नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
हिन्दीटीकासहित ५७
प्रभुं भक्तपराधीनं नित्यमालोकयेद्धरिम् ।
विमानमथ वा तस्य दूराद् गोपुरमेव वा ॥४६॥
सर्वेश्वर श्री हरि का जो कि भक्ति के कारण भक्तों के अधीन रहते हैं तथा जो उन पर कृपा
करते हैं अतः उनका नित्य दर्शन करे (क्योंकि भगवद्दर्शन भक्ति का आधार तथा
आपादक है) अथवा परिस्थितिवश दूर स्थित रहकर उनके विमान अथवा गोपुर का ही
दर्शन नित्य कर लें॥४६॥
स्वरूप-रूप-विभव-गुण-कर्माणि शार्ङ्गिणः ।
आचक्षीत निबध्नीयाच्छृणुयाद्विलिखेत् पठेत् ॥४७॥
श्रीविष्णु का स्वरूप, उनके रूप या विग्रहों, उनकी विभूतियों उनके ज्ञानादि गुणों, उनके
गजेन्द्ररक्षण रूप कार्य, अर्जुन का सारथि बनने जैसे कार्यों या दिव्यचेष्टितों का विचार
कर, इनकी व्याख्या करे। वह इन दिव्यचरितों का श्रवण करें, इनका लेखन तथा पठन भी
करे॥४७॥
चतुर्भुजमुदाराङ्गं श्यामं पद्मनिवेक्षणम् ।
श्रीभूमिलालासहितं चिन्तयेच्च सदा हृदि ॥४८॥
वह सदा ऐसे श्री विष्णु का जो कि चतुर्भुज, उन्नत शरीरवाले, श्यामवर्ण, कमलदल के
समान विशाल नेत्रों वाले तथा श्रीभूमि लीलादि के साथ हों तो ऐसे उनके स्वरूप का हृदय
से चिन्तन करता रहे॥४८॥
उपेत्यायतनं विष्णोः प्रणिपत्य ततस्ततः ।
परीत्य देवदेवेशं प्रणम्यात्मानमर्पयेत् ॥४९॥
वह श्रीविष्णु के मन्दिर में नित्य पहुँचे तथा वहाँ उन्हें प्रणाम कर प्रदक्षिणा करें तथा अपने
प्रपत्तिभाव के स्मरणार्थ आत्मनिवेदन नित्य प्रस्तुत करता रहे॥४९॥
प्रीतिसंहृष्टसर्वाङ्गः स्तुत्वा वापि विलोकयेत् ।
कृतप्रसादः सेवेत नियतात्मा यथोचितम् ॥५०॥
वह भगवत्प्रीति से रोमांचित भाव में आकर इष्ट श्री अच्युत की स्तुति करते हुए उनका
दर्शन करे। भगवान् ने उस पर प्रसाद किया हैं, ऐसी भावना रखे फिर वह नियतचित्त से
अपने पारिवारिक व्यक्तिगत कार्यों का आचरण करे(या ऐसे कार्यों का आचरण तथा
सेवन करे॥५०॥
यात्रादिषु च सेवेत तद्दृष्टिस्तद्गुणान् वदन् ।
तत् कर्माणि च युक्तस्तज्जनसम्बन्धहर्षितः ॥५१॥
वह भगवान् की रथयात्रादि के प्रसंग आने पर उनकी ओर अपनी दृष्टि लगाते हुए
तथा उनके गुणानुवाद नामादि को उच्चारित करते हुए उनके द्वारा किये गये दिव्य
५८ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता
कर्मों का कथन करते हुए रथयात्रा में एकत्रित अन्य वैष्णवों से युक्त होकर
प्रसन्नभाव से इष्टदेव का सेवन करे॥५१॥
गायेदास्फोटयेन्नृत्येदुत्पतेन्निपतेत् स्खलेत् ।
क्रोशेद्दिषीदेद्धृष्येच्च विष्णोः प्रेमवशानुगः ॥५२॥
वह श्रीविष्णु के ऐसे उत्सवादि प्रसंग में सम्मिलित होकर भक्ति के भावावेश में
प्रेमवश उनका गुणगान कर गायन करे, भुजास्फोटन करे, करताल बजावे, नृत्य
करे, उत्पतन करे, निपतन करे, स्खलद्गति में चेष्टारत रहे, आक्रोश भाव में स्थित
होकर विषाद करे तथा प्रसन्नभाव दिखलावे॥५२॥
कुर्वाणश्च सदा वृत्तिं विष्णोरायतने वसेत् ।
दद्याच्च विविधान् भोगाननुरूपान् मनोरमान् ॥५३॥
वह श्रीविष्णु के मन्दिरादि स्थानों में सेवाभाव से सम्मार्जन आदि वृत्ति कर स्थित
रहे तथा चन्दन, अगरू, कस्तूरी आदि देशकाल के अनुरूप शास्त्रानुमोदित सुन्दर
भोग्य पदार्थों को श्री भगवान् को अर्पित करे॥५३॥
परीवारांश्च सेवेत भक्त्या परमया हरेः ।
तत्तदर्चागतान् भक्तान् गुर्वादींश्च विशेषतः ॥५४॥
श्रीहरि के परिवारभूत श्रीदेवी के भूषण स्वयं के आयुध, परिजन आदि संवाहन
परिच्छद सेनाधिप चण्डादि द्वारपाल, कुमुदादिगणाधिप रूप भगवान् की उन उन
अर्चाओं में प्रतिष्ठापित परिवारों का तथा श्रीहरि के भक्तों उनका मन्त्र देने वाले
गुरुजन का विशेषरूप में सेवन करे॥५४॥
हरेराश्रितवात्सल्यात् तत्तत्स्थानाभिनन्दिनः ।
असाधारणभावेन तत्र तत्रैव वा वसेत् ॥५५॥
वात्सल्य तथा अनुरागवश श्रीहरि के द्वारा आश्रित तीर्थादि स्थानों का जैसे श्रीरंग
हस्तिगिरि, यदुगिरि जैसे दिव्य प्रदेशों का वह असाधारणभाव से अभिनन्दन करते
हुए यात्रादि के प्रसंग में सेवन करे अथवा अतिशय भक्तिवश उन्हीं प्रदेशों में अपना
निवास भी रखे॥५५॥
ये च भुक्तोज्झिता भोगाः श्रीपतेः शिरसा नतः ।
अभ्येत्य प्रतिपद्येत भक्त्या परमया स्वयम् ॥५६॥
जो श्रीहरि से भुक्त होकर निर्माल्यभूत माल्यादि भोग हों, उन्हें परमभक्ति के साथ
विनत मस्तक कर प्रणाम के साथ अभिमुख होकर ग्रहण करे॥५६॥
पादोदकं भगवतो लब्ध्वा भागवतस्य वा ।
तिष्ठन्नेवाथयासीनः पिबेच्छुद्धिश्च नापरा ॥५७॥
हिन्दीटीकासहित ५९
श्री हरि के चरणामृत स्वरूप जल को हाथों में ग्रहण कर स्थित होकर अथवा बैठकर
पान करे। इसी प्रकार पूज्य भागवतजन का पादोदक भी ग्रहण कर उसे भी पान
करे। इसके अतिरिक्त अन्य शुद्धि-आचमन हस्तप्रक्षालनादि स्वरूप नहीं मानी जाती
है। (कहीं कहीं विष्णुपादोदक को पान न कर मस्तक पर सिंचन करने तथा उसे
अज्ञानवश पृथ्वी पर न गिराने का भी उल्लेख मिलता है क्योंकि यदि मोहवश यह
जल पृथ्वी पर गिर जाए तो गृहीता का पतन होता है॥५७॥
पुरराष्ट्राभिवृद्ध्यर्थमर्चितस्य जगत्पतेः ।
शेषभाजोऽर्थिनः सर्वे सन्त एव सतां गृहे ॥५८॥
अर्चना के बाद भी श्री हरि के भुक्त प्रसादरूप चरणामृतादि पदार्थ पुर तथा राष्ट्र
