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मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

अथ तृतीयोऽध्यायः
( भूपरीक्षा )
✺ अनिन्द्या भूः ✺
देवानां तु द्विजातीनां चतुरस्रायताः श्रुताः ।
वस्त्वाकृतिरनिन्द्या सावाक्प्रत्यग्दिक्समुन्नता ॥१॥
देवों एवं ब्राह्मणों के लिये आयताकार भूमि भी प्रशस्त होती है। भूमि की आकृति
अनिन्दनीय होनी चाहिये एवं उसे दक्षिण तथा पश्चिम में ऊँची होनी चाहिये ।। १ ।।
हयेभवेणुवीणाब्धिदुन्दुभिध्वनिसंयुता ।
पुन्नागजातिपुष्पाब्जधान्यपाटलगन्धकैः ॥२॥
भूमि अश्व, गज, वेणु, वीणा, समुद्र ( जल ) एवं दुन्दुभि वाद्य की ध्वनि से युक्त
होनी चाहिये तथा पुन्नाग ( नागकेसर ), जाति-पुष्प ( चमेली ), कमल, धान्य एवं
पाटल ( गुलाब ) के सुगन्ध से सुवासित होनी चाहिये ।। २ ।।
पशुगन्धसमा श्रेष्ठा सर्वबीजप्ररोहिणी ।
एकवर्णा घना स्निग्धा सुखसंस्पर्शनान्विता ॥३॥
पशु के गन्ध के समान एवं जिस पर सभी प्रकार के बीज उगें, ऐसी भूमि श्रेष्ठ
होती है। भूमि एक रंग की, सघन, कोमल एवं छूने में सुख प्रदान करने वाली होनी
चाहिये ।। ३ ।।
बिल्वो निम्बश्च निर्गुण्डी पिण्डितः सप्तपर्णकः ।
सहकारश्च षड्वृक्षैरारूढा या समस्थला ॥४॥
जिस समतल भूमि पर बेल, नीम, निर्गुण्डी, पिण्डित, सप्तपर्णक ( सप्तच्छद )
एवं सहकार ( आम )—ये छः वृक्ष हों एवं भूमि समतल हो ।।४।।
श्वेता रक्ता च पीता च कृष्णा कापोतसन्निभा ।
तिक्ता च कटुका चैव कषायलवणाम्लका ॥५॥
रंग में श्वेत, लाल, पीली तथा कपोत के समान काली, स्वाद में तिक्त, कड़वी,
कसैली, नमकीन, खट्टी—।।५।।

तृतीयोऽध्यायः 卐 भूपरीक्षा ९
मधुरा षड्रसोपेता सर्वसम्पत्करी धरा।
प्रदक्षिणोदकवती वर्णगन्धरसैः शुभा ॥६॥
एवं मीठी—इन छः स्वादों वाली भूमि सभी प्रकार की सम्पत्तियाँ प्रदान करती
है। रंग, गन्ध एवं स्वाद से युक्त जिस भूमि पर जलधारा का प्रवाह दाहिनी ओर हो,
वह भूमि शुभ होती है।।६।।
पुरुषाञ्जलिमात्रे तु दृष्टतोया मनोरमा।
निष्कपाला निरुपला कृमिवल्मीकवर्जिता ॥७॥
(उत्खनन करने पर) पुरुषाञ्जलि-प्रमाण (पुरुष-प्रमाण) पर जल दिखाई पड़े,
मन को अच्छी लगने वाली, कपालास्थि-विहीन, कंकड़-पत्थररहित, कीटों एवं
दीमक की बाँबी आदि से विहीन—।।७।।
अस्थिवर्ज्या नसुषिरा तनुवालुकसंयुता।
अङ्गारैर्वृक्षमूलैश्च शूलैश्चापि पृथग्विधैः ॥८॥
हड्डी आदि से रहित, छिद्ररहित, महीन बालू वाली, जले कोयले, वृक्ष के मूल
एवं किसी प्रकार के शूल से रहित—।।८।।
पङ्कसङ्करकूपैश्च दारुभिलोष्टकैरपि।
शर्कराभिरयुक्ता या भस्माद्यैस्तु तुषैरपि ॥९॥
कीचड़, धूल, कूप, काष्ठ, मिट्टी के ढेले एवं बालू, राख आदि से तथा भूसे
से रहित—।।९।।
निन्द्या भूः
सा शुभा सर्ववर्णानां सर्वसम्पत्करी धरा।
दध्याज्यमधुगन्धा च तैलासृग्गन्धिका च या ॥१०॥
भूमि सभी वर्ण वालों के लिये शुभ एवं समृद्धि प्रदान करने वाली होती है। जो
भूमि दधि, घृत, मधु (मद्य), तेल तथा रक्त गन्ध वाली होती है (वह भी प्रशस्त
होती है) ।।१०।।
शवमीनपक्षिगन्धा सा धरा निन्दिता वरैः।
सभाचैत्यसमीपस्था नृपमन्दिरसंश्रिता ॥११॥
शव, मछली एवं पक्षी के गन्ध वाली भूमि अग्राह्य होती है। इसी प्रकार सभागार,
चैत्य (ग्राम का प्रधान वृक्ष) एवं राजभवन के निकट की भूमि गृहनिर्माण की दृष्टि
से त्याज्य होती है।।११।।

