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नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

प्रारंभिक पृष्ठ एवं आगम भूमिका

नारदपञ्चरात्र-
भारद्वाजसंहिता
श्री
खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन बम्बई

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नारदपञ्चरात्र-भारद्वाजसंहिता
तत्वप्रकाशिकया हिन्दी व्याख्या समन्विता
सेयम्
तत्वप्रकाशिकाख्याभिनव हिन्दी व्याख्या प्रस्तावना-
पद्यानुक्रमणिका परिशिष्टादिभिः संयोज्य
श्रीबाबूलालशुक्ल, शास्त्रिणा
मध्यप्रदेशशासन (साहित्य अकादमी) सम्मानितेन
कालिदास अकादमी अनुसन्धान विभागाचार्येण एम० ए०
साहित्याचार्य्याद्यनेकविरुदालङ्कृतेन विदुषा
सम्पादिता
सा च
खेमराज श्रीकृष्णदास श्रेष्ठिना
स्वकीये वेङ्कटेश्वर मुद्रणालये मुद्रयित्वा प्रकाशिता

संस्करण :मार्च २०१६, सवंत् २०७२
मूल्य : १३० रूपये मात्र ।
मुद्रक एवं प्रकाशकः
खेमराज श्रीकृष्णदास,™
अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,
खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग,
मुंबई - ४०० ००४.
© सर्वाधिकार : प्रकाशक द्वारा सुरक्षित
Printers & Publishers :
Khemraj Shrikrishnadass,
Prop: Shri Venkateshwar Press,
Khemraj Shrikrishnadass Marg, 7th Khetwadi,
Mumbai - 400 004.
Web Site : http://www.khe-shri.com
Email : [email protected]
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Proprietors Shri Venkateshwar Press, Mumbai - 400 004,
at their Shri Venkateshwar Press, 66 Hadapsar Industrial
Estate, Pune 411 013.

NARADA PANCHARATRA–BHARADWAJA SAMHITA
WITH TATVAPRAKASHIKA HINDI COMMENTARY
Edited with Tatvaprakashika Hindi Commentary
Introduction, Index and Appendies
By
PROFESSOR BABULAL SHUKLA, SHASTRI
M.A, Sahityacharya etc.
Honoured By Madya Pradesh Government (Sahitya Parishad)
Professor of Research, KaliDasa Akedemy, UJJAIN (M.P)
Published By
Khemraj Shrikrishnadass
Prop : Shri Venkateshwar Press,
Khemraj Shrikrishnadass Marg,
(Khetwadi, Khambata Lane)
Bombay-400 004

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NĀRADA PAÑCHARĀTRA—BHARADWĀJA SAṀHITĀ
WITH TATTVAPRAKĀŚIKĀ HINDI COMMENTARY
Edited with Tattvaprakāśikā Hindi Commentary,
Introduction, Index and Appendices
By
PROFESSOR BABU LAL SHUKLA SHASTRI
Honoured By Madhya Pradesh Government (Sahitya Parishad)
Professor of Research, Kalidasa Akademi, UJJAIN (M.P.)
Published By
Khemraj Shrikrishnadass
Prop :- Shri Venkateshwar Press
Khemraj Shrikrishnadass Marg
(Khetwadi, 7th Backline Corner)
Bombay–400 004

प्रस्तावना
नारदपञ्चरात्र तथा इसी के अनुगत भारद्वाजसंहिता के महत्व तथा उसकी उपयोगिता
वैष्णव-आगम में अपना विशिष्ट स्थान रखती है। जिसमें सर्वाधिक प्रमुखता के साथ दास्यभक्ति के
द्वारा भवबन्धन से मुक्ति एवं गोलोकप्राप्ति के उपाय एवं आचार का परम्परागत प्रतिपादन है।
पञ्चरात्रागम वैष्णव-आगम का एक प्रमुख प्रभेद है। आगम को श्रुतिमूलक तथा प्रमाणभूत
मानने की आस्था का कारण इसके प्रतिपाद्य एवं उपास्य साक्षान्नारायण तथा वक्ता भी श्री
परमेश्वर का होना है। नारदपञ्चरात्र तथा इसके अनुगत ग्रन्थ संहिताओं के रूप में वैष्णव तन्त्र(या
आगम के रूप) में प्रसिद्ध तथा प्रतिष्ठित हैं। आगम का एक पर्याय तन्त्र भी है, इसी कारण
पाञ्चरात्र को भी तन्त्र शब्द से अभिहित कर इसे वैष्णव-तन्त्र के रूप में माना जाता है। यहां हम
तन्त्र तथा इसके वाङ्मय की भी इस प्रसंग में चर्चा कर रहे हैं।
तन्त्र साहित्य
संस्कृत साहित्य के व्यापक क्षेत्र रहने के कारण धर्म तथा दर्शन के क्षेत्र के साथ साथ इसे आगम
या तन्त्र का एक ऐसा क्षेत्र भी प्राप्त है जो भारतीय चिन्तन, योग तथा उपासना का एक साथ
निदर्शक है। तन्त्र के अन्तर्गत एक ऐसा विस्तीर्ण क्षेत्र आता है जिसके ग्रन्थों की अपरिमित सम्पत्ति
भारत के विभिन्न प्रदेशों में सुरक्षित, प्रचलित तथा परम्परा के कार्यरूप में सम्पन्न होकर अवस्थित
है। तान्त्रिक वाङ्मय की खोज करनेवाले मनीषिगण के सर्वेक्षण के आधार पर यह तथ्य उभर कर
आता है कि ऐसे ग्रन्थों के वर्गीकरण में दो हजार ग्रन्थों को तो इस वर्ग के अन्तर्गत रखा जा सकता
ह। इनमें से अनेक ग्रन्थों का प्रकाशन हो चुका है किन्तु इनमें अनेक ऐसे ग्रन्थ भी हैं जो आज भी
अप्रकाशित हैं तथा महत्वपूर्ण भी। ऐसे ग्रन्थों की संख्या प्रकाशित ग्रन्थों की तुलना में बहुत अधिक
है। यदि इन ग्रन्थों का सामान्यतः इनके विषयों के आधार पर विभाजन करें तो इन्हें चार मुख्य
वर्गों में रखा जा सकता है। ये हैं-(१) ज्ञान (२) योग (३) क्रिया तथा (४) चर्या। इनमें
“ज्ञान'' के अन्तर्गत इसके निदर्शक तथा इसकी प्राप्ति आदि के विवेचक ग्रन्थ आते हैं। “योग" के
अन्तर्गत वे ग्रन्थ हैं जिनमें चित्त के नियमन तथा उसकी एकाग्रता के विषय में विचार तथा उपाय
तथा उसके वशीकरण हेतु दिखलाई जानेवाली क्रियाओं आदि का विवरण रहता है। “क्रिया" के
अन्तर्गत उपास्य इष्ट देव, उनके निवासभूत मन्दिरों के निर्माण तथा इसमें चलने वाले कार्यों का
विधान सहित विवरण होता है। “चर्या" एक प्रकार से इनकी प्रासंगिकता के अनुगत धार्मिक
आचार तथा सामाजिक पर्यवेक्षा के बिन्दु पर विश्लेषण या विवेचन को लक्ष्य बनाकर रचे गये
ग्रन्थ होते हैं। कभी कभी इन वर्गों के एक या दो मुद्दों को लेकर भी ये ग्रन्थ रचित होते हैं परन्तु
ग्रन्थकार इनके लिये सर्वथा स्वतंत्र है तथा ग्रन्थ भी जिनको आधार या लक्ष्यबिन्दु बनाकर रचित
हुए हों, यह भी स्पष्टतः परिशीलन के आधार पर प्रतीत होता है। परन्तु कुछ गन्थ इस लक्ष्यबिन्दु पर
हों केन्द्रित होकर रचना में प्रवृत्त हुए हों, यह भी स्पष्ट नहीं है।
१

५ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता
इस प्रकार यदि देखें तो तन्त्र या आगम शास्त्र को ऐसे रचनाग्रन्थों में रखना पड़ता है जिनमें
प्रतिपादित सिद्धान्तों का क्रमानुगत ऐसा विवरण हो जिनसे ज्ञानादि की प्राप्ति उपयुक्त साधनादि
के द्वारा सम्भव होती है। इस शास्त्र के ग्रन्थ, तन्त्र, आगम या संहिता के रूप में निरूढ माने गये हैं
जिनमें आगम का रूप परम्परा से अधिक आबद्ध रहता है। संहिता ग्रन्थों में पारम्परिक मान्य
सिद्धांतों का संकलन रखा जाता है। जिसमें प्राचीन एवं पवित्र परम्परा से प्रचलित ग्रन्थों के
आधार पर या गुरुपदेशोंके आधार पर विवरण रहता है तथा विवेचन भी। इनके स्वरूप तथा
उनमें स्थित विभेदक तत्वों के अनेक पहलू हैं तथा इनमें अनेक तथ्य तथा तत्व की आगमशास्त्रीय
ग्रन्थों में मीमांसा मिलती है परन्तु ये ऐसी रचनाओं पर टिके हैं जहां इष्ट या उपास्य की उपासना
की चर्चा हो, जो प्रतिपाद्य विषय के रूप में रखे जाएं। स्थूलरूप में ऐसे ग्रन्थ जिनमें आराध्य श्री
सदाशिव तथा भगवती उमा (शिव तथा शक्ति) अथवा श्रीमन्महाविष्णु तथा श्रीमहालक्ष्मी विषयक
उपासना तथा चर्चा रहती है। ऐसे ग्रन्थों को संहिता के अन्तर्गत रखा गया है। अतएव पूर्वोक्त ऐसे
वर्गों के साहित्य या प्रतिपाद्य को आधार बनाकर निर्मित ग्रन्थ "तन्त्रग्रन्थ" या आगमग्रन्थ के
नाम से जाने जाते हैं। परन्तु व्यवहार में वैष्णवतत्व को आधार बनाकर रचे गये इस शास्त्र के
ग्रन्थ संहिता तथा इनसे भिन्न तत्व को बिन्दु मान कर रचे गये दूसरे सभी ग्रन्थ आगम ग्रन्थ या
तन्त्रागमग्रन्थ के रूप में जाने जाते रहे हैं। इनको सरलता से शैवागम, बौद्धागम आदि के रूप में
समझने के लिये लिखा है। सभी साधक या भक्तजन अपनी परम्परा के अनुरूप इन तन्त्रग्रन्थों को
अपने अर्घानुरूप तथा परम्परा प्राप्त रूपों को मान्यता देकर तथा अपने अपने आग्रहों को
निष्ठापूर्वक तथा बड़ी कठोरता से पालन कर अपनी साधना सम्पन्न करते हैं।
तन्त्र
तन्त्रशास्त्र या तन्त्रविद्या के प्रतिपादक के रूप में अवस्थित "तन्त्र" शब्द की व्याख्या तथा
उसके परिसर को एवं इसकी व्यापकता को देखते हुए उसे एक स्वतन्त्र दर्शन की गरिमा भी दी
गई। इसके क्षेत्रादि की व्यापकता को देखते हुए इस शब्द की "शब्दार्थ-चिन्तामणि" कोष में
विवृत्ति इस प्रकार है:-
"सर्गश्च प्रतिसर्गश्च मन्त्रलक्षणमेव च ।
देवतानाञ्च संस्थानं तीर्थानाञ्चैव वर्णनम् ॥
तथैवाश्रमधर्माश्च मन्त्रसंस्थानमेव च ।
संस्थानञ्चैव भूतानां यन्त्राणाञ्चैव निर्णयः ॥
उत्पत्तिर्विबुधानाञ्च तरूणां कल्पसंज्ञितम् ।
संस्थानं ज्योतिषाञ्चैव पुराणाख्यानमेव च ॥
कोशस्य कथनञ्चैव व्रतानां परिभाषणम् ।
शौचाशौचस्य चाख्यानं नरकाणाञ्च वर्णनम् ॥
हरचक्रस्य चाख्यानं स्त्रीपुंसोश्चैव लक्षणम् ।
राजधर्मो दानधर्मो युगधर्मस्तथैव च ॥
व्यवहारः कथ्यते च तथा चाध्यात्मवर्णनम् ।
इत्यादिलक्षणैर्युक्तं "तन्त्र" मित्यभिधीयते ॥"
कोशकार के द्वारा इस प्रकार की गयी तन्त्र पद की यह विवृत्ति एक ओर जहां व्यापक है वहीं
बड़ी सरल भी है तथा तन्त्रविद्या की सभी प्रकार की रचनाओं पर पूर्ण तथा विशेषरूप में लागू
होती है फिर वह चाहे जैसी तन्त्रपद्धति हो। इसका कारण यह विवृत्ति है जो अपने सर्वसंग्राहक
भाव के साथ व्यापक क्षेत्र की कल्पना को लेकर ही प्रवर्तित हुई।

