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मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

पृष्ठ 49, कुल 395 में से

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पञ्चमोऽध्यायः 卐 मानोपकरणम् २५
धनुर्मुष्टिद्वयोपेतो दण्ड इत्यभिधीयते।
दण्डद्वयेन संयुक्तो नृपदण्ड इतीरितः।।७६।।
नृपदण्डद्वयोपेतो ब्रह्मदण्ड इति स्मृतः।
इत्यादि बहुधा मानं शास्त्रेषूक्तं मनीषिभिः।।७७।।
५. मानसार (२.२०-२६) में परमाणु, रथधूलि, वालाग्र, लिक्षा, यूका एवं
यव की चर्चा प्राप्त होती है। छः, सात एवं आठ यव के माध्यम से कनिष्ठ, मध्यम
एवं उत्तम अङ्गुल-मान प्राप्त होता है। अङ्गुल-मान से वितस्ति, किष्कु, हस्त, धनुर्ग्रह,
धनुर्दण्ड, रज्जु आदि मान प्राप्त होते हैं। यवमान से प्राप्त मान इस प्रकार हैं—
मानमात्रं त्रिधा प्रोक्तं यववृद्धिविशेषतः।
षट्सप्ताष्टयवैरेतत्कनिष्ठो मध्यमोत्तमम्।।२४।।
अङ्गुलैर्द्वादशभिर्युक्तं वितस्तिः परिकीर्तितम्।
वितस्तियुग्मं किष्कुः स्यात्प्राजापत्योऽङ्गुलाधिका।।२५।।
षड्विंशत्यङ्गुलो हस्तो धनुर्मुष्टिरिति स्मृतम्।
सप्तविंशतिकाङ्गुल्यं हस्तमुक्तं धनुर्ग्रहः।।२६।।
चतुर्हस्तं धनुर्दण्डं दण्डाष्टं रज्जुमेव च।।२७।।
६. शिल्परत्न (२.१-१६) में भी मान का वर्णन किया गया है। यहाँ परमाणु,
त्रसरेणु, बालाग्र, लिक्षा, जूका, यवमान प्राप्त होता है। छः, सात एवं आठ यवमान
से अङ्गुलमान तथा शाली-मान से अङ्गुलमान की चर्चा की गई है। मात्राङ्गुल से मुष्टि,
वितस्ति, किष्कु, कर, प्राजापत्य, धनुर्मुष्टि, चापग्रह, वैदेहक, वैपुल्य आदि करभेद, दण्ड,
क्रोश, योजन, वंश, रज्जु, गजदण्ड, अरत्नि, अरणि, प्रादेश, ताल, गोकर्ण आदि
मानों का वर्णन प्राप्त होता है।
शिल्पिलक्षण (श्लोक-१३-२४)
अन्य वास्तुग्रन्थों में स्थपति, सूत्रधार आदि शिल्पियों के लक्षण इस प्रकार प्राप्त
होते हैं—
१. समराङ्गणसूत्रधार (४४.१-२२) में स्थपति की विशेषताओं की विस्तार से
चर्चा प्राप्त होती है। इसके अनुसार इसे शास्त्र, कर्म, प्रज्ञा से एवं शील से युक्त होना
चाहिये। शास्त्रों में इसे सामुद्रिक, गणित, ज्योतिष, छन्द, सिरा, शिल्प एवं यन्त्रकर्म
का ज्ञाता होना चाहिये—
शास्त्रं कर्म तथा प्रज्ञा शीलं च क्रिययान्वितम्।
लक्ष्यलक्षणयुक्तार्थशास्त्रनिष्ठो नरो भवेत्।।२।।