१० मयमतम्
देवालयसमीपस्था कण्टकिद्रुमसंयुता ।
वृत्तत्रिकोणविषमा वज्राभा कच्छपोन्नता ॥१२॥
देवालय के निकट, काँटेदार वृक्ष से युक्त, वृत्ताकार, त्रिकोण, विषम ( जिसकी
आकृति असमान हो ), वज्र के सदृश ( कई कोण वाली ) तथा कछुये के समान आकृति
( बीच में ऊँची ) वाली भूमि गृहनिर्माण के लिये प्रशस्त नहीं होती है।।१२।।
चण्डालावासगच्छाया चर्मकारालयाश्रिता ।
एकद्वित्रिचतुर्मार्गा तरिताव्यक्तमार्गका ॥१३॥
जिस भूमि पर चाण्डाल ( शव आदि से आजीविका चलाने वाले ) के गृह की
छाया पड़े, चर्म द्वारा आजीविका चलाने वाले के गृह के पास, एक, दो, तीन एवं
चार मार्गों पर ( एक-दो राजमार्गों, तिराहे एवं चौराहे ) पर स्थित तथा जहाँ ठीक मार्ग
न हों, ऐसे स्थान पर गृह-निर्माण प्रशस्त नहीं होता।।१३।।
निम्नं यत् पणवाकारं पक्षीव मुरजोपमम् ।
मत्स्याभं तु चतुष्कोणे महावृक्षसमायुतम् ॥१४॥
मध्य में दबी, पणव ( ढोल के सदृश एक वाद्य ), पक्षी, मुरज ( एक वाद्य )
तथा मछली के समान आकार की भूमि तथा जहाँ चारो कोनों पर महावृक्ष लगे हों,
ऐसी भूमि गृहनिर्माण के लिये उचित नहीं होती है।।१४।।
चैत्यवृक्षयुतं सालचतुष्कोणसमाश्रितम् ।
भुजङ्गनिलयं चैव सङ्गाराममेव च ॥१५॥
ग्रामादि के प्रधान वृक्ष, जिसके चारो कोनों पर साल वृक्ष हों, सर्प के आवास
के निकट एवं मिश्रित जाति के वृक्षों के बाग के पास की भूमि गृह-निर्माण के लिये
अप्रशस्त होती है।।१५।।
श्मशानं चाश्रमस्थानं कपिसूकरसन्निभम् ।
वनोरगनिभं टङ्कं शूर्पोलूखलसन्निभम् ॥१६॥
श्मशान के क्षेत्र, आश्रमस्थान, बन्दर एवं सुअर के आकार की, वनसर्प के
सदृश, कुठार की आकृति वाली, शूर्प एवं ऊखल की आकृति वाली भूमि त्याज्य
होती है।।१६।।
शङ्खाभं शङ्कुनाभं च बिडालकृकलासवत् ।
ऊषरं कृमिभिर्जुष्टं गृहगौलिसमाकृति ॥१७॥
शङ्ख, शङ्कु, विडाल, गिरगिट तथा छिपकली की आकृति वाली, ऊसर एवं कीड़े

तृतीयोऽध्यायः 卐 भूपरीक्षा ११
लगी भूमि गृह-निर्माण के लिये त्याज्य होती है।।१७।।
अन्यदेवंविधं वस्तु निन्दितं वस्तुपाठकैः ।
बहुप्रवेशमार्गं च मार्गविद्धं च गर्हितम् ।।१८।।
इसी प्रकार अन्य आकृति वाली भूमि, बहुत से प्रवेशमार्ग वाली एवं मार्ग से विद्ध
भूमि विद्वानों द्वारा निन्दित है।।१८।।
यत् कर्म विहितं मोहादेवम्भूते तु वस्तुनि ।
तन्महादोषहेतुः स्यात्सर्वथा तद्विवर्जयेत् ।।१९।।
यदि अज्ञानतावश ऐसी भूमि पर गृह बन भी जाय तो इससे महान् दोष उत्पन्न
होता है। अतः सभी प्रकार से ऐसी भूमि का परित्याग करना चाहिये।।१९।।
✺ सर्वोत्कृष्टा भूः ✺
श्वेतासृक्पीतकृष्णा हयगजनिनदा षड्रसा चैकवर्णा
गोधान्याम्भोजगन्धोपलतुषरहितावाक्प्रतीच्युन्नता या।
पूर्वोदग्वारिसारा वरसुरभिसमा शूलहीनास्थिवर्ज्या
सा भूमिः सर्वयोग्या कणदररहिता सम्मताद्यैर्मुनीन्द्रैः ।।२०।।
इति मयमते वास्तुशास्त्रे भूपरीक्षा नाम तृतीयोऽध्यायः
श्वेत, रक्त, पीत एवं कृष्ण वर्ण वाली, अश्व एवं गज के निनाद से युक्त, मधुर
आदि छः स्वादों वाली, एक वर्ण की, गो-धान्य एवं कमल के गन्ध से युक्त, पत्थर
एवं भूसे से रहित, दक्षिण एवं पश्चिम में ऊँची, पूर्व एवं उत्तर में ढलान वाली, श्रेष्ठ
सुरभि के सदृश, शूल एवं अस्थि से रहित, कणद ( धूल, बालू आदि ) रहित भूमि
सभी के लिये अनुकूल होती है, ऐसा सभी श्रेष्ठ मुनियों का विचार है।।२०।।
व्याख्यात्मक टिप्पणी
भूमि के प्रकार ( श्लोक १-२० )
(क) शिल्परत्न पूर्वभाग, तृतीय अध्याय में भूमिपरिग्रह के प्रसङ्ग में चार प्रकार
की भूमि—पूर्णा, सुपा ( सुपद्मा ), भद्रा एवं धूम्रा का उल्लेख प्राप्त होता है—
पूर्णा सुपद्मा च तथैव भद्रा धूम्रा च भूमिर्विहिता चतुर्धा।
वक्ष्ये च तासामपि लक्षणानि संक्षेपतो भूमिपरिग्रहार्थम्।। ( ३.४ )

१२ मयमतम्
पूर्णा भूमि—
प्लक्षन्यग्रोधनिम्बार्जुनवकुलकुलस्थापनसाशोकनिष्पा-
वाङ्कोलैर्मालतीचम्पकतिलखदिरैः कोद्रवैर्मुद्रिता वा।
भूमिर्या भूधराधीश्वरशिखरगता पार्श्वसंस्थाथवाद्रेः
पूर्णा सा पुष्टिदात्री सुरनिलयसमा कल्पने स्वल्पतोया।। ( ३.५ )
सुपद्मा भूमि—
कर्पूरागरुनालिकेरतिलकैटैर्भैः कदम्बार्जुनै-
र्मलियैः क्रमुकेक्षुकेतककुरशैः कुन्दारविन्दोत्पलैः।
पूर्वोदक्प्लवशालिनी बहुजला वा या दरीदृश्यते
सेयं शान्तिकरी सुरेशयजने सूक्ता सुपद्मा मही।। ( ३-६ )
भद्रा भूमि—
तीरं वारिनिधेः श्रिताथ सरितस्तीर्थस्य वा दक्षिणे
व्रीहिक्षेत्रविचित्रिताप्यदिशि यज्ञार्हाङ्घ्रिपैरङ्किता।
कीर्णा पुष्पफलप्रवालतरुभिर्योद्यानहृद्यापि वा
भद्रा सा परिगीयते वसुमती प्रीतिप्रदा यज्वनाम्।। ( ३-७ )
धूम्रा भूमि—
अर्कैर्वेणुविभीतकैः स्नुहियुतैः श्लेष्मातकैः पीलुभिः
सङ्कीर्णा बहुशर्करा च कठिना गर्भान्विता सोषरा।
गृध्रश्येनवराहवायसशवाशाखामृगैः सन्ततं
जुष्टा यष्टुरनिष्टदा निगदिता धूम्रा मही सूरिभिः।। ( ३-८ )
इसके अतिरिक्त भूमि के चार भेद और प्राप्त होते हैं—वारुणी, ऐन्द्री, आग्नेयी
एवं वायवी—
वारुण्यैन्द्री तथाग्नेयी वायवी भूश्चतुर्विधा। ( ३-९ )
वारुणी भूमि—
या कोमलतरुव्राता स्वतः पुष्पितकानना।
जलाशयाैश्च सर्वत्र युक्ता भूर्वारुणी स्मृता।। ( ३-१० )
माहेन्द्री भूमि—
या क्षीरवृक्षबहुला सौम्ये यस्या जलं महत्।
व्रीहिक्षेत्रं च याम्यायां सा माहेन्द्री क्षितिः स्मृता।। ( ३-११ )
आग्नेयी भूमि—

