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मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary

भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा

DevanagariRajasthanipublished365 पृष्ठ

२५० मीराँ-बृहद्-पद-सग्रह
पद मे पूर्वा पर संबध का निर्वाह नही हुआ है, इतना ही नही
तीसरी और चतुर्थ पंक्ति मे विरोधाभास भी बहुत स्पष्ट है। तृतीय
पंक्ति का प्रथमाश अर्थ-हीन है, अन्तिम पंक्ति के अन्तिम शब्द “मरवो”
का अर्थ नही लगता, अत उपयुक्त नही प्रतीत होता। उपर्युक्त
परिस्थिति मे पद को प्रामाणिक मानना सम्भव नही।
२६
जब ते मोहि नन्दनन्दन दृष्टि पड़चो माई।
तब से परलोक लोक कछु न सुहाई।
मोरन की चन्द्रकला सीस मुकुट सोहै।
केसर को तिलक भाल तीन लोक मोहै।
कुडल की अलक झलक कपोलन पर छाई।
मानो मीन सरवर तजि मकर मिलन आई।
कुटिल तिलक भाल चितवन मे टोना।
खंजन अरु मधुप मीन भूले मृग छोना।
सुन्दर अति नासिका सुग्रीव तीन रेखा।
नटवर प्रभु वेष धरे रूप अति विशेषा।
अधर बिम्ब अरुण नैन मधुर मन्द हाँसी।
दसन दमक दाडिम दुति अति चपलासी।
छुद्र घटिका किकनी अनूप धुनि सुहाई।
गिरिधर के अग अग मीरा बलि जाई। ॥४३६॥
पाठान्तर १,
जब से मोहि नन्दनन्दन दृष्टि पड़चो भाई।
जमुना जल भरन गई, मोहन पर दृष्टि गई।
गागंर भरि गृह चली, भवन न सुहाई।
गृह काज भूलि गई, सुधि बुधि बिसराई।

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २५१
सास नन्द उलझि परी, जाऊ कहाँ भाई।
मोरन की चन्द्रकला कीरीट मुकुट सोहै।
केसर के तिलक ऊपर तीन लोक मोहै।
कानन मे कुडल कपोलन पर छाई।
मानो मीन सरवर तजि मकर मिलन आई।
काछनि कटि सोहै, पग नूपुर बिराजै।
गिरधर के अग अग मीराँ बलि जाई।
पाठान्तर २,
जब ते मोहि नन्दनन्दन दृष्टि पड़्‌यो भाई।
तब ते परलोक लोक कछु न सुहाई।
मोर मुकुट चंद्रिका सु सीस मध्य सीहै।
केसरि को तिलक ऊपर तीन लोक मोहै।
साँवरो त्रिभग अंग चितवन मे टोना।
खजन जौ मधुप मीन भूले मृग छौना।
अधर बिम्ब असन नयन मधुर मद हाँसी।
दसन दमक दाडिम दुति दमके चपला सी।
छुद्र घटिका अनूप नुपुर धुनि सोहै।
गिरिधर के चरणकमल मीराँ मन मोहै।
पाठान्तर ३,
जब ते मोहि नन्दनन्दन दृष्टि पर्यो भाई।
तब तैं परलोक लोक कछु न सुहाई।
मोरन की चन्द्रकला सीस मुकुट सोहै।
केसर को तिलक भाल तीन लोक मोहै।
कुडल की अलक झलक कपोलन परछाई।
मानो मीन सरवर तजि मकर मिलन आई।
भृकुटि कुटिल चपल नयन मधुर मद हाँसी।

२५२ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
दसन दमक दाडिम द्युति दमकै चपलासी ।
कबु कठ भुज बिलासे ढीव तीन रेखा ।
नटवर को भेष भानु सकल गुण विशेषा ।
क्षुद्र घट किकनी अनूप धुन सुहाई ।
गिरिधर के अग अग मीराँ बलि जाई ।
पाठान्तर ४,
जब ते मोय नन्दनन्दन दृष्टि पड़्यो भाई ।
हरि की कहा कहौं सुन्दरता बरनी नही जाई ।
मोरन की चन्द्रकला सीस मुकुट सोहै ।
केसर को तिलक् भाल तीन लोक मोहै ।
कुडल की अलक झलक कपोलन पर छाई ।
मानो मीन सरवर तज मकर मिलन आई ।
भृकुटि कुटिल अति विसाल चितवन मे टौना ।
खजन और मधुप मीन मोहै मृग छौना ।
नासिका अति अनूप मद मद हाँसी ।
दसन बरन दामिनि द्युति चमकत चपलासी ।
कुंभुक कंठ भुज विशाल गिरिव तीन रेखा ।
नटवर को भेख मानो सकल गुण विसेषा ।
क्षुद्र घटिका अति अनूप किकनि धुन सवाई ।
(उस) गिरिधर के अंग अंग मीराँ बलि जाई ।
उपर्युक्त पाठ के विभिन्न पाठान्तरो मे कुछ शब्दो का ही हेर फेर
है। यद्यपि प्रत्येक पाठ मे कुछ शब्द निरर्थक है तथापि कही भी
भाव मे कोई विशेष अन्तर नही पडने पाया है।
२७
(१) कोई स्याम मनोहर ल्यो रे, सिर धरे मटकिया डोले ।
\ दधि को नाँव बिसर गई ग्वालन, हरि ल्यो हरि ल्यो बोले ।

