाल में जल दिव्य का और ग्रीष्मकाल में अग्नि दिव्य का, वर्षा ऋतु में
विष दिव्य का और प्रचण्ड वायु के चलते समय तुला दिव्य का प्रयोग नहीं करना
चाहिए; क्योंकि इन ऋतुओं में ये प्रयोग असह्य ही नहीं होते, अपितु अमानवीय भी
होते हैं। इसके अतिरिक्त प्राणों के मूल्य पर सत्य का ज्ञान कोई महंगा सौदा नहीं है।
विचार्य धर्मनिपुणैः सर्वधर्मविशारदैः ।
इदं सर्वर्तुकं प्रोक्तं पण्डितैर्घटधारणम् ॥ 260 ॥
128 / नारदस्मृति