तृतीयोऽध्यायः 卐 भूपरीक्षा १३
गृध्रकङ्कवराहर्क्षश्येनगोमायुवायसैः ।
संयुक्ता दूरपानीया भूराग्नेयी विनिन्दिता।। ( ३-१२ )
वायवी भूमि—
अक्षस्नुहिकलिङ्गार्कपीलुश्लेष्मातकण्टकैः ।
युक्ता या निर्जला भूमिरशुभा वायवी स्मृता।। ( ३-१३ )
वर्ण, गन्ध स्वाद के अनुसार भूमि—
विप्रादिक्रमतः कुशेषुवनदूर्वाकाशयुक्ता भुव-
स्तुल्यातानवितानसिन्धुररसाब्ध्यंशाधिदीर्घा अपि।
श्वेतापाटलपीतमेचकरुचश्चाज्यासृगन्नासवा-
मोदाः स्वादुकषायतिक्तकटुकास्वादान्विताश्च स्मृताः।। ( ३-१४ )
(ख) विष्णुसंहिता ( द्वादश पटल ) में भी सुपद्मा, भद्रिका, पूर्णा एवं धूम्रा भूमि
की चर्चा प्राप्त होती है तथा गुण के अनुसार तीन भेद—उत्तमा, अधमा एवं मध्यमा
प्राप्त होते हैं—
त्रिधोत्तमाधमा मध्या चतुर्धा जातिभेदतः ।
सुपद्मा भद्रिका पूर्णा धूम्रेत्यपि तथैव भूः ।।२।।
वर्ण, गन्ध एवं स्वादादि के अनुसार भूमि—
विप्रादीनां स्मृता भूमिः सर्वेषा वोत्तमस्य या।
सिता रक्ता च पीता च कृष्णा विप्रादिभूस्तथा ।।७।।
मधुरा च कषाया च तिक्ता च कटुका क्रमात् ।
घृतासृक्चरुविड्गन्धा बहुवर्णा तु वर्जिता ।।८।।
ग्रन्थकार ने ( श्लोक-१०-१४ ) निन्दित भूमि के दोषों की भी चर्चा की है, जो
मयमत के वर्णन की पुष्टि करता है।
(ग) विश्वकर्मवास्तुशास्त्र ( पञ्चम अध्याय ) में गुणभेद के अनुसार उत्तमा, मध्यमा
एवं अधमा ( श्लोक-६ ) तीन प्रकार की भूमि का उल्लेख प्राप्त होता है। रस, वर्ण,
स्पर्श, गन्ध एवं अन्य लक्षणों के अनुसार भूमि के भेद इस प्रकार प्राप्त होते हैं—
ब्राह्मणी भूमि—
माधुर्यमृत्तिका भूमिर्देवविप्रहितप्रदा।
तथोदुम्बरवृक्षाढ्या श्वेतवर्णा च भूरपि ।।८।।
( उदीच्याञ्च जलोपेता भूरियं चोत्तमा मता । )
क्षत्रिया भूमि—
कषायमृत्तिका भूमी रक्तवर्णा च भूरपि ।।९।।

१४ मयमतम्
पूर्वभागजलोपेता तथाश्वत्थद्रुमान्विता।
विपुला लोहयुग्भूमिः क्षत्रियाणां हितप्रदा।।१०।।
वैश्यवर्णा भूमि—
नातिकृष्णा न रक्ता च प्लक्षद्रुमसमन्विता।
दक्षिणायां जलोपेता नातिनिम्नोन्नतस्थला।।११।।
भूरियं वैश्यजातीनां बलसम्पत्करा मता।
शूद्रा भूमि—
कटुमृत्स्ना कृष्णवर्णा वटवृक्षसमन्विता।।१२।।
वारुण्यामुदकोपेता शूद्राणां क्षेमकारिणी।
इनके अतिरिक्त भूमि के उत्तम गुणों का वर्णन ( १४-२१ ) प्राप्त होता है एवं
इसी के साथ भूमि के दोष ( २३-२७ ) भी वर्णित हैं, जिनमें भूकम्प से प्रभावित एवं
अग्नि से दग्ध भूमि का परित्याग विशेष रूप से उल्लेखनीय है—
कम्पेन भेदिता भूमिरग्निदग्धा च सर्वतः। ( ५-२७ )
अप्रशस्त भूमि की चर्चा समराङ्गणसूत्रधार ( ८.५२-६२ ) में विस्तार से प्राप्त
होती है। अन्य वास्तुग्रन्थों में भी इस विषय पर प्रकाश डाला गया है।

अथ चतुर्थोऽध्यायः
( भूपरिग्रहः )
✺ भूग्रहणे कर्त्तव्यानि ✺
आकारवर्णशब्दादिगुणोपेतं भुवः स्थलम् ।
संगृह्य स्थपतिः प्राज्ञो दत्त्वा देवबलिं पुनः ॥१॥
निर्माण-हेतु भूमि का ग्रहण—आकार, रंग एवं शब्द आदि गुणों से युक्त भूमि
का चयन करने के पश्चात् बुद्धिमान स्थपति को देवबलि ( वास्तुदेवों की पूजा ) करनी
चाहिये। इसके पश्चात्—॥१॥
स्वस्तिवाचकघोषेण जयशब्दादिमङ्गलैः ।
अपक्रामन्तु भूतानि देवताश्च सराक्षसाः॥२॥
वह स्वस्तिवाचक घोष एवं जय आदि मंगलकारी शब्दों के साथ इस प्रकार
कहे—राक्षसों के साथ देवता एवं भूत ( मानवेतर प्राणी ) दूर हो जायँ।।२।।
वासान्तरं व्रजन्त्वस्मात् कुर्या भूमिपरिग्रहम्।
इति मन्त्रं समुच्चार्य विहिते भूपरिग्रहे ॥३॥
वे इस भूमि से अन्यत्र स्थान पर जाकर अपना निवास बनायें। हम इस भूमि को
( .गृहनिर्माण-हेतु ) ग्रहण कर रहे हैं। इस मन्त्र का उच्चारण करते हुये ग्रहण की गई
भूमि पर ( अधोलिखित कार्य करना चाहिये )॥३॥
कृष्ट्वा गोमयमिश्राणि सर्वबीजानि वापयेत् ।
दृष्ट्वा तानि विरूढानि फलपक्वगतानि च ॥४॥
उस भूमि में हल चलवा कर गोबरमिश्रित सभी प्रकार के बीजों को उसमें बो देना
चाहिये। उन बीजों को उगा हुआ एवं उनमें पके हुये फल देख कर—।।४।।
सवृषाश्च सवत्साश्च ततो गास्तत्र वासयेत्।
यतो गोभिः परिक्रान्तमुपघ्राणैश्च पूजितम् ॥५॥
वृषभ एवं बछड़ों के साथ गायों को वहाँ बसा देना चाहिये; क्योंकि गायों के वहाँ
चलने एवं सूंघने से वह भूमि पवित्र हो जाती है।।५।।

