मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
१४० मीराँ-बृहद्-पद संग्रह
अपने द्वार मै कब की ठाढी, बाह पकरि हरि साधोरी ।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, मिलियो बिरह बाजन बाघोरी ।
॥२२४॥†
असंगत अभिव्यक्ति के आधार पर पद की प्रामाणिकता विशेष
संदिग्ध है।
उपर्युक्त दोनो पदो की भाषा प्रधानत. ब्रजभाषा है यद्यपि कुछ
ठेठ राजस्थानी शब्दों का प्रयोग भी है।
३
आण मिल्यो अनुरागी (गिरधर) आण मिल्यो अनुरागी।
सांसो१ सोच अंग नहि, अब तो तिस्ना२ दुबध्या३ त्यागा।
मोर मुकुट पीताम्बर सोहै, स्याम बरण४ बड भागी।
जनम जनम के साहिब मेरो, वाही से लौ लागी।
अपण पिया सग हिलमिल खेलूँ, अधर सुधारस पागी।
मीराँ के गिरधर नागर, अब के भई सुभागी ॥२२५॥†
पदाभिव्यक्ति से सतमत और वैष्णव मत दोनो का ही प्रभाव
इंगित होता है।
१ सशय, २ तृष्णा, ३ दुविधा, ४ वर्ण।
मिलन और बधाई १४१
ब्रज भाषा में प्राप्त पद
१
बदला रे तू जल भरि ले आयो।
छोटी छोटी बूदन बरसन लागी, कोयल सबद सुनायो।
गाजै बाजै पवन मधुरिया, अबर बदरा छायो।
सज सवारी पिय घर आये, हिल्मिल मगल गायो।
मीरॉ के प्रभु हरि अविनासी, भाग भलो जिन पायो। ॥२२६॥
२
नन्द नन्दन बिलमाई, बदरा ने घेरी माई।
इत घन लरजे, उत घन गरजे चमकत बिज्जु सवाई।
उमड़ घुमड चहुँ दिसी से आया, पवन चलै पुरवाई।
दादुर मोर पपीहा बोले, कोयल सबद सुनाई।
मीरॉ के प्रभु गिरिधर नागर, चरण कमल चितलाई। ॥२२७॥
पाठान्तर १,
चित नन्दन बिलमाई, बदराने घेरी भाई।
इत घन लरजै, उत घन गरजै, चमकत बिज्जु सवाई।
उमड़ घुमड चहुँ दिस से आया, पवन चलै पुरवाई।
विरहनि तेरी प्राण डरत है, दाधी बेल सिचाई।
मीराँ के प्रभु दर्शन दीजै, प्राण रखौ सरणाई।
तृतीय पंक्ति के उत्तरार्द्ध का निम्नांकित पाठान्तर भी प्राप्त है।
'माण रहत मोकू।'
एक ही पद के दो पाठान्तर दो विभिन्न भावो के द्योतक हैं, यह विचारणीय ह। पाठान्तर की तृतीय पंक्ति का अर्थ स्पष्ट नही होता।
१४२ मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह
३
मेहा बरसवो करे रे, आज तो रमियो मेरे घर रे ।
नान्ही नान्ही बूंद मेघ घन् बरसे, सूखे सखर भरे रे ।
बहुत दिना पै पीतम पायो, बिछुरन को मोहि डर रे ।
मीराँ कहै अति नेह जुडायो, मै लियो पुरबालो बर रे ।॥२२८॥
पद की द्वितीय पक्ति में 'मेघ' और 'घन' दोनो पर्यायवाची शब्दो
के प्रयोग से पुनरुक्ति हुई है।
४
देखी बरषा की सरसाई, मेरे पिया जी के मन आई ।
नान्ही नान्ही बूंदैन बरसन लाग्यो, दामिनी दमके झरलाई ।
स्याम घटा उमडी चहुँ दिसी सो, बोलत मोर सुहाई ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर आणन्द मगल गाई । ॥२२९॥
५
रग भरी रग भरी, रग सूं भरी री,
होली आई प्यारी रग सूं भरी री ।
उडत गुलाल लाल भये बाहर,
पिचकारिन की लगी झरी री ।
चोवा चन्दन और अरगजा,
केसर गागर भरी धरी री ।
मीराँ कहै प्रभु गिरधर नागर,
चेरी होय पायन मे परी री ॥२३०॥
६
बसो मोरे नैनन मे नन्दलाल ।
मोहनि मूरत सावरि सूरत, नैणा बने विसाल ।
