नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
पृष्ठ 63, कुल 176 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीटीकासहित ६१
धारयेदूर्ध्वपुण्ड्रांश्च विष्णोः प्रीतिकरान् सदा ।
जप-होमार्चनध्यान-दानादिषु विशेषतः ॥६७॥
वैष्णव भक्त अपने जप, होम, दान तथा अर्चन, ध्यानादि के अवसर पर भगवत्सेवा
की परमयोग्यता के आपादनार्थ विशेषरूप में श्रीविष्णु के प्रीति के सदैव आधारभूत
रहनेवाले ऊर्ध्व तिलक को अवश्य धारण करे॥६७॥
नश्यन्ति सकलाः क्लेशा नराणां पापसम्भवाः ।
अभीष्टान्यखिलानि स्युरूर्ध्वपुण्ड्रस्य धारणात् ॥६८॥
इस ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक के धारण करने से मनुष्यों के पापों से उत्पन्न होने वाले समस्त
क्लेशों का उपशम या नाश होता है तथा सभी अभीष्ट प्रयोजनों की संप्राप्ति होती
है॥६८॥
त्रयोदश द्वादश वाप्यूर्ध्वपुण्ड्राणि धारयेत् ।
एकं चत्वारि षट् चाष्टावपि वाञ्छन्ति केचन ॥६९॥
इन ऊर्ध्वपुण्ड्रों के धारण में त्रयोदश या द्वादश संख्या की स्थिति मान्य है परन्तु कुछ
विष्णुभक्त एक, चार, छः तथा आठ संख्या भी ऊर्ध्वपुण्ड्रों की बतलाते
हैं॥६९॥
ऋजूनि स्फुटपार्श्वानि सान्तरालाानि विन्यसेत् ।
ऊर्ध्वपुण्ड्राणि दण्डाब्जमत्स्यदीपनिभानि च ॥७०॥
ये ऊर्ध्वपुण्ड्र आकार में सीधे होने के साथ साथ इनकी दोनों रेखा या वस्तुएं स्पष्ट
होनी चाहिए तथा इनके बीच के भाग स्पष्ट अलग दिखना चाहिए तथा इनका
आकार लम्बा, चक्र, अब्ज (शंख) तथा दीप के आकारों से समानता लिये हुए
श्रीहरि के पादाब्ज के समान होना चाहिए॥७०॥
विष्णोरूर्ध्वतया क्षेत्रे पर्वतादौ प्रशस्तया ।
मृदोर्ध्वपुण्ड्रं देवानामन्त्यैर्वा छिद्रमेव वा ॥७१॥
श्रीविष्णु के पर्वतादि क्षेत्रों के प्रशस्त होने के कारण उसी पर्वतादि की मिट्टी से
ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण होता है। अतः उसे ही धारण करना चाहिए। देवताओं की
अर्चनाकारी अन्य कस्तूरी आदि द्रव्यों से भी ऊर्ध्वपुण्ड्र किया जाता है। मनुष्यों का
ऊर्ध्वपुण्ड्र बीच में छिद्रवाला होता है तथा यहाँ मिट्टी सफेद होनी
चाहिए॥७१॥
निघर्षणादि विधिवत्कृत्वा ध्यायन् जगद्गुरुम् ।
आसीनोऽङ्गुलिभिर्दद्यादूर्ध्वपुण्ड्रान् स्वयं क्रमात् ॥७२॥
विधिवत् संसार के प्रभु श्रीनारायण का ध्यान करते हुए (स्मरण करते हुए) श्वेत