लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
(८) निम्नलिखित शब्दों की रूपमाला लिखें—
१ क्रुञ्च्, २ अग्निमथ्, ३ सह+अञ्च् (दोनों पक्षों में), ४ तिरस्+
अञ्च् (दोनों पक्षों में) ५ प्रति+अञ्च् (दोनों पक्षों में) ।
(६) निम्नलिखित सूत्रों की व्याख्या करें—
१ अनिदितां हल उपधायाः क्ङिति । २ अचः । ३ घोः । ४ तिरस-
स्तिर्यलोपे । ५ उद ईत् । ६ सहस्य सधिः ।
(यहाँ चकारान्त पुंलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है ।)
० —— ०
अब तकारान्त पुंलिङ्गों का वर्णन करते हैं—
[लघु०] उगित्वान्नुम् ॥
व्याख्या—महत् (बड़ा) शब्द वर्तमाने पृषद्-बृहन्महज्जगच् शतृवच्च (उणा०
२४१) इस औणादिक सूत्र द्वारा मह् पूजायाम् (भ्वा० प०) धातु से अति प्रत्यय कर
निपातित किया गया है और साथ ही इसे शतृ-प्रत्यय के समान आदिष्ट भी किया गया
है । शतृ प्रत्यय अन्त्य ऋकार के इत् होने से उगित् है । इस प्रकार महत् शब्द को भी
उगित् मान कर उगित्कार्य नुम् आदि हो जायेंगे ।
महत्+सुं (स्) । शतृवत् अतिदेश के कारण उगित् होने से उगिदचां सर्व-
नामस्थानेऽधातोः (२८६) से नुँम् का आगम होकर—मह् नुँम् त्+स्=महन्त्+
स् । अब निम्नस्थ सूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधिसूत्रम्—(३४२) सान्त महतः संयोगस्य ।६।४।१०॥
सान्तसंयोगस्य महतश्च यो नकारस्तस्योपधाया दीर्घः स्यादासम्बुद्धौ
सर्वनामस्थाने । महान् । महान्तौ । महान्तः । हे महन् ! । महद्भ्याम् ॥
अर्थ —सम्बुद्धिभिन्न सर्वनामस्थान परे होने पर सकारान्त संयोग के तथा महत्
शब्द के नकार की उपधा को दीर्घ हो जाता है ।
व्याख्या—सान्तः ।६।१। (यहाँ षष्ठीविभक्ति का लुक् हुआ है । यह ‘संयोगस्य’
का विशेषण है) । संयोगस्य ।६।१। महत् ।६।१। न ।६।१। (नोपधायाः से । यहाँ षष्ठी
का लुक् हुआ है)। उपधायाः ।६।१। (नोपधायाः से ) । दीर्घः ।१।१। (ढ्रलोपे पूर्वस्य
दीर्घोऽणः से)। असम्बुद्धौ ।७।१। सर्वनामस्थाने ।७।१। (सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ से)।
अर्थ — (सान्तः) सकारान्त (संयोगस्य) संयोग के तथा (महतः) महत् शब्द के
(न—नस्य) नकार की (उपधायाः) उपधा के स्थान पर (दीर्घः) दीर्घ आदेश
हो जाता है (असम्बुद्धौ) सम्बुद्धिभिन्न (सर्वनामस्थाने) सर्वनामस्थान परे होने पर ।
सकारान्त संयोग के नकार की उपधा को दीर्घ करने के उदाहरण आगे—विद्वांसौ,
विद्वांसः, यशांसि, मनांसि आदि आएँगे ।
'महन्त् +स्' । यहाँ प्रकृतसूत्र से महत् शब्द के अवयव नकार की उपधा—
हकारोत्तर अकार को दीर्घ होकर—'महान्त् +स्' । अब सुँलोप तथा संयोगान्तलोप
हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४५१
होकर 'महान्' प्रयोग सिद्ध होता है। संयोर्गान्तलोप के असिद्ध होने से नकार का लोप
नहीं होता। 'महत्' शब्द की रूपमाला यथा—
प्र० महान् महान्तौ महान्तः | प० महतः महद्भ्याम् महद्भ्यः
द्वि० महान्तम् " महतः | ष० " महतोः महताम्
तृ० महता महद्भ्याम्‡ महद्भिः | स० महति " महत्सु
च० महते " महद्भ्यः | सं० हे महन्*! हे महान्तौ! हे महान्तः!