अधर सुधारस मुरलि राजति, उर बैजन्ती माल ।
मिलन और बधाई १४३
छुद्र घटिका कटि तट सोभित, नूपुर शब्द रसाल ।
मीराँ प्रभु संतन सुखदाई, भक्त वच्छल गोपाल ॥२३१॥
पदाभिव्यक्ति से बालकृष्ण का वर्णन ही स्पष्ट होता है, जो मुग्धा
नारी के लिय सगत नही प्रतीत होता। देखे 'मीरा', एक अध्ययन।'
'बृहदाग रत्नाकर' मे निम्नाकित पद प्राप्त है। दोनो पदो मे
इस गहरे साम्य के कारण कहा जा सकता है कि 'दास गोपाल' का ही
पद मीराँ के नाम पर प्रचलित हो गया है :-
बसो मोरे नैनन मे नन्दलाल ।
सावरी सूरत माधुरी मूरत, राजिव नयन विसाल ।
मोर मुकुट मकराकृत कुडल, अरुण तिलक दिये भाल ।
अधरन बंसी कर मे लकुटी, कौस्तुभ मणि वनमाल ।
बाजूबन्द आभूषण मुदर, नुपूर शब्द रसाल ।
दास गोपाल मदन मोहन, पिय भक्तन के प्रतिपाल ।
(पद ४८५, पृष्ठ १२३,)
'दास गोपाल' के पद की भाषा साहित्यिक है जबकि मीराँ के
नाम पर प्रचलित पद की भाषा सरल है। सम्भव है कि गेय परम्परा
ही इसका कारण हो।
उपर्युक्त दोनो पद से कुछ साम्य रखता हुआ एक और भी निम्ना-
कित पद 'बृहद्राग रत्नाकर' मे मिलता है।
“बसो मेरे नयनन मे दोऊ चद।
गौर बरण बृषभानु नदिनी, श्याम वरण नन्दनन्द।
गोकुल रहे लुभाय रूप मे, निरखत आनन्द कद।
जयश्री भट्ट युगल रूप बडो, क्यो छूटै दृढ फंद।
(पद ४८६, पृष्ठ १२४)
इस पद की प्रथम पक्ति और उपर्युक्त अन्य दोनो पदो की प्रथम
पक्ति मे ही गहरा साम्य है। यद्यपि शेष पद सर्वथा भिन्न है।
१४४ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
७
जोसीड़ा ने लाख बधाई, अब घर आये स्याम।
आजि आनन्द उमंगि भयो है, जीव लहै सुखधाम।
पांच सखि मिली, पीव परसि के, आनन्द ठासू ठाम।
बिसर गई दु ख निरखि पिया कूँ, सुफल मनोरथ काम।
मीराँ के सुख सागर स्वामी, भवन गवन कियो राम ॥२३२॥†
पाठान्तर १,
जोसीड़ा ने लाख बधाई, आज घर आये स्याम।
आजि आनन्द उमगि भयो अति, जीव लहै सुखधाम।
पच सखी मिलि परसि पिया कूँ, आनन्द आठूँ जाम।
विसर गई दुख निरखि पिया कूं सुफल मनोरथ काम।
मीराँ के प्रभु सुख के सागर, भवन गवन कियो, राम।
यह पद ‘राम सनेही’ गुटके से उद्धृत है। बहुत सम्भव है कि ‘राम
सनेही’ सम्प्रदाय का ही पद मीराँ के नाम पर चल पड़ा हो। ‘राम
सनेही’ प्रयोगयुक्त एक पद (सं० ४) राजस्थानी मे भी मिलता है।
८
पायो जी मै तो राम रतन धन पायो।
वस्तु अमोलक दी म्हारे सतगुरु, किरपा करि अपनायो।
जनम जनम की पूँजी पाई, जग मे सभी खोवायो।
खरचै नहि कोई चोर न लेवै, दिन दिन बढ़त सवायो।
सत की नाव खेवटिया सतगुरु भवसागर तर आयो।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, हरख हरख जस पायो ॥२३३॥
सम्पूर्ण पद की भाषा विशुद्ध ब्रज भाषा है। मात्र एक शब्द ‘म्हारे’
ठेठ राजस्थानी शब्द है। पाठान्तर मे इस शब्द का प्रयोग नही
मिलता।
मिलन और बधाई १४५
पाठान्तर १,
राम रतन धन पायो, मैया मै तो राम रतन धन पायो ।
खरचै ना खूटै, वाकू चोर न लुटै, दिन दिन होत सवायो ।
नीर न डूबै वाकूँ अगिन न जालै, धरनी धर्यो न समायो ।
नाँव को नाँव भजन की बतियाँ, भवसागर से तार्यो ।