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २५३
(iv) मीरॉ के प्रभु गिरिधर नागर, चेली भई बिन मोले।
(iii) कृष्ण रूप छकी है ग्वालिन, और ही और बोले। ।।४३७।।
उपर्युक्त पद मे तीसरी पंक्ति मे ही टेक आ जाता है। चतुर्थ
पंक्ति को यदि तृतीय पंक्ति के स्थान पर रख कर तृतीय पंक्ति को ही,
अन्तिम पंक्ति बना दिया जाना अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है। ऐसा
करने पर द्वितीय और अन्तिम पंक्ति की भाव-धारा मे व्यवधान भी
नही पड़ेगा और मीराँ के पदो की परम्परा का भी निर्वाह हो जावेगा।
तृतीय पंक्ति के द्वितीयांश के प्रारम्भ मे 'चेली' शब्द के बदले 'चेरी'
शब्द का होना अधिक संगत प्रतीत होता है।
२८
या ब्रज मे कछु देख्यो री टोना।
ले मकुटी सिर चली गुजरिया, आगे मिले बाबा नन्दजी के छोना।
दधि को नाम बिसर गयो प्यारी, ले लेहुरी कोई स्याम सलोना।
वृन्दावन की कुज गलिन मे, आँख लगाई गयो मन मोहना।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, सुन्दर स्याम सुघर सलोना। ।।४३८।।
उपर्युक्त तीनो पद विशेष विचारणीय है। इन तीनो की भाषा
साहित्यिक है, भाव मे भी साहित्यिक उपमाएँ व चमत्कार है। इन
पदो पर ब्रजभाषा मे प्राप्त वैष्णव साहित्य का गहरा प्रभाव बहुत
ही स्पष्ट हो उठता है।
२९
शिव मठ पर सोहैं लाल ध्वजा।
कौन कै सोहै हरी पीरी चुनरियाँ, कौन के सोहै भसम गोला।
गौरी कै सोहै हरी पीरी चुनरियाँ, शिव के सोहै भसम गोला।
कौन शिखर पर गौरी विराजै, कौन शिखर पर बम भोला।
उत्तर शिखर पर गौरी विराजे, दक्षिण शिखर पर बम भोला।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, प्रभु के चरन पर चित मोरा।।।४३९।।†

२५४ मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह
३०
शिव के मन माँही बसी कासी।
आधी काशी बामन बनिया, आधी कामी सन्यासी।
काह करण को ब्राह्मण बनिया, काह करन को सन्यासी।
नेम धरम को ब्राह्मण बनिया, तप करने को सन्यासी।
कौन शिखर पर गौरी विराजै, कौन शिखर पर अविनासी।
उत्तर शिखर पर गौरी विराजै, दक्षिण शिखर पर अविनासी।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, हरी चरणन पर मै दासी। ॥४४०॥†
उपर्युक्त पद की पाँचवी और छठी पक्तियाँ प्रथम पद की पाँचवी
और छठी पक्तियो की पुनरुक्ति मात्र हैं।
३१
वे न मिले जिनकी हम दासी।
पात पात विन्द्रावन ढूँढचो, ढूँढि फिरी सिगरी मै कासी।
कासी को लोग बडो बिसवासी, मुष मे राम बगल मे फासी।
आधी कासी मे बामण बनिया, आधी कासी बड़े सगसी।
मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, हरि चरणा की रहो मै दासी ॥४४१॥†
इस पद की तीसरी पंक्ति पद स० २८ की दूसरी पंक्ति की
पुनरुक्ति ही प्रतीत होती है। “सगसी” कोई शब्द नही है। सम्भव
है कि “सन्यासी” का ही अशुद्ध रूप चल गया हो।
इन तीनो ही पदो को भाव और भाषा के ही आधार पर प्रक्षिप्त
कहना ही उपयुक्त प्रतीत होता है। अभिव्यक्ति मे ही वह भावातिरेक
और गाम्भीर्य नही है जो मीराँ के पदो की विशेषता है। प्राप्त
अधिकांश पदो की भाषा शैली का भी इन पदो की भाषा शैली से
कोई साम्य नही बैठता। इतना ही नही, पदाभिक्तियो मे भी पूर्णतया
पूर्वापर सबंध का निर्वाह नही हुआ है।
३२
नमो नमो तुलसी महारानी, नमो नमो हरि की पटरानी।
जाके दरस परस अघ नासै, महिमा वेद पुरान बखानी।