की अभिवृद्धि के कारण हैं। अतः इस प्रसाद के अपेक्षी सभी सन्तजन होते हैं तथा गृह
में अर्चित श्रीहरि के दर्शन तथा उनका प्रसाद ग्रहण करने हेतु स्थित सन्त तथा
भक्तजन ही अधिकारी होते हैं (अन्य नहीं)॥५८॥
(इति भक्त्यधिकार)
ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रो नारी तथेतरः ।
चक्राद्यैरङ्कयेद् गात्रमात्मीयस्याखिलस्य च ॥५९॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, नारी तथा अन्य सभी जन श्रीहरि के चक्रादि आयुध या
लक्ष्म से अपने अपने तथा परिवार के सभी के शरीरों के अंकित
करें॥५९॥
अनिष्टानां निवृत्त्यर्थमैकान्त्याय जगत्पतेः ।
सिद्ध्यर्थं कर्मणांश्चैव धार्यं चक्रादिलाञ्छनम् ॥६०॥
इन चक्रादि लांछनों को धारण करने का प्रयोजन यह है कि इससे अनिष्टों की
निवृत्ति होती है तथा जगदीश श्रीनारायण की परमैकान्तिकता की पुष्टि होकर
आरब्ध कर्मों में सिद्धि प्राप्त होती है। अतः श्रीहरि के इन चक्रादि लांछनों का
धारण आवश्यक है॥६०॥
बाह्वोर्ललाटे शिरसि हृदये चाग्रजन्मनाम् ।
शङ्खचक्रगदाशार्ङ्गखड्गैः मन्त्रेण दाहयेत् ॥६१॥
इन्हें दोनों बाहुओं पर, ललाट देश में, मस्तक पर, शरीर में, हृदय स्थान पर
मन्त्रपूर्वक ब्राह्मणादि के शरीर पर दाहन के साथ अंकित करना
चाहिए॥६१॥
६० नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता
विष्णोरायतनाग्नौ वा गुरोरात्मन एव वा ।
हुते हेमादिभिस्तप्तैः सुरूपैरर्चितैः क्रमात् ॥६२॥
श्रीविष्णु के मन्दिर में स्थित अग्नि में अथवा श्रीविष्णु के नैवेद्यार्थ निर्मित पाकादिक
अग्नि में, गुरु की अग्निहोत्रादि हवन कार्य की हुई अग्नि में या स्वयं के घर की पवित्र
अग्नि में इन चक्रादि मुद्राको सन्तप्त करे जो हेम रजत, ताम्र आदि से निर्मित हो
तथा जिनकी विधिवत् अर्चना पूर्व में की जाए फिर उभरते अंगों को अग्नि से तप्त
कर, उनसे अंकित करे॥६२॥
दासभूतं यदात्मानं बुद्धचेत परमात्मनः ।
तदैव गात्रं कुर्वीत शङ्खचक्रादिलाञ्छितम् ॥६३॥
जब साधक या शिष्य परमेश्वर श्रीविष्णु की दासभावना का स्वयं अन्तरात्मा से
बोध अनुभव करे तभी उसके शरीर को शंख, चक्रादि से यथास्थान लांछित करना
चाहिए॥६३॥
अङ्कितं क्वचिदप्येवं चक्रेणैकेन केवलम् ।
अनिष्टानान्तु भूतानां न तावद्वशगो भवेत् ॥६४॥
भागवतत्व की स्थिति इन चक्रादि के लांछन से होती है अतः किसी को केवल एक
चक्र मात्र के लांछन के द्वारा भी अंकित किया जा सकता है (पूरे शरीर के
निर्धारित स्थानों के विकल्प में अथवा शंख तथा चक्र की मुद्राओं के द्वारा अथवा
सभी श्रीहरि के आयुधों की मुद्राओं से शरीर को अंकित किया जाना चाहिए।) ऐसा
करने से अनिष्टकारी भूतादि तथा यमकिङ्करों पिशाचादि के वश में वह नहीं आ
सकता है॥६४॥
अग्निषोमौ हि चक्राब्जौ सर्व एव तदात्मकाः ।
यदि वा मानयन्नेकं पूर्णो हि परमश्नुते ॥६५॥
चक्र तथा शंख अग्निषोमीय स्वरूप वाले माने गये हैं (अर्थात् चक्र अग्नि तथा अब्ज
(शंख) सोमरूप है तथा सभी देवगण इन्हीं रूपों वाले माने जाते हैं। अतएव चक्र का
धारण (ही) मुख्य है। या इन दोनों में से किसी एक को ही मुख्य मानते हुए धारण
करे तो भी वह पूर्ण होकर परमफल का दाता होता है॥६५॥
शङ्खचक्रप्रधानं हि सर्वमन्यद् गदादिकम् ।
अङ्कितः शङ्खचक्राभ्यां सर्वैरङ्कित एव वा ॥६६॥
क्योंकि श्रीनारायण के सभी आयुधों में शङ्ख तथा चक्र की प्रमुखता है। अतः
शङ्ख और चक्र के द्वारा अंकित होने पर वह सभी आयुधों से अङ्कित होकर (पूर्ण
भागवत के रूप में) मान्य हो जाता है॥६६॥
हिन्दीटीकासहित ६१
धारयेदूर्ध्वपुण्ड्रांश्च विष्णोः प्रीतिकरान् सदा ।
जप-होमार्चनध्यान-दानादिषु विशेषतः ॥६७॥
वैष्णव भक्त अपने जप, होम, दान तथा अर्चन, ध्यानादि के अवसर पर भगवत्सेवा
की परमयोग्यता के आपादनार्थ विशेषरूप में श्रीविष्णु के प्रीति के सदैव आधारभूत
रहनेवाले ऊर्ध्व तिलक को अवश्य धारण करे॥६७॥
नश्यन्ति सकलाः क्लेशा नराणां पापसम्भवाः ।
अभीष्टान्यखिलानि स्युरूर्ध्वपुण्ड्रस्य धारणात् ॥६८॥
इस ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक के धारण करने से मनुष्यों के पापों से उत्पन्न होने वाले समस्त
क्लेशों का उपशम या नाश होता है तथा सभी अभीष्ट प्रयोजनों की संप्राप्ति होती
है॥६८॥
त्रयोदश द्वादश वाप्यूर्ध्वपुण्ड्राणि धारयेत् ।
एकं चत्वारि षट् चाष्टावपि वाञ्छन्ति केचन ॥६९॥
इन ऊर्ध्वपुण्ड्रों के धारण में त्रयोदश या द्वादश संख्या की स्थिति मान्य है परन्तु कुछ
विष्णुभक्त एक, चार, छः तथा आठ संख्या भी ऊर्ध्वपुण्ड्रों की बतलाते
हैं॥६९॥
ऋजूनि स्फुटपार्श्वानि सान्तरालाानि विन्यसेत् ।
ऊर्ध्वपुण्ड्राणि दण्डाब्जमत्स्यदीपनिभानि च ॥७०॥
ये ऊर्ध्वपुण्ड्र आकार में सीधे होने के साथ साथ इनकी दोनों रेखा या वस्तुएं स्पष्ट
होनी चाहिए तथा इनके बीच के भाग स्पष्ट अलग दिखना चाहिए तथा इनका
आकार लम्बा, चक्र, अब्ज (शंख) तथा दीप के आकारों से समानता लिये हुए
श्रीहरि के पादाब्ज के समान होना चाहिए॥७०॥
विष्णोरूर्ध्वतया क्षेत्रे पर्वतादौ प्रशस्तया ।
मृदोर्ध्वपुण्ड्रं देवानामन्त्यैर्वा छिद्रमेव वा ॥७१॥