मीराँ बाई प्रभु गिरधर सरणै, चरण कमल चित लायो ।
उपर्युक्त पद के दोनो पाठो से सतंमत का प्रभाव स्पष्ट हो
जाता है।
९
माई मै तो लियो रमैयो मोल ।
कोई कहै छानी¹, कोई कहै चोरी, लियो है बजता ढोल ।
कोई कहै कारो, कोई कहै गोरो, लियो है अखी खोल ।
कोई कहै हल्का, कोई कहै मँहगा, लियो है तराजू तोल ।
तनका गहना मै सब कुछ दीन्हा, दियो है बाजूबन्द खोल ।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, पूरब जनम का कोल ॥२३४॥
उपर्युक्त पाठ की भाषा राजस्थानी की ओर झुकी हुई है। पद
की द्वितीय पंक्ति मे प्रयुक्त ‘चोरी’ शब्द के बदले ‘चोडे’ का भी प्रयोग
मिलता है जो अर्थ सगति के विचार से अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है।
‘चोडे’ का अर्थ हे सब की जानकारी मे । शेष पद से चतुर्थ पंक्ति भिन्न
पडती है, इतना ही नही यह पंक्ति ज्यो की त्यों अन्य पदो मे भी मिल जाती
है। इसी तरह, अन्तिम पक्ति का द्वितीयाश भी ज्यो का त्यो अन्य
पदो मे प्राप्त है।
१ छिपा कर ।
०
पाठान्तर १,
माई म्हे गोविन्द लीनी मोल।
कोई कहै सस्तो, कोई कहै महँगो, लीनी तराजू तोल।
कोई कहै घर मे, कोई कहै वन मे, राधा के सग किलोल।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, आवत प्रेम के मोल।
पाठान्तर २,
माई मै तो लीयो री गोविन्दो मोल।
कोई कहै सोहग्गो कोई कहै मेहगो लियोरी तराजू तोल।
कोई कहै छानै, कोई कहै छुरकै लीयोरी बाजता ढोल।
याकूँ तो सब लोग जाणत है, लियो अमोला मोल।
मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, पूरब जनम के कोल।
पाठान्तर ३,
मै तो गोविन्द लीन्हा मोल।
कोई कहै महंगा, कोई कहै सस्ता, लियो तराजू तोल।
ब्रज के लोग करै सब चर्चा, लिया बजा के ढोल।
सुर नर मुनि जाको पार न पावै, ढक लिया प्रेम पटोल।
जहर पियाला राणाजी भेज्यो, पिया मै अमृत मोल।
मीराँ प्रभु के हाथ बिकानी, सर्वस दीना घोल।
'ब्रजं कै बसिया करै सब चर्चा' और 'जहर पियाला . अमृत
मोल' जैसी अभिव्यक्तियाँ इस पाठ की विशेषताएँ हैं।
मिलन और बधाई १४७
पाठान्तर ४,
माई मै तो लियो है सावरियो मोल ।
कोई कहै सूँघो, कोई कहै मूँहगो (मै तो) लियो ह हीरा सूँ तोल ।
कोई कहै हलका, कोई कहै भारी, (मै तो) लियोरी जाखडिया१तोल
कोई कहै घटतो, कोई बढतो (मै तो) लियो है बराबर तोल ।
कोई कहै कालो, कोई कहै गोरो, (मै तो) देख्यो हे घूँघट पट खोल ।
मीराँ कहै प्रभु गिरिधर नागर, म्हारे पूरब जनमरो कोल ।
पाठान्तर ५,
माई मै तो लियो छै सांवरियो मोल ।
कोई कहै हलको, कोई कहै भारी, (मै तो) लियो छै तराजू तोल ।
कोई कहै सोगो, कोई कहै मैंगो२, (मै तो) लियो छै अमोलख मोल ।
कोइ कहै छानै, कोई कहै चोडे (मै तो) लियो छै बजता ढोल ।
कोई कहै कालो, कोई कहै गोरो (मै तो) लियो छै अखिया खोल ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, (म्हारे) पूरब जनम को कोल ।
स्पष्ट है कि उपर्युक्त सभी पाठ एक ही पद के गेय रूपान्तर मात्र
हे। यद्यपि प्रत्येक पाठ की भाषा किसी एक बोली विशेष के प्रभाव