†उगिदचाम्० (२८६) से नुँम् तथा सान्तमहतः० (३४२) से नकार की
उपधा को दीर्घ होकर अनुस्वार (७८) और परसवर्ण (७६) हो जाते हैं।
‡झलां जशोऽन्ते (६७) से तकार को जश्त्व-दकार हो जाता हैं।
*उगिदचाम्० (२८६) से नुँम् होकर सुँलोप तथा संयोगान्तलोप हो जाते
हैं। सम्बुद्धि परे होने से सान्तमहतः० (३४२) प्रवृत्त नहीं होता।
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३४३) अत्वसन्तस्य चाधातोः।६।४।१४॥
अत्वन्तस्योपधाया दीर्घो धातुभिन्नाऽसन्तस्य चाऽसम्बुद्धौ सौ परे।
धीमान्। धीमन्तौ। धीमन्तः। हे धीमन्! । शसादौ महद्वत्॥
अर्थः—सम्बुद्धि-भिन्न सुँ परे होने पर, 'अतुँ' जिस के अन्त में हो उस की उपधा
को दीर्घ होता है एवम् धातु को छोड़कर 'अस्' जिस के अन्त में हो उसकी उपधा को
भी दीर्घ हो जाता है।
व्याख्या—अतुँ ।६।१। (यहां षष्ठी का लुक् हुआ है। अङ्गस्य का विशेषण
होने से तदन्तविधि होकर 'अत्वन्तस्य' बन जाता है)। असन्तस्य ।६।१। च इत्यव्यय-
पदम्। अङ्गस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। उपधायाः ।६।१। (नोपधायाः से)। दीर्घः
।१।१। (ढ्रलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः से)। असम्बुद्धौ ।७।१। (सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ से)।
सौ ।७।१। (सौ च से)। अर्थः — (अतु-अन्तस्य) अत्वन्त (अङ्गस्य) अङ्ग की (च)
तथा (अधातोः) धातुभिन्न (असन्तस्य) अस् अन्त वाले (अङ्गस्य) अङ्ग की (उपधायाः)
उपधा के स्थान पर (दीर्घः) दीर्घ होता है (असम्बुद्धौ) सम्बुद्धिभिन्न (सौ) सुँ परे हो तो।
'अतुँ' से 'मतुँप्, वतुँप्, डवतुँ, क्तवतुँ' आदि प्रत्ययों का ग्रहण होता है। 'अस्-
अन्त' का उदाहरण आगे मूल में ही 'वेधाः' आदि पर स्पष्ट हो जायेगा। यहां अत्वन्त
का उदाहरण दर्शाया जाता है—
धीमत् (बुद्धिमान्)। धीरस्त्यस्येति धीमान्। 'धी' शब्द से तदस्यास्त्यस्मिन्निति
मतुँप् (११८१) सूत्र द्वारा मतुँप् प्रत्यय करने पर 'धीमत्' शब्द निष्पन्न होता है।
'धीमत् + सुँ' यहां धीमत् शब्द के अतु + अन्त (मतुँ = म् + अतुँ) होने से
प्रथम¹ अत्वसन्तस्य चाधातोः (३४३) से उपधादीर्घ होकर—धीमात् + सुँ। पुनः
१. ध्यान रहे कि 'धीमत् + सुँ' में अत्वसन्तस्य० (३४३) द्वारा उपधादीर्घ तथा
उगिदचाम्० (२८६) से नुँम् आगम युगपत् प्राप्त होते हैं। नुँम् आगम नित्य
तथा पर होने पर भी प्रथम नहीं होता। क्योंकि यदि ऐसा किया जाये तो सर्वत्र
४५२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
उगिदचां० (२८६) से नुँम् आगम—धीमा न् त्+स् । अब सुँलोप और संयोगान्त-
लोप होकर—'धीमान्' प्रयोग सिद्ध होता है। 'धीमत्' की समग्र रूपमाला यथा—
प्र० धीमान् धीमन्तौ धीमन्तः प० धीमतः धीमद्भ्याम् धीमद्भ्यः
द्वि० धीमन्तम् ,, धीमतः ष० ,, धीमतोः धीमताम्
तृ० धीमता धीमद्भ्याम् धीमद्भिः स० धीमति ,, धीमत्सु
