महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
१०१-
एकाधिकशततमोऽध्यायः
अभिमन्युके द्वारा अलम्बुषकी पराजय, अर्जुनके साथ भीष्मका तथा कृपाचार्य, अश्वत्थामा और द्रोणाचार्यके साथ सात्यकिका युद्ध
धृतराष्ट्र उवाच
आर्जुनिं समरे शूरं विनिघ्नन्तं महारथान् ।
अलम्बुषः कथं युद्धे प्रत्ययुध्यत संजय ।। १ ।।
आर्श्यशृङ्गिं कथं चैव सौभद्रः परवीरहा ।
तन्ममाचक्ष्व तत्त्वेन यथावृत्तं स्म संयुगे ।। २ ।।
**धृतराष्ट्रने पूछा—**संजय! समरमें बड़े-बड़े महारथियोंका संहार करते हुए शूरवीर अर्जुनकुमार अभिमन्युके साथ राक्षस अलम्बुषने किस प्रकार युद्ध किया? इसी प्रकार शत्रुवीरोंका हनन करनेवाले सुभद्रा-कुमारने राक्षस अलम्बुषके साथ कैसे युद्ध किया? युद्धस्थलमें उन दोनोंसे सम्बन्ध रखनेवाला जो भी वृत्तान्त हो, वह मुझे ठीक-ठीक बताओ ।। १-२ ।।
धनंजयश्च किं चक्रे मम सैन्येषु संयुगे ।
भीमो वा रथिनां श्रेष्ठो राक्षसो वा घटोत्कचः ।। ३ ।।
नकुलः सहदेवो वा सात्यकिर्वा महारथः ।
एतदाचक्ष्व मे सत्यं कुशलो ह्यसि संजय ।। ४ ।।
उस युद्धके मैदानमें अर्जुनने मेरी सेनाओंके साथ क्या किया? रथियोंमें श्रेष्ठ भीमसेन अथवा राक्षस घटोत्कच या नकुल-सहदेव एवं महारथी सात्यकिने क्या किया? संजय! यह सब मुझे यथार्थरूपसे बताओ; क्योंकि तुम इन बातोंके बतानेमें कुशल हो ।। ३-४ ।।
संजय उवाच
हन्त तेऽहं प्रवक्ष्यामि संग्रामं लोमहर्षणम् ।
यथाभूद् राक्षसेन्द्रस्य सौभद्रस्य च मारिष ।। ५ ।।
अर्जुनश्च यथा संख्ये भीमसेनश्च पाण्डवः ।
नकुलः सहदेवश्च रणे चक्रुः पराक्रमम् ।। ६ ।।
तथैव तावकाः सर्वे भीष्मद्रोणपुरःसराः ।
अद्भुतानि विचित्राणि चक्रुः कर्माण्यभीतवत् ।। ७ ।।
**संजयने कहा—**आर्य! मैं बड़े दुःखके साथ उस रोमांचकारी संग्रामका वर्णन करूँगा, जो राक्षसराज अलम्बुष और सुभद्राकुमार अभिमन्युमें हुआ था तथा पाण्डुपुत्र अर्जुन,
भीमसेन, नकुल और सहदेवने युद्धमें किस प्रकार पराक्रम किया और उसी प्रकार भीष्म, द्रोण आदि आपके सभी योद्धाओंने निर्भीक-से होकर अद्भुत और विचित्र कर्म किये—यह सब भी मुझसे सुनिये ॥ ५–७ ॥
अलम्बुषस्तु समरे अभिमन्युं महारथम् ।
विनद्य सुमहानादं तर्जयित्वा मुहुर्मुहुः ॥ ८ ॥
अभिदुद्राव वेगेन तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ।
अलम्बुषने समरभूमिमें महारथी अभिमन्युको जोर-जोरसे गर्जना करके बारंबार डाँट बतायी और 'खड़ा रह, खड़ा रह' ऐसा कहकर बड़े वेगसे उसपर धावा किया ॥ ८ १/२ ॥
अभिमन्युश्च वेगेन सिंहवद् विनदन् मुहुः ॥ ९ ॥
आर्श्यशृङ्गिं महेष्वासं पितुरत्यन्तवैरिणम् ।
इसी प्रकार वीर अभिमन्युने भी बारंबार सिंहनाद करते हुए अपने पितृव्य भीमसेनके अत्यन्त वैरी महाधनुर्धर अलम्बुषपर वेगसे आक्रमण किया ॥ ९ १/२ ॥