१६ मयमतम्
संहृष्टवृषनादैश्च निर्धौतकलुषीकृतम्।
वत्सवक्त्रच्युतैः फेनैः संस्कृतं प्रस्रवैरपि ॥६॥
प्रसन्न वृषों के नाद से एवं बछड़ों के मुख से गिरे हुये फेन से भूमि परिष्कृत हो
जाती है एवं उसके सभी दोष धुल जाते हैं।।६।।
स्नातं गोमूत्रसेकैश्च गोपुरीषैः सलेपनम्।
च्युतरोमन्थनोद्गारैर्गोष्पदैः कृतकौतुकम् ॥७॥
गोमूत्र से सींची गई तथा गोबर से लीपी हुई, शरीर रगड़ने से गिरे हुये रोमों से
युक्त तथा गायों के पैरों द्वारा किये गये खेल से भूमि ( शुद्ध हो जाती है।)।।७।।
गोगन्धेन समाविष्टं पुण्यतोयैः शुभं पुनः।
तथा पुण्यतिथोपेत नक्षत्रविषये शुभे ॥८॥
गाय के गन्ध से युक्त, इसके पश्चात् पुण्यजल से पुनः पवित्र की गई भूमि पर
( निर्माणकार्य के लिये ) शुभ तिथि से युक्त नक्षत्र का विचार करना चाहिये ॥८॥
करणे च सुलग्ने च मुहूर्

चतुर्थोऽध्यायः 卐 भूपरिग्रहः १७
पयसा तु ततः प्राज्ञो निशादौ परिपूरयेत् ।
तस्य कूपस्य चाभ्याशे शुचिर्भूत्वा समाहितः ॥१३॥
भूमौ दर्भावकीर्णायां संविशेत् प्राक्शिरा बुधः ।
बुद्धिमान् मनुष्य को रात्रि के प्रारम्भ में गड्ढे में डालते हुये उसे जल से पूर्ण करना
चाहिये। इसके पश्चात् पवित्र होकर सावधान मन से गड्ढे के पास भूमि पर कुश बिछा
कर पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठ जाना चाहिये॥१३॥
अयं मन्त्रः—
अस्मिन् वस्तुनि वर्धस्व धनधान्येन मेदिनि! ॥१४॥
उत्तमं वीर्यमास्थाय नमस्तेऽस्तु शिवा भव ।
उपवासमुपक्रामेदेतं मन्त्रं जपंस्ततः ॥१५॥
उपवास करते हुये इस मन्त्र का जप करना चाहिये। मन्त्र इस प्रकार है—हे
पृथिवी, इस भूमि पर उत्तम समृद्धि स्थापित कर इसे धन-धान्य से वृद्धि प्रदान करो।
तुम कल्याणकारी बनो, तुम्हें प्रणाम॥१४-१५॥
❋ उत्तमादिभूलक्षणम् ❋
अह्न आदौ परीक्षेत तं कूपं स्थपतिर्बुधः ।
सावशेषं जलं दृष्ट्वा तद् ग्राह्यं सर्वसम्पदे ॥१६॥
बुद्धिमान् स्थपति को दिन होने पर प्रथमतः उस गड्ढे की परीक्षा करनी चाहिये।
इसमें जल बचा हुआ देख कर सभी प्रकार की सम्पत्तियों के लिये उस भूमि को
निर्माणहेतु ग्रहण करना चाहिये॥१६॥
क्लिन्ने वस्तुविनाशाय शुष्के धान्यधनक्षयः ।
पूरिते तन्मृदा खाते समता मध्यमा मता ॥१७॥
भूमि यदि गीली रहे तो उस पर निर्मित गृह में विनाश होता है। यदि शुष्क रहे
तो उस गृह में धन-धान्य की हानि होती है। यदि उस गड्ढे के खोदने से निकली मिट्टी
से उसे भरा जाय एवं पूरी मिट्टी उसमें समा जाय तो भूमि को मध्यम श्रेणी का समझना
चाहिये॥१७॥
उत्तमा भूर्मृदाधिक्या हीना हीना मृदा मही ।
तन्मध्यावटसन्दृष्टप्रदक्षिणावरोदकाम् ।
सुरभिप्रतिमां भूमिं गृह्णीयात् सर्वसम्पदे ॥१८॥
यदि मिट्टी से गड्ढा भर जाय एवं मिट्टी बच भी जाय अर्थात् मिट्टी अधिक हो तो
मय०-२

१८ मयमतम्
भूमि उत्तम, यदि गड्ढा भी न भरे एवं मिट्टी समाप्त हो जाय अर्थात् मिट्टी गड्ढा भरने
में कम पड़े तो भूमि हीन कोटि की होती है। उस गड्ढे के मध्य में यदि जल दाहिनी
ओर घूम कर बहे तो इस प्रकार की सुरभि की मूर्ति के सदृश वाली भूमि सर्वसम्पत्ति-
कारक होती है।।१९८।।
एवं यथोक्तविधिना विविधं विदित्वा
ग्रामाग्रहारपुरपत्तनखर्वटानि ।
स्थानीयखेटनिगमानि तथेतराणि
यः संविविक्षुरवनीग्रहणं विदध्यात् ।।१९९।।
इति मयमते वस्तुशास्त्रे भूपरिग्रहो
नाम चतुर्थोऽध्यायः
इसे निर्माण-हेतु ग्रहण करना चाहिये। इस प्रकार पूर्वोक्त विधि से विविध प्रकार
की भूमियों का ज्ञान कर व्यक्ति को ग्राम, अग्रहार, पुर, पत्तन, खर्वट, स्थानीय, खेट,
निगम एवं अन्य की स्थापना के लिये भूमि का ग्रहण करना चाहिये।।१९९।।