हिन्दीटीकासहित ७
परम्परा में 'तन्त्र की उत्पत्ति श्रुति से मानी गई है। व्याकरण निर्वचन के अनुसार
“तन्यते तन्यते विस्तार्यते वा ज्ञानमनेनेति तन्त्रम्" अर्थात् जिससे ज्ञान का विस्तार हो वह 'तन्त्र'
है। यह ज्ञान का विस्तार सभी के रक्षण या भयमुक्ति के लिये भी होने से लोककल्याण का
आधायक है। तन्त्र के प्रयोजन के साथ उपर्युक्त निरुक्ति का निदर्शन "विष्णुसंहिता" की
निम्नलिखित कारिका से स्पष्ट हो जाता है।
"सर्वेषां येन तन्यन्ते त्रायन्ते च भयाज्जनाः ।
इति तन्त्रस्य तन्त्रत्वं तन्त्रज्ञाः परिचक्षते ॥"
तथा शैव-मत के अनुसार-
"तनोति विपुलान् अर्थान् तत्त्वमन्त्रसमन्वितान् ।
त्राणञ्च कुरुते यस्मात् तन्त्रमित्यभिधीयते ॥"
तत्व मन्त्र के अर्थज्ञान का प्रचुर विस्तार तथा रक्षण (करने) के कारण "तन्त्र" माना गया
था। तन्त्रशास्त्र की धारणा सामान्यतः शक्ति तथा भैरव की उपासना के पारम्परिक अर्चादि को
लेकर जनसाधारण में प्रचलित है। किन्तु इसकी व्यापकता इसके द्वारा होनेवाले कल्याण विधान,
भयमुक्ति एवं रक्षण को लेकर होनेवाली उपायभूत अर्चा के कारण है जो पुराणों में भी दूसरी तरह
कही गयी है।
'श्रीमद्भागवत' में श्री विष्णु की अर्चा को वेद, तन्त्र तथा मिश्ररूप में दिखलाया गया है-
"यजन्ति वेदतन्त्राभ्यां परं जिज्ञासवो नृप ।
तथा-नाना तन्त्रविधानेन कलावपि यथा श्रृणु ।"
(भा० ११/५-२८ तथा ३१)
इसी प्रकार महाभारत में शिवजी को पञ्चरात्र (तन्त्र) का विज्ञाता तथा बालखिल्य आदि
ऋषियों को तन्त्रशास्त्र की दीक्षा तथा उपदेश कृतयुग में शिव के द्वारा प्रदान करने का उल्लेख
मिलता है। ब्रह्मपुराण-श्री शिव की पूजा वैदिक तथा तान्त्रिक विधि से करने की विधि का संकेत
करता है। कालिकापुराण-देवी का ध्यान तथा अर्चा दुर्गातन्त्र के अनुसार करने के अतिरिक्त
तन्त्रशास्त्र का वार-बार अनुवर्तन करता है तथा मार्कण्डेयपुराण में शक्ति उपासना का तान्त्रिक
विधान विस्तार से निर्देशित किया गया है जो सर्वविदित है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि तन्त्रविद्या
का महत्व तथा उसका प्रचलन सुदूर प्राचीन काल से ही यहाँ चला आ रहा है।
आगम
तन्त्र शब्द के अतिरिक्त 'आगम' शब्द भी इस शास्त्र का पर्याय माना जाता है। आगम भी श्रुति
के समान महत्वशाली अनुष्ठान प्रकार की गरिमा रखता है। ऐसी मान्यता है कि जो महादेव (या
सदाशिव) के द्वारा माता पार्वती के लोककल्याण की जिज्ञासा में करुणा से प्रेरित आग्रह से पूछे
गये प्रश्नों के आधार पर कहे गये धर्मादि के गुप्त या रहस्यमय विवरणादि हैं वे "आगम"
कहलाते हैं। पद्मंसंहिता में आगम की जो परिभाषा दी गई है वह भी इसी बात को दर्शाती है।
यथा-
"आगतं पञ्चवक्त्रात्तु गतं च गिरिजानने ।
मतञ्च वासुदेवस्य तस्मादागम उच्यते ॥
सृष्टिश्च प्रलयश्चैव देवतानां तथार्चनम् ।
साधनञ्चैव सर्वेषां पुरश्चरणमेव च ॥
षट्कर्मसाधनञ्चैव ध्यानयोगश्चतुर्विधः ।
सप्तभिर्लक्षणैर्युक्तं तस्मादागममुच्यते ॥"
आगम के लक्षणभूत अंगों से सात लक्षण उपर्युक्त विवरण से निदर्शित हैं। ये हैं-(१) सृष्टि

८ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता
(२) प्रलय (३) देवार्चा (४) साधन (५) पुरश्चरण (६) षट्कर्म साधना तथा (७)
ध्यानयोग
इष्ट देवों की उपासना के आधार आदि अनेक स्वेष्ट देवताराधन एवं विषयादि को अपना
आधार बनाकर आगमों का सम्बन्ध धर्म तथा दार्शनिक चिन्तन आदि से सम्बद्ध होता है जिनकी
संख्या अट्ठाईस मानी गयी थी। इस संख्या में (जो शैवागम में दिखलाई गयी थी) आनेवाले
आगमों की नामावली इस प्रकार है-कामिक, योगज, चिन्त्य, कारण, अजित, दीप्त, सूक्ष्म, सहस्र,
अंशुमद्‌भेद, सुप्रभेद, विजय, निश्वास, स्वायम्भुव, अनिल, वीर, रौरव, मुकुटक, विमल, चन्द्रज्ञान,
बिम्ब, प्रोद्गीत, ललित, सिद्ध, सन्तान, सर्वोक्त, परमेश्वर, किरण तथा वातूल आगम। इन आगमों
के ग्रन्थों में अपने अपने विषय से सम्बद्ध तन्त्र के अनुगत धार्मिक विधानों तथा विधियों का
विवरण रहता है (आगमों को भी तन्त्र के क्षेत्र के अन्तर्गत समाविष्ट माना जाता है)।
संहिताएं-
तन्त्रशास्त्र के आगमवर्ग में संहिताओं का महत्वपूर्ण स्थान माना गया है क्योंकि इन संहिताओं
का क्षेत्र विस्तीर्ण होता है तथा इनके मूल ग्रन्थ में बारह हजार श्लोक (तक का ?) आयाम रहता
है। इन संहिताओं में वैष्णव-तन्त्र या आगम के वर्ग में आनेवाली संहिताओं की संख्या अधिक है।
इसके विषय में 'पौष्करसंहिता' का यह वचन द्रष्टव्य है:-
“द्विषट्सहस्रपर्यन्तं संहितारव्यं सदागमम् ।
ये चान्ये चान्तराला वै शास्त्राद्येनाधिका शतैः ।
सर्वेषां संहिता संज्ञा बोद्धव्या कमलोद्भव ॥”
आगम साहित्य के इस वर्ग में संहिताएं कितनी थीं तथा उनमें से कितनी संहिताएं उपलब्ध हैं,
इसका निश्चित विवरण नहीं दिया जा सकता है। फिर भी अभी तक इस विषय पर जो तथ्य मिल
चुके हैं उनके आधार पर प्राप्त संहिताओं के नामादि इस प्रकार हैं-
अहिर्बुध्न्य, ईश्वर, कपिञ्जल, जया, पाराशर्य, पाद्म, बृहद्ब्राह्म, भारद्वाज, सात्वत, श्रीपाश्न,
विष्णु, विष्णुतिलक, लक्ष्मी, मारीच, अत्रि, परम तथा पौष्कर संहिता। पाश्चात्य विद्वान् 'श्रोडर' ने
इस वर्ग में अगस्त्य, अनिरुद्ध, उपेन्द्र, काश्यप संहिताओं के विद्यमान रहने की सूचना देकर उनकी
भी इसी वर्ग में योजना रखने की बात कही है।
रहस्य-ग्रन्थ
तन्त्रशास्त्र के अन्तर्गत इन आगम तथा संहिता ग्रन्थों के अतिरिक्त इनसे अधिक सम्बद्ध विषयों
के विवेचक ग्रन्थों में रहस्य ग्रन्थों का भी महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है। इनमें शिवरहस्य,
ब्रह्मरहस्य तथा विष्णु रहस्य जैसे ग्रन्थ आते हैं। इन रहस्य ग्रन्थों का वर्गीकृत विभाजन
यामलों तथा डामर-तन्त्र जैसे ग्रन्थों में मिलता है। 'यामल' की परिभाषा इस प्रकार (मिलती)
है-
“सृष्टिश्च ज्योतिषारूयानं नित्यकृत्यप्रदीपनम् ।
क्रमसूत्रं वर्णभेदो जातिभेदस्तथैव च ।
युगधर्मस्तथारूयातं यामलस्याष्ट-लक्षणम् ॥ इति ।
इस यामल वर्ग में परिगणित कुछ ग्रन्थों के नाम इस प्रकार हैं-आदि, ब्रह्म, विष्णु, रुद्र, गणेश,
आदित्य जयद्रथ तथा शक्ति यामल जो संख्या में आठ हैं। इन रहस्य ग्रन्थों में इन यामलों के साथ
डामर ग्रन्थों का भी तन्त्रपरम्परा में समावेश माना गया है। इनमें योग, शिव, दुर्गा, सरस्वती,
ब्रह्मा, तथा गान्धर्व डामर ऐसे ग्रन्थ हैं जिन्हें तन्त्रग्रन्थों में डामर मानते हैं।
ये तन्त्र दो प्रमुख धाराओं में विभक्त हैं जिन्हें वैदिक तथा अवैदिक कहते हैं। इनमें वैदिक
मन्त्रादि से अनुगत धारा मुख्यरूप से दक्षिणमार्गी धारा कहलाती है तथा अवैदिक को वाममार्गी

हिन्दीटीकासहित ९
या अवैदिक धारा या शाख भी कह सकते हैं जिसका विस्तार से विवरण यहां अनभिप्रेत तथा
प्रासंगिक नहीं है।
इस प्रकार उपर्युक्त विवरण से तन्त्रसाहित्य के व्यापक क्षेत्र का परिज्ञान होता है जिसमें
अपरिमित या विशाल ग्रन्थसम्पत्ति विद्यमान है। जिनके अनेक ग्रन्थों के परिशीलन से इसी वर्ग के
अनेक लुप्त या अप्राप्य ग्रन्थों का पता लग रहा है तथा जिनके उद्धरण इन (प्राप्य) ग्रन्थों में
मिलते हैं। तन्त्रशास्त्र के परिशीलन से अनेक अज्ञात तत्वों का परिज्ञान होने से यह शास्त्र
महत्वपूर्ण स्थिति से सदैव मण्डित रहेगा यह भी स्पष्ट ही है तथा इस पर अनुसन्धान भी नितान्त
आवश्यक है।
वैष्णव-आगम तथा संहिताएं
वैष्णवआगम अपने में सर्वथा पूर्ण आगम माना गया है। इसके सामान्यतः दो भेद प्रमुख
हैं-वैखानस तथा पाञ्चरात्र। इनमें से वैखानस नाम श्रीमद्भागवत् में गोपीगीत में मिलता है, जो
इस धारा की प्राचीन स्थिति दर्शाता है। यथा-
न खलु गोपिकानन्दनो भवान्
अखिलदेहिनामन्तरात्मदृक् ।
विखनसार्थितो विश्वगुप्तये
सख उदेयिवान् सात्वतां कुले ॥
विखानस् शब्द का अर्थ ब्रह्मा है तथा इस नाम के एक मुनि भी विखानस् कहलाते थे। विखानस
से प्रवर्तित सम्प्रदाय वैखानस हुआ। छान्दोग्योपनिषद् में वैखानस् का अर्थ वानप्रस्थ किया गया है।
वैखानस गृह्यसूत्र में कहा गया है कि वैखानसों को भगवान् नारायण स्वयं गर्भ में ही मुद्रा धारण
करवा देते हैं। यथा-
नारायणः स्वयं गर्भे मुद्रां धारयते निजाम् ।
विप्रा वैखानसा ये ते स्मृताः श्रीभगवत्-प्रियाः ॥”
अतः इन वैखानसों के सम्प्रदाय को वैखानस आगम कहा गया।
पाञ्चरात्र-आगम वैष्णव-आगम में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इसमें चर्चित विवरणों में
पञ्चरात्र की व्याख्याएं भिन्न भिन्न रूप में मिलती हैं। इस शाखा के ग्रन्थ भी प्रचुर मात्रा में
उपलब्ध हैं जिनकी आगे चर्चा की जा रही है। पञ्चरात्र शब्द की व्याख्या में पाद्मसंहिता के
अनुसार पांच विरोधी दर्शन अर्थात् बौद्ध, जैन, सांख्य, न्याय तथा वेदान्तशास्त्रों को जो
अन्धकारमय या रात्रितुल्य अपने प्रकाश से कर देता है वह “पञ्चरात्र” शास्त्र या मत है।
'अहिर्बुध्न्यसंहिता' तथा 'नारदपञ्चरात्र' के अनुसार रात्रपद ज्ञान का वाचक है। ये पंचविध ज्ञान
हैं-(१) परमतत्व, (२) मुक्ति, (३) भुक्ति, (४) योग, तथा (५) विषय (संसार) जिनके
ज्ञान का आपादक यह शास्त्र है। 'ईश्वरसंहिता'-के अनुसार पांच मुनियों को सर्वप्रथम इस शास्त्र
का ज्ञान प्राप्त होने के कारण यह पाञ्चरात्र शास्त्र कहलाया। ये पांच मुनि हैं-शाण्डिल्य,
औपगायन, मौञ्जायन, कौशिक तथा भारद्वाज तथा यह भी है कि परमेश्वर ने पांच दिवारात्र की
कालावधि में इस विद्या का उपदेश दिया था इसलिये इसका नाम पंचरात्र हुआ। इस प्रकार
विविध वैष्णव आगमों में इसकी भिन्न भिन्न विवृतियाँ मिलती है। शतपथब्राह्मण में पाञ्चरात्र पद
का अर्थ पांचसत्र किया गया है। आचार्य वेदान्तदेशिका ने “न्यायपरिशुद्धि” मैं विभिन्न आगमादि
के आधार पर सारभूतरूप में पाञ्चरात्र पद का यह स्वरूप दिखलाया है:-
“प्रतिबुद्धविषयभगवदन्यभजनोपदेशप्रवृत्तं तु ।
शास्त्रं पाञ्चरात्रम् । (श० अ० २ आ०)
तदनुसार श्री विष्णु की अनन्यभाव से भक्ति का उपदेशक शास्त्र पाञ्चरात्र माना गया है। इस

१० नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता
प्रकार अनेक तरह से पाञ्चरात्र शब्द का अर्थ वर्णित रहने पर भी इस शब्द के शास्त्रादि ग्रन्थों में
मिलने वाले प्रयोगों से भी इस पर अतिरिक्त प्रकाश पड़ता है जहां (पुरुष) नारायण को पांच
अहोरात्र में सम्पन्न होने वाले यज्ञ का सम्पादक कहा गया है। आचार्य उत्पल ने पाञ्चरात्र श्रुति,
पाञ्चरात्रोपनिषद् तथा पाञ्चरात्र संहिता इन तीन नामों से पाञ्चरात्र साहित्य का निर्देश किया है।
इस प्रकार श्रुति तथा उपनिषद् के अतिरिक्त इस शास्त्र के ग्रन्थों के साथ संहिता शब्द का प्रयोग
एक परम्परा के रूप में सर्वज्ञात रहने से इसकी निरन्तर धारारूप में गति बनी रही यह माना
जाता है।
(१) प्रथमं सात्विकं ज्ञानं द्वितीयन्तु तदेव तु। नैर्गुण्यन्तु तृतीयञ्च ज्ञानञ्च सर्वतः परम् । चतुर्थञ्च
राजसिकं भक्तस्तन्नाभिवाञ्छति । पञ्चमं तामसं ज्ञानं विद्वांस्तन्नाभिवाञ्छति । इति पञ्चविधं
ज्ञानं पञ्चरात्रं विदुर्बुधा । (२) ब्रह्मवैवर्तेऽपि-वासिष्ठं नारदीयञ्च कापिलं गौतमीयकम् । परं
सनत्कुमारीयं पाञ्चरात्रन्तु पञ्चकम् ॥” इति।
पाञ्चरात्र शब्द के अर्थ निर्वचन के क्रम में पाञ्चरात्रागमगत विभिन्न संहितादि का मत देखते
हुए जब हम भारतीय दर्शनशास्त्र के सांख्य, योग तथा वेदान्तादि (अद्वैतवेदान्तादि) दार्शनिक
परम्परा को देखे तो ये सभी निश्चितरूप से पुरुषार्थ साधक होकर अमूर्ताराधनपरक शास्त्र भी हैं
जिनमें प्रवृत्ति यदि असंभव नहीं तो कठिन तो अवश्य ही है। इनकी तुलना में पाञ्चरात्र
समूर्ताराधक होकर सर्वसामान्यजन के लिये भी पुरुषार्थ साधक बन पड़ने से लाघव आपादक
शास्त्र है तथा सरल भी रहने से इसमें लोक प्रवृत्ति का लगाव या झुकना भी संभव हुआ था यही
समझना चाहिये। यही इस शास्त्र की दर्शनादि अन्य शास्त्रों में भिन्नता भी है।
अतएव पाञ्चरात्र शब्द में अवस्थित रात्र-पद को सामान्य काल वाचक मान लेना इस आगम
के अनुकूल है, अर्थात् पाञ्चरात्र-पद पञ्चकाल शब्द का समानार्थक है यही प्रतीत होता है।
पाञ्चरात्र संहिता आदि अनेक ग्रन्थों में पञ्चकालपरायण शब्द का प्रयोग पाञ्चरात्र-विशेषज्ञ के
अर्थ में प्रयुक्त किया गया मिलता है। अतः पाञ्चरात्र शब्द से ऐसा संप्रदाय एवं उसका आचार
अभिहित है जिसमें वैष्णवों के आचार निर्वाह हेतु चौबीस घण्टे या एक अहोरात्र को पांच भागों में
विभक्त किया गया हो तथा प्रत्येक काल के कर्तव्यों का निरूपण रहे। इस पञ्चकाल के अन्तर्गत
प्रातःकाल से आरम्भ होकर रात्रि के उत्तर भाग पर्यन्त रहने वाले आचार जैसे- (१) अभिगमन,
(२) उपादान, (३) इज्या, (४) स्वाध्याय तथा (५) योगकाल का कर्म इष्ट है जिसका निर्देश
पाञ्चरात्र ग्रन्थों में दिया गया है। यही अर्थ यहां व्यावहारिक भी है तथा युक्तियुक्त भी है कि पांच
कालों के लिये निर्धारित पृथक् एवं विशिष्ट आचार-परक विधेय क्रियाओं का इन विभक्त हुए
पांच कालों में ही सम्पादन हो। यही विधि यहां इष्ट भी है।
पाञ्चरात्र मत की प्राचीनता-
पाञ्चरात्र-आगम की मूल परम्परा अतिशय प्राचीन है जिसका सम्बन्ध ऋग्वेद के पुरुषसूक्त से
है तथा जो आगे चलकर सभी वैष्णव सम्प्रदायों का आधार बनी। शतपथब्राह्मण में कहा गया है
कि परमपुरुष नारायण ने जब एक होने की इच्छा की तो उन्हें पञ्चरात्र यज्ञ का साक्षात्कार हुआ।
श्री वेंकटसुधी ने अपने विशाल ग्रन्थ ‘सिद्धान्तरत्नावली’ में दिखलाया कि नारायण पद ब्रह्म का
वाचक है। महाभारत के शान्तिपर्व में एक उल्लेख है कि-नारायण तथा नर उस एक अपरिणामी
ब्रह्म की उपासना करते हैं। अन्य एक अध्याय में एक ऐसी कथा है कि नारायण का अनन्य भक्त
एक राजा सात्वत धर्मविधि के अनुसार उनकी उपासना करता था। वह अपने यहां पञ्चरात्र वेत्ता
सन्तों का सम्मान कर उन्हें आश्रय देता था। पर ये सन्त अपनी उपासना साधना के बाद भी
नारायण के दर्शन नहीं पा सके। उन्हें बाद में सन्देश मिला कि नारायण का श्वेतद्वीप वासियों को
ही दर्शन संभव है क्योंकि वे इन्द्रियहीन हैं। नारद भी श्वेतद्वीप वासियों को दूर से ही देख पाए थे