ततः समीयातुः संख्ये त्वरितौ नरराक्षसौ ॥ १० ॥
रथाभ्यां रथिनौ श्रेष्ठौ यथा वै देवदानवौ ।
फिर तो वे मनुष्य तथा राक्षस दोनों वीर तुरंत ही युद्धस्थलमें एक-दूसरेसे भिड़ गये। दोनों ही रथियोंमें श्रेष्ठ थे, अतः देवता और दानवकी भाँति रथोंद्वारा एक-दूसरेका सामना करने लगे ॥ १० १/२ ॥
मायावी राक्षसश्रेष्ठो दिव्यास्त्रश्चैव फाल्गुनिः ॥ ११ ॥
राक्षसश्रेष्ठ अलम्बुष मायावी था और अर्जुनकुमार अभिमन्युको दिव्यास्त्रोंका ज्ञान था ॥ ११ ॥
ततः कार्ष्णिर्महाराज निशितैः सायकैस्त्रिभिः ।
आर्श्यशृङ्गिं रणे विद्ध्वा पुनर्विव्याध पञ्चभिः ॥ १२ ॥
महाराज! तदनन्तर अर्जुनपुत्र अभिमन्युने तीन तीखे सायकोंसे रणक्षेत्रमें अलम्बुषको बींधकर पुनः पाँच बाणोंसे घायल कर दिया ॥ १२ ॥
अलम्बुषोऽपि संक्रुद्धः कार्ष्णिं नवभिराशुगैः ।
हृदि विव्याध वेगेन तोत्रैरिव महाद्विपम् ॥ १३ ॥
तब क्रोधमें भरे हुए अलम्बुषने भी नौ शीघ्रगामी बाणोंद्वारा अर्जुनपुत्र अभिमन्युकी छातीमें उसी प्रकार वेगपूर्वक प्रहार किया, जैसे अंकुशद्वारा गजराजपर प्रहार किया जाता है ॥ १३ ॥
ततः शरसहस्रेण क्षिप्रकारी निशाचरः ।
अर्जुनस्य सुतं संख्ये पीडयामास भारत ॥ १४ ॥
भारत! तत्पश्चात् शीघ्रतापूर्वक सारे कार्य करनेवाले निशाचरने एक हजार बाण मारकर युद्धस्थलमें अर्जुनके पुत्रको पीड़ित कर दिया ॥ १४ ॥
अभिमन्युस्ततः क्रुद्धो नवभिर्नतपर्वभिः ।
बिभेद निशितैर्बाणै राक्षसेन्द्रं महोरसि ॥ १५ ॥
इससे क्रुद्ध होकर अभिमन्युने राक्षसराज अलम्बुषकी चौड़ी छातीमें झुकी हुई गाँठवाले नौ पैने बाण मारे ॥ १५ ॥
ते तस्य विविशुस्तूर्णं कायं निर्भिद्य मर्मसु ।
स तैर्विभिन्नसर्वाङ्गः शुशुभे राक्षसोत्तमः ॥ १६ ॥
पुष्पितैः किंशुकै राजन् संस्तीर्ण इव पर्वतः ।
वे बाण राक्षसके शरीरको विदीर्ण करके उसके मर्मस्थानोंमें धँस गये। राजन्! उन बाणोंसे सम्पूर्ण अंगोंके क्षत-विक्षत हो जानेपर राक्षसराज अलम्बुष खिले हुए पलाशके वृक्षोंसे आच्छादित पर्वतकी भाँति सुशोभित होने लगा ॥ १६ १/२ ॥
संधारयाणश्च शरान् हेमपुङ्खान् महाबलः ॥ १७ ॥
विबभौ राक्षसश्रेष्ठः सज्वाल इव पर्वतः ।
सुवर्णमय पंखसे युक्त उन बाणोंको अपने अंगोंमें धारण किये महाबली राक्षसश्रेष्ठ अलम्बुष अग्निकी ज्वालाओंसे युक्त पर्वतकी भाँति शोभा पा रहा था ॥ १७ १/२ ॥
ततः क्रुद्धो महाराज आर्ष्यशृङ्गिरमर्षणः ॥ १८ ॥
महेन्द्रप्रतिमं कार्ष्णिं छादयामास पत्रिभिः ।
महाराज! तब अमर्षशील अलम्बुषने कुपित होकर देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी अर्जुनकुमारको पंखवाले बाणोंसे आच्छादित कर दिया ॥ १८ १/२ ॥
तेन ते विशिखा मुक्ता यमदण्डोपमाः शिताः ॥ १९ ॥