अथ पञ्चमोऽध्यायः
( मानोपकरणम् )
सर्वेषामपि वास्तूनां मानेनैव विनिश्चयः ।
तस्मान्मानोपकरणं वक्ष्ये संक्षेपतः क्रमात् ॥१॥
भूमि-मापन के उपकरण—सभी प्रकार के वास्तुओं ( भूमि एवं भवन ) का
निर्धारण मान या प्रमाण से ही किया जाता है; अतः मैं ( मय ऋषि ) संक्षेप में मापन
के उपकरणों के विषय में बतलाता हूँ।।१।।
परमाणुक्रमाद् वृद्धं मानाङ्गुलमिति स्मृतम् ।
परमाणुरिति प्रोक्तं योगिनां दृष्टिगोचरम् ॥२॥
( मापन की प्रथम इकाई ) अङ्गुल-माप परमाणुओं के क्रमशः वृद्धि से होती है।
परमाणुओं का दर्शन योगी-जनों को होता है, ऐसा शास्त्रों में कहा गया है।।२।।
परमाणुभिरष्टाभी रथरेणुरुदाहृतः ।
रथरेणुश्च वालाग्रं लिक्षायूकायवास्तथा ॥३॥
आठ परमाणुओं के मिलने से एक 'रथरेणु' ( धूल का कण ), आठ रथरेणुओं
के मिलने से एक 'बालाग्र' ( बाल की नोक ), आठ बालाग्र से एक 'लिक्षा', आठ
लिक्षा से एक 'यूका' एवं आठ यूका से एक 'यव' रूपी माप बनता है।।३।।
क्रमशोऽष्टगुणैः प्रोक्तो यवाष्टगुणितोऽङ्गुलम् ।
अङ्गुलं तु भवेन्मात्रं वितस्तिर्द्वादशाङ्गुलम् ॥४॥
उपर्युक्त माप क्रमशः आठ गुना बढ़ते हुये 'यव' बनते हैं। यव का आठ गुना
'अङ्गुल' माप होता है। बारह अङ्गुल माप को 'वितस्ति' ( बित्ता ) कहते हैं।।४।।
तद्द्वयं हस्तमुद्दिष्टं तत् किष्क्विति मतं वरैः ।
पञ्चविंशतिमात्रं तु प्राजापत्यमिति स्मृतम् ॥५॥
दो वितस्ति का एक 'हस्त' होता है, जिसे 'किष्कु' भी कहा गया है। पच्चीस
हाथ का एक 'प्राजापत्य' होता है।।५।।
षड्विंशतिर्धनुर्मुष्टिः सप्तविंशद्धनुर्ग्रहः ।
याने च शयने किष्कुः प्राजापत्यं विमानके ॥६॥

मयमतम्
२०
छब्बीस हाथ की एक 'धनुर्मुष्टि' तथा सत्ताईस हाथ से एक 'धनुर्ग्रह' माप बनता
है। यान (वाहन) तथा शयन (आसन एवं शय्या) में किष्कु माप तथा विमान में
प्राजापत्य माप का प्रयोग होता है॥६॥
वास्तूनां तु धनुर्मुष्टिर्ग्रामादीनां धनुर्ग्रहः ।
सर्वेषामपि वास्तूनां किष्कुरे वाथवा मतः ॥७॥
वास्तुनिर्माण में 'धनुर्मुष्टि' माप का तथा ग्रामादि के मापन में 'धनुर्ग्रह' प्रमाण का
प्रयोग होता है। अथवा सभी प्रकार के वास्तु-कर्म में 'किष्कु' प्रमाण का प्रयोग किया
जा सकता है॥७॥
रत्निश्चैवमरत्निश्च भुजो बाहुः करः स्मृतः ।
हस्ताश्चतुर्धनुर्दण्डो यष्टिश्चैव प्रकीर्तितः ॥८॥
हस्त माप को 'रत्नि', 'अरत्नि', 'भुज', 'बाहु' एवं 'कर' कहते हैं। चार हस्त
से 'धनुर्दण्ड' माप बनता है। इसी को 'यष्टि'

पञ्चमोऽध्यायः 卐 मानोपकरणम् २१
एवमेवं विदित्वा तु स्थपतिर्मानयेद् दृढम्।
इस प्रकार माप का ज्ञान करने के पश्चात् स्थपति को दृढ़तापूर्वक ( सावधानी
पूर्वक ) मापनकार्य करना चाहिये।।
☀ शिल्पिलक्षणम् ☀
भवन्ति शिल्पिनो लोके चतुर्धा स्वस्वकर्मभिः ॥१३॥
संसार में अपने-अपने कार्यों के अनुसार चार प्रकार के शिल्पी होते हैं।।१३।।
स्थपतिः सूत्रग्राही च वर्धकिस्तक्षकस्तथा।
प्रसिद्धदेशसङ्कीर्णजातिजोऽभीष्टलक्षणः ॥१४॥
चार प्रकार के शिल्पी—स्थपति, सूत्रग्राही, वर्धकि ( बढ़ई ) एवं तक्षक ( छीलने,
काटने एवं आकृतियाँ उकेरने वाले ) होते हैं। ये सभी ( स्थापत्यादि कर्म के लिये )
प्रसिद्ध स्थान वाले, सङ्कीर्ण जाति से उत्पन्न एवं अपने कार्यों के लिये अभीष्ट गुणों
से युक्त होते हैं।।१४।।
☀ स्थपतिः ☀
स्थपतिः स्थापनार्हः स्यात् सर्वशास्त्रविशारदः ।
न हीनाङ्गोऽतिरिक्ताङ्गो धार्मिकस्तु दयापरः ॥१५॥
‘स्थपति’संज्ञक शिल्पी को भवन की स्थापना में योग्य एवं ( गृह-निर्माण के
सहायक ) अन्य शास्त्रों का भी ज्ञाता होना चाहिये। शारीरिक दृष्टि से सामान्य से न
कम अङ्गों वाला तथा न ही अधिक अङ्गों वाला ( अर्थात् सम्पूर्ण रूप से स्वस्थ ),
धार्मिक वृत्ति वाला एवं दयावान होना चाहिये।।१५।।
अमात्सर्योऽनसूयश्चातन्द्रितस्त्वभिजातवान् ।
गणितज्ञः पुराणज्ञः सत्यवादी जितेन्द्रियः ॥१६॥
स्थपति को द्वेषरहित, ईर्ष्यारहित, सावधान, आभिजात्य गुणों से युक्त, गणित
तथा पुराणों का ज्ञाता, सत्यवक्ता एवं इन्द्रियों को वश में रखने वाला होना चाहिये।।१६।।
चित्रज्ञः सर्वदेशज्ञश्चान्नदश्चाप्यलुब्धकः ।
अरोगी चाप्रमादी च सप्तव्यसनवर्जितः ॥१७॥
स्थपति को चित्रकर्म ( गृह के नक्शा आदि बनाने ) में निपुण, सभी देशों का
ज्ञाता ( स्थान के भूगोल का ज्ञाता ), ( अपने सहायकों को ) अन्न देने वाला, अलोभी,
रोगरहित, आलस्य एवं भूल न करने वाला तथा सात प्रकार के व्यसनों ( वाचिक
आघात पहुँचाना, सम्पत्ति के लिये हिंसा का मार्ग अपनाना, शारीरिक चोट पहुँचाना,

