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सर्वकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

पृष्ठ 140, कुल 268 में से

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पृष्ठ 140

( १२४ ) लीलावती ।
सोलह लब्धि हुए; यही कोटिका प्रमाण है; इसी कोटिको इष्ट २ से गुणा किया
तब ३२ हुए इसमें कल्पित भुज १२ को घटा दिया तब २० शेष रहे यही कर्णका
प्रमाण है. जब ३ तीनको इष्ट माना तब इष्ट ३ को द्विगुणा ६ किया इससे माने हुए
भुज १२ को गुणा किया तब ७२ हुए; इसमें इष्ट ३ का वर्ग
कर १ एक घटाया तब ८ आठ शेष रहे; इनका भाग दिया तब
९ लब्धि हुए; यही कोटिका प्रमाण है; इसी कोटिको इष्ट ३से
गुणा किया तब २७ हुए; इसमें भुज १२ का घटाया तब १५
शेष रहे. यही कर्णका प्रमाण है ॥
जब पांच ५ को इष्ट माना तब पूर्वोक्त रीतिके अनुसार
क्रिया करनेसे कोटिका प्रमाण ५ और कर्णका प्रमाण १३
होता है. इस प्रकार जितने इष्ट मानोगे उतने ही अनेक प्रकारके
कोटिकर्ण मिलेंगे ॥
अस्यैव द्वितीयः प्रकारः-
इसीकी दूसरी रीति दिखाते हैं-
इष्टो भुजस्तत्कृतिरिष्टभक्ता द्विःस्थापितेष्टोनयुतार्द्धिता वा ॥
तौ कोटिकर्णाविति कोटितो वा बाहुश्रुती चाकरणीगते स्तः॥६॥
अन्वयः-इष्टः कल्प्यः भुजः कल्प्यः इष्टभक्ता तत्कृतिः द्विःस्थापिता इष्टोनयुता
ततः अर्द्धिता इति तौ कोटिकर्णौ स्तः। वा कोटितः अकरणीगते बाहुश्रुती च स्तः॥५॥
अर्थः-पहले एक इष्ट कल्पना करे और एक भुज कल्पना करे कल्पना किये हुए
भुजके वर्गमें इष्टका भाग दे जो लब्धि हो, उसका दो स्थानमें लिखे; एक स्थानमें
कल्पित इष्टको जोड दे; और एक स्थानमें घटा दे; फिर आधा कर ले; इस
प्रकार कोटि और कर्ण होते हैं. यदि कोटिसे पूर्वोक्त किया करे तो भुज और कर्ण
अकरणीगत सिद्ध होते हैं ॥ ५ ॥
उदाहरण पहला कहा हुआ ही जानना.
अथ द्वितीयप्रकारेण न्यासः-
इष्टो भुजः १२ अस्य
कृतिः १४४ इष्टेन २ भक्ता
लब्धम् ७२ इष्टेन २