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २५५
शाखा पत्र भेज री कोमल, श्रीपति चरण कमल लपटानी।
धनि तुलसी पूरब तप कीन्हौ, शालिग्राम भई पटरानी।
शिव सनकादिक अस ब्रह्मादिक ,खोजत फिरे महामुनी ज्ञानी।
छप्पन भोग धरे हरि आगे, बिन तुलसी प्रभु एक न मानी।
धूप दीप नैवेद्य आरती, पुष्पन की वर्षा वर्षानी।
प्रेम प्रीति करी हरि बस कीन्ही, साँवरी सूरत हृदय हुलसानी।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, भक्ति दान मोहि दियो महारानी।
॥४४२॥†
पद के द्वितीयार्द्ध मे अर्थ सगति का विशेष अभाव है। शिव
और काशी वर्णन के पदो की तरह इस पद को भी भाव और भाषा
के आधार पर प्रक्षिप्त मानना ही अधिक युक्तियुक्त प्रतीत होता है।
३३
अजी ये लला जू आज गोकुल वासी।
गोकुल वासी प्राण हमारे, हाँ ललाजी, श्याम आये, भला।
श्याम सुन्दर अविनासी।
इत गोकुल उत मथुरा नगरी, हाँ लला जी, बीच ये भला।
बीचे नदी यमुना सी।
यमुना के तीरे धेनु चरावे, हाँ लला जी, हाथ लिये नौलासी।
वृन्दावन की कुंज गलिन मे, हाँ लला जी, सग दुलहिन राधा सी।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, हाँ ललाजी, तुम ठाकुर मै दासी।
॥४४३॥†
भाव भाषा के आधार पर प्रक्षिप्त ही प्रतीत होता है। इस शैली
का यही एक पद प्राप्त है। पद मे पूर्वापर सबध और अर्थ सगत
का अभाव है। "यमुना के नीरे तीरे धेनु चरावे" जैसी अभिव्यक्ति
की पुनरुक्ति अन्य कई पदो की तरह इसमे भी हुई है।
३४
नागर नन्दा रे भुगट पर वारी जाऊँ नागर नन्दां।
वनस्पति मे तुलसी बडी है, नदीयन मे बड़ी गंगा।

२५६ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
सब देवन मे शिवजी बडे है, तारन मे बडा चन्दा।
सब भक्त मे भरथरी बडे है, शरण राखो गोविन्दा।
मीराँ के प्रभु गिरिधर ना गुण, चरण कमल चित चन्दा ॥४४४॥†
३५
कृष्ण करो यजमान, अब तुम कृष्ण करो यजमान।
जाकी कीरत वेद बखानत, साखी देत पुरान।
मोर मुकुट पीताम्बर सोहत, कुण्डल झलकत कान।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, दो दरशण का दान ॥४४५॥†
३६
माई मोरे नैन- बसे रघुबीर।
कर सर चाप, कुसुम सर लोचन, ढारे भए मन धीर।
ललित लवग लता नागर लीला, जब पेखो तब रनबीर।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, बरसत काचन नीर ॥४४६॥†
३७
दोनो ठाढे कदम की छइयाँ।
गौर वरण है ज्येष्ठ हमारा, श्याम वरण मोरे सइयाँ रे।
गौर के सिर जर कसबी नीरा, श्याम सिर मुकुट धरइया रे।
गौर के नाव बलभद्र भइया, श्याम के नाव कन्हैया रे।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, दोनो मोरे शीश नवइया रे ॥४४७॥†
३८
गोरस लीने नन्दलाल, रसमाँ गोरस लीजे।
मै हू वृषभानु नन्दिनी, तुम हो नन्दाजी के लाल।
मोर-मुकट मुक्ता फूल कुन्डल, उर बैजन्ती माल।
मै दंधि बेचन जाती वृन्दाबन, रोकत है बिना काज।
बाई मीराँ के प्रभु गिरधर ना गुण, बॉह गहे की लाज ॥४४८॥†