२२ मयमतम्
शिकार, जुआ, स्त्री एवं सुरापान-अर्थशास्त्र-८.३.२३, ३२) से रहित होना चाहिये।
✺ सूत्रग्राही ✺
सुनामा दृढबुद्धिश्च वास्तुविद्याब्धिपारगः ।
स्थपतेस्तस्य शिष्यो वा सूत्रग्राही सुतोऽथवा ॥१८॥
'सूत्रग्राही' स्थपति का पुत्र या शिष्य होता है। उसे यशस्वी, दृढ़ मानसिकता से
युक्त एवं वास्तु-विद्या में पारंगत होना चाहिये ।।१८।।
स्थपत्याज्ञानुसारी च सर्वकर्मविशारदः ।
सूत्रदण्डप्रपातज्ञो मानोन्मानप्रमाणवित् ॥१९॥
सूत्रग्राही को स्थपति की आज्ञानुसार कार्य करने वाला एवं ( स्थापत्यसम्बन्धी )
सभी कार्यों का ज्ञाता होना चाहिये। उसे सूत्र एवं दण्ड के प्रयोग का ज्ञाता एवं विविध
प्रकार के मापन मान-उन्मान (लम्बाई, चौड़ाई, ऊँचाई एवं उनके उचित अनुपात )
का ज्ञाता होना चाहिये ।। १९ ।।
✺ तक्षकः ✺
शैलदार्विष्टकादीनां सूत्रग्राहिवशानुगः ।
तक्षणात् स्थूलसूक्ष्माणां तक्षकः स तु कीर्तितः ॥२०॥
पत्थर, काष्ठ एवं ईंट आदि को मोटा एवं पतला काटने के कारण वह शिल्पी
'तक्षक' कहलाता है। यह सूत्रग्राही की इच्छानुसार कार्य करता है।।२०।।
✺ वर्धकिः ✺
मृत्कर्मज्ञो गुणी शक्तः सर्वकर्मस्वतन्त्रकः ।
तक्षितानां तक्षकानामुपर्युपरि युक्तितः ॥२१॥
वर्धकि मृत्तिका के कर्म (गृहनिर्माण) का ज्ञाता, गुणवान, अपने कार्य में समर्थ,
अपने क्षेत्र से सम्बद्ध सभी कार्यों को स्वतन्त्रतापूर्वक करने वाला, तक्षक द्वारा काटे-
छाँटे गये सभी टुकड़ों को युक्तिपूर्वक जोड़ सकता है।।२१।।
वृद्धिकृद् वर्धकिः प्रोक्तः सूत्रग्राह्यनुगः सदा ।
कर्मिणो निपुणाः शुद्धा बलवन्तो दयापराः ॥२२॥
सर्वदा सूत्रग्राही के अनुसार कार्य करने वाला शिल्पी 'वर्धकि' कहा जाता है। इस
प्रकार ये सभी शिल्पी कार्य करने वाले, अपने कार्यों में कुशल, शुद्ध, बलवान,
दयावान होते हैं।।२२।।
गुरुभक्ताः सदा हृष्टाः स्थपत्याज्ञानुगाः सदा ।
तेषामेव स्थपत्याख्यो विश्वकर्मेति संस्मृतः ॥२३॥

पञ्चमोऽध्यायः 卐 मानोपकरणम् २३
ये सभी शिल्पी अपने गुरु ( प्रधान स्थपति ) का सम्मान करने वाले, सदा प्रसन्न
रहने वाले एवं सदैव स्थपति की आज्ञा का अनुसरण करने वाले होते हैं। उनके लिये
स्थपति ही विश्वकर्मा माना जाता है॥२३॥
एभिर्विना हि सर्वेषां कर्म कर्तुं न शक्यते।
तस्मादेतत् सदा पूज्यं स्थपत्यादिचतुष्टयम् ॥२४॥
उपर्युक्त ( सूत्रग्राही, तक्षक एवं वर्धकि ) शिल्पियों के विना स्थपति ( भवन-
निर्माणसम्बन्धी ) सभी कार्य नहीं कर सकता है। इसलिये स्थपति आदि चारो शिल्पियों
का सदा सत्कार करना चाहिये॥२४॥
एभिः स्थपत्यादिभिरत्र लोके विना ग्रहीतुं सुकृतं न शक्यम्।
तैरेव सार्धं गुरुणाऽथ तस्माद् भजन्ति मोक्षं भवतस्तु मर्त्याः ॥२५॥
इति मयमते मानोपकरणं नाम पञ्चमोऽध्यायः
इस संसार में इन स्थपति आदि को ग्रहण किये विना कोई भी ( निर्माणसम्बन्धी )
सुन्दर कार्य सम्भव नहीं है। अतः तीनों शिल्पियों को उनके गुरु ( प्रधान स्थपति ) के
साथ ग्रहण करना चाहिये। इसी से मनुष्य संसार ( शीत, धूप, वर्षा एवं गृह के अभाव
में होने वाले कष्टों ) से मुक्ति प्राप्त करते हैं॥२५॥
व्याख्यात्मक टिप्पणी
माप-विधान ( श्लोक १-१२ )
१. माप के विवरण के विषय में मत्स्यपुराण ( अ. २५८ ) उल्लेखनीय है।
इसके अनुसार जाली के भीतर से सूर्य-रश्मियों के प्रविष्ट होने पर जो उड़ता हुआ
धूलिकण स्पष्ट दिखाई पड़ता है, उसे 'त्रसरेणु' कहते हैं। आठ त्रसरेणु का एक
बालाग्र, आठ बालाग्र से एक लिक्ख्या, आठ लिक्ख्या से एक यूका, आठ यूका से एक
यव तथा आठ यव से एक अङ्गुल होता है—
जालान्तरप्रविष्टानां भानूनां यद्रजःस्फुटम्।
त्रसरेणुः स विज्ञेयो बालाग्रं तैरथाष्टभिः॥१७॥
तदष्टकेन लिक्ख्या तु यूका लिक्ख्याष्टकैर्मता।
यवो यूकाष्टकं तद्वदष्टभिस्तैस्तदङ्गुलम्॥१८॥

