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सर्वकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

पृष्ठ 73, कुल 176 में से

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पृष्ठ 73

हिन्दीटीकासहित ७१
पातकानि समस्तानि गुरूणि च लघूनि च ।
विभोः कालुष्यकारीणि मनसाऽपि न चिन्तयेत् ॥१६॥
वह गुरु तथा लघु रूपवाले सभी पातकों को भी जो इष्टदेव के प्रति मन में कलुषता
उत्पन्न करते हो तो ऐसे कार्यों की मन से भी चिन्तना छोड़ देवे॥१६॥
इति विहिताचार विरुद्धवर्जन
ज्ञानन्तु स्वपरोपायफलान्वयविरोधिनाम् ।
अन्यथा विपरीतं वा ज्ञानं हानिकरं परम् ॥१७॥
वह ऐसे ज्ञान को (दृष्टि को) जिसमें प्रत्यगात्म स्व तथा प्राप्य ब्रह्म के उपाय, फल
तथा सम्बन्ध के विरोधि अन्यथाज्ञान या विपरीतज्ञान को अतिशय हानिकारक
समझे॥१७॥
छन्दांसि सरहस्यानि दिव्यशास्त्रान्विताः स्मृतीः ।
न जातु विचिकित्सीत पुराणादि च सात्विकम् ॥१८॥
वह रहस्यों से सम्पन्न वेदों तथा उपनिषद् आदि की, दिव्य शास्त्र पंचरात्र आगम
आदि तथा शास्त्रानुगत स्मृतियों की तथा सात्विक पुराणों (श्री विष्णुपुराण तथा
श्रीमद्भागवतादि) आदि की न तो निन्दा करे न व्यर्थ ही उनके वचनों पर संशय
या अप्रासंगिक विवेचन ही करे॥१८॥
शरण्यमिज्यं लक्ष्मीशं सदा सेव्यमनिच्छताम् ।
नेच्छेद् दृष्टिं कुदृष्टीनां सुधीः श्रुत्यर्थनिर्णयात् ॥१९॥
जो परमेश शरणागत की रक्षण करने में समर्थ है तथा जिससे यज्ञादि सम्पन्न होते हैं
ऐसे श्री लक्ष्मीपति की सेवा को न चाहने वाले तथा उनके ज्ञान को न रखनेवाले को
वह पुराण, इतिहास, पंचरात्र तथा श्रुत्यादि के अर्थों के विनिश्चय को ध्यान में
रखते हुए न चाहे और न ही संगति में रहे॥१९॥
ज्ञानं ज्ञेयञ्च तत्वेन कारणं चाच्युतं परम् ।
अजानद्भिर्वृथा नीतान् नाश्रयेन्न्यायविस्तरान् ॥२०॥
जिनसे श्रीहरि जाने जाते हो ऐसे ज्ञान, शास्त्ररूप, ज्ञेय तथा तात्विकभूत इस जगत्
के जो कारणभूत तथा इन सभी से जो परे भी हैं वह श्री अच्युत ही हैं, यह न जानने
वाले पण्डितों के साथ न्याय तथा उनके विस्तारों को व्यर्थ या बिना ही हेतु या अर्थ के