अभिमन्युं विनिर्भिद्य प्राविशन्त धरातलम् ।
उसके द्वारा छोड़े हुए यमदण्डके समान भयंकर एवं तीखे बाण अभिमन्युके शरीरको छेदकर धरतीमें समा गये ॥ १९ १/२ ॥
तथैवार्जुनिना मुक्ताः शराः कनकभूषणाः ॥ २० ॥
अलम्बुषं विनिर्भिद्य प्राविशन्त धरातलम् ।
उसी प्रकार अभिमन्युके छोड़े हुए सुवर्णभूषित बाण भी अलम्बुषको विदीर्ण करके पृथ्वीमें समा गये ॥
सौभद्रस्तु रणे रक्षः शरैः संनतपर्वभिः ॥ २१ ॥
चक्रे विमुखमासाद्य मयं शक्र इवाहवे ।
जैसे इन्द्र युद्धस्थलमें मयासुरको विमुख कर देते हैं, उसी प्रकार सुभद्राकुमार अभिमन्युने रणक्षेत्रमें झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा मारकर उस राक्षसको युद्धसे विमुख कर दिया ॥ २१ १/२ ॥
विमुखं च ततो रक्षो वध्यमानं रणेऽरिणा ॥ २२ ॥
प्रादुश्चक्रे महामायां तामसीं परतापनाम् ।
फिर समरांगणमें शत्रुसे पीड़ित एवं विमुख हुए राक्षसने शत्रुओंको तपानेवाली अपनी (अन्धकारमयी) तामसी महामाया प्रकट की ।। २२ १/२ ।।
ततस्ते तमसा सर्वे वृताश्चासन् महीपते ।। २३ ।।
नाभिमन्युमपश्यन्त नैव स्वान् न परान् रणे ।
महीपते! तब वे समस्त पाण्डव सैनिक अन्धकारसे आच्छादित हो गये। अतः न तो रणक्षेत्रमें अभिमन्युको देख पाते थे और न अपने तथा शत्रुपक्षके सैनिकोंको ही ।।
अभिमन्युश्च तद् दृष्ट्वा घोररूपं महत्तमः ।। २४ ।।
प्रादुश्चक्रेऽस्त्रमत्युग्रं भास्करं कुरुनन्दनः ।
ततः प्रकाशमभवज्जगत् सर्वं महीपते ।। २५ ।।
यह भयंकर एवं महान् अन्धकार देखकर कुरु-कुलको आनन्दित करनेवाले अभिमन्युने अत्यन्त उग्र भास्करास्त्रको प्रकट किया। राजन्! इससे सम्पूर्ण जगत्में प्रकाश छा गया ।। २४-२५ ।।
तां चाभिजघ्निवान् मायां राक्षसस्य दुरात्मनः ।
संक्रुद्धश्च महावीर्यो राक्षसेन्द्रं नरोत्तमः ।। २६ ।।
छादयामास समरे शरैः संनतपर्वभिः ।
इस प्रकार महापराक्रमी नरश्रेष्ठ अभिमन्युने उस दुरात्मा राक्षसकी मायाको नष्ट कर दिया और अत्यन्त कुपित हो झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा उसे समरभूमिमें आच्छादित कर दिया ।। २६ १/२ ।।
बह्वीस्तथान्या मायाश्च प्रयुक्तास्तेन रक्षसा ।। २७ ।।
सर्वास्त्रविद्मेयात्मा वारयामास फाल्गुनिः ।
उस राक्षसने और भी बहुत-सी जिन-जिन मायाओंका प्रयोग किया, उन सबको सम्पूर्ण अस्त्रोंके ज्ञाता अनन्त आत्मबलसे सम्पन्न अभिमन्युने नष्ट कर दिया ।। २७ १/२ ।।
हतमायं ततो रक्षो वध्यमानं च सायकैः ।। २८ ।।
रथं तत्रैव संत्यज्य प्राद्रवन्महतो भयात् ।
अपनी माया नष्ट हो जानेपर सायकोंकी मार खाता हुआ राक्षस अलम्बुष अत्यन्त भयके कारण अपने रथको वहीं छोड़कर भाग गया ।। २८ १/२ ।।
तस्मिन् विनिर्जिते तूर्णं कूटयोधिनि राक्षसे ।। २९ ।।
आर्जुनः समरे सैन्यं तावकं सम्ममर्द ह ।