की द्योतक है तथापि भाव सर्वथा एक ही है।
तत्कालीन समाज के साथ मीराँ के कठोर सघर्ष की भावना
सभी पाठो से व्यक्त होती है। साथ ही सभी पाठो से निन्दा-स्तुति
के प्रति उदासीन मीराँ का आत्मविश्वास और दृढ भक्ति-भाव
“मै तो लियो तराजू तोल” जैसी अभिव्यक्ति से अति स्पष्ट हो उठता है।
शुद्ध ब्रजभाषा के साथ ही साथ राजस्थानी से कुछ प्रभावित
ब्रजभाषा मे भी प्राप्त यह पद और इसके विभिन्न पाठ विशेष
विचारणीय है ।
१ तराजू, २ महँगा।
१४८ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
गुजराती में प्राप्त पद
१
मने मलिया मित्र गोपाल, नही जाऊ सासराए ।
ससार मारूँ हो सासुरो ने बैकुंठ मारो वास रे ।
लक्ष चौरासी मारो हो चुड़ोलो रे, हारे मै तो वरिया गोपाल लाल नाथ ।
सासु हमारी शुशुमना रे, सुसरी प्रेम सतोष रे ।
जेठ जुगे जुग जीव जो रे, हा रे पेलो नावलियो निरदोस ।
आपूँ तो नवरग चूंदडी रे, नही ओढूँ कामल लगार रे ।
ओढूँ प्रेम रस चूंदडी रे, हाँ रे मारा पाप निवारण करनार ।
दियरे¹ ने दीनूँ है दीकडी² रे, दोनूँ राजकुमार रे ।
एक ने सतयुग मोहि रहियो, राणा, दूजी रही ब्रह्मचार ।
एक एक नो गुरु गोविन्द जी हो रे, दूजी की है ससार रे ।
राज छाड़ौ चित्रकूट नेरे हाला, बाला गावला सोल हजार ।
अपना पिया को जाई ने कह जो, घना दहाडो³ धना वास रे ।
बेऊँ⁴ कर जोडी हो निनवरे, हा रे गुण गावे मीराबाई दास ॥२३५॥†
पदाभिव्यक्ति विशेष विचारणीय ह। यद्यपि अभिव्यक्ति अस्पष्ट
और कही कही असगत भी है, तथापि सतमत का प्रभाव विशेष रूपम
इंगित हो जाता है।
अन्तिम पक्ति मे 'मीराबाई दास' जैसा प्रयोग इस पद की विशे-
षता है। इस प्रयोग के आधार पर पद की प्रामाणिकता और भी
सदिग्ध हो उठती है।
२
अरज करे छे मीरा राकडी, ऊंभी ऊभी अरज करे छे ।
मणिधर स्वामी म्हारे मादेर पधारी, सेवा करु दिन रातडी ।
१ देवर, २ दीकडी अशुद्ध है, शुद्ध शब्द हैडीकरी, जिसका अर्थ हैं पुत्री, ३ दिन,
४ दोनो।
मिलन और बधाई १४९
फुलना रे तोडा,$^१$ फुलना रे गजरा,$^२$ फुलना रे हार फल पाखडी।
फुलना रे गादी फुलना रे तकिया, फुलना री पाथरी पछेडी।
पय पकवान मिठाई ने मेवा, सेवेया ने सुन्दर दहीडी।
लवग सुपारी ने एलची, तजवाला कथा पुरारी पान बीडी।
सेज बिछाऊ ने पासा मगाऊ, रमवा आवो तो जाय रातड़ी ॥२३६॥†
मीराँ के नाम पर प्रचलित इस पद के किसी भी अंश से इसका
मीराँ विरचित होना आभासित नही होता। ऐसो पदो को प्रामाणिक
सग्रह मे स्थान न देना ही युक्तियुक्त प्रतीत होता है। किसी किसी
सग्रह मे निम्नाकित एक पक्ति और भी मिलती है जिसके आधार पर
पद को मीराँ का कहा जा सकता है।
'मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, वाँला राम ने जोता ठरे आखडी।
इस पक्ति से व्यक्त होती भावना का शेष पदाभिव्यक्ति से कोई
सगति नही बैठती। फिर गुजराती मे प्राप्त मीराँ के पदो की अन्तिम
पक्ति मे 'मीराँ के प्रभु गिरधर नागर' के बदले "मीराँ के प्रभु गिरधर
ना गुण' का ही प्रयोग मिलता है। ऐसी स्थिति मे उपर्युक्त पक्ति के