हिन्दीटीकासहित ११
पर जब वे वहां स्वयं पहुंचे तो उन्हें नारायण के दर्शन हुए। नारायण ने उन्हें उपदेश दिया कि
वासुदेव परम एवं अपरिणामी हैं जिनसे संकर्षण की उत्पत्ति हुई जो समस्त जीवों (प्राणियों) के
अधिपति हैं, उनसे प्रद्युम्न हुए जो मनस् भूत हैं, इनसे अनिरुद्ध उत्पन्न हुए जो अहंकार रूप हैं।
अनिरुद्ध से ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई और जिसने इस समग्र सृष्टि की उत्पत्ति की। अतः महाप्रलय के
पश्चात् प्रथम वासुदेव से ही कर्मपूरक संकर्षण, प्रद्युम्न एवं अनिरुद्ध की उत्पत्ति होकर सृष्टि
प्रक्रिया प्रवृत्त होती है।
पाञ्चरात्र आगम होने से इसकी पुष्टि सभी वैष्णवाचार्यों ने की सात्वत्संहिता, आदि के
आधार पर इस शास्त्र के वक्ता स्वयं श्रीनारायण हैं यह भी उपर्युक्त विवरण से प्रकट है। जैसा कि
कहा भी गया है:-
“पञ्चरात्रस्य कृत्स्नस्य वक्ता नारायणः स्वयम् ।”
अर्थात् समग्र पञ्चरात्र आगम के वक्ता या प्रथमोपदेष्टा स्वयं श्री नारायण हैं। इस
पंचरात्र-आगम के अनुगत अनेक उपनिषद् हैं। यथा-अव्यक्तोपनिषद् या अव्यक्तनृसिंहोपनिषद्,
कृष्णोपनिषद्, गोपालतापनी उपनिषद्, महानारायणोपनिषद्, नृसिंहतापनी उपनिषद्, नृसिंहो-
त्तरतापनी उपनिषद्, रामतापनी उपनिषद्, रामरहस्योपनिषद् तथा वासुदेवोपनिषद् आदि। ये
सभी उपनिषद् वैष्णव मन्त्रों तथा क्रिया एवं कर्म विधानों से युक्त विवरण परक हैं। इनमें से कुछ
उपनिषद् विभिन्न वैष्णवाचार्यों द्वारा अपने यहां आगृहीत भी हैं तथा इनमें नृसिंहतापनी तथा
गोपालतापनी अति प्रसिद्ध भी हैं।
यामुनाचार्य ने अपने 'आगमप्रामाण्य' (नामक) ग्रन्थ में पांचरात्र पद की आध्यात्मिक रहस्यपूर्ण
विशिष्टता की विवेचना की है। वे कहते हैं कि पञ्चरात्र से सम्बद्ध प्रक्रियाएं प्रत्यक्ष तथा अनुमान
से ज्ञेय नहीं है। केवल ईश्वर ही पञ्चरात्र का आप्तभूत विशिष्ट उपदेश दे सकते हैं क्योंकि उनका
ज्ञान अपरिमित होकर जगत् की समस्त वस्तुओं तक पहुंचता है। पञ्चरात्र ग्रन्थ ईश्वर द्वारा ऐसे
भक्तों के हितार्थ उपदिष्ट हुए हैं जो वेदोक्त बहुश्रमसाध्य अनुष्ठानादि क्रियाओं से त्रस्त हो चुके थे।
अतएव वेद में पाञ्चरात्र समर्थक पाठ न पाये जाने का कारण समझा जा सकता है। क्योंकि
शाण्डिल्य ने वेदों में अपने अभीष्ट हेतु को प्राप्त करने का जब साधन नहीं देखा तो वे भक्ति की
ओर झुके जिसका तात्पर्य वेद-निन्दा नहीं है। इससे यह भी समझा जा सकता है कि पाञ्चरात्र
आगम के आधार तथा साधन वेद से भिन्नता रखते हैं। इसमें वेदोक्त कर्मकाण्ड के अतिरिक्त अपनी
कर्मविधि होने से इसकी अवैदिकता भी सिद्ध नहीं हो सकती है। इसी तरह पञ्चरात्र में चार व्यूहों
को स्वीकार करने पर इसकी अनेकेश्वरवादिता मानना भी अनुचित है क्योंकि दैवी पुरुष एक
वासुदेव के ही ये अभिहित चारव्यूह अभिव्यक्ति है। इस प्रकार यही तथ्य सामने आता है कि वेद
की तरह ही पञ्चरात्र मत की भी समानरूप में प्रामाणिकता है जिसका मूल उद्गम स्थान एक ही
दैवी पुरुष नारायण हैं।
पाञ्चरात्र-साहित्य
पाञ्चरात्र मत के प्रतिपादक अनेक ग्रन्थ हैं क्योंकि दसवीं शती से लेकर १७ वीं शती तक इस
मत का सुदूर दक्षिण में अधिक प्रसार रहा। यहां वैष्णवों को शैवमत के साथ रहना भी पड़ा तथा
इसकी सिद्धान्त विषयक विचार मीमांसा भी खण्डन-मण्डन में प्रवृत्त हुई जो समय को देखते हुए
स्वाभाविक थी। ऐसे ग्रन्थों के विवरण क्रम में सर्वप्रथम “सिद्धान्तरत्नावली” ग्रन्थ को लेते हैं
जिसके रचयिता वेङ्कटसुधी हैं। यह ग्रन्थ चार अध्याय का है जिसका तीन लाख अक्षर का आयाम
है। यह ग्रन्थ बड़ा होने से अभी तक अप्रकाशित है। परन्तु महत्वपूर्ण भी हैं। वेंकटसुधी का स्थितिकाल
१४ तथा १५ वीं शती है। ये प्रसिद्ध विद्वान् वेङ्कटनाथ के शिष्य तथा श्रीशैल ताताचार्य के पुत्र
थे। इन्होंने सिद्धान्तरत्नावली के अतिरिक्त रहस्यत्रयसार तथा सिद्धान्तवैजयन्ती नामक अन्य दो
ग्रन्थों की भी रचना की थी।