मदान्धो गन्धनागेन्द्रः सपद्मां पद्मिनीमिव ।। ३० ।।
मायाद्वारा युद्ध करनेवाले उस राक्षसके पराजित हो जानेपर अर्जुनकुमार अभिमन्युने तुरंत ही रणक्षेत्रमें आपकी सेनाका उसी प्रकार मर्दन आरम्भ किया, जैसे गन्धयुक्त मदान्ध गजराज कमलोंसे भरी हुई पुष्करिणीको मथ डालता है ।। २९-३० ।।
ततः शान्तनवो भीष्मः सैन्यं दृष्ट्वाभिविद्रुतम् ।
महता शरवर्षेण सौभद्रं पर्यवारयत् ।। ३१ ।।
तदनन्तर अपनी सेनाको भागती हुई देख शान्तनु-नन्दन भीष्मने बड़ी भारी बाण-वर्षा करके सुभद्रकुमार अभिमन्युको रोक दिया ।। ३१ ।।
कोष्ठीकृत्य च तं वीरं धार्तराष्ट्रा महारथाः ।
एकं सुबहवो युद्धे ततक्षुः सायकैर्दृढम् ।। ३२ ।।
फिर आपके महारथी पुत्रोंने वीर अभिमन्युको सब ओरसे घेर लिया और युद्धस्थलमें उस अकेलेको बहुत-से योद्धाओंने सायकोंद्वारा जोर-जोरसे घायल करना आरम्भ किया ।। ३२ ।।
स तेषां रथिनां वीरः पितुस्तुल्यपराक्रमः ।
सदृशो वासुदेवस्य विक्रमेण बलेन च ।। ३३ ।।
उभयोः सदृशं कर्म स पितुर्मातुलस्य च ।
रणे बहुविधं चक्रे सर्वशस्त्रभृतां वरः ।। ३४ ।।
वीर अभिमन्यु अपने पिता अर्जुनके समान पराक्रमी था। बल और विक्रममें वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णकी समानता करता था। सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ उस वीरने रणक्षेत्रमें उन कौरव रथियोंके साथ अपने पिता और मामा दोनोंके सदृश अनेक प्रकारका शौर्यपूर्ण कार्य किया ।। ३३-३४ ।।
ततो धनंजयो वीरो विनिघ्नंस्तव सैनिकान् ।
आससाद रणे भीष्मं अत्रप्रेप्सुरमर्षणः ।। ३५ ।।
तत्पश्चात् वीर अर्जुन समरांगणमें आपके सैनिकोंका संहार करते हुए अपने पुत्रकी रक्षाके लिये अमर्षमें भरकर भीष्मके पास आ पहुँचे ।। ३५ ।।
तथैव समरे राजन् पिता देवव्रतस्तव ।
आससाद रणे पार्थं स्वर्भानुरिव भास्करम् ।। ३६ ।।
राजन्! जैसे सूर्यपर राहु आक्रमण करता है, उसी प्रकार आपके पितृव्य देवव्रत भीष्मने समरभूमिमें कुन्तीकुमार अर्जुनपर धावा किया ।। ३६ ।।
ततः सरथनागाश्वाः पुत्रास्तव जनेश्वर ।
परिवव्रू रणे भीष्मं जुगुपुश्च समन्ततः ।। ३७ ।।
जनेश्वर! उस समय आपके पुत्र रथ, हाथी, घोड़ोंकी सेना साथ लेकर युद्धस्थलमें भीष्मको घेरकर खड़े हो गये और सब ओरसे उनकी रक्षा करने लगे ।। ३७ ।।
तथैव पाण्डवा राजन् परिवार्य धनंजयम् ।
रणाय महते युक्ता दंशिता भरतर्षभ ।। ३८ ।।
राजन्! भरतश्रेष्ठ! उसी प्रकार पाण्डव अर्जुनको सब ओरसे घेरकर कवच आदिसे सुसज्जित हो महायुद्धके लिये तैयार हो गये ।। ३८ ।।
शारद्वतस्ततो राजन् भीष्मस्य प्रमुखे स्थितम् ।
अर्जुनं पञ्चविंशत्या सायकानां समाचिनोत् ॥ ३९ ॥
राजन्! उस समय भीष्मके सामने खड़े हुए अर्जुनको कृपाचार्यने पचीस बाण मारे ॥ ३९ ॥