आधार पर भी पद की प्रामाणिकता सिद्ध नही होती।
३
अबोला सीद लोछी मारा राज, प्राण जीवन प्रभु मारा म्हांरा राज।
अमे तो तमारा तमे तो अमारा, टाली दोस दो छोरे।
अमे तो तमारी सेवा करीये, सुख लई ने दुख दो छोरे।
जेने पोतानी मासी भारी, तेनी सो विश्वास रे।
अमृत पाई ने उच्छेरिया वाँला, बिखडा घोलि घोलि शीद पावो छोरे।
१ हाथो मे पहनने का जेवर विशेष, २ हार।
१५० मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
ऊडा कुवी मे उतरिया वाला, बरत बाढी शूं जाओ छो रे।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, चरण कमल चित लाओ छो रे ॥२३७॥
पदाभिव्यक्ति मे पूर्वापर सगति का अभाव है। 'मीराँ के प्रभु
गिरधर नागर' का प्रयोग भी अन्य गुजराती पदो की परम्परा के अनु-
कूल नही पडता।
आराध्य की अप्रसन्नता के प्रति उलाहने की अभिव्यक्ति अन्य
पदो मे भी मिलती है।
समर्पण द्योतक पद
राजस्थानी में प्राप्त पद
१
मीराँ रग लाग्यो हो नाम हरी, और रंग अटकि परी।
गिरधर गास्यां सती न होस्या, मन मोह्यो घण नामी।
जेठ बहू नही राणा जी, थे सेवक हू स्वामी।
चोरी करा नही जीव सतावा, कांई करेगी म्हाको कोई।
गज सूँ उतरि गधे नही चढ़स्या, या तो बात न होई।
चूडो तिलक दोवडो अस माला, सील वरत सिणगार।
और वस्तु रति नही मोहै भावै कोई निन्दो,
म्हो तो गोविन्द जी रा गास्या।
जिण मारग वे संत गया छै, जी' मारग म्हे जास्या।
राज करता नरक पडता, भोगी जो रै लीया।
जोग करता मुकति पहुता, जोगी जुग जुग जीया।
गिरधर धनी धनी² मेरे गिरधर, मात पिता सुत भाई।
थे थाके मै म्हाके राणा जी, यूँ कहै मीराँ बाई। ॥२३८॥
पद के अन्तिम चरण मे "गिरधर धनी, धनी मेरे गिरधर "
के बदले "गिरधर म्हांरा मै गिरधर की" अभिव्यक्ति भी मिलती है,
जो अधिक उपयुक्त प्रतीत होती है।
पाठान्तर १,
मीराँ रग लाग्यो नाव हरी, और रंग अटकि परी।
गिरधर भजस्या सती ये न होस्यां, मन मोह्यो गिरधारी।
१ वही, २ स्वामी।
१५२ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
जेठ बहू को नाती नही छै, राणा थे सेवक म्हे स्वामी।
चूडो देवडो तिलक ज माला, सील बरत सो भारी।
चोरी करा नही जीव सतावा, काई केरैलो म्हारो कोई।
गज चढ गीदड न चढा हो राणा, ये तो बाता सरी।
गिरधर धणी गोविन्द कडूं वो, साध सत म्हारा धरी।
थे थाके म्हे म्हाके हो राणा जी, यूँ कहै मीराँ खरी।
पाठान्तर २,
मीराँ लागो रग हरी, और रग सब अटक परी।
चूडो म्हारे तिलक अस माला, सील बरत सिण गारो।
और सिगार म्हारे दाय१ न आवै, यो गुर ग्यान हमारो।
कोई निन्दो कोई बिन्दो, म्हे तो गुण गोविन्द का गास्या।
जिण मारग म्हारा साध पधारे, उन मारग म्हे जास्या।
चोरी न करस्या, जीव न सतास्या, काई करसी म्हारो कोई।
गज से उतर कर खर नही चढ़स्या, ये तो बात न होई।
कही कही निम्नाकित कुछ पक्तियाँ उपर्युक्त पद के साथ और
भी मिलती है।
सती न होस्या गिरधर गास्यां, म्हारो मन मोहो घण नामी।
जेठ बहू को नातो राणो जी, हू सेवक थे स्वामी।