श्रीविष्णु के पर्वतादि क्षेत्रों के प्रशस्त होने के कारण उसी पर्वतादि की मिट्टी से
ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण होता है। अतः उसे ही धारण करना चाहिए। देवताओं की
अर्चनाकारी अन्य कस्तूरी आदि द्रव्यों से भी ऊर्ध्वपुण्ड्र किया जाता है। मनुष्यों का
ऊर्ध्वपुण्ड्र बीच में छिद्रवाला होता है तथा यहाँ मिट्टी सफेद होनी
चाहिए॥७१॥
निघर्षणादि विधिवत्कृत्वा ध्यायन् जगद्गुरुम् ।
आसीनोऽङ्गुलिभिर्दद्यादूर्ध्वपुण्ड्रान् स्वयं क्रमात् ॥७२॥
विधिवत् संसार के प्रभु श्रीनारायण का ध्यान करते हुए (स्मरण करते हुए) श्वेत
६२ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता
मृत्तिका का सव्यहस्त के द्वारा निघर्षण कर उससे ऊर्ध्वपुण्ड्र बनाकर धारण करे। यह
कार्य वह आसीन होकर स्वयं की अंगुलि में मृत्तिका से ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण
करे॥७२॥
ऊर्ध्वपुण्ड्रं ललाटे तु कुर्वीत चतुरङ्गुलम् ।
उदरे हृदि कण्ठे च दशाष्टचतुरङ्गुलान् ॥७३॥
ललाट पर यह ऊर्ध्वपुण्ड्र चार अंगुल के प्रमाण का उन्नत रखना चाहिए तथा उदर,
हृदय तथा कण्ठ देश पर क्रमशः दस, आठ तथा चतुरंगुल प्रमाण का रखना
चाहिए॥७३॥
दक्षिणोदरबाह्वंसेष्वेवं त्रीणीतरस्य च ।
आद्यवत् पृष्ठतो द्वे च मूर्ध्नि चैवं त्रयोदश ॥७४॥
उदर के दक्षिण भाग पर, दक्षिण बाहु तथा स्कन्ध पर तथा उदर के वामभाग, बाहु
तथा स्कन्ध पर इसी क्रम से दस, आठ तथा चार अंगुलों वाले ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करे।
ललाट के ऊर्ध्वपुण्ड्र की तरह ही पृष्ट देश में दो तथा मूर्धा पर एक ऊर्ध्वपुण्ड्र
रखें। इसी प्रकार शरीर पर इनकी संख्या तेरह रहती है॥७४॥
त्रिधा सर्वत्र विस्तारश्चतुस्त्रिद्व्यङ्गुलं क्रमात् ।
उत्तमो मध्यमो हीनः पार्श्वद्व्यङ्गुलिकौ स्मृतौ ॥७५॥
इन सभी ऊर्ध्वपुण्ड्रों में चार, तीन तथा दो अंगुलों की लम्बाई का विस्तार क्रमशः
उत्तम, मध्यम तथा हीन माना जाता है। अतएव इनके अतिरिक्त मध्यम तथा हीन
बाजुओं में ये अंगुलि मात्र प्रमाण के रहते हैं॥७५॥
तत्र तत्र स्मरन् मन्त्रैः केशवादीन्न्यसेत् क्रमात् ।
पाणिना दक्षिणेनैव वासुदेवं त्रयोदशे ॥७६॥
इनमें जहाँ तहाँ ललाटादि प्रदेश में रहनेवाले ऊर्ध्वपुण्ड्रों में केशवादिरूपों का ध्यान
करते हुए उनके मन्त्रों से क्रमशः केशवादि का वहाँ न्यास करे। इन शिर आदि
त्रयोदश ऊर्ध्वपुण्ड्रों में वासुदेव मन्त्र से दक्षिण हस्त के द्वारा ही वासुदेव का न्यास
करें॥७६॥
प्रणवेन तथा व्यूहैः षडष्टद्वादशाक्षरैः ।
मन्त्रैरन्यैश्च ताँस्तान् वै धारयेदूर्ध्वपुण्ड्रकान् ॥७७॥
प्रणव के द्वारा तथा केशव के षड् आठ तथा द्वादशाक्षर वाले अपने उपदिष्ट मन्त्रों से
या उनके व्यूह चतुष्टय के त्रिगुण होकर द्वादश मन्त्रों से उन उन ऊर्ध्वपुण्ड्रों को
धारण करना चाहिए॥७७॥
हिन्दीटीकासहित ६३
ततो दिव्यञ्च हारिद्रं सहेम-तुलसीदलम् ।
मन्त्रेण धारयेच्चूर्णं ललाटे मस्तके तथा ॥७८॥
इसके उपरान्त श्री भगवदर्पित सुवर्ण तुलसीदल चूर्ण मिश्रित हरिद्रा चूर्ण को ललाट
तथा मस्तक पर मन्त्र के साथ (अधिकारानुसारी ‘श्रियो जात’ इत्यादि मन्त्रादि के
साथ) धारण करना चाहिए॥७८॥
पवित्राण्यब्जबीजानि शङ्खचक्राङ्कभूषणम् ।
धारयेद् वैष्णवं नाम वैष्णवाश्रयमेव वा ॥७९॥
पवित्रारोपणादि उत्सव के अवसर पर श्रीभगवान् विष्णु के द्वारा धारण किये गये
तन्तुमय पद्माक्ष बीज के वलयों (तुलसी काष्ठ निर्मित अक्ष वलय और अन्य वैष्णवों
के इष्ट कण्ठी आदि को) तथा शंख चक्रादि से अङ्कित मुद्रिकादिभूषणों को जो
वैष्णवाश्रय होकर नाम से भी वैष्णव भूषण हो गये हों तथा भगवत्सम्बन्धित भूषणों
को धारण करना चाहिए॥७९॥
अयुक्सूत्रैर्व्यतिस्यूतं धारयेत् कटिबन्धनम् ।
कौपीनं वस्त्रयुग्मञ्च यथार्हमितराणि च ॥८०॥
उसे अयुग्म या तीन सूत्रों से बट कर बनाया हुआ कटिसूत्र का धारण करना चाहिए,
कौपीन के दो वस्त्रखण्डों को रखना चाहिए तथा यथायोग्य आवश्यकतानुरूप अन्य
वस्त्रों (उष्णीष आदि) को शरीर पर धारण करना चाहिए॥८०॥
लक्षणानि स्फुटान्येव क्रियासिद्धिकराणि तु ।
धारयेन्नोपहन्येत कदाचित् किङ्करादिभिः ॥८१॥
शंख, चक्र, ऊर्ध्वपुण्ड्र आदि लक्षणों को स्पष्ट रूप में प्रकट होने वाले आकारों में
धारण करने से ये क्रियाओं के सिद्धि-कारक भगवान् श्रीविष्णु के किंकरभाव की
योग्यता के सम्पादक होकर भी रहने से इनका धारण करना इष्ट है जिससे कभी
भी यम देवता के किङ्कर दूतादि से बाधा नहीं होती है॥८१॥
सत्सेवाधिकार-
दण्डवत्प्रणमेद् भूमावुपैत्य गुरुमन्वहम् ।
दिशे वाऽपि नमस्कुर्याद् यत्रासौ वसति स्वयम् ॥८२॥
आचार्यायाहरेदर्थानात्मानञ्च निवेदयेत् ।
तदधीनश्च वर्तेत साक्षान्नारायणो हि सः ॥८३॥
अपने अहंकार को हटाकर प्रतिदिन अपने उपदेष्टा पूज्य गुरु को दण्डवत् प्रणाम
पृथ्वी पर झुककर करना चाहिए अथवा जिस स्थान पर वह निवास करता हो उसी
दिशा को गुरु का आवास स्थान मानकर (गुरु के न मिलने पर) प्रणाम कर लेना
६४ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता
चाहिए। अपने आचार्य के लिये धनादि देने को लावे तथा अपना परिचय निवेदन क