च० धीमते ,, धीमद्भ्यः स० हे धीमन्*! धीमन्तौ धीमन्तः
सम्बुद्धि में अत्वसन्तस्य० (३४३) द्वारा दीर्घ नहीं होता।
इसी प्रकार—भगवत्, बुद्धिमत्, धनवत्, मतिमत्, गतवत्, कृतवत् आदि
मत्वन्त, वत्वन्त और क्तवत्वन्त शब्दों के रूप होते हैं।
[लघु०] भातेर्डवतुं । डित्त्वसामर्थ्यादभस्यापि टेर्लोपः । भवान् । भवन्तौ ।
भवन्तः । शतृन्तस्य—भवन् ॥
व्याख्या—भवतुँ = भवत् (आप) । भा दीप्तौ (अदा० प०) धातु से भातेर्ड-
वतुँ (उणा० ६३) इस औणादिकसूत्र द्वारा 'डवतुँ' प्रत्यय करने में—'भा+डवतुँ'।
डवतुँ के अनुबन्धों का लोप कर 'अवत्' शेष रह जाता है—'भा+अवत्'। अब 'भा'
की भसञ्ज्ञा न होने पर भी डवतुँ को डित् करने के सामर्थ्य से भकारोत्तर आकार
का टेः(२४२) से लोप होकर—'भवत्' शब्द निष्पन्न होता है।
भवत्+सु(सुँ) । वत्वन्त होने से अत्वसन्तस्य चाधातोः (३४३) से उपधा-
दीर्घ, उगिदचां० (२८६) से नुँम् आगम, सुँलोप तथा संयोगान्तलोप करने में
'भवान्' प्रयोग सिद्ध होता है। इस की सम्पूर्ण प्रक्रिया 'धीमत्' शब्द के समान होती
है। रूपमाला यथा—
प्र० भवान् भवन्तौ भवन्तः प० भवतः भवद्भ्याम् भवद्भ्यः
द्वि० भवन्तम् ,, भवतः ष० ,, भवतोः भवताम्
तृ० भवता भवद्भ्याम् भवद्भिः स० भवति ,, भवत्सु
घ० भवते ,, भवद्भ्यः स० हे भवन्! भवन्तौ ! भवन्तः
*सम्बुद्धि में अत्वसन्तस्य० (३४३) प्रवृत्त नहीं होता।
'भवत्' शब्द 'त्यदाद्यन्तर्गत सर्वनाम है। सर्वनामसञ्ज्ञा का प्रयोजन 'भवद्वान्'
आदि में अव्यय सर्वनाम्नाकच् प्राक्टेः (१२२६) द्वारा अकच् प्रत्यय करना है।
त्यदादियों का यद्यपि सम्बोधन नहीं होता तथापि ऊपर सम्भावनामूल्य से दर्शाया गया है।
भवन् = भवत् (होता हुआ)। भू सत्तायाम् (भ्वा० प०) धातु से लट्, उस के
स्थान पर शतृँ प्रत्यय, शतृँ के सार्वधातुक होने से शप् विकरण, गुण, अवादेश तथा
अतो गुणे (२७४) से पररूप करने पर 'भवत्' शब्द निष्पन्न होता है। यह 'भवत्'
थत्वन्त की उपधा 'न्' ही मिलेगी जिसे दीर्घ नहीं हो सकेगा क्योंकि अचश्च
(१२२८) परिभाषा द्वारा ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत अचों के स्थान पर ही हुआ करते
हैं। अतः वचनसामर्थ्य से प्रथम उपधादीर्घ होकर पश्चात् नुँम् आगम होता है।
हलन्त-पुल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४५३
शब्द शतृ प्रत्ययान्त है। शतृँ प्रत्यय के ऋकार की उपदेशेऽजनुनासिक इत् (२८) से
इत्संज्ञा होती है। अतः 'भवत्' शब्द उगित् है। उगित् होने से सर्वनामस्थान में इसे
नुँम् का आगम (२८६) हो जायेगा। इस की रूपमाला यथा—
प्र० भवन्† भवन्तौ भवन्तः | प० भवतः भवद्भ्याम् भवद्भ्यः
द्वि० भवन्तम् ,, भवतः | प० ,, भवतोः भवताम्
तृ० भवता भवद्भ्याम् भवद्भिः | स० भवति ,, भवत्सु
च० भवते भवद्भ्याम् भवद्भ्यः | सं० हे भवन् ! हे भवन्तौ ! हे भवन्तः !