१२ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता
इसी क्रम में गोपालसूरिकृत "पञ्चरात्र-रक्षासंग्रह" नामक ग्रन्थ आता है। गोपालसूरि
कृष्णदैशिक के पुत्र तथा वेदान्तरामानुज के शिष्य थे। वह ग्रन्थ पञ्चरात्र के विविध क्रियाकलापों
का विवरण देता है। प्रमाणसंग्रह भी ऐसा ही एक ग्रन्थ है जिसमें महाभारत,पुराण तथा स्मृत्यादि
को आधार बनाकर पाञ्चरात्र मत की प्रामाणिकता दिखलाई गई है।
पाञ्चरात्र-साहित्य विशाल है जिसके कुछ ही ग्रन्थ मुद्रित तथा प्रकाशित हैं। इन ग्रन्थों का
दार्शनिक दृष्टि से कम महत्व है तथा सांप्रदायिक दृष्टि से अधिक है। फिर भी इस क्रम में जो
महत्वपूर्ण ग्रन्थ है उनमें एक "सात्वतसंहिता है। इस ग्रन्थ के २४ अध्याय हैं। इसमें कहा गया है
कि स्वयं नारायण ने ऋषि आदि के हितार्थ पञ्चरात्र शास्त्र का प्रवर्तन किया। 'सात्वत-संहिता"
ऋषि द्वारा रचित मानी जाती है। "ईश्वरसंहिता" भी इस शास्त्र की महत्वपूर्ण रचना है। जिसमें
२४ अध्याय हैं जिनमें मूर्ति, ध्यान, मन्त्र, शुद्धि तथा आत्मनिग्रह आदि विषय हैं तथा जिसमें
दार्शनिक सिद्धान्त भी प्रतिपादित हैं। बाद में यह ग्रन्थ श्रीवैष्णव जन के दर्शन और धर्म का
प्रमाणसिद्ध तथा आधारभूत ग्रन्थ माना गया।
"हयशीर्षसंहिता" भी इसी क्रम में आता है। जिसमें देवमूर्ति प्रतिष्ठा तथा इनके निर्माण कार्य
तथा अन्य प्रकारादि का विवरण है। यह ग्रन्थ विस्तीर्ण है तथा चार विभागों में विभक्त है।
वैष्णवतंत्रीग्रन्थों में "जयाख्यसंहिता" चर्चा के योग्य है जिसका आगे (विषयादि) दिखलाने
का प्रक्रम रखा गया है। इस तन्त्र के कुछ अन्य ग्रन्थ भी हैं जिनमें पद्मंसहिता, पौष्करसंहिता,
सनत्कुमारसंहिता (जो एक बृहद् ग्रन्थ है), अनिरुद्धसंहिता महोपनिषद्, कश्यपसंहिता,
विहगेन्द्रसंहिता, सुदर्शनसंहिता, अगस्त्यसंहिता आदि आते हैं। ये सभी ग्रन्थ न्यूनाधिकरूप में
आनुष्ठानिक अर्चा आदि के विवरण से युक्त हैं तथा प्रायः अप्रकाशित भी। विष्णुसंहिता-भक्ति का
प्रतिपादक ऐसा ग्रन्थ है जिसे भागवतयोग कहा गया है। "मार्कण्डेयसंहिता"ग्रन्थ को प्राचीन माना
जाता है जिसमें वैष्णवतन्त्र की १०८ संहिताओं का उल्लेख तथा उसमें से ९१ संहिताओं की सूची
दी गयी है। "जयाख्यसंहिता, अहिर्बुध्न्यसंहिता, विष्णुसंहिता, विहगेन्द्रसंहिता, परमसंहिता तथा
पौष्करसंहिता नामक ग्रन्थ पाञ्चरात्र आगम के ऐसे ही ग्रन्थ है जिनमें साम्प्रदायिक अर्चा तथा
कर्मकाण्डादि विषयों के साथ साथ तात्विक दार्शनिक चिन्तन भी मिलता है। यहां हम क्रमशः इस
बिन्दु पर भी थोड़ा प्रकाश डालने का प्रयत्न करेंगे। इनमें भी जयाख्य तथा अहिर्बुध्न्यसंहिताएं
अधिक महत्वपूर्ण मानी गयी हैं।
जयाख्यसंहिता में वैदिक यज्ञादि से विरत होकर मुक्ति की प्राप्ति हेतु चिन्तना के क्रम में कहा
गया कि ऋषिगण शाण्डिल्य मुनि के समीप गये तथा उनसे परमतत्व प्राप्ति की जिज्ञासा की।
उत्तर में शाण्डिल्य ने नारद को नारायण द्वारा किये गये उपदेश की गाथा सुनाकर इसी क्रम में
साधक के अन्तःकरण में उत्कट भक्ति की स्थिति की आवश्यकता प्रतिपादित की। यह कार्य उसे
प्रथमसाधन के रूप में गुरु प्राप्ति से आरम्भ करना पड़ेगा जो शास्त्राध्यापन के द्वारा इसका ज्ञान
करवाता है। बाद में सृष्टिप्रक्रिया का विवरण देकर श्रीविष्णु के अनेक आख्यान शिष्य को कहता
है। गुरु बतलाता है कि जीव विशुद्ध चैतन्य के सत्य अनादिवासना के योग का परिणाम है। इस
वासना को दूर करने के लिये ब्रह्म में से एक विशिष्ट शक्ति उत्पन्न होती है कि जीव के अन्तर्गत
शुद्धचैतन्य अपने कर्मों के क्षीण हो जाने पर वासना रहित हो जाता है और अन्त में ब्रह्म से
एकरसता प्राप्त कर लेता है। चैतन्य का जड़ से सम्बन्ध ईश्वर की विशिष्ट शक्ति द्वारा होता है जो
आत्मा का माया के संयोग से अनेक भोगों का अनुभव करवाता है तथा बन्धन के टूटते ही
शुद्धचैतन्यरूप आत्मा का ब्रह्म से एक भाव हो जाता है।
जयाख्य-संहिता में दो प्रकार के ज्ञान का उल्लेख हैं जिन्हें स्थिति या सत्तारूप तथा क्रिया या
क्रियारूप ज्ञान कहते हैं। क्रियारूप ज्ञान के अन्तर्गत यम नियम आदि अनुशासन आते हैं तथा इन