गिरधर कंत गिरधर धनी म्हारे, मात पिता वीर भाई।
थे थारे मै म्हारे राणा जी, यूँ कहै मीराँ बाई।
उपर्युक्त पद के तीनो ही पाठो मे मीराँ का सती होने से इन्कार
करना सुस्पष्ट हो जाता है। राजपूती परम्परा के आधार पर यह
आश्चर्यजनक प्रतीत होता है। पद के ही आधार पर यह भी मालूम होता
है कि मीराँ को सती होने का आदेश करने वाले स्वय राणा ही थे।
१ पसन्द।
समर्पण द्योतक पद १५३
इन राणा से मीराँ का क्या सम्बन्ध था, यह सर्वथा अनिश्चित है ।
बहुत सम्भव हो कि ये राणा जेठ ही रह हो । सम्भव है कि मीराँ
अपने ही प्रति 'जेठ बहू' (प्रथम पाठ मे) की अभिव्यक्ति करती हैं
अर्थात् सब मे बडी बहू ।
“यूँ कहै मीराँ बाईं” जैसी टेक भी विचारणीय है ।
सतमत का प्रभाव इस पद से भी स्पष्ट हो उठता है । “जिग
मारग म्है जास्या” जैसी अभिव्यक्ति ‘गुरु’ और उनके
प्रदर्शित मार्ग के प्रति मीराँ के विशेष अनुराग को ही सिद्ध करती है ।
२
चाला वाही देस, चाला वाही देस ।
कहो कुसम्भी सारी रगावा, कहो तो भगवा भेस ।
कहो तो मोतियन मांग भरावा, कहो तो छिटकावा केस ।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, सुणज्यो बिडद नरेस । ।।२३९।।
यह पद विशेष महत्वपूर्ण है । “जिन जिन भेखा म्हारो साहिब
रीझै, सोई सोई भेख धारणा”के लिये उतावली मीराँ स्वय ही यह निश्चित
नही कर पा रही हैं कि आराध्य को कौन रूप स्वीकृत होगा । “कहो तो
मोतियन भगवा भेस ।” सम्भव है कि वैष्णव और
नाथ पथ की विभिन्न परम्पराओ के कारण ही ऐसी अभिव्यक्ति हुई हो ।
१५४ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
मिश्रित भाषा में प्राप्त पद
१
म्हाने चाकर राखो जी गिरधारी लाला, चाकर राखोजी।
चाकर रहसूँ बाग लगासूँ, नित उठि दरसन पासू।
वृन्दावन की कुंज गलिन मे गोविन्द लीला गासूं।
चाकरी मे दरसनं पाऊ, सुमिरन पाऊं खरची।
भाव भगत जागिरी पाऊं, तीनो बाता सरसी।
मोर मुकुट पीताम्बर सोहै, गल वैजन्ती माला।
वृन्दावन मे धेनु चरावै, मोहन मुरली वाला।
ऊचे ऊचे महल बनाऊं, बिच बिच राखू बारी।
सावरिया के दरसन पाऊ, पहिर कुसुम्मी सारी।
जोगी आया जोग करन कूँ, तप करने सन्यासी।
हरी भजन को साधू आए, वृन्दावन के वासी।
मीराँ के प्रभु गहिर गम्भीरा, हृदे रहो जी धीरा।
आधी रात प्रभु दरसन दीन्हो, प्रेम नदी के तीरा ॥२४०॥
इस पद की टेक “मीराँ के प्रभु गहिर गम्भीरा” सर्वथा नूतन है।
२
मैं तो थारे दामन लागी जी गोपाल।
किरपा कीजो दरसन दीजो, सुध लीजो तत्काल।
गल बैजन्ती माल बिराजै, दर्शन भई है निहाल।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, भक्तन के रखपाल। ॥२४१॥
पद की तृतीय और चतुर्थ पंक्तियों के द्वितीयार्द्ध विरोधात्मक
भावना के द्योतक हैं।
समर्पण द्योतक पद १५५
ब्रजभाषा में प्राप्त पद
१
मेरे मन राम नाम बसी ।
तेरे कारण स्याम सुन्दर, सकल जोगा हांसी ।
कोई कहै मीराँ भई बावरी, कोई कहे कुलनासी ।
कोई कहै मीराँ दीप आगरी, नाम पिया सूं रासी ।
खाड धार भक्ति की न्यांरी, काटी है जम फासी ॥२४२॥