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २५७
खड़ी बोली
१
एरी बरजो जसोदा कान, मेरे घर नित्य आता है।
जिधर को मै जाती हूँ, वह मेरे सामा ही आता है।
मै जल जमुना भरन जात हूँ, मेरे सामा ही आता है।
ककरी दे मोरी बहिया मरोरी, बारजोरी मचाता है।
मै दहि बेचन जात वृन्दावन, चली पीछा से आता है।
दहि मटकी फोड माखन, मेरा लुट खाता है।
रास विलास करत गोकुल मे, बीसयाँ सुनाता है।
मीराँ के गिरधर मिलियाँ, चरण मे लगता है ॥४४९॥†
२
बसीवारे की चितवन सालति है।
मोर मुकुट मकराकृत कुंडल, तापर कलंगी हालति है।
मै तो छकी तुमरे छबि ऊपर, जो न छके ताहैं नालति है।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, चरण कवल चित लागति है।
॥४५०॥†
३
बता दे सखी सांवरियाँ को डेरो किती दूर।
इत मथुरा उत गोकुल नगरी बीच बहे यमुना पूर।
मथुरा जी की मस्त गुवालिनी मुख पर बरसे नूर।
मीराँ के प्रभ गिरिधर नागर, सांवरे से मिलना जरूर।
॥४५१॥†
१७

२५८
मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह

पंजाबी बोली
१
दसियो मोहन किस दानी।
आवदा जावदा नजर न आवै, अजब तमाशा इस दानी,।
दधि मेरी खायो मटुकिया फोरी, लोभी वह गोरस दानी।
मात यशोदा दधि विलोवै, गोरस ले ले नसदानी।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, लूँ लूँ रस दानी ॥४५२॥†
पदाभिव्यक्ति असगत है।
भोजपुरी बोली
१
मेरो मन बसि गयो गिरधर लाल सो।
मोर मुकुट पीताम्बरो, गल बैजन्ती माल।
गऊवन के सग डोलत हो, जसुमति को लाल।
कालिन्दी के तीर हो, कान्हा गऊबा चराय।
सीतल कदम की छहियाँ हो, मुरली बजाय।
जसुमति के दुवरवाँ हो, ग्वालिन सब जाय।
बरजहूँ अपना दुलरवाँ हो, हमसे अरुझाय।
वृन्दावन क्रीडा करै हो, गोपिन के साथ।
सुर नर मुनि सब मोहै हो, ठाकुर जदुनाथ।
इन्द्र कोप घन बरखे, मूसल जल धार।
बूडत ब्रज को राखेऊ, मोरे प्रान अधार।
मीराँ के प्रभु गिरिधर हो, सुनिये चितलाय।
तुम्हरे दरस की भूखी हो, मोहि कछु न सुहाय। ॥४५३॥
पदाभिव्यक्ति मे पूर्वापर सबंध का अभाव है।

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २५६
बिहारी बोली
१
मैं तो लागी रहो नन्दलाल सो।
हमरे बारहि दूज न पार।
लाल लाल पगिया झिन झिन बार।
साँकर खटोलना दुइ जन बीच।
मन कइले बरष, तन कइले कीच।
कहाँ गइले बछरु, कहाँ गइली गाय।
कहाँ गइले धेनु चरावन राय।
कहाँ गइले गोपी, कह गइले बाल।
कहाँ गइले मुरली बजावनहार।
मीराँ के प्रभु गिरधर लाल।
तुम्हरे दरस बिन महल बेहाल ।।४५४।।
पदाभिव्यक्ति असंगत और कही कही अर्थहीन भी है।
२
हरि सो बिनती कर जोरी।
बरबस रचल धमारी, हम पर मात पिता पारे गारी ।
निपट अल्प बुधि हीन, दीन गति थोरी, प्रेम मकान रसले बसोरी।
मीराँ के प्रभु शरण तिहारी, ओचक आय मिलतु गिरधारी ।।४५५।।†
पद की तृतीय पंक्ति अर्थहीन है।
३
जागिस गिरधारी लाल, भक्तन हितकारी।
दासी हाजर खवास, कचन ले झारी।

२६० मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
संऊच करो दंत धाबन, स्नान की तय्यारी ।
वस्त्र और पुष्प माल, तुलसी अति प्यारी ।
रत्न जटित आभूषण, मुकुट लटक वारी ।
धूप दीप नैवेद्य, आरती सवारी ।
मीराँ प्रभु विधी विधान चरणन चित हारी ॥ ४५६ ॥†
पद की प्रथम पंक्ति से बिहारी प्रभाव स्पष्ट है तथापि शेष पद
की भाषा शुद्ध ब्रजभाषा ही है। भाव और भाषा के आधार पर पद
की प्रामाणिकता संदिग्ध है। पद की अन्तिम पंक्ति का निम्नांकित
पाठान्तर प्राप्त है :— "जागिये गिरिधारी लाल भक्तन हितकारी"
इस पाठान्तर के आधार पर पद शुद्ध ब्रजभाषा का हो जाता है।
गुजराती में प्राप्त पद
१
कन्हैया बल जाऊँ, अब नहि बसूँ रे गोकुल मे।
काली ओढे कामली रे, काली हेरे कहान ।
वृन्दावन की कुंज गलिन मे, खेलत गोपी तज मान रे।
घेर आईं गोवालन, घेर आये गोवाल ।
हरिह जु नहि आये रे, मेरे मदन गोपाल ।
सोने की बँसरिया, रूपे की जजीर ।
गावे न बजावे कान जी, भट जमुना के तीर ।
जमना के नीरे तीरे बँगला बनावुँ ।
बँगला के भीते भीते बेर बेर प्रेम चणाऊँ ।
'मीराँ' के प्रभु गिरिधर प्यारे लाल ।
अब कोई मत पडो रे, मेरे ख्याल ॥४५७॥†
२
लेने तुरी लकंडी रे, लेने तुरी कामली, गायो तो चरावा नहिं जाऊँ मावडी ।
माखन तो बलभद्र ने खायो, हमने खायो खाटी हो रे छाँशडली ।

