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सर्वकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

पृष्ठ 71, कुल 176 में से

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पृष्ठ 71

हिन्दीटीकासहित ६९
प्रमाद, आलस्य नास्तिक बुद्धि के काम क्रोध आदि के कारण भी कभी न छोड़े
(क्योंकि यह चर्या नित्यविधि है, अपरिहार्य है)॥५॥
देश-काल-गुणादीनां विना पापेन संविदः ।
आस्त्रीभ्यश्चाखिलाचारान्नातिक्रमेत् कदाचन ॥६॥
वह देश, काल तथा कुलादि के निर्धारित आचारों को बिना निषिद्ध किये हुए तथा
स्त्रियों के भी इसी प्रकार के विहित आचारों का उल्लंघन (भी) न
करे॥६॥
न वृत्तेरधिकामृद्धिं न मृत्युं न च जीवितम् ।
न चाप्रशस्तान् विषयानिच्छेदिह परत्र वा ॥७॥
इस लोक में वह अपनी वृत्ति से अधिक समृद्धिकी मृत्यु की या जीवन की अभिलाषा
न करे। इसी प्रकार वह वेदादि से निषिद्ध अप्रशस्त विषयों की इस या परलोक के
विषय में भी अभिलाषा न रखे॥७॥
न पापेन न पुण्येन नात्यायासेन कर्मणा ।
सम्पदां सङ्ग्रहं कुर्याद्विपदाञ्च प्रतिक्रियाम् ॥८॥
वह अपनी सम्पत्ति का संग्रह तथा आपत्तियों का प्रतीकार चौर्य या हिंसादि कृत्यों के
कारण पापों के द्वारा प्राप्त सम्पत्ति कारणभूत लक्ष्मीव्रतादि पुण्याचरणों के द्वारा
अथवा अविहित या प्रतिषिद्ध काम्यकर्मों को अतिशय प्रयत्नों के द्वारा सम्पादित
नहीं करे। (विहित तथा अप्रतिषिद्ध ऐसे कर्म जो अतिशय प्रयासकारी न हो-उन्हीं
से सम्पत्ति का संग्रह तथा विपत्ति का प्रतीकार करना चाहिए)॥८॥
विनैव प्रतिषिद्धेन सर्वार्थान् साधयेत् सुधीः ।
नोपेक्षेत च भूतानां व्यसनं शक्यवारणम् ॥९॥
उत्तमबुद्धि सम्पन्न पुरुष बिना किसी प्रतिषिद्ध कर्म के आचरण के अपने तथा
आचार्यादि के सभी अभीष्ट अर्थों की सिद्धि करे। तथा असद्भूत चेतन के जो स्वयं
के द्वारा निवारण योग्य व्यसन (कष्ट विपत्तियां) की उपेक्षा न करे (अर्थात् शक्य
भूतादि व्यसनों की संभव विपत्तियों को स्वयं ही दूर करने का उद्यम करे) किन्तु पूज्य
गुरु आदि सत्पुरुषों की अशक्य विपत्तियों के निवारणार्थ स्वयं के अतिशय प्रयास के
द्वारा भी निवारण किया जाना उचित है॥९॥
न विषज्ज्वरभूतादिहरणं स्तम्भनादि च ।
नाद्भुतानि तथान्यानि साधयेत् सत्वसंश्रयः ॥१०॥
वह सत्वादि का आश्रय या शक्ति को प्राप्त कर उसके द्वारा न सर्पादि के विष या
ज्वरादि व्याधि, ब्रह्मराक्षस आदि का मन्त्रों से निवारण, अग्नि तथा जल का