† यहाँ अत्वन्त न होने से अत्वसन्तस्य चाधातोः (३४३) सूत्र से उपधादीर्घ
नहीं होता। नुँम्, सुँलोप तथा संयोगान्तलोप पूर्ववत् होते हैं।
इसी प्रकार—गच्छत् (जाता हुआ), चलत् (चलता हुआ), पतत् (गिरता
हुआ), खादत् (खाता हुआ) प्रभृति शत्रन्त शब्दों के रूप होते हैं। शत्रन्तों का सार्थ
वृहत्-संग्रह इस व्याख्या के द्वितीयभागस्थ शतृँप्रकरण में देखें।
अब शत्रन्त शब्दों में कुछ विशेष प्रक्रिया वाले शब्द कहे जाते हैं—
[लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(३४४) उभे अभ्यस्तम्¹ ।६।१।५॥
षाष्ठद्वित्वप्रकरणे ये द्वे विहिते ते उभे समुदिते अभ्यस्तसञ्ज्ञे स्तः ॥
अर्थः—षष्ठाध्याय के द्वित्वप्रकरण में द्वित्व से जिन दो शब्दस्वरूपों का विधान
होता है वे दोनों समुदित (इकट्ठे न कि पृथक्) अभ्यस्तसञ्ज्ञक हों।
व्याख्या—उभे ।१।२। द्वे ।१।२। (एकाचो द्वे प्रथमस्य से)। अभ्यस्तम् ।१।१।
अर्थः—(उभे) समुदित (द्वे) दोनों शब्दस्वरूप (अभ्यस्तम्) अभ्यस्तसञ्ज्ञक होते हैं।
द्वित्व अर्थात् एक शब्द को दो शब्द विधान करने वाले अष्टाध्यायी में दो
प्रकरण आते हैं। पहला—छठे अध्याय के प्रथमपाद के प्रथमसूत्र से लेकर बारहवें
सूत्र तक। दूसरा अष्टम अध्याय के प्रथमपाद के प्रथमसूत्र से लेकर पन्द्रहवें सूत्र तक।
यहां अभ्यस्तसञ्ज्ञा षष्ठाध्याय वाले शब्दस्वरूपों की होती है अष्टमाध्याय वाले शब्द-
स्वरूपों की नहीं। इस का कारण यह है कि—अनन्तरस्य विधिर्वा भवति प्रतिषेधो वा
(प०) अर्थात् विधि और निषेध समीप पठित के ही होते हैं दूरपठित के नहीं। उभे
अभ्यस्तम् (६.१.५) सूत्र छठे अध्याय के द्वित्वप्रकरण में पढ़ा गया है अतः अभ्यस्तसञ्ज्ञा
भी छठे अध्याय के द्वित्वप्रकरण में विहित समुदित शब्दस्वरूपों की ही होगी।
'द्वे' पद का अनुवर्त्तन होने पर भी 'उभे' का ग्रहण इस बात को बतलाने के
लिये है कि दोनों की इकट्ठी अभ्यस्तसञ्ज्ञा हो प्रत्येक की पृथक् २ न हो। इस से
'नेनिजाति' आदि में अभ्यस्तानामादिः (६.१.१८३) द्वारा प्रत्येक को आद्युदात्त न