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २६१
•
वृन्दाबन ने मारग जाता; पाँवों मे खुंचे१ झीनी काँकडली ।
मीराँ बाई के प्रभु गिरधर नागुण, चरण कलम चित राखडली ॥४५८॥†
३
नन्दलाल नही रे आऊँ मुझे घरे काम छे,तुलसीनी माला मे श्याम छे ।
वन्द्राते वनने मारग जता, राधा गोरी ने कान श्याम छे ।
वन्द्राते वन में रास रचो छे, सहस्त्र गोपी मैं एक श्याम छे ।
वन्द्राते वन ने मारग जाता, दान आथानि२ धनी हाम३ छे ।
वन्द्राते वननी कुञ्ज गलिन में, घरे घरे गोपियो मे डाम छे ।
आनी तेरे गगा वाला पेरी तेरे जमुना, वह माँ गोकुल यू गाम छे ।
गामना वालो ना मारे महीना वलोना,महिणा धुनियानी घनी हाम छे ।
बाई मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, चरन मे सुख स्याम छे ॥४५९॥†
४
वारे वारे कहोने कहीए दिलडानी वातो, वारे वारे कहोने कहीए ।
आगे तमे बोलड़ा बोल्या मारा राज ।
ते बोलड़ा सभारी४ मने कहे ताँ आवे लाज ।
पाँडवोनी प्रतिज्ञा पाली, द्रौपदी नी राखी लाज ।
सुदामानी वेला वारी, उगार्यो प्रह्लाद ।
प्रजापतिए नीभामाँ पूरियाँ , माँहे देवेतानो वास ।
माजारी५ ना बच्चा रे राख्याँ, एवा श्री महाराज ।
वृन्दावन थी सालुडा लाव्या६, राधाजी ने काज ।
पहेरी ओढी महेले आव्या, रीझया श्री महाराज ।
बाई मीराँ के प्रभु गिरधर ना गुण, सोहागी बनी सजी सीज़॥४६०॥†
१ चुभती हैं, २ देनेकी, ३ इच्छा, ४ सुनकर, ५ बिल्ली, ६ लाये ।

२६२ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
५
आँखलडी बाँकी रे, अलबेला तारी, आँखडली बाँकी ।
चारवणीमाँ मारा चित्त चोरी लीधा१,नेणे मोहनी नाखी ।
नेण कमलना भलका२ मारे, अेणे मार्या ताकी ताकी रे ।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागुण,नीत चरण कमलनी दासी रे ॥४६१॥†
६
झगडो लाग्यो श्री जमना जी आरे, चल्याने माँरे शुं छे ।
वृन्दावन ना मारग जाताँ, हॉरे आगल आवी३ का घेरे ।
वृन्दाबननी कुज गलीन माँ, पालव आवी का झेरे ।
बाई मीराँ के प्रभु गिरिधर नागुण,गोपी ओने लाड लडावे ॥४६२।।†
७
कोण भरे रे पानी कोण भरे, जमनानाँ पाणी कोण भरे ।
घर म्हारूँ दूर गागर शिर भारी, अरे खोटी थाँऊ तो घेर बेठणी बढे ।
शिर पर कलश कलश पर झारी, झारी पे बेठी झारी मोज करे ।
आणी तेरे गगा पेली तीरे जमना, वचमाँ४ कानुडे रग रास रमे५ ।
साव सोनानो मारो घाट घडुलो, उठाणीए तो रत्न कनक जडे ।
मीराँ के प्रभु गिरधर ना गुण, चरण कमल चित्त ध्यान ठरे ॥४६३॥†
८
चाल सखी वृन्दाबन जइये, जीवन जोवाने६, महीनी भटुकी ओ माथे लई ।
श्याम सुन्दर ने भावे भेट जो, तेणे दुखडा सहु शमावशे७ रे ।
मीराँ बाई प्रभु गिरधर नागर, भावजी मारग माँ आवशे रे ॥४६४।।†
१ लिया, २ चमक, ३ आकर, ४ बीच मे, ५ खेले, ६ देखने के लिए,
७ शामिल हो जावेगे, नष्ट हो जावेगे ।