उनकी आज्ञा का अनुसरण कर स्थित रहे, क्योंकि आचार्य स्वयं नारायण स्वरूप होता है
(आशय यह कि भगवद्विषयक सारी वृत्तियां तथा श्रद्धा को गुरु के लिये भी किय
जाना चाहिये)॥८२-८३॥
कुर्वीत परमां भक्तिं गुरौ तत्प्रियवत्सलः ।
तदनिष्टापवादी च तन्नामगुणहर्षितः ॥८४॥
आचार्य का भक्तवत्सल होकर अपने पूज्य गुरु के प्रति परम भक्ति रखे तथा अपनी
ओर से गुरु के अनिष्ट का विरोध करे तथा उनके वचन, नाम तथा गुणों का अनुवाद
सुनकर प्रसन्नता दिखलाए॥८४॥
नित्यं गुरुमुपासीत तद्वचःश्रवणोत्सुकः ।
विग्रहालोकनपरस्तस्यैवाज्ञाप्रतीक्षकः ॥८५॥
नित्य ही वह अपने आचार्य या उपदेष्टा गुरु की उपासना करता रहे तथा उनके
कथन (उपदेश वचन) को सुनने को उत्सुक रहे। उनके शरीर की सेवा में सदैव
तत्पर रहे तथा उनके द्वारा दी जाने वाली आज्ञाओं की सदा प्रतीक्षा करत
रहे॥८५॥
प्रक्षाल्य चरणौ पात्रे प्रणिपत्योपयुज्य च ।
नित्यं विधिवदर्घ्याद्यैरादृतोऽभ्यर्चयेद् गुरुम् ॥८६॥
वह अपने आचार्य के चरणों को पात्र में स्थापित कर उन्हें प्रक्षालित करे तथ
दण्डवत् प्रणाम कर पादप्रक्षालन के जल का आचमन कर ग्रहण करे तथा प्रतिदिन
अर्घ्यादि लेकर आदर करते हुए आचार्य का अर्चन करे॥८६॥
इच्छाप्रकृत्यनुगुणैरुपचारैः सदोचितैः ।
भजन्नवहितश्चात्र हितमावेदयेद् रहः ॥८७॥
वह सदा उनकी इच्छा तथा प्रकृति के अनुरूप उपचारों से सेवा करे तथ
सावधानीपूर्वक रहते हुए आचार्य के हितों को अलग एकान्त होने पर उन
बतलावे॥८७॥
यथानुजीवी नृपतिं यथा भक्तस्तु दैवतम् ।
तथैव देशिकं शिष्यः सेवेत विनयान्वितः ॥८८॥
१ आचार्य भगवद्रूप है। यह पारम्परिक वचन है-'साक्षात्नारायणो देवः कृत्वा मर्त्यमयीं तनुम्
मग्नानुद्धरते लोकान् कारुण्याच्छास्त्रपाणिना।।' अतएव भगवद्विषयक वृत्ति के समान उस
आचार्य के प्रति भी आचरण प्रमाण सम्मत है।
हिन्दीटीकासहित ६५
जैसे कोई राजसेवक अपने स्वामी राजा का अथवा जैसे कोई भक्त अपने इष्टदेव की
विनयपूर्वक सेवा करता रहता है उसी प्रकार वह शिष्य अपने देशिक (गुरु) की
सेवा करे॥८८॥
स्नातञ्च गुरुणा यत्र तीर्थं नान्यत्ततोऽधिकम् ।
यच्च कर्म तदर्थन्तद्विष्णोराराधनात् परम् ॥८९॥
अपने गुरु ने जिस जलाशय (नदी, सरोवर या कूप) में स्नान किये उससे अधिक
अन्य श्रेष्ठ तीर्थ नहीं है१ तथा जो भी कार्य उनके लिये किया जाता है वह स्वयं
श्रीविष्णु की आराधना के समान श्रेष्ठ कार्य है॥८९॥
अपदिश्य पितॄन् देवान् गुरौ यत् प्रतिपाद्यते ।
देश-काल-क्रिया-मन्त्र-निरपेक्षं तदक्षयम् ॥९०॥
अपने पितरों तथा देवताओं को भी न देते हुए जो हव्य कव्य पदार्थ आचार्य को
प्रदान किया जाता है वह देश, काल, क्रिया तथा मन्त्रों की बिना अपेक्षा किये हुए
भी अक्षय होता है॥९०॥
आत्मनो ह्यतिनीचस्य योगिध्येयपदार्हताम् ।
कृपयैवोपकर्त्तारमाचार्यं संस्मरेत् सदा ॥९१॥
अतिशय हीनात्मा को भी योगिजन से ध्यान करने (प्राप्तव्य) योग्य पद की
योग्यता को जो अपनी करुणामयी कृपा के द्वारा उपदेशों के उपकार से शक्य बनाता
है, अतः ऐसे उपदेष्टा आचार्य का सदैव स्मरण करना चाहिए॥९१॥
स्वयं देहानुकूलानि धर्मार्थोपयिकानि च ।
कुर्यादप्रतिषिद्धानि गुरोः कर्म्माण्यशेषतः ॥९२॥
वह सदां आचार्य के शरीर के अनुकूल पादसंवाहन आदि सेवा तथा धर्म और अर्थ के
उपयुक्त अग्नि परिचर्या देवपूजन आदि शास्त्र के अनुगत तथा अप्रतिषिद्ध कर्मों को
स्वयं सम्पन्न करे॥९२॥
योऽसौ मन्त्रवरं प्रादात् संसारोच्छेदसाधनम् ।
प्रतीच्छेद् गुरुवर्यस्य तस्योच्छिष्टं सुपावनम् ॥९३॥
जो आचार्य मोक्ष के हेतुभूत श्रेष्ठ मन्त्र को प्रदान करता है उस आचार्य का
पवित्रभूत उच्छिष्ट प्रासादं पवित्र भगवत्प्रसादवत् आचार्यके वदनसे स्पृष्ट अन्नादि
को स्वीकार करे॥९३॥
१ गुरु के स्नान से पवित्र तीर्थ का भागवत् में इस प्रकार माहात्म्य दिखलाया है-
'भवद्विधा भागवतास्तीर्थभूताः स्वयं विभो । तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि स्वान्तस्थेन गदाभृता ॥'
अतएव ऐसे पवित्रभूत जल से स्नान करना आचार तथा विनयाचार भी शास्त्रसम्मत है।
६६ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता
ये चोपकुर्वते ज्ञानं किमप्यच्युतसंशयम् ।
विनोच्छिष्टाशनं कुर्याद् वृत्तिं तेष्वपि गौरवात् ॥९४॥
श्रीमद्भगवान् अच्युत विषयक मोक्ष साधक ज्ञान का जिस गुरु के उच्छिष्टाशन
कर्म से उपकार होता है या ऐसे ज्ञान को जो प्रदान करता है, ऐसे अन्य गुरुजन
उच्छिष्टाशन से वर्जित अपने गुरु के समान ही वृत्ति का आचरण करे॥९४॥
गुरोश्च पत्नीपुत्रादिष्वन्येष्वप्यमलात्मसु ।
कुर्यादाचार्यवद्वृत्तिं तत्र तत्र व्यवस्थया ॥९५॥
अपने पूज्य गुरु की पत्नी तथा पुत्रादि भ्राता आदि तथा उनके अंतरंग ऐसे शिष्टजन
सहृदयादि निर्मल स्वभाव वाले हों तो उन सभी में यथा पर्या
उच्छिष्टाशनादिवर्ज्य पादोपसंग्रहणादि आचार का पालन करे॥९५॥
आचार्योऽपि तथा शिष्यं स्निग्धो हितपरः सदा ।
प्रबोध्य बोधनीयानि वृत्तिमाचारयेत् स्वयम् ॥९६॥
गुरु भी विनयादि सम्पन्न शिष्य के प्रति कृपापूर्ण तथा सदैव शिष्यहित की चिन्ता