१. 'उभे+अभ्यस्तम्' में ईदूदेद् द्विवचनं प्रगृह्यम् (५१) द्वारा प्रगृह्यसञ्ज्ञा और
प्लुतप्रगृह्या अचि नित्यम् (५०) द्वारा प्रकृतिभाव हो जाने से सन्धि नहीं होती।
एवम् वृत्ति में 'ते उभे समुदिते अभ्यस्तसञ्ज्ञे' यहां पर भी सन्ध्यभाव जानना
चाहिये।
४५४ | भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
होकर समुदित का होता है। इस का विशेष विवेचन काशिका और महाभाष्य में
देखना चाहिये।
ददत् - ददत् (देता हुआ)। दा (डुदाञ् दाने, जुहो० उभ०) धातु से लँट्,
उस का शतृँ, शप् प्रत्यय, शप् का श्लु (लोप), श्लु पर होने पर षष्ठाध्यायस्थ श्लौ
(६।१।१०) सूत्र से द्वित्व, अभ्यासह्रस्व तथा श्नाभ्यस्तयोरात (६१६) से आकार
का लोप होकर ददत् शब्द निष्पन्न होता है।
षाष्ठद्वित्वप्रकरणस्थ श्लौ (६।१।१०) सूत्र से द्वित्व होने के कारण 'दद्' की
उभे अभ्यस्तम् (३४४) से अभ्यस्तसञ्ज्ञा हो जाती है।
अब अग्रिमसूत्र द्वारा अभ्यस्तसञ्ज्ञा का प्रयोजन बतलाते हैं—
[लघु०] निषेध सूत्रम्—(३४५) नाभ्यस्ताच्छतुः ।७।१।७८॥
अभ्यस्तात् परस्य शतुर्नुम् न स्यात् । ददत्, ददद् । ददतौ । ददतः ॥
अर्थ —अभ्यस्त से परे शतृँ प्रत्यय को नुँम् का आगम नहीं होता।
व्याख्या—न इत्यव्ययपदम्। अभ्यस्तात् ।५।१। शतुः ।६।१। नुम् ।१।१।
(इदितो नुम् धातोः से)। अर्थ —(अभ्यस्तात्) अभ्यस्तसञ्ज्ञक से परे (शतुः) शतृँ
का अवयव (नुँम्) नुँम् (न) नहीं होता।
ददत्+स् (सुँ)। यहां उगिदचां० (२८६) से प्राप्त नुँम् आगम का
नाभ्यस्ताच्छतुः (२४५) से निषेध हो जाता है। अब हल्ङ्याब्भ्यो० (१७६) से सुँ का
लोप कर जश्त्व चर्त्व प्रक्रिया से— ददत्, ददद्' ये दो प्रयोग सिद्ध होते हैं। इसी प्रकार
आगे भी सर्वनामस्थानों में नुँम् का निषेध कर लेना चाहिये। इस की रूपमाला यथा—
प्र० ददत्,-द् ददतौ ददतः | पं० ददतः ददद्भ्याम् ददद्भ्यः
द्वि० ददतम् ददतौ ददतः | ष० " ददतोः ददताम्
तृ० ददता ददद्भ्याम्* ददद्भिः | स० ददति " ददत्सु
च० ददते " ददद्भ्यः | सं० हे ददत्-द् ! हे ददतौ ! हे ददतः !