२४ मयमतम्
२. राजवल्लभमण्डन ( १.३९ ) के अनुसार बारह अङ्गुल का एक ताल ( बालिशत,
बित्ता ), दो ताल का एक हस्त, पौने दो हाथ का एक किष्कु, चार हाथ का चाप,
दो सहस्र दण्ड का क्रोश, उसका दुगुना गव्यूतिका, दो गव्यूतिका का एक योजन तथा
सौ योजन का एक कोटि होता है—
तालो द्वादशमात्रिकापरिमितस्तालद्वयं स्यात्करः
पादोनद्विकरोऽपि किष्कुरुदितश्चापं चतुर्भिः करैः।
क्रोशो दण्डसहस्रयुग्ममुदितो द्वाभ्यां च गव्यूतिका
ताभ्यां योजनमेव भूमिरखिला कोटिः शतं योजनैः।।
३. मापन के मूल में यव-मान प्रधान है। इससे अङ्गुल-माप प्राप्त होता है। सम-
राङ्गणसूत्रधार एवं अपराजितपृच्छा में तीन प्रकार के—ज्येष्ठ, मध्यम एवं कनिष्ठ अङ्गुल
माप प्राप्त होते हैं; जो आठ, सात एवं छः यवों से निर्मित होते हैं—
(क) अष्टाभिः सप्तभिः षड्भिरङ्गुलानि यवोदरैः।
ज्येष्ठमध्यकनिष्ठानि तच्चतुर्विंशतिः करः।।
सोऽष्टभिः पर्वभिर्युक्तः करः कार्यों विजानता।
करस्यार्धं चतुःपर्वं शेषं स्यात् भक्तमङ्गुलैः।।
( समराङ्गणसूत्रधार ९.५-६ )
(ख) ज्येष्ठं चाष्टयवैः प्रोक्तं मध्यमं सप्तभिर्यवैः।
स्यात्कनिष्ठं षड्यवैस्तु चतुर्विंशतिभिः करैः।।
( अपराजितपृच्छा-४१.९ )
इसके अतिरिक्त अपराजितपृच्छा ( अ. ४१ ) में परमाणु, केशाग्र, लिक्षा, यूका
एवं यव मान की चर्चा भी प्राप्त होती है।
४. विश्वकर्मवास्तुशास्त्र ( ७.७२-७७ ) में मान की चर्चा प्राप्त होती है। परमाणु
मान के अतिरिक्त शालि, व्रीहि, अङ्गुल, वितस्ति, हस्त, धनुर्मुष्टि, दण्ड, नृपदण्ड एवं
ब्रह्मदण्ड का वर्णन प्राप्त होता है—
तस्मान्मानवमानन्तु प्रोच्यते फलदायि तत्।
शालिव्रीहिस्तु सर्वत्र सिद्धमानोदयो मतः।।७३।।
तैर्व्रीहिभिस्त्रिभिर्युक्तमङ्गुलं मानवं मतम्।
द्वादशाङ्गुलसंयुक्तो वितस्तिरभिधीयते।।७४।।
वितस्तिद्वयसंयुक्तं हस्तमानमुदीरितम्।
हस्तमानद्वयोपेतो धनुर्मुष्टिरितीरिता।।७५।।

पञ्चमोऽध्यायः 卐 मानोपकरणम् २५
धनुर्मुष्टिद्वयोपेतो दण्ड इत्यभिधीयते।
दण्डद्वयेन संयुक्तो नृपदण्ड इतीरितः।।७६।।
नृपदण्डद्वयोपेतो ब्रह्मदण्ड इति स्मृतः।
इत्यादि बहुधा मानं शास्त्रेषूक्तं मनीषिभिः।।७७।।
५. मानसार (२.२०-२६) में परमाणु, रथधूलि, वालाग्र, लिक्षा, यूका एवं
यव की चर्चा प्राप्त होती है। छः, सात एवं आठ यव के माध्यम से कनिष्ठ, मध्यम
एवं उत्तम अङ्गुल-मान प्राप्त होता है। अङ्गुल-मान से वितस्ति, किष्कु, हस्त, धनुर्ग्रह,
धनुर्दण्ड, रज्जु आदि मान प्राप्त होते हैं। यवमान से प्राप्त मान इस प्रकार हैं—
मानमात्रं त्रिधा प्रोक्तं यववृद्धिविशेषतः।
षट्सप्ताष्टयवैरेतत्कनिष्ठो मध्यमोत्तमम्।।२४।।
अङ्गुलैर्द्वादशभिर्युक्तं वितस्तिः परिकीर्तितम्।
वितस्तियुग्मं किष्कुः स्यात्प्राजापत्योऽङ्गुलाधिका।।२५।।
षड्विंशत्यङ्गुलो हस्तो धनुर्मुष्टिरिति स्मृतम्।
सप्तविंशतिकाङ्गुल्यं हस्तमुक्तं धनुर्ग्रहः।।२६।।
चतुर्हस्तं धनुर्दण्डं दण्डाष्टं रज्जुमेव च।।२७।।
६. शिल्परत्न (२.१-१६) में भी मान का वर्णन किया गया है। यहाँ परमाणु,
त्रसरेणु, बालाग्र, लिक्षा, जूका, यवमान प्राप्त होता है। छः, सात एवं आठ यवमान
से अङ्गुलमान तथा शाली-मान से अङ्गुलमान की चर्चा की गई है। मात्राङ्गुल से मुष्टि,
वितस्ति, किष्कु, कर, प्राजापत्य, धनुर्मुष्टि, चापग्रह, वैदेहक, वैपुल्य आदि करभेद, दण्ड,
क्रोश, योजन, वंश, रज्जु, गजदण्ड, अरत्नि, अरणि, प्रादेश, ताल, गोकर्ण आदि
मानों का वर्णन प्राप्त होता है।
शिल्पिलक्षण (श्लोक-१३-२४)
अन्य वास्तुग्रन्थों में स्थपति, सूत्रधार आदि शिल्पियों के लक्षण इस प्रकार प्राप्त
होते हैं—
१. समराङ्गणसूत्रधार (४४.१-२२) में स्थपति की विशेषताओं की विस्तार से
चर्चा प्राप्त होती है। इसके अनुसार इसे शास्त्र, कर्म, प्रज्ञा से एवं शील से युक्त होना
चाहिये। शास्त्रों में इसे सामुद्रिक, गणित, ज्योतिष, छन्द, सिरा, शिल्प एवं यन्त्रकर्म
का ज्ञाता होना चाहिये—
शास्त्रं कर्म तथा प्रज्ञा शीलं च क्रिययान्वितम्।
लक्ष्यलक्षणयुक्तार्थशास्त्रनिष्ठो नरो भवेत्।।२।।