रहकर उन्हें बतलाने योग्य सभी विषयों का उपदेश देते हुए सदा प्रबुद्ध करे तथा स्व
अपनी वृत्ति का यापन करे॥९६॥
निजधर्मानुरोधेन वैष्णवैरेव वैष्णवः ।
कुर्यात् सर्वाणि कार्याणि न कदाचिदवैष्णवैः ॥९७॥
अधिकैः सदृशैर्वाऽपि कुर्यादेव तु सङ्गमम् ।
हीनांश्च नावमन्येत न च दोषं विभावयेत् ॥९८॥
वह शिष्य अपने से अधिक योग्य अथवा अपने समान बुद्धिवाले अन्य शिष्यों क
संगति रखे। वह अपने से कम योग्यता या स्थिति वालों की अवहेलना न करे और
ही उनमें दोषों की चिन्ता या निदर्शन करे॥९८॥
वृद्धानाचारसम्पन्नान् विष्णुभक्तान् दृढव्रतान् ।
सतः सत्सेवनपरान्नित्यं सेवेत सन्नतः ॥९९॥
वह सदा विनम्र भाव से ऐसे सन्तजन की जो श्रीहरि के भक्त तथा इष्ट के प्रति दृ
आस्था एवं व्रतशील रहते हो आचार सम्पन्न हों तथा सज्जनों के सेवी हों तो उनक
सदा सेवन (सेवा) करना चाहिए॥९९॥
१ इस विषय में विहगेन्द्रसंहिता का यह वचन-‘आचार्यपत्नीं पुत्रं वा मातापितरौ सोदरम्
आचार्यमेव मन्येत अन्यथा नाशमाप्नुयात् ॥”
हिन्दीटीकासहित ६७
एवं स्वकर्मणि ज्ञाने भक्तौ च परिनिष्ठितः ।
वैराग्येण च संयुक्तो न चेह जायते पुनः ॥१००॥
इस प्रकार वह अपने विहित आचारों में इष्ट के दृष्टज्ञान तथा भक्ति वैराग्यादि में
परिपक्व या दृढ़ धारणा रखकर वर्तत करने पर पुनः इस लोक में जन्म ग्रहण नहीं
करता है॥१००॥
(इति सत्सेवनाधिकारः)
इति श्रीभारद्वाजसंहितायां न्यासोपदेशो तृतीयोऽध्यायः ॥३॥
(भारद्वाज संहिता के न्यासोपदेश का तृतीय अध्याय समाप्त)
६८ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता
अथ चतुर्थोऽध्यायः
प्रीतिरूपाँस्तथा विष्णोः स्वधर्मानाचरेद् यथा ।
तथैवाप्रीतिरूपाणि प्रतिषिद्धानि वर्जयेत् ॥१॥
प्रपत्ति या न्यास-योग में स्थित साधक भक्त को अपने इष्टभूत श्रीविष्णु के प्रीतिरूप
या प्रीतिकारक स्वधर्म का आचरण जैसे इष्ट होता है उनका अनुगमन करे वैसे ही
उन्हें अप्रीतिरूप जो प्रतिषिद्ध धर्म है उनको निषिद्ध मान कर वह उनका परित्याग
भी करे॥१॥
विष्णोर्ध्यानप्रणाभार्चास्तुतिचिह्नादिवर्जितम् ।
समारब्धन्तु यत् कर्म तत्कर्म विफलं भवेत् ॥२॥
जिस धर्माचरणभूत कर्म में श्रीविष्णु के ध्यान, प्रणाम, अर्चन, स्तुति तथा ऊर्ध्वपुण्ड्र
जैसे चिह्न का विधान न रहे और यदि ऐसा कोई कर्म आरम्भ किया गया हो तो वह
कर्म निष्फल होता है॥२॥
विष्वक्सेनः स्मृतो नेता भगवांच्छुद्धकर्मणाम् ।
तस्मान्नान्यमुपासीत कर्मणां विघ्नशान्तये ॥३॥
आरब्ध एवं अनुष्ठित सभी शुद्धकर्मों के भगवान् विष्वक्-सेन (श्रीविष्णु) ही प्रभु या
पूर्णकर्ता माने गये हैं। अतएव विघ्नादि की शान्ति हेतु भी अन्य देवता की उपासना
नहीं करना चाहिए॥३॥
ब्रह्मारुद्रदिगीशार्कतच्छक्तिप्रसवादयः ।
नित्यसम्पर्चने वर्ज्याः काम्योऽपि स्यान्न तन्मुखः ॥४॥
ब्रह्मा, रुद्र, दिक्पाल, सूर्य, इन ब्रह्मादि की शक्तियां (मातृकाएं) तथा इन देवगणों
के पुत्रादि देवगणों की नित्य अर्चा (कर्मविशेष में कभी अपेक्षित होने पर भी)
वर्जित मानी गयी है। अतएव काम्य कर्म के रहने की अपेक्षा पर भी इनकी अर्चा में
अभिमुख न रहे॥४॥
न जातु परमां वृत्तिं कुर्वीत विरसाशयः ।
प्रमादालस्यनास्तिक्यकामाद्यैर्न च हापयेत् ॥५॥
उस निष्पार्कन की निष्ठा गयी वृत्ति को भक्तिहीन भाव से कभी न रखे तथा उसे
हिन्दीटीकासहित ६९
प्रमाद, आलस्य नास्तिक बुद्धि के काम क्रोध आदि के कारण भी कभी न छोड़े
(क्योंकि यह चर्या नित्यविधि है, अपरिहार्य है)॥५॥
देश-काल-गुणादीनां विना पापेन संविदः ।
आस्त्रीभ्यश्चाखिलाचारान्नातिक्रमेत् कदाचन ॥६॥
वह देश, काल तथा कुलादि के निर्धारित आचारों को बिना निषिद्ध किये हुए तथा
स्त्रियों के भी इसी प्रकार के विहित आचारों का उल्लंघन (भी) न
करे॥६॥
न वृत्तेरधिकामृद्धिं न मृत्युं न च जीवितम् ।
न चाप्रशस्तान् विषयानिच्छेदिह परत्र वा ॥७॥
इस लोक में वह अपनी वृत्ति से अधिक समृद्धिकी मृत्यु की या जीवन की अभिलाषा
न करे। इसी प्रकार वह वेदादि से निषिद्ध अप्रशस्त विषयों की इस या परलोक के
विषय में भी अभिलाषा न रखे॥७॥
न पापेन न पुण्येन नात्यायासेन कर्मणा ।
सम्पदां सङ्ग्रहं कुर्याद्विपदाञ्च प्रतिक्रियाम् ॥८॥
वह अपनी सम्पत्ति का संग्रह तथा आपत्तियों का प्रतीकार चौर्य या हिंसादि कृत्यों के
कारण पापों के द्वारा प्राप्त सम्पत्ति कारणभूत लक्ष्मीव्रतादि पुण्याचरणों के द्वारा
अथवा अविहित या प्रतिषिद्ध काम्यकर्मों को अतिशय प्रयत्नों के द्वारा सम्पादित
नहीं करे। (विहित तथा अप्रतिषिद्ध ऐसे कर्म जो अतिशय प्रयासकारी न हो-उन्हीं
से सम्पत्ति का संग्रह तथा विपत्ति का प्रतीकार करना चाहिए)॥८॥
विनैव प्रतिषिद्धेन सर्वार्थान् साधयेत् सुधीः ।
नोपेक्षेत च भूतानां व्यसनं शक्यवारणम् ॥९॥
उत्तमबुद्धि सम्पन्न पुरुष बिना किसी प्रतिषिद्ध कर्म के आचरण के अपने तथा
आचार्यादि के सभी अभीष्ट अर्थों की सिद्धि करे। तथा असद्भूत चेतन के जो स्वयं
के द्वारा निवारण योग्य व्यसन (कष्ट विपत्तियां) की उपेक्षा न करे (अर्थात् शक्य
भूतादि व्यसनों की संभव विपत्तियों को स्वयं ही दूर करने का उद्यम करे) किन्तु पूज्य