पदाभिव्यक्ति विशेष विचारणीय है। कठिन सघर्ष के साथ
ही साथ मीराँ को गहरा समर्थन भी प्राप्त हुआ। 'कुलनासी' और
'दीप आगरी' जैसे विशेषण साथ ही साथ मिले। वृन्दावन पहुँचने पर
भी ये दोनों विरोधी धाराये अक्षुण्ण रही, यही ऐसे पदो से सुस्पष्ट
होता है।
२
हमारे मन राधा स्याम बसी।
कोई कहै मीराँ भई बावरी, कोई कहै कुलनासी।
खोल के घूँघट प्यार के गाती, हरि ढिग नाचत गासी।
वृन्दावन की कुजगलिन मे, भाल तिलक उर लसी।
विष को प्याला राणा जी ने भेज्या, पीवत मीराँ हासी।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, भक्ति मार्ग मे फंसी ॥२४३॥
दोनो पदों की अन्तर्भावना एक ही है,तथापि प्रथम पद का भाव-
गाम्भीर्य दूसरे पद मे नही। दूसरे पद की भाषा पर खडी बोली का भी
प्रभाव भी विचारणीय है। पूर्वापर संगति, विचार-गाम्भीर्य और भाषा
की शुद्धता के दृष्टिकोण से भी प्रथम पद प्रामाणिकता के अधिक
निकट पडता सिद्ध होता है।
१५६ मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह
३
माई मै तो गोविन्द सो अटकी ।
चकित भए है दृग दोऊ मेरे, लखि शोभा नटकी ।
शोभा अग अग प्रति भूषण, बनमाला तट की ।
मोर मुकुट कटि किकिन राजै, दुति दामिनी पटकी ।
रमित भई हां सावरे के सग लोग कहै भटकी ।
छुटि लाज कुल कानि लोग डर, रह्यो न घर हटकी ।
मीराँ प्रभु के संग फिरैगी, कुजा कुजा लटकी ।
बिनु गोपाल लाल के सजवनी, को जानै घटकी ।।२४४।।†
उपर्युक्त पद को प्रामाणिक मान लेने पर अभिव्यक्ति विचारणीय
हो जाती है। पद मे परम्परानुगत टेक नही है। केवल 'मीराँ' नाम
मात्र का प्रयोग किसी अन्य पद मे नही मिलता। टेक के बाद और
एक पक्ति अन्य कुछ पदो मे भी मिलती है, परन्तु ऐसे पदो की
प्रामाणिकता संदिग्ध ही है।
४
पग घूँघरू बाध मीराँ नाची रे ।
मै तो मेरे नारायण की, आपही हो गई दासी रे ।
लोग कहै मीराँ भई बावरी, न्यात कहै कुलनासी रे ।
विष का प्याला राणा जी भेज्या पीवत मीराँ दासी रे ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, सहज मिले अविनासी रे ।।२४५।।
उपर्युक्त पद की भाषा पर खडी बोली की छाप विशेष
स्पष्ट दिखती है। “सहज मिले अविनासी' जैसी अभिव्यक्ति
विचारणीय है। सम्भवत इसको संतमत का ही प्रभाव कहा जा सकता
है। संतमत से प्रभावित पदो “साँवरे रग राची” जैसे पद से इस पद का
बहुत साम्य है। विभिन्न पदो के सम्मिश्रण से एक स्वतन्त्र पद का बन
जाना असम्भव नही प्रतीत होता तथापि यह कहना असम्भव हे कि
कौन पद किस रूप मे प्रामाणिक है।
समर्पण द्योतक पद १५७
५
चितनन्दन आगे नाचूँगी।
नाच नाच पिय रसिक रिझाऊ, प्रेमी जन को जाचूँगी।
प्रेम प्रीति का बाध घूघरा, ‘सुरत की कछनी काढूँगी।
लोक लाज कुल की मरजादा,या मै एक न राखूँगी।
पिया के पलगा जा पोढूँगी, मीराँ हरि रग राचूँगी ॥२४६॥
पूर्व पद का पाठान्तर से प्रतीत होते इस पद पर सतमत का प्रभाव
विशेष रूपेण स्पष्ट हो जाता है। भाषा पर खड़ी बोली का प्रभाव भी
विचारणीय है। प्रथम पंक्ति मे प्रयुक्त ‘चितनन्दन’ के बदले ‘रघुनन्दन’