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २६३
९
चढी ने कदम्ब पर बैठो रे, वालो मारो चीर तो हरी ने।
माता जसोदा नो कुँवर कन्हैया, नागर नन्दजी नो बेटो रे।
मोर मुकुट सिर बिराजे, पहिर्यो छे पीलो लपेटो रे।
नहाया धोया मै केम१ करी आवी ये, नाखो२ ने नवरग रेटो रे।
बाई मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, को उतारू ने अने हेठो३ रे ॥४६५॥†
१०
नाव रीसायो रे, बेनी मारो नाव रीसाचो रे।
चोरामा जोया४ ने चौटामाँ जोयो, फलीयाँ जोयाँ पूरी पूरी ने।
हाथ माँ दीवलडो ने घेर घेर जोती, जोती अणे धणु५ रोती।
बाई मीराँ के प्रभु गिरधर ना गुण, चरण कमल चित देती ॥४६६॥†
११
कानुड न जाणी मोरी पीर।
बाई हुँ तो बाल कुँवारी रे, कानुडे न जाणी मोरी पीर।
जलरे जमनाँ अमे पाणीडाँ गया ना, वाहला कानुडे उठाडाया आच्छानीर ।।
उडाया फर ऽऽऽ रे।
वृन्दा रे वनमाँ वालछै, रास रच्यो सोलसे गोपियाँ ताण्याँ चीर।
फाट्योँ चर ऽऽऽ रे।
हुँ६ वरणागी काहना तमारो७ र नामनी रे, कानुडे मारया छे अमने तीर।
वाग्योँ अरऽऽऽरे।
बाई मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, कानुडे बाली ने फेकी ऊँचे नीर।
राख ऊँडे फर ऽऽऽ रे ॥४६७॥†
१ कैसे, २ डालो, ३ नीचा, ४ देखा, ५ बहुत, ६ में, ७ तुम्हारा।

२६४ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
१२
कांकरी मारे घूनारो कान, पाणीलों केम करी जई ये।
आं१ कांढे२ गगा वहाला, पेली३ कांठे जमना जी, वचमाँ गोकुलीऊं गाम।
सोना उठाणी मारूँ, रूपानु बेठँ वा'लाँ, हलवो चढावत कानो करे काम।
मारे मदरिए मारी सासु रहे छे वा'ला, सामा मदरीए मारो श्याम।
बाई मीराँ के प्रभु गिरधर नागुण, भावे भेटों४ भगवान ॥४६८॥†
१३
भूली मोतियन को हार, सखी तट जमुना किनारे।
एक एक मोती मारूँ लाख टकानु वाला, परोव्यूँ सुवरण के रे तार।
सासु हमारी अती बढकणी५ वा'ला, नन्दन बिखड़ानु६ झार।
सासु हमारो परम सुहागी, मारा छे मोहना बान।
बाई मीराँ के प्रभु गिरधर ना गुण, चरण कमल चित ध्यान ॥४६९॥†
१४
हॉरे कोइ माधवल्यो, माधवल्यो, बेचती व्रजनारी रे।
माधव ने मटुकी माँ घाली, गोपी लटके लटके चाली रे।
हॉरे गोपी घेलुं शुं७ बोलती जाय, मटुकी माँ न समाय रे।
नव मानो तो जुवो८ उतारी, माँही जुवे तो कुजबिहारी रे।
वृन्दाबन माँ जाता दहाडी वा'लो गो चार छे गिरधारी रे।
गोपी चाली वृन्दाबन वाटे, सौ व्रजनी गोपियो साथे रे।
मीराँ कहे प्रभु गिरधर नागर, जेना चरण कमल सुख सागर रे ॥४७०॥
उपर्युक्त पद से भाव साम्य रखता हुआ एक पद ब्रजभाषा मे भी
मिलता है।
१ इस, २ और, ३ उस, ४ मिलो, ५ क्रोधी, ६ विषका, ७ पागल की
तरह, ८ देख लो।