गुरु आदि सत्पुरुषों की अशक्य विपत्तियों के निवारणार्थ स्वयं के अतिशय प्रयास के
द्वारा भी निवारण किया जाना उचित है॥९॥
न विषज्ज्वरभूतादिहरणं स्तम्भनादि च ।
नाद्भुतानि तथान्यानि साधयेत् सत्वसंश्रयः ॥१०॥
वह सत्वादि का आश्रय या शक्ति को प्राप्त कर उसके द्वारा न सर्पादि के विष या
ज्वरादि व्याधि, ब्रह्मराक्षस आदि का मन्त्रों से निवारण, अग्नि तथा जल का
७० नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता
स्तम्भन, उच्चाटन आदि अन्य अद्भूत कर्मों की साधना न करे॥१०॥
न विपत्तिषु वैकल्यं नोदयेषु समुन्नतिम् ।
न कामेषु प्रसक्तिञ्च भजेदच्युतमानसः ॥११॥
वह विपत्ति के अवसर पर अधीरता (वैकलव्य) तथा उदय एव उन्नति की दशा
में उन्नतभाव न रखे। वह भोगादि में अतिशय संगभाव भी न रखकर एकाग्रमन से स
बिना स्थितियों के प्रभावों के श्री अच्युत का भजन करता रहे॥११॥
विनिन्दितः प्रशस्तो वा विमतः सम्मतोऽपि वा ।
विलुप्तोऽभ्यर्चितो वापि विक्रियेत न तत्ववित् ॥१२॥
वह तत्वभूत श्रीविष्णु का स्मरण तथा ज्ञान रखते हुए अपनी दुर्जनों के द्वारा निन्द
के किये जाने या सद्गुणों के कारण स्तुति किये जाने, किसी के अविश्वास से
चाहने पर अथवा किसी के विश्वासपात्र हो जाने की स्थिति में, किसी से अपमानित
(विलप्त) अथवा आदर प्रदान करने की दशा में (को प्राप्त करने पर) हर्ष य
शोकादि विकारों को प्राप्त न करे॥१२॥
न च क्रियान्तरङ्गाणां नायस्येदप्यसम्भवे ।
हानिं निवेद्य देवाय मनसैव प्रपूरयेत् ॥१३॥
वह अपने इष्टदेव की अर्चना में अपेक्षित द्रव्यों के सम्भव या प्राप्त न होने प
अधिक प्रयास न करे या बिल्कुल ही न मिलने पर अधिक प्रयास न करे या बिल्कु
ही न मिलने पर दुष्करायास भी न करते हुए इष्टदेव को उस पदार्थ का अभा
निवेदित करते हुए केवल उस पदार्थ को मन से निवेदित कर दे (तथा वह न प्राप्त हो
वाले पदार्थों की मानसिक भाव से पूर्ति कर लेवे)॥१३॥
वर्जयेत् प्रतिषिद्धानि सर्वाण्यस्खलितः शुचिः ।
प्रवृत्तेः कारणञ्चात्र कामक्रोधादिकं त्यजेत् ॥१४॥
वह पवित्रभाव में स्थित रहते हुए बिना किसी अर्चनादि की त्रुटि करते हुए सभ
निषिद्ध कार्यों तथा पदार्थों का परित्याग कर दे तथा इन प्रतिषिद्धों में अपनी प्रवृ
जाने के कारणभूत काम तथा क्रोधादि की वृत्तियों का भी वह परित्याग क
देवे॥१४॥
अगम्यागमनं हिंसामभक्ष्याणाञ्च भक्षणम् ।
असत्यवचनं स्तेयं तद्गत्सङ्गाँश्च वर्जयेत् ॥१५॥
वह परदारादि अगम्यगमन, हिंसादि कर्मों, अभक्ष्यपदार्थों का भक्षण, अस
सम्भाषण जैसे कर्मों, चोरी आदि दुष्कर्मों (पापाचरण) को तथा ऐसे कार्यों
करनेवालों की संगति का भी परित्याग कर दे॥१५॥
हिन्दीटीकासहित ७१
पातकानि समस्तानि गुरूणि च लघूनि च ।
विभोः कालुष्यकारीणि मनसाऽपि न चिन्तयेत् ॥१६॥
वह गुरु तथा लघु रूपवाले सभी पातकों को भी जो इष्टदेव के प्रति मन में कलुषता
उत्पन्न करते हो तो ऐसे कार्यों की मन से भी चिन्तना छोड़ देवे॥१६॥
इति विहिताचार विरुद्धवर्जन
ज्ञानन्तु स्वपरोपायफलान्वयविरोधिनाम् ।
अन्यथा विपरीतं वा ज्ञानं हानिकरं परम् ॥१७॥
वह ऐसे ज्ञान को (दृष्टि को) जिसमें प्रत्यगात्म स्व तथा प्राप्य ब्रह्म के उपाय, फल
तथा सम्बन्ध के विरोधि अन्यथाज्ञान या विपरीतज्ञान को अतिशय हानिकारक
समझे॥१७॥
छन्दांसि सरहस्यानि दिव्यशास्त्रान्विताः स्मृतीः ।
न जातु विचिकित्सीत पुराणादि च सात्विकम् ॥१८॥
वह रहस्यों से सम्पन्न वेदों तथा उपनिषद् आदि की, दिव्य शास्त्र पंचरात्र आगम
आदि तथा शास्त्रानुगत स्मृतियों की तथा सात्विक पुराणों (श्री विष्णुपुराण तथा
श्रीमद्भागवतादि) आदि की न तो निन्दा करे न व्यर्थ ही उनके वचनों पर संशय
या अप्रासंगिक विवेचन ही करे॥१८॥
शरण्यमिज्यं लक्ष्मीशं सदा सेव्यमनिच्छताम् ।
नेच्छेद् दृष्टिं कुदृष्टीनां सुधीः श्रुत्यर्थनिर्णयात् ॥१९॥
जो परमेश शरणागत की रक्षण करने में समर्थ है तथा जिससे यज्ञादि सम्पन्न होते हैं
ऐसे श्री लक्ष्मीपति की सेवा को न चाहने वाले तथा उनके ज्ञान को न रखनेवाले को
वह पुराण, इतिहास, पंचरात्र तथा श्रुत्यादि के अर्थों के विनिश्चय को ध्यान में
रखते हुए न चाहे और न ही संगति में रहे॥१९॥
ज्ञानं ज्ञेयञ्च तत्वेन कारणं चाच्युतं परम् ।
अजानद्भिर्वृथा नीतान् नाश्रयेन्न्यायविस्तरान् ॥२०॥
जिनसे श्रीहरि जाने जाते हो ऐसे ज्ञान, शास्त्ररूप, ज्ञेय तथा तात्विकभूत इस जगत्
के जो कारणभूत तथा इन सभी से जो परे भी हैं वह श्री अच्युत ही हैं, यह न जानने
वाले पण्डितों के साथ न्याय तथा उनके विस्तारों को व्यर्थ या बिना ही हेतु या अर्थ के
७२ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता
दिखलाने वाले समझ कर उनकी ओर ध्यान नहीं देना चाहिए (परन्तु तात्त्विक¹
न्यायपरिशुद्ध ऐसी वस्तु की सहमति रखे जो कुदृष्टि से रहित हो।।२०।।
प्रकृतिं पुरुषं योगं परं पाप्यञ्च माधवम् ।
अन्यथा मन्यमानानां स्मृतीश्च परिवर्जयेत् ॥२१॥
त्रिगुणात्मक स्वरूप वाली प्रकृति तथा चिद्विशिष्ट पुरुष के सम्बन्ध अथवा जीवात्मा
परमात्म सम्बन्ध को मुक्त्युपाय से प्राप्य माधव से अन्यथा या दूसरे कार्यादि में²