*झलां जशोऽन्ते (६७) से तकार को दकार हो जाता है।
इसी प्रकार—दधत् (धारण करता हुआ), जुह्वत् (हवन करता हुआ),
बिभ्यत् (डरता हुआ), बिभ्रत् (धारण करता हुआ), जहत् (छोड़ता हुआ), जिहि-
यत् (शर्माता हुआ) आदि जुहोत्यादिगणीय शत्रन्तों के रूप होते हैं।
अब कुछ उन शत्रन्तों का वर्णन करते हैं जिन में नुँम् का निषेध तो अभीष्ट है
परन्तु षाष्ठद्वित्व न होने से अभ्यस्तसञ्ज्ञा प्राप्त नहीं।
[लघु०] सञ्ज्ञा सूत्रम् —(३४६) जक्षित्यादयः षट् ।६।१।६॥
षड् धातवोऽन्ये जक्षितिश्च सप्तम एतेऽभ्यस्तसञ्ज्ञाः स्युः । जक्षत्,
जक्षद् । जक्षतौ । जक्षतः । एवम् जाग्रत्, दरिद्रत्, शासत्, चकासत् ॥
अर्थ —जागृ आदि छ धातु तथा सातवीं 'जक्ष्' धातु अभ्यस्तसञ्ज्ञक हों।
व्याख्या—जक्ष् । १।१। इत्यादयः । १।३। षट् । १।३। अभ्यस्तम्
हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४५५
। १ । १ । (उभे अभ्यस्तम् ने) । समासः—इति (इतिशब्देन जक्ष्परामर्शो भवति)
आदिर्येषान्ते = इत्यादयः, अतद्गुणसंविज्ञानबहुव्रीहिसमासः, 'षड्' इतिग्रहणात् । अर्थः—
(जक्ष्) जक्ष् धातु तथा (इत्यादयः) जक्ष् से अगली (षट्) छः धातुएं अर्थात् कुल
सात धातुएं (अभ्यस्तम्) अभ्यस्तसञ्ज्ञक होती हैं।
इन सात धातुओं का सङ्ग्रह एक प्राचीन श्लोक में यथा—
जक्षि-जागृ-दरिद्रा-शास्-दीधीङ्-वेवीङ्-चकास्तयः ।
अभ्यस्तसञ्ज्ञा विज्ञेया धातवो मुनिभाषिताः ॥
१. जक्ष भक्षहसनयोः (अदा० प०) । २. जागृ निद्राक्षये (अदा० प०) । ३.
दरिद्रा दुर्गतौ (अदा० प०) । ४. चकासृँ दीप्तौ (अदा० प०) । ५. शासुँ अनु-
शिष्टौ (अदा० प०) । ६. दीधीङ् दीप्तिदेवनयोः (अदा० आ०) । ७. वेवीङ् वेतिना
तुल्ये (अदा० आ०) । इन सात में पिछली दीधीङ् और वेवीङ् धातुओं का प्रयोग
वेद में ही होता है। इन के शत्रन्त रूप क्रमशः यथा—१. जक्षत् = खाता वा हँसता
हुआ। २. जाग्रत् = जागता हुआ। ३. दरिद्रत् = दरिद्रता या दुर्गति को प्राप्त होता
हुआ। ४. चकासत् = चमकता हुआ। ५. शासत् = शासन करता हुआ। ६. दीध्यत् =
क्रीडा करता हुआ। ७. वेव्यत् = गति करता हुआ।
इन सातों शत्रन्तों से सर्वनामस्थान परे होने पर उगिदचाम्० (२८६) द्वारा
नुँम् आगम प्राप्त था जो अब जक्षित्यादयः षट् (३४६) सूत्र से अभ्यस्तसञ्ज्ञा हो
जाने के कारण नाभ्यस्ताच्छतुः (३४५) द्वारा निषिद्ध हो जाता है। उदाहरणार्थ
'जक्षत्' की रूपमाला यथा—
प्र० जक्षत्-द्¹ जक्षतौ जक्षतः प० जक्षतः जक्षद्भ्याम् जक्षद्भ्यः
द्वि० जक्षतम् ,, ,, प० ,, जक्षतोः जक्षताम्
तृ० जक्षता जक्षद्भ्याम् जक्षद्भिः स० जक्षति ,, जक्षत्सु
च० जक्षते ,, जक्षद्भ्यः सं० हे जक्षत्-द् ! जक्षतौ ! जक्षतः !