प्रत्युद्गम्याथ विव्याध सात्यकिस्तं शितैः शरैः ।
पाण्डवप्रियकामार्थं शार्दूल इव कुञ्जरम् ॥ ४० ॥
तब जैसे सिंह हाथीपर आक्रमण करता है, उसी प्रकार सात्यकिने आगे बढ़कर पाण्डुनन्दन अर्जुनका प्रिय करनेके लिये कृपाचार्यको अपने तीखे बाणोंसे घायल कर दिया ॥ ४० ॥
गौतमोऽपि त्वरायुक्तो माधवं नवभिः शरैः ।
हृदि विव्याध संक्रुद्धः कङ्कपत्रपरिच्छदैः ॥ ४१ ॥
यह देख कृपाचार्यने भी अत्यन्त कुपित हो बड़ी उतावलीके साथ सात्यकिकी छातीमें कंकपत्रविभूषित नौ बाण मारकर उन्हें घायल कर दिया ॥ ४१ ॥
शैनेयोऽपि ततः क्रुद्धश्चापमानम्य वेगवान् ।
गौतमान्तकरं तूर्णं समाधत्त शिलीमुखम् ॥ ४२ ॥
तब वेगशाली सात्यकिने भी क्रोधमें भरकर अपने धनुषको झुकाया और तुरंत ही उसपर कृपाचार्यका अन्त करनेवाला बाण रखा ॥ ४२ ॥
तमापतन्तं वेगेन शक्राशनिसमद्युतिम् ।
द्विधा चिच्छेद संक्रुद्धो द्रौणिः परमकोपनः ॥ ४३ ॥
उस बाणका प्रकाश इन्द्रके वज्रके समान था। उसे वेगसे आते देख परम क्रोधी अश्वत्थामाने अत्यन्त कुपित हो उसके दो टुकड़े कर डाले ॥ ४३ ॥
समुत्सृज्याथ शैनेयो गौतमं रथिनां वरः ।
अभ्यद्रवद् रणे द्रौणिं राहुः खे शशिनं यथा ॥ ४४ ॥
तब रथियोंमें श्रेष्ठ सात्यकिने कृपाचार्यको छोड़कर जैसे आकाशमें राहु चन्द्रमापर आक्रमण करता है, उसी प्रकार युद्धस्थलमें अश्वत्थामापर धावा किया ॥ ४४ ॥
तस्य द्रोणसुतश्चापं द्विधा चिच्छेद भारत ।
अथैनं छिन्नधन्वानं ताडयामास सायकैः ॥ ४५ ॥
भारत! उस द्रोणपुत्रने सात्यकिके धनुषके दो टुकड़े कर दिये और धनुष कट जानेपर उन्हें सायकोंसे घायल करना आरम्भ किया ॥ ४५ ॥
सोऽन्यत् कार्मुकमादाय शत्रुघ्नं भारसाधनम् ।
द्रौणिं षष्ट्या महाराज बाह्वोरुरसि चार्पयत् ॥ ४६ ॥
महाराज! तब सात्यकिने भार-साधनमें समर्थ एवं शत्रुविनाशक दूसरा धनुष हाथमें लेकर साठ बाणोंद्वारा अश्वत्थामाकी भुजाओं तथा छातीको छेद डाला ॥ ४६ ॥
स विद्धो व्यथितश्चैव मुहूर्तं कश्मलायुतः ।
निषसाद रथोपस्थे ध्वजयष्टिं समाश्रितः ॥ ४७ ॥
इससे अत्यन्त घायल और व्यथित होकर मूर्च्छित हो ध्वजका सहारा ले वह दो घड़ीतक रथके पिछले भागमें बैठा रहा ॥ ४७ ॥
प्रतिलभ्य ततः संज्ञां द्रोणपुत्रः प्रतापवान् ।
वार्ष्णेयं समरे क्रुद्धो नाराचेन समर्पयत् ॥ ४८ ॥
तत्पश्चात् प्रतापी द्रोणपुत्रने होशमें आकर कुपित हो समरभूमिमें सात्यकिको नाराचसे घायल कर दिया ॥
शैनेयं स तु निर्भिद्य प्राविशद् धरणीतलम् ।
वसन्तकाले बलवान् बिलं सर्पशिशुर्यथा ॥ ४९ ॥
वह नाराच सात्यकिको छेदकर उसी प्रकार धरतीमें समा गया, जैसे वसन्त-ऋतुमें बलवान् सर्प-शिशु बिलमें घुसता है ॥ ४९ ॥
अथापरेण भल्लेन माधवस्य ध्वजोत्तमम् ।
चिच्छेद समरे द्रौणिः सिंहनादं मुमोच ह ॥ ५० ॥