प्राप्य मोक्ष को बतलाने वाले सांख्य, योग दर्शन, स्मृति आदि को भी (श्रीहरि की
भक्ति के तथा सिद्धान्त के प्रतिकूल समझते हुए) अनन्यभाव के प्रति बाधक समझना
चाहिए॥२१॥
नाद्रियेत् पुराणादीन् राजसाँस्तामसाँस्तथा ।
अनीशानां परेशत्वं वृथा यत्रोपवर्ण्यते ॥२२॥
इसी तरह रजोगुण की प्रधानता तथा तमोगुण की प्रमुखता के प्रतिपादक ऐसे पुराणों को
भी जिनमें ईश श्रीमन्नारायण की परमप्रभुता से भिन्न अन्य देवेश ब्रह्मादि की प्रमुखता
वर्णित हो॥२२॥
तथा रुद्रेण कथितं मोहनं क्षुद्रकामदम् ।
तन्त्रं बहुविरुद्धञ्च तामसं परिवर्जयेत् ॥२३॥
इसी प्रकार तामस तत्व से अनुप्राणित श्रीरुद्र द्वारा कथित सामान्य एवं लौकिक
इच्छाओं की पूर्ति करने तथा उन्हें प्रदान कर देने में समर्थ पाशुपतादि तन्त्रों को भी
भगवन्निष्ठा में बाधक मानकर परिहार्य माने॥२३॥
अन्येषां त्रिदशादीनां स्तुतीर्मन्त्राँश्च वर्जयेत् ।
निबन्धनं गुणादीनां निबन्धाँश्चान्यचेतसाम् ॥२४॥
अन्य उपास्य देवगणों की स्तुति तथा उनके मन्त्रादि का भी काम्य पाठ नहीं किया
जावे जिनमें उन उन देवगणों के आपदादि उद्धारक गुणों का विवरण दिया जावे तो
१ यद्यपि अष्टादश स्थानों में प्रमाण से वस्तु परीक्षण हेतु न्याय का स्थान महत्वपूर्ण हैं फिर भी ऐसे
न्याय का कुदृष्टि को छोड़कर ग्रहण करना निरापद है। ऐसा न्याय परिशुद्ध तथा परमेश की
ऐकान्त्यभावना में सहायक ही होता है अतः इसे स्वीकार करना उचित है।
२ इसका समर्थन-'या वेदबाह्याः स्मृतयो याश्च काश्च कुदृष्टयः । सर्वास्ता निष्फला ज्ञेया
तमोनिष्ठा हि ताः स्मृताः ।।' यह मनूक्तवचन भी करता है कि राजस तथा तामस मूलक स्मृतियों
के विधानों का ग्रहण उपादेय नहीं। कपिलादि की प्रणीत सांख्यदर्शन की तथा योग का भी
बादरायण ने-अतएव 'एतेन योगः प्रत्युक्त' जैसे सूत्र से प्रत्याख्यान किया था। इसी तथ्य को यहाँ
उपर्युक्त कारिका में दिखलाया गया है।
हिन्दीटीकासहित ७३
इष्ट प्रभुनारायण से मन को हटानेवाले हो तो उनका भी परित्याग
करे॥२४॥
बाह्यं दुष्टं तमोनिष्ठं विपरीतमनर्थकम् ।
मतं न सौगतादीनां मनसाऽपि विचिन्तयेत् ॥२५॥
तथा इसी प्रकार वेदबाह्य तथा वेदादि के विपरीत रहने वाले कुतर्ककारी तमोनिष्ठ
तथा व्यर्थ के विषयों का विवेचन करनेवाले सौगतादि (बौद्धादि) धर्म तथा
दर्शनादि के मत हैं उनका अतःकरण को लगाकर चिन्तन नहीं करना
चाहिए॥२५॥
कामं मतानि चान्येषां पश्येत् प्राज्ञोऽपनुत्तये ।
न च तेषु प्रसज्येत नानुमन्येत नाभ्यसेत् ॥२६॥
चाहे बुद्धिमान् पण्डित वेद बाह्य मत के प्रतिपादक धर्मग्रन्थों तथा दर्शनों को उनके
खण्डन के लिये ही देखें तथा उनका अध्ययन करे किन्तु वह उन उन मतों में मन को
न लगाये और न उनके तर्कों का अनुमोदन मन में लाये और उनका आदरपूर्वक
अध्ययन ही करे॥२६॥
इति दृष्ट-विरोधाधिकार
भक्तिविरुद्धवर्जन
अपचारांश्च विविधान् हरेर्यत्नेन वर्जयेत् ।
महानपायो माध्यस्थ्यं किम्पुनर्विपरीतता ॥२७॥
श्रीहरि के विषय में अन्य मतों के द्वारा आक्षेपों से पूर्ण विविध चिन्तनों तथा तर्कों
का प्रयत्नपूर्वक निराकरण करना चाहिए। इस कार्य में मध्यस्थता या तटस्थता और भी
अनर्थकारी होती है फिर विपरीत भाव रखना तो और भी अनर्थकारी होगा॥२७॥
विष्ण्वर्चारहिते ग्रामे विष्ण्वर्चारहिते गृहे ।
न कुर्यादन्नपानादि न तत्र दिवसं वसेत् ॥२८॥
ऐसे ग्राम में जहाँ श्रीविष्णु का अर्चन न होता हो (जहाँ श्रीविष्णु का कोई स्थान या
मन्दिर न हो), जिस घर में श्रीविष्णु की उपासना तथा नित्य अर्चन न होता हो
वहां अन्न तथा जल ग्रहण नहीं करना चाहिए तथा ऐसे स्थान पर एक दिन भी
निवास या विश्राम न किया जावे॥२८॥
न च मन्त्रोपजीवी स्यान्नचाप्यर्थोपजीविकः ।
नानिवेदितभोगश्च न च निन्द्यनिवेदकः ॥२९॥
७४ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता
श्रीहरि का प्रपत्तिशील भक्त अपनी जीविका मन्त्रों के पाठ तथा जप करके न चलावे
और न ही देवपूजक होकर रहे। वह श्रीहरि को बिना अर्पण किये भोजन
करनेवाला और भगवान् को प्रसादरूप में नित्यवर्ज्य खाद्यादि को अर्पण करनेवाला
भी नहीं होना चाहिए॥२९॥
वर्ज्याः पाखण्डशैवाद्यैः स्थापिताश्च तथार्चिताः ।
अन्यत्र च स्वतो बद्धा नियमात् सर्वदेवताः ॥३०॥
ऐसी भगवत् प्रतिमाएं जिन्हें वैदिक ब्राह्मण पाखण्डजन तथा अन्य शैवादि ने स्थापित
तथा पूजित की हो उनकी भी पूजनादि से दूर रहना चाहिए। नियमतः तु कर्मवश
सभी देवता भगवत् शरीरभाव के बिना उपासना के योग्य नहीं माने जाते
हैं॥३०॥
गृहे यस्यान्यदेवार्चा व्यक्तो न च जनार्दनः ।
न तस्य किञ्चिदश्नीयादपि वेदान्तवेदिनः ॥३१॥
जिस पुरुष के घर में अन्य देवगण की पूजन में श्रीविष्णु का पूजन व्यक्त रूप में नहीं
होता हो तो यदि वह वेद या वेदान्तवेत्ता विद्वान् भी (अनेक यज्ञादिं का कर्त्ता
विद्वान् ब्राह्मण भी) हो तो उसके यहाँ पर (कुछ भी) अन्नादि ग्रहण नहीं करना
चाहिए॥३१॥
वर्जयेदन्यदेवानामाल्याद्युपसर्पणम् ।
तथा गोपुरहर्म्यार्चयानास्त्राद्यवलोकनम् ॥३२॥
इसी प्रकार श्रीविष्णु के अतिरिक्त अन्य देवताओं के मन्दिरों में दर्शनार्थ भक्ति से न
तो जाना ही चाहिए और न उनके गोपुर, निवास भवन तथा रथोत्सवादि का
