नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
अष्टापाद्यं तु शूद्रस्य स्तेये भवति किल्बिषम्।
परन्तु ऊपर से सज्जन बने, अर्थात् प्रच्छन्न धूर्तों को सुधारने का दायित्व तो विवस्वान्
(सूर्य) के पुत्र यमराज ही करते हैं, अर्थात् वे ही ऐसे दुष्ट-कपटी जनों को अनेक
प्रकार की नरक यातनाएं देकर उन्हें सचेत करते रहते हैं।
अष्टापाद्यं तु शूद्रस्य स्तेये भवति किल्बिषम्।
द्विराष्टापाद्यं वैश्यस्य द्वात्रिंशत् क्षत्रियस्य तु॥ 51 ॥
ब्राह्मणस्य चतुःषष्टीत्येवं स्वायम्भुवोऽब्रवीत्।
विद्यापि च विशेषेण विद्वत्स्वभ्यधिकं भवत्॥ 52 ॥
महर्षि मनु के अनुसार मूर्खों द्वारा किये गये अपराध का दण्ड समझदारों द्वारा
किये जाने वाले अपराध के दण्ड की तुलना में कम होता है। मूर्ख तो मूर्ख है।
उसके द्वारा किया अपराध मूर्खता है। उसे तो अच्छे-बुरे की परख ही नहीं, परन्तु
विवेकशील व्यक्ति भी मूर्खों के समान आचरण अथवा उनका अनुसरण करता है,
तो निश्चित है कि उसे अधिक दण्ड मिलना चाहिए। मूर्खों द्वारा किये अपराध का
तो कोई समर्थन नहीं करता, परन्तु विवेकशील व बुद्धिमानों द्वारा किया ग़लत-सही
कार्य तो दूसरों के लिए उदाहरण बन जाता है। यही कारण है कि मनु महाराज ने
एक ही अपराध के लिए विभिन्न वर्णों के लोगों के लिए भिन्न-भिन्न दण्ड की
व्यवस्था दी है। उदाहरणार्थ, चोरी के लिए शूद्र से चोरी के सामान का आठ गुणा,
वैश्य से सोलह गुणा, क्षत्रिय से बत्तीस गुणा और ब्राह्मण से चौंसठ गुणा दाम दण्ड
के रूप में वसूल करना चाहिए; क्योंकि विद्या-विवेकसम्पन्न बुद्धिमानों का अपराध
और दण्ड अधिक ही होता है।
शारीरश्चार्थदण्डश्च दण्डस्तु द्विविधः स्मृतः।
शारीरं दशधा प्रोक्तमर्थदण्डस्त्वनेकधा ॥ 53 ॥
अपराध के लिए दिये जाने वाले दण्ड के दो रूप हैं- 1. शारीरिक तथा
2. आर्थिक। शारीरिक दण्ड के दस और आर्थिक दण्ड के अनेक रूप-भेद हैं।
काकिण्यादिस्त्वर्थदण्डः सर्वस्वान्तस्तथैव च।
शारीरः सन्निरोधादिर्जीवितान्तस्तथैव च॥ 54 ॥
बन्दी बनाने से लेकर मृत्यु-दण्ड देने तक मारना-पीटना आदि यातनाएं
शारीरिक दण्ड के अन्तर्गत आती हैं तथा कौड़ी से लेकर सर्वस्व (सारी सम्पत्ति)
का हरण आर्थिक दण्ड है।
काकिण्यादिस्तु यो दण्डः स तु भाषावरः स्मृतः।
भाषावराद् योऽयं प्रोक्तः कार्षापणपरस्तु सः॥ 55 ॥
उत्तर भारत में लेन-देन में काकिणी अथवा वराटिका (कौड़ियों) का प्रचलन
है, परन्तु दक्षिण भारत में लेन-देन के रूप में प्रचलित मुद्रा कार्षापण (लोहे का
सिक्का) कहलाती है। वैसे काकिणी से अधिक मूल्य की मुद्रा माष और माष से
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भी अधिक मूल्य की मुद्रा कार्षापण है। एक प्रकार से कार्षापण का मूल्य साठ
अथवा अस्सी काकिणी है।
कार्षापणावराद् यस्तु चतुः कार्षापणावरः।