२६ मयमतम्
सामुद्रं गणितं चैव ज्योतिषं छन्द एव च।
सिराज्ञानं तथा शिल्पं यन्त्रकर्मविधिस्तथा।।३।।
एतान्यङ्गानि जानीयाद्वास्तुशास्त्रस्य बुद्धिमान्।।४।।
इसको शास्त्र के साथ कार्य का भी ज्ञान होना चाहिये—
यस्तु केवलशास्त्रज्ञः कर्मस्वपरिनिष्ठितः।।८।।
स मुह्यति क्रियाकाले दृष्ट्वा भीरुरिवाहवम्।
केवलं कर्म यो वेत्ति शास्त्रार्थं नाधिगच्छति।।९।।
सोऽचक्षुरिव नीयेत विवशोऽन्येन वर्त्मसु।।१०।।
स्थपति का शीलवान होना अत्यावश्यक चारित्रिक गुण है—
ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः।
एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः।।१६।।
२. राजवल्लभमण्डन (१.४१) में भी उपर्युक्त मत की पुष्टि प्राप्त होती है—
सुशीलः चतुरो दक्षः शास्त्रज्ञो लोभवर्जितः।
क्षमायुक्तो द्विजश्चैव सूत्रधारः स उच्यते।।
३. मनुष्यालयचन्द्रिका (१.११-१३) में स्थपति, सूत्रग्राही, तक्षक एवं वर्धक
संज्ञक शिल्पियों के लक्षण इस प्रकार प्राप्त होते हैं—
चतुर्धा कारवः—
स्थपतिः सूत्रग्राही तक्षकसंज्ञश्च वर्धकिः क्रमशः।
स्वोचितकर्मणि दक्षा ग्राह्यास्ते कारवश्चतुर्धैति।।११।।
स्थपतिः—
सर्वशास्त्रविहितक्रियापटुः सर्वदावहितमानसः शुचिः।
धार्मिको विगतमत्सरादिको यः स च स्थपतिरस्तु सत्यवाक्।।१२।।
अन्ये कारवः—
जानीयात् स्थापनार्हं स्थपतिमथ गुणैः प्रायशस्तेन तुल्यः
सूत्रग्राही सुतो वा स्थपतिमतिगतिप्रेक्षकः शिष्यको वा।
स्थूलानां तक्षणात्तक्षक इति कथितः सन्ततं हृष्टचित्तो
दार्वद्यन्योऽन्यसम्मेलनपटुरुदितो वर्धकिः सावधानः।।१३।।
४. मानसार (२.१-१७) में स्थपतियों के उद्भव, उनके प्रकार, उनके वैशिष्ट्य
आदि सभी पर अत्यन्त विस्तार से चिन्तन किया गया है। प्रथम स्थपति इस सृष्टि के
सर्जक 'महाविश्वकर्मा' थे—

पञ्चमोऽध्यायः 卐 मानोपकरणम् २७
परः शिवसकाशाद्धि ब्रह्मा चेन्द्रोऽपि लोककृत्।।१।।
स महाविश्वकर्मेति त्वीश्वरेणैव कीर्तितः।
स एवायं विश्वकर्मा ब्रह्माण्डं सृजते मुहुः।।२।।
इस विश्वकर्मा के चार मुख थे। पूर्व दिशा के मुख का नाम विश्वभू, दक्षिणमुख
विश्वविद्, उत्तरमुख विश्वस्थ एवं पश्चिममुख विश्वस्रष्टा था—
विश्वभूरिति नामैतत्पूर्ववक्त्रं प्रकीर्तितम्।
दक्षिणे विश्वविद्वक्त्रं विश्वस्थश्च तथोत्तरे।।४।।
पश्चिमे विश्वस्रष्टाख्यं वक्त्रमेवं चतुर्विधम्।
एतेभ्यः प्रथमो जातो विश्वकर्माचतुष्टयः।।५।।
इनसे चार कारवों ( स्थपतियों, विश्वकर्माचतुष्टय )—विश्वकर्मा, मय, त्वष्टा एवं मनु
की उत्पत्ति हुई। ये चारो क्रमशः इन्द्र, सुरेन्द्र, वैश्रवण एवं नल के पुत्र ( २.७-८ )
कहे गये—
पूर्वानने विश्वकर्मा जायते दक्षिणे मयः।
उत्तरस्य मुखे त्वष्टा पश्चिमे तु मनुः स्मृतः।।६।।
विश्वकर्मा के पुत्र को स्थपति, मय के पुत्र को सूत्रग्राही, त्वष्टा के पुत्र को वर्धकी
एवं मनु के पुत्र को तक्षक कहा गया है—
विश्वकर्माख्यानाम्नोऽस्य पुत्रः स्थपतिरुच्यते।
मयस्य तनयः सूत्रग्राहीति परिकीर्तितः।।९।।
त्वष्टुर्देव-ऋषेः पुत्रो वर्धकीरिति प्रकथ्यते।
मनोः पुत्रस्तक्षकः स्यात्स्थपत्यादिचतुष्टयम्।।१०।।
इनमें स्थपति को सभी शास्त्रों का ज्ञाता, सूत्रग्राही को मानसूत्र धारण करने वाला,
वर्धकी को मानकर्म का ज्ञाता एवं तक्षक को छीलने-काटने का विशेषज्ञ कहा गया है—
स्थपतिः सर्वशास्त्रज्ञः सूत्रग्राहीति सूत्रधृत्।।१२।।
वर्धकीर्मानकर्मज्ञः तक्षणात्तक्षकः स्मृतः।।१३।।
५. वास्तुविद्या ( १.१२-२० ) में चारो स्थपति आदि का लक्षण इस प्रकार प्राप्त
होता है—
स्थपति—
स्थपतिः स्थापनार्हः स्यात्सर्वशास्त्रविशारदः।
न हीनाङ्गोऽतिरिक्ताङ्गो धार्मिकस्तु दयापरः।
अमात्सर्योऽनसूयश्च तान्त्रिकस्त्वभिजातवान्।।१३।।