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २६५
१५
मेलो ने मारगड़ो मेलीनी मावा ।
वाटे ने घाटे रोको साँवलिया हारे मारा पाल बडा सावा ।
रसिया जी सु सहोर करो छो, जीवन दो जावा ।
मीराँ बाई के शुभ गिरधर ना गुण, गुण तो गोविन्द नु गावा ॥४७१॥
१६
मने मेली ना जाशो भावा रे, आ व्रज मा केम वैसीए बोलारे, भेली ना जाशो।
जे जोइए ते तमणे आणी आपु बोला, मीठाई मेवा खावा रे ।
आ बीजाँ घणा घणा तमने बाना रे करती, नहि देऊँ तमने जावा रे ।
कब की ठारी अरज करूँ हूँ, ऐटली¹ अरज मोरी मानो ब्रज बाबा रे ।
जल जमनाँ रे जल भरवाँ गयाँ ताँ वहाला, सुन्दर गयाँ ता न्हावा रे ।
मीराँ बाई के प्रभु गिरधर ना गुण वहाला, शाम लिओ चित्र थे मनावा रे ।
॥४७२॥†
१७
जल भरवा के म जाऊँ, कानो मारी केडे² पड़्यो रे ।
साव सोनानु घाट घड़ुला वाला, उठानिए रतन जड़ाऊँ रे ।
मारग माँ वा'लो पानिला मागे, सहिय³ देखताँ⁴ केम⁵ पाऊँ रे ।
नाथ जी हमारा निरलज थई बैठा, वां'ला हुँ निरलज केम थाऊँ ।
बाईं मीराँ के प्रभु गिरधर ना गुण वा'ला, हरी चरणे ध्यान धराऊँ ।
॥४७३॥†
१८
काँनुडे कामण⁶ कीधा⁷, ओधव ने वा'ल, कानुड़े कॉमण कीधॉ ।
वृन्दावन माँ धेनु चरावे वा'लो, मोरलीए मनड़ा गोपी बिर्धा ।
जल जमनाँ भरवाँ ने गयाँ ताँ, ताँ पालव पकड़ी मन लीधॉ ।
१ इतना, २ पीछे, ३ सखियो के, ४ देखते हुये, ५ कैसे, ६ सम्मोहन,
जादू, ७ किया ।

२६६ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
राधा नो कथ^१ कामण^२ गारो।
मीराँबाई के प्रभु गिरिधर ना गुण वा'ला, भव सागर थी^३ हमने तारो।
॥४७४॥†
१९
प्रेम नी प्रेम नी प्रेम नी रे, मन लागी कटारी प्रेम नी रे।
जल जमुना माँ भरवा गयाताँ, इती गागर माथे इमे नीरे।
काँचे ते ताँत न हरि जी पे बाँधी, जेम खेचे तेम नी रे।
'मीराँ' के प्रभु गिरधर नागर, साँवली सुरत सुभ एक नी रे॥४७५॥†
श्री विष्णु कुमारी 'मजु' ने उपर्युक्त पद को मीराँ कृत मानने मे
सन्देह प्रकट किया है। परन्तु "मीराबाई की शब्दावली" वेलवेडियर
प्रेस, प्रयाग मे लिखित होने के कारण इसमे उल्लिखित है।
२०
जागो रे अलबेला कान्हा, मोटा मुकुट धारी र।
सहु दुनिया तो सुती जागी, प्रभु तुम्हारी निद्रा भारी रे।
गोकुल गामिनी गायो छूटी, वनज करे व्यापारी रे।
दातन करो तमे आद देवा, मुख धुओ मुरारी रे।
भात भात ना भोजन निपाया^५, भरी सुवरण थीली रे।
लवँग सुपारी न एलची, प्रभु पाननी बीडी वाली रे।
प्रीत करी बाओ पुरुषोत्तम, अवडावे^६ ब्रजनी नारी रे।
कस नीत मे वस काढी, मासी पूतना मारी रे।
पताले जाई काली नाग नाथ्यो, अँवली करी असारी रे।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, हुँ छे दासी तमारी रे ॥४७६॥
२१
ब्रजमा कथम र' वाशे, ओधवना वा' ला, ब्रजमा कयम रें' वाशे।
आठ दाहाड़ानी^७ अवध करीने गया छे वा'ला, खर मास थया छे^८ हरि ने।
१ पति, २ जादू करनेवाला, ३ से, ४ सब, ५ बनाया, ६ अच्छा लगे,
७ दिवस, ८ हो गये।

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २६७
वृन्दाबन नी कुज गली माँ वा'ला, बेठा छे मुख मोरली धटी ने ।
मीराँ के प्रभु गिरधर ना गुण वा'ला, अमोरहया छे ऑसडा१ मरी ने ।
॥४७७॥†
२२
शामले मेल्याँ ते विसारी, ओधवने वा'ले शामले ते मेयाँ विसारी ।
प्रीत करीने पालव पकडो वा'ला, प्रेम नी कटारी मुने मारी ।
गोकुल थी मथुरामाँ गया छो वा'ला, कुब्जा से लागी छे ताली ।
मीराँ बाई के प्रभु गिरधर ना गुण, चरण कमल बलिहारी ॥४७८॥†
२३
लालने लोचनीए दिल लीधाँरे, माडी मारा, लालने लोचनीए दिल लीधाँ रे ।
जत्र मणी वा'लो मुझ पर डारे वा'लो, वेला कबेलाजाँ कामण मने कीधाँ रे ।
जल जमना ना जल भरवाँ गयाँ ताँ वा'ला, घुंघटड़ा माँ घेरी लीधाँ रे ।
चुन चुन कलिया वाली सेज बनावुँ वाहला, भ्रमर पलग सुख लीधाँ रे ।
मीराँ बाई के प्रभु गिरधर ना गुण, चरण कमल मे चित्त चोरी लीधाँ रे ।
॥४७९॥†
२४
लेशे रे महीडाँ केरा दान आ तो मोढुं, लेरो रे महीडा केराँ दाण ।
अमो अबला कइ सबल सुवालाँ वा'ला, आवड़ी शी खेचा ताण ।
नन्दना घरना गोवालियो रे, ओलख्या बिना रे अभ्रु माण ।
मधराते मथुराथी रे नांठो, ते तो अमणे न थी रे अजाण ।
वृन्दावन ने मारगे जाताँ, तुँ तो शेणे माँगे छे रे दाण ।
मीराँ के प्रभु गिरधर ना गुण, चरण कमल नु चित्तडा मे ध्यान ॥४८०॥†
२५
कोने२ कोने कहुँ दिलडानी बात, वारे वारे कोने कोने केहुँ ।
पॉडवनी प्रतिज्ञा पाली, द्रौपदी नी राखी लाज रे,
१ आशा, २ किसको ।