हिन्दीटीकासहित १३
क्यारूप ज्ञान के निरन्तर अभ्यास से सत्ताख्य ज्ञान पूर्ण तथा परिपक्व होता है। इस प्रकार
योगाभ्यास के द्वारा अन्त में साधक या योगी ब्रह्मरंध्र के द्वार से निकल जाता है और अपने देह
का परित्याग कर अन्त में मूल सत्यभूत वासुदेव के साथ एकरस हो जाता है।
"विष्णुसंहिता" में ईश्वर की पांच शक्तियों का उल्लेख है जिनके द्वारा ईश्वर अपने को प्रकट
करता है। इस प्रकार प्रकृति की शक्तियां ईश्वर में निहित हैं तथा क्षेत्र या प्रकृति क्षेत्रज्ञ या
रूपभूत ईश्वर से अभिन्न हैं। इनमें प्रथमशक्ति चित्शक्ति है जो समस्त क्रियाओं की अपरिणामी
आधार है। द्वितीय भोगशक्ति है जो पुरुषरूप में है। तीसरी कारणशक्ति है जो विश्व के विविधरूपों
में प्रकट होती है। चौथी शक्ति इन्द्रियों के विषय ग्रहण करवा कर ज्ञानरूपता देती है तथा पांचवी
शक्ति ज्ञान क्रियात्मक होती है जिसे सर्वा कहा जाता है। अतः पुरुष तथा भोग्य प्रकृति ये दोनों
स्वतन्त्र तत्व न होकर ईश्वर की ही शक्ति मात्र हैं।
परमेश्वर से समरस होने के लिये प्राणायामके क्रम से आगे अनेक ध्यानादि करने भी आवश्यक
हैं। भक्ति का अर्थ यहां ईश्वराभिमुखीकरण है जिसको आगे बढ़ाने का साधन योग साधना है। यहां
भक्त को योगी माना गया है तथा योग द्वारा प्राप्त ज्ञान ही सर्वोच्च है क्योंकि योग के ज्ञान के
बिना अनुष्ठित कर्म इष्टफल नहीं दे पाते हैं। योग का अर्थ ही चित्त का विषय पर बिना क्षोभ से
समाहित होना (कहा गया) है। अतः जब चित्त कर्म करने में दृढ़ता से स्थिर हो जाए तो यही
कर्मयोग और जब यही ज्ञान पर अस्खलित रूप से सक्त या स्थिर हो तो ज्ञानयोग हो जाता है।
योगी या भक्त इन दोनों योगों को साधते हुए जब श्रीविष्णु की शरण लेता है तो उसे एकात्मता
की प्राप्ति होती है। यहां उसकी वृत्तिभूत इस चिन्तनासे चित्त में निर्मल भक्ति का जन्म होता है
जिससे आसक्ति की जड़ों का नाश होकर अन्त में समस्त इच्छाओं से तथा राग से छुटकारा पाकर
वह मुक्ति प्राप्त कर लेता है। यहां कर्मयोग तथा ज्ञानयोग में से किसे चुना जाए इस बिन्दु पर यही
दिखलाया है कि इस विषय में कोई नियम नहीं है। कोई स्वभाव से कर्मयोग के लिये तथा कोई
ज्ञान-योग के उपयुक्त होता है। परन्तु विशेष योग्यता वाले कर्म तथा ज्ञान दोनों का संयोजन करने
में समर्थ हो जाते हैं।
"अहिर्बुध्न्यसंहिता"
पाञ्चरात्र ग्रन्थों में 'अहिर्बुध्न्यसंहिता' का अपना विशेष तथा प्रामाणिक स्थान माना गया है।
इसमें अहिर्बुध्न्य के द्वारा सङ्कर्षण से सुदर्शन नामक सत्यज्ञान की प्राप्ति का विवरण है जो विश्व
की समस्त वस्तुओं का आधार है। जब ब्रह्म जो ज्ञानरूप तथा सर्वगुणसम्पन्न है अपने को नानारूप
में प्रकट करता है तो वह "सुदर्शन" कहलाता है। ईश्वर में शक्ति अभिन्न रूप से स्थित है तथा
जगत् उसकी अभिव्यक्ति है, जिसे आनन्द कहा गया है। क्योंकि वह निरपेक्ष है और जगत् रूप से
अभिव्यक्त होने पर लक्ष्मी कहलाती हैं। यह जगत्रूप से अपने को संकुचित करती है अतः
कुण्डलिनी है तथा विष्णुशक्ति भी कहलाती है। शक्ति ब्रह्म से अभिन्न दिखती है और ईश्वर इसी
की सहायता से जगत् की रचना करता है। प्रगति के क्रम से यह शक्ति सृष्टि का विकास करती है
तथा जब यही विपरिवर्तित होती है तो प्रलय होता है।
इस शक्ति की दो भिन्न युगल क्रियाओं से नाना प्रकार की शुद्ध रचनाएं होती हैं। ज्ञान और बल
क्रियाओं से संकर्षण का आध्यात्मिकरूप उत्पन्न होता है। ऐश्वर्य और वीर्य से प्रद्युम्न का तथा शक्ति
और तेज से अनिरुद्ध की उत्पत्ति होती है। ये तीनों दैवी-व्यूह कहे जाते हैं। यद्यपि प्रत्येक व्यूह में
दो दो गुण प्रधान है फिर भी वह ईश्वर के षड्गुणों से युक्त हैं क्योंकि ये श्रीविष्णु के ही रूप हैं।
व्यूह तीन प्रकार के कार्य करते हैं-(१) उत्पत्ति स्थिति और लय, (२) सांसारिक वस्तुओं का
पोषण तथा (३) मुमुक्षु भक्तों की सहायता। ये तीनों रूप वासुदेव से अभिन्न हैं और श्रीविष्णु के
शुद्ध या पूर्ण अवतार माने जाते हैं।
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