और द्वितीय पंक्ति मे ‘पिय’ के बदले ‘यदुनाथ जी’ शब्द का भी व्यवहार
मिलता है।
पाठान्तर १,
घूघरू बाध मीराँ नाची रे, पग घूघरूं।
लोग कहै मीराँ हो गई बावरी, सास कहै कुलनासी रे।
जहर का प्याला राणा जी भेज्या पीवत मीराँ हासी रे।
मै तो अपने नारायण की आपही हो गई दासी रे।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, बेग मिलो अविनासी रे।
६
मै गिरिधर के घर जाऊ।
गिरिधर म्हारो साचो प्रीतम, देखत रूप लुभाऊं।
रैन पडे तब हि उठि धाऊ, भोर भये उठि आऊ।
रैन दिना वाके सग खेलूँ, ज्यो त्यो ताहि लुभाऊ।
जो पहिरावै सोई पहिरू, जो दे सोई खाऊं।
मेरी उन की प्रीत पुरानी, उन बिन पल न रहाऊ।
जहा बैठावै तित ही बैठूं, बेचै तो बिक जाऊ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, बार बार बलि जाऊ ॥२४७॥
१५८ मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह
उपर्युक्त पद मे 'म्हारो' (मेरा) और 'धारो', (आपका या
तुम्हारा) ये दो शब्द शुद्ध राजस्थानी के है, जब कि शेष पद की भाषा
ब्रजभाषा है। परशुराम जी द्वारा सग्रहीत 'पदावली' मे 'उन की',
'पुरानी' आदि के बदले 'उण की' 'पुराणी' आदि का प्रयोग मिलता है,
जिससे पद की भाषा पर राजस्थानी प्रभाव और भी स्पष्ट हो
उठता है।
७
हरि मेरे जीवन प्राण अधार।
और आसिरो नाहि न तुम बिनु, तीनूं लोक मझार।
आप बिना मोहि न सुहावं, निरख्यौ सब ससार।
मीराँ कहे मै दासी बावरी, दीज्यो मति बिसार ॥२४८॥
८
निपट बक्ट छबि अटकै मेरे नैना, निपट बक्ट छबि अटके।
देखत रूप मदन मोहन को, पियत मयूखन अटके।
वारिज भवा अलका टेढी, मनो अति सुगध रस वटके।
टेढी कटि टेढी कर मुरली, टेढी पाग लर लटके।
मीराँ प्रभु के रुप लुभानी, गिरिधर नागर नटके ॥२४९॥
९
सखी मेरो कानूड़ो कलेजे कोर।
मोर मुकुट पीताम्बर सोहै, कुडल की झकझोर।
बिन्द्रावन की कुज गलिन मे, नाचत नन्दकिशोर।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, चरण कवल चितचोर। ॥२५०॥
समर्पण द्योतक पद १५९
विभिन्न बोलियों में प्राप्त पद
१
हमरे रौरे लागिल कैसे छूटे।
जैसे हीरा हनत निहाई, तैसे हमरे रौरे बनि जाई।
जैसे सोना मिलत सोहागा, तैसे हम रौरे दिल लागा।
जैसे कमल नाल बिच पानी, तैसे हम् रौरे मन मानी।
जैसे चन्दा मिलत चकोरा, तैसे हम रौरे दिल जोरा।
जैसे मीराँ पति गिरधारी, तैसे मिलि रहू कुज बिहारी ॥२५१॥
पद की भाषा स्पष्ट रूपेण अवधी है।
२
जो तुम तोडो पिया, मै नही तोडे्।
तोरी प्रीत तोडी, कृष्ण कौन सग जोडे्।
तुम भये तरुवर, मै भई पखिया।
तुम भये सरवर, मै भई मछिया।
तुम भये गिरिवर, मै भई चारा।
तुम भये चदा, मै भई चकोरा।
तुम भये मोती प्रभुजी, हम भये धागा।
तुम भये सोना, हम भये सुहागा।
बाई मीराँ के प्रभु, ब्रज के बासी।
तुम मेरे ठाकुर, मै तेरी दासी ॥२५२॥†
भाव, भाषा दोनो के ही आधार पर पद की प्रामाणिकता संदिग्ध
है। भाषा खडी बोली है और भाव मे वह गाम्भीर्य नही है जो
तथाकथित मीराँ के पदो मे प्राय प्राप्त है। उपर्युक्त पद की
तुलना कीर्तन-मंडली के चालू पदो से की जा सकती है।