अवलोकन या उनके त्रिशूलादि अस्त्रों की अर्चना ही करना चाहिए॥३२॥
गीतवादित्रघण्टादिशब्दानां श्रवणं तथा ।
कर्माणि च समस्तानि बाह्यान्याभ्यन्तराणि च ॥३३॥
उनके मन्दिर में होनेवाले गीत, वादन तथा घण्टादि शब्दों का श्रवण तथा वहाँ
सम्पन्न होनेवाले अर्चनादि समस्त कर्म जो मन्दिर के अन्दर किये जाएं या जो
मन्दिरों के बाहर हो रहे हों तो उनको भी नहीं देखना या कार्यों में सम्मिलित होना
ही उचित है॥३३॥
द्रव्याणां भुक्तभोगानां स्वीकारं स्पर्शनन्तथा ।
भोगादीनां तदर्थञ्चाप्यर्थनां प्रतिपादनम् ॥३४॥
उन अन्य देवताओं के द्वारा भुक्त या अर्पित (प्रसादादि) अन्यान्य अन्नादि का
स्वीकार करना उनका स्पर्श करते हुए या उनके वन्दनादि में झुक कर पृथ्वी को
हिन्दीटीकासहित ७५
स्पर्श करना या उनके देवताओं को अर्पित किये जानेवाले भोग्य पदार्थों (अन्नादि
पक्व या अपक्व पदार्थों) को समर्पित करना भी उचित नहीं है॥३४॥
प्रणामं स्पर्शनं सेवां स्मरणं कीर्तनं तथा ।
निन्दाञ्च तद्भक्तिपराण्यप्येतानि विवर्जयेत् ॥३५॥
इसी प्रकार उन सभी अन्य देवताओं को प्रणाम करने, उनका श्रद्धा से स्पर्श करने,
उनके मन्दिरों में सम्मार्जन या सफाई के लिये उनके स्थानों को लीपने पोतने की
सेवा करने, उनके स्वरूप का स्मरण या स्तुति आदि करने या अन्य देवगण को भक्ति
के साथ मन से प्रणाम करने जैसी क्रियाएं भी उचित नहीं है॥३५॥
इति भक्तिविरुद्धाधिकारः
अथ लक्ष्म विरुद्धाधिकार
शङ्खचक्रोर्ध्वपुण्ड्राद्यैश्चिह्नैः प्रियतमैर्हरेः ।
रहितः सर्वधर्मेभ्यः प्रच्युतो नैनमाप्नुयात् ॥३६॥
जो श्रीनारायण के अतिशय प्रिय शङ्ख, चक्र तथा उर्ध्वपुण्ड्र आदि लक्ष्म कहे गये हैं
उनसे यदि कोई दीक्षित भक्त रहित है तो वह सभी धर्मों के अधिकारों से पतित
होकर अन्त में श्रीनारायण को प्राप्त करने के योग्य नहीं रह जाता है॥३६॥
चक्राम्बुजगदाशार्ङ्ग- खड्गेभ्योऽन्यैर्हरेरपि ।
न लक्षणैर्दहेच्चाङ्गानान्यदग्धोऽर्हति क्रियाम् ॥३७॥
श्रीनारायण के लक्ष्मभूत जो शंख, चक्र, गदा तथा शार्ङ्ग और खड्ग है, इन पांचो के
अतिरिक्त उनके अन्य किसी लक्ष्म से दग्ध पुरुष उनकी अर्चानादि क्रिया के योग्य
किङ्करभाव भी प्राप्त करने के योग्य नहीं है॥३७॥
धारयेन्नान्यचिह्नानि विशेषेणाङ्कनं क्वचित् ।
धारणादन्यचिह्नानां महदाप्नोति किल्विषम् ॥३८॥
अन्य देवगण के चिन्हों का तथा विशेषकर शरीर पर तप्त मुद्रा के दाह चिन्हों को
धारण नहीं करना चाहिए, क्योंकि इन अन्य देवताओं के चिन्हों को धारण करने
(या श्रीविष्णु के ही इन चिन्हों से भिन्न किसी लक्ष्मकी धारण करने) पर अतिशय
किल्विष (ऐकान्त्यभंगरुपदोष या उसके कारण आपराधिकता) को प्राप्त करता
है॥३८॥
७६ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता
अन्यचिह्नाङ्कितान् मर्त्यान् दूरतः परिवर्जयेत् ।
पयोऽस्थिचर्ममांसादि पशूनाञ्चातिगर्हितम् ॥३९॥
जो मनुष्य या प्राणी श्रीनारायण के शंखचक्रादि चिह्नों से अंकित नहीं हो तो उसका
परित्याग करना चाहिए तथा ऐसे पशुओं का दूध अस्थि, चर्म तथा मांसादि की भी
(जो अतिशय अपवित्र हैं उन्हें भी) दूर से ही परित्याग करे॥३९॥
वृक्षादीनाञ्च सर्वेषामकर्मण्यं फलादिकम् ।
अन्यचिह्नाङ्कितञ्चैव गृहक्षेत्रादिकं त्यजेत् ॥४०॥
ऐसे वृक्षादि जो अन्य चिह्नों से अंकित वृक्ष तथा लता आदि हों तो उनके फल तथा
पत्रादि को भी ग्रहण नहीं करना चाहिए तथा इसी प्रकार अन्य चिह्नांकित गृह तथा
क्षेत्रादि के रहने पर उनका भी परित्याग करना योग्य है॥४०॥
वर्तुलं तिर्यगच्छिद्रं ह्रस्वं दीर्घन्ततं तनुम् ।
वक्रं स्वरूपं बद्धाग्रं छिन्नमूलं पदच्युतम् ॥४१॥
अशुभं रूक्षमासक्तं तथानङ्गुलिकल्पितम् ।
विगन्धमपसंख्यञ्च पुण्ड्रमाहुरनर्थकम् ॥४२॥
त्रिपुण्ड्र- स्वरूपादि विचार-
इसी प्रकार जो पुण्ड्र (तिलक) केवल मालाकार हो, तिरछे आकार में हो, छिद्र
हीन हो, छोटे आकार का हो या बहुत बड़े आकार का हो, अपने विस्तार से न्यून या
अधिक परिमाण वाला हो, अपने टेढ़े आकार में हो, असुन्दर या सीधे आकार में न
हो, दोनों भौहों के मूलभाग में न मिलता हो, अपने निर्धारित स्थान से हट गया हो,
जो श्वेतवर्ण के हल्केपन से युक्त होकर शुभकारी न हो, जिसके हृदय स्थान से हट
गया हो, जो श्वेतवर्ण के हल्केपन से युक्त होकर शुभकारी न हो, जिसके हृदय स्थान
पर धारण करने का स्थान फोड़े आदि के कारण सूखा सा रहता हो, अन्य पुण्ड्र से
लगा हुआ हो, जो स्वयं की (हस्त की) अंगुलियों के द्वारा किया हुआ न हो, जो
किसी गन्ध से रहित हो, निर्धारित संख्या के अनुरूप धारण किया हुआ न हो तो
ऐसा 'पण्ड्र' धारण करने पर भी अनर्थकारी या व्यर्थ समझना
चाहिए॥४१-४२॥
न चन्दनादिभिर्गन्धैः कर्तव्यं न च भस्मना ।
न मृद्भिश्वाप्रशस्ताभिरूर्ध्वपुण्ड्रं कदाचन ॥४३॥
इसे चन्दन अगर आदि गन्धों से युक्त वस्तुओं से तथा भस्म आदि के द्वारा नहीं
किया जाता है तथा इसी प्रकार साधारण मिट्टी जो कि प्रशस्त न हो तो उससे भी
ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण न करने (क्षेत्र या पर्वतादि की प्रशस्त मृत्तिका से ही ऊर्ध्वपुण्ड्र