इसके बाद दूसरे भल्लसे समरभूमिमें अश्वत्थामाने सात्यकिके उत्तम ध्वजको काट डाला और बड़े जोरसे सिंहनाद किया ॥ ५० ॥
पुनश्चैनं शरैर्घोरैश्छादयामास भारत ।
निदाघान्ते महाराज यथा मेघो दिवाकरम् ॥ ५१ ॥
भारत! महाराज! तदनन्तर जैसे वर्षा-ऋतुमें बादल सूर्यको ढक लेता है, उसी प्रकार उसने पुनः अपने भयंकर बाणोंद्वारा सात्यकिको आच्छादित कर दिया ॥ ५१ ॥
सात्यकोऽपि महाराज शरजालं निहत्य तत् ।
द्रौणिमभ्यकिरत् तूर्णं शरजालैरनेकधा ॥ ५२ ॥
नरेश्वर! उस समय सात्यकिने भी उस बाण-समूहको नष्ट करके तुरंत ही अश्वत्थामाके ऊपर अनेक प्रकारके बाणोंका जाल-सा बिछा दिया ॥ ५२ ॥
तापयामास च द्रौणिं शैनेयः परवीरहा ।
विमुक्तो मेघजालेन यथैव तपनस्तथा ॥ ५३ ॥
फिर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले युयुधानने मेघोंकी घटासे मुक्त हुए सूर्यकी भाँति द्रोणपुत्रको संताप देना आरम्भ किया ॥ ५३ ॥
शराणां च सहस्रेण पुनरेव समुद्यतः ।
सात्यकिश्छादयामास ननाद च महाबलः ॥ ५४ ॥
महाबली सात्यकिने पुनः एक हजार बाणोंकी वर्षा करके अश्वत्थामाको ढक दिया और बड़े जोरसे गर्जना की ॥ ५४ ॥
दृष्ट्वा पुत्रं च तं ग्रस्तं राहुणेव निशाकरम् ।
अभ्यद्रवत शैनेयं भारद्वाजः प्रतापवान् ॥ ५५ ॥
जैसे राहु चन्द्रमाको ग्रस लेता है, उसी प्रकार सात्यकिके द्वारा अपने पुत्रपर ग्रहण लगा हुआ देख प्रतापी द्रोणाचार्यने उनके ऊपर धावा किया ॥ ५५ ॥
विव्याध च सुतीक्ष्णेन पृषत्केन महामृधे ।
परीप्सन् स्वसुतं राजन् वार्ष्णेयेनाभिपीडितम् ॥ ५६ ॥
राजन्! उस महायुद्धमें सात्यकिद्वारा पीड़ित हुए अपने पुत्रकी रक्षा करनेके लिये आचार्यने तीखे बाणसे उन्हें घायल कर दिया ॥ ५६ ॥
सात्यकिस्तु रणे हित्वा गुरुपुत्रं महारथम् ।
द्रोणं विव्याध विंशत्या सर्वपारशवैः शरैः ॥ ५७ ॥
तब सात्यकिने रणक्षेत्रमें गुरुपुत्र महारथी अश्वत्थामाको छोड़कर पूर्णतः लोहेके बने हुए बीस बाणोंसे द्रोणाचार्यको बींध डाला ॥ ५७ ॥
तदन्तरममेयात्मा कौन्तेयः शत्रुतापनः ।
अभ्यद्रवद् रणे क्रुद्धो द्रोणं प्रति महारथः ॥ ५८ ॥
इसी समय शत्रुओंको संताप देनेवाले अमेय आत्मबलसे सम्पन्न महारथी कुन्तीपुत्र अर्जुन युद्धस्थलमें कुपित हो द्रोणाचार्यपर टूट पड़े ॥ ५८ ॥
ततो द्रोणश्च पार्थश्च समेयातां महामृधे ।
यथा बुधश्च शुक्रश्च महाराज नभस्तले ॥ ५९ ॥
महाराज! तत्पश्चात् द्रोणाचार्य और अर्जुन उस महासमरमें एक-दूसरेसे भिड़ गये, मानो आकाशमें बुध और शुक्र एक-दूसरेपर आक्रमण कर रहे हों ॥ ५९ ॥
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि अलम्बुषाभिमन्युयुद्धे
एकाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें अलम्बुष और अभिमन्युका युद्धविषयक एक सौ एकवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०१ ॥