२७० मीरॉ-बृहद्-पद-संग्रह
३१
वृजमॉ नाव्या१ फरीने२ गोपीनो वांलो, व्रज माँ नाव्या फरीनो ।
गामने गोकुल यो मेली मथुरा पधारिया वांलो, जईवरिया कुब्जा कारीनो ।
सातरी दिवस हरि वादो करीने गयो छो, षटमास थमाछे हरी ने ।
सोलसे गोपी नो साथे रास रचे थे वांला, उमा मुख मुरली धरीने ।
बाई मीरॉ के प्रभु गिरधर ना गुन वाला, चरन कमल चित हरी ने ।
।।४८७।।†
३२
गगरिया बेडा ढलसे, उठानी मारी आप्णे, गागरिया बेडा ढलसे ।
साव सो नानी मारी, जड़ित्र उघानी वांला, सुने री तार मारो खड़से ।
कस तो दाय नो कुरु छे राज वांला, कस कहयू जू पडसे ।
जल रे जमुना ना वांला मोटो छे आरो रे, नित्य उठि नाहवॉ जाऊ परसे ।
बाई मीरॉ के प्रभु गिरिधर नागर वांला, गोपी नो स्वामी मुझने मलसे ।
।।४८८।।†
३३
वांला ना कान हेडा रे ओधव जी, एवा काल ना कठन हेडा रे ।
टीटू डीना इण्डा३ डगरिया मञ्जारी, ना राख्या दड्या रे ।
ग्रेह थी गजराज उगारियो, गोकुल मा चारी गइया रे ।
गोकुल सघन रेलतुँ राख्युँ, गोबरधन कर धरिया रे ।
मीरॉ गवे गिरधर ना गुन, मै तो तोरे लागूँ पड्या रे ।।४८९।।†
३४
उठानी मोरे आलो रे, गागरिया बेढा ढलसे ।
जल जमना भरूआ गयाँ ता, चीर खस्योने बेढु परसे ।
१ न + आव्या-नाव्या अर्थात् नही आये, २ लौटकर, ३ अण्डा ।

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २७१
•
सास हठीली मारी ननद धुतारी, नाधड़े दीयरियो मूजने बढसे ।
मीराँ गावे प्रभु गिरधर ना गुन, चरण कमल चित हर से ॥४९०॥†
३५
ज्ञान कटारी मारी, अमने प्रेम कटारी मारी।
मारे आँगणे रे रामजी तपसीओ तापे रे,
काने कुडल जटाँधारी रे, राणाजी अमने।
मकनोसो¹ हाथी रामजी, लाल अबाडी² रे,
अँकुश दई दई हारी रे।
खारा समुद्र माँ अमृत नाँ बहे लियुँ रे,
ऐवी³ छे भक्ति हमारी रे।
बाई मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर,
चरण कमल बलिहारी रे ॥४९१॥†
३६
राखो रे श्याम हरि लज्जा मोरी, राखो श्याम हरि।
भीम ही बैठे, अर्जुन ही बैठे, तेणे⁴ मारी गरज ना खरी।
दुष्ट दुर्योधन चीरने खेचावे, सभा बीच खडी रे करी।
गरूड चढीने गोविन्द जी रे आव्या, चीरना तो वाण भरी।
बाई मीराँ के प्रभु गिरिधर ना गुण, चरणे आवे तो उबरी ॥४९२॥†
३७
ओ आवे हरि हसता सजनी, ओ आवे हरि हसता।
मुझ अबला एकलडी जानी, पीताम्बर केड़े कसता।
पचरगी पाघ केसरिया रे बाधा, फुलडा मेहेले तोरा।̂
१ मदमाता, २ हौदा, ३ ऐसी, ४ उनसे ।