द्व्यवरोऽष्टापरश्चान्यस्त्र्यवरो द्वादशोत्तरः॥५६॥
इस प्रकार विभिन्न अपराधों के लिए निर्दिष्ट एक, दो, तीन तथा चार कार्षापणों
से क्रमशः बीस, चालीस, अस्सी तथा एक सौ साठ काकिणी समझना चाहिए।
कार्षापण के मूल्य में न्यूनाधिकता मान्य होने के कारण अपराध विशेष के लिए
निर्दिष्ट दण्ड कार्षापण का सवाया अथवा ड्योढ़े, 2 का 2½, 3, 4 का 5, 6 तथा
8 का 12 किया जा सकता है, इससे अधिक नहीं।
कार्षापणो दक्षिणस्यां दिशि रौप्यः प्रवर्तते ।
पणैर्निबद्धः पूर्वस्यां विंशतिस्तु पणाः स तु ॥ ५७ ॥
दक्षिण भारत (आन्ध्र, कर्नाटक, तमिलनाडु तथा केरल) में कार्षापण का
मूल्य चांदी का एक रुपया है। पूर्व भारत (बिहार, बंगाल, उड़ीसा तथा असम) में
सवा रुपया (बीस आने) को (बीस-पच्चीस वर्ष पूर्णदशमलव पद्धति नहीं अपनाये
जाने पर रुपये के सोलह आने और तौल में सेर की सोलह छटांकें मान्य एवं
प्रचलित थीं) कार्षापण माना जाता है।
माषो विंशतिभागस्तु ज्ञेयः कार्षापणस्य तु।
काकिणी तु चतुर्थांगी माषस्य च पणस्य च ॥ ५८ ॥
कार्षापण का बीस आना मूल्य मानने पर उसके बीसवें भाग को माष
(आना) कहा जाता है और एक माष की चार काकिणी (पैसे) होते हैं।
पञ्चनद्याः प्रदेशे तु संज्ञा या व्यावहारिकी ।
कार्षापणप्रमाणं तु निबद्धमिह नेतया ॥ ५९ ॥
पञ्चनद प्रदेश-आज तो पूर्वी पंजाब के पाकिस्तान में चले जाने से पांच
नदियों का प्रदेश तीन नदियों वाला रह गया है। इसके अतिरिक्त उसके भी तीन
भागों-पंजाब, हरियाणा तथा हिमाचल हो गये हैं- में तो सोलह आने मूल्य के
कार्षापण का लोकव्यवहार में पर्याप्त प्रचलन है। इसलिए उसे लिपिबद्ध करना
आवश्यक नहीं समझा गया।
कार्षापणोऽन्तिका ज्ञेया ताश्चतस्त्रस्तु धानकः ।
तद्द्वादश सुवर्णस्तु दीनारण्यः स एव च ॥ ६०॥
सबसे बड़ा सिक्का कार्षापण है, चार कार्षापणों के योग का नाम धानक है।
बारह धानकों का योग सुवर्ण कहलाता है और इसी सुवर्ण का नाम दीनार है।
वार्तां तु यां चाप्यथ दण्डनीतिम्
राजाऽनुवर्त्तेत सदाऽप्रमत्तः ।
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हन्यादुपायैर्निपुणैर्गृहीतान्
तथैव शास्तावन्निगृह्य पापान् ॥ 61 ॥
राजा को विवेक से कार्य लेते हुए प्रयोगों और अनुभवों से सुपरीक्षित एवं
व्यावहारिक दृष्टि से उपयोगी सिद्ध दण्डात्मक उपायों से पापियों तथा अपराधियों
को पकड़कर व बन्धन में डालकर रखना चाहिए तथा देश में वार्ता- कृषि,
वाणिज्य और पशुपालन--के विकास के अवसर जुटाकर प्रजा को समृद्ध बनाना
चाहिए।
देश की समृद्धि एवं सम्पन्नता में सहायक सिद्ध होने वाली दण्ड नीति का
प्रयोक्ता राजा ही प्रजा का अनुराग तथा सम्मान, यश एवं प्रतिष्ठा पाने में सफल होता
है।
॥ नारदस्मृति समाप्त ॥
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