1 हल्ङ्याब्भ्यः० (१७६), झलां जशोऽन्ते (६७), वाऽवसाने (१४६) ।
इसी प्रकार अन्य छः शत्रन्तों के रूप बनते हैं।
तकारान्त पुंल्लिङ्गों के विषय में विशेष वक्तव्य—
तकारान्त पुंल्लिङ्गों को चार श्रेणियों में विभक्त कर सकते हैं—
(१) 'महत्' शब्द। सान्तमहतः संयोगस्य (३४२) सूत्र में केवल 'महत्'
शब्द का वर्णन होने से यह अपने ढङ्ग का अकेला शब्द है अतः इस के सदृश अन्य
किसी तकारान्त पुंल्लिङ्ग का उच्चारण नहीं होता।
(२) अत्वन्त शब्द। इस श्रेणी में मत्वन्त, वत्वन्त, क्तवत्वन्त शब्द तथा
डवतुंप्रत्ययान्त सर्वनाम 'भवत्' शब्द आता है। मत्वन्तों और क्तवत्वन्तों का बृहत्
सङ्ग्रह इस व्याख्या के अपने-अपने प्रकरणों में देखें।
(३) शत्रन्त शब्द। इस श्रेणी में अभ्यस्त शत्रन्तों को छोड़कर अन्य सब
शत्रन्त शब्द आ जाते हैं।
४५६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
(४) अभ्यस्त शतृन्त। इस श्रेणी में ददत्, दधत् प्रभृति जुहोत्यादिगण के
शतृन्त तथा जक्षत् आदि अदादिगण के सात शतृन्त सम्मिलित हैं।
बालकों के अभ्यासार्थ कुछ तकारान्त शब्द नीचे सार्थ लिखे जाते हैं। इन के
आगे १, २, ३, ४ के अङ्क इन की उपर्युक्त श्रेणी के बोधक हैं—
१ विद्यावान् (२) = विद्वान् । १३ विचारवान् (२) = विचार वाला
२ पचत् (३) = पकाता हुआ । १४ मधुमत् (२) = मिठासयुक्त, मीठा
३ वेविषत् (४) = व्याप्त होता हुआ । १५ सुमहत् (१) = बहुत वडा
४ चकासत् (४) = चमकता हुआ। । १६ जुह्वत् (४) = होम करता हुआ
५ भक्तिमत् (२) = भक्तिवाला, भक्त । १७ भूतवत् (२) = हो चुका हुआ
६ महत् (१) = वडा । १८ पृच्छत् (३) = पूछता हुआ
७ नेनिजत् (४) = शुद्ध करता हुआ । १९ शासत् (४) = शासन करता हुआ
८ गुणवत् (२) = गुणो वाला, गुणी । २० हतवत् (२) = मार चुका हुआ
६ दरिद्रत् (४) = दरिद्र होता हुआ । २१ जहत् (४) = छोड़ता हुआ
१० चिन्तयत् (३) = सोचता हुआ । २२ दीव्यत् (३) = चमकता हुआ
११ जाग्रत् (४) = जागता हुआ । २३ वेव्यत् (४) = जाता हुआ
१२ विचारयत् (३) = विचार करता हुआ । २४ सृष्टवत् (२) = पैदा कर चुका हुआ
(यहां तकारान्त पुल्लिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।)
अभ्यास (४४)
(१) अभ्यस्तसंज्ञा का सूत्र लिख कर इस संज्ञा का प्रयोजन स्पष्ट करें।
(२) जक्षित्यादयः षट् में षट् कहने पर भी सात धातुएं कैसे हो जाती हैं?
(३) उभे अभ्यस्तम् में 'उभे' ग्रहण का क्या प्रयोजन है?
(४) सर्वनामसंज्ञक भवत् तथा शतृन्त भवत् शब्दों में क्या अन्तर है?
(५) तकारान्त पुल्लिङ्ग चार प्रकार के हैं—सोदाहरण स्पष्ट करें।
(६) भवतुं शब्द की सर्वनामसंज्ञा क्यो की जाती है?
(७) जक्षित्यादि सात धातुएं कौन सी हैं?
(८) अनन्तरस्य विधिर्वा० परिभाषा का सोदाहरण विवेचन करें।
(६) सान्तमहतः संयोगस्य और उभे अभ्यस्तम् सूत्रो की व्याख्या करें।
(१०) उभे अभ्यस्तम् सूत्र में स्वरसन्धि क्यो नहीं हुई?
(११) निम्नलिखित रूपों की सूत्रनिर्देशपूर्वक साधनप्रक्रिया लिखें—
भवान्, महान्तौ, धीमन्त, ददतम्, जक्षती।
(१२) प्राणवन्, जाग्रत्, अतिमहत्, बिभ्यत्, अधीतवन्, धनवत्—इन शब्दो -
की प्रथमा के एकवचन में साधनप्रक्रिया दर्शाते हुए रूपमाला लिखें।
(१३) नुम् की अपेक्षा अत्वसन्तस्य० पहले क्यो प्रवृत्त हो जाता है?
हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४५७
[लघु०] गुप्, गुव् । गुपौ । गुपः । गुब्भ्याम् ॥
व्याख्या—गुप्(रक्षा करने वाला) । गोपायतीति — गुप् । गुपू रक्षणे (भ्वा०
प०) इत्यस्मात् क्विप् च (८०२) इति क्विपि तस्य च सर्वापहारलोपे 'गुप्' इति
शब्दः सिध्यति । रूपमाला यथा—
प्र० गुप्-व्* गुपौ गुपः प० गुपः गुब्भ्याम् गुब्भ्यः
द्वि० गुपम् ,, गुपः ष० ,, गुपोः गुपाम्
तृ० गुपा गुब्भ्याम्‡ गुब्भिः स० गुपि ,, गुप्सु†
च० गुपे ,, गुब्भ्यः सं० हे गुप्-व् ! हे गुपौ ! हे गुपः !
*सुंलोप, जश्त्व, चर्व्व । ‡झलां जशोऽन्ते । †जश्त्व, चर्व्व ।
(यहां पकारान्त पुंलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।)
—:०:—
अब शकारान्त पुंलिङ्गों का वर्णन करते है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्— (३४७) त्यदादिषु दृशोऽनालोचने कञ् च । ३।२।६०॥
त्यदादिषूपपदेष्वज्ञानार्थाद् दृशेः कञ् स्याच्चात् क्विन्न् ॥
अर्थः— त्यद् आदि शब्दों के उपपद रहने पर ज्ञानभिन्न अर्थ के वाचक 'दृश्'
धातु से कञ् तथा क्विन् प्रत्यय हो ।
व्याख्या—त्यदादिषु ।७।३। दृशः ।५।१। अनालोचने ।७।१। कञ् ।१।१। च
इत्यव्ययपदम् । क्विन्न् ।१।१। (स्पृशोऽनुदके क्विन् से) । समासः—आलोचनं ज्ञानम्, न
आलोचनाम् = अनालोचनम्, तस्मिन् = अनालोचने । नञ्तत्पुरुषसमासः । अर्थः—
(त्यदादिषु) त्यद् आदि उपपद अर्थात् समीप ठहरने पर (अनालोचने) ज्ञान से भिन्न अर्थ
में (दृशः) दृश् धातु से (कञ्) कञ् प्रत्यय (च) तथा (क्विन्न्) क्विन्न् प्रत्यय होता है ।
अष्टाध्यायी के तृतीयाध्याय के प्रथमपाद में धातोः (७६६) यह अधिकार
चलाया गया है । यह अधिकार तृतीयाध्याय की समाप्तिपर्यन्त जाता है । इस अधि-
कार में सप्तम्यन्त पदों की तत्रोपपदं सप्तमीस्थम् (६५३) सूत्र द्वारा उपपदसञ्ज्ञा की
जाती है । उपपदसञ्ज्ञा का प्रयोजन उपपदमतिङ् (६५४) सूत्र द्वारा समास कर पूर्व-
निपात करना है । यह सब समासों में स्पष्ट हो जायेगा । यहां पर 'त्यदादिषु' सप्त-
म्यन्त होने से उपपद है ।
तादृश् (उसके समान दिखाई देने वाला अर्थात् वैसा) । स इव पश्यतीति विग्रहः ।
कर्मकर्तरि प्रयोगः । ज्ञानविषयो भवतीत्यर्थः । दृशेरत्र ज्ञानविषयत्वापत्तिमात्रवृत्तित्वा-
दज्ञानार्थता । 'तद्'पूर्वक अज्ञानार्थक' दृश् (भ्वा० प०) धातु से त्यदादिषु० (३४७)
१. यहां दृश् धातु का अर्थ देखना नहीं अपितु कर्मकर्तृप्रक्रियावशात् दिखाई देना या
दीखना है । 'देखना' ज्ञान है, दीखना नहीं । अतः यह अज्ञानार्थक है । यदि दृश्
धातु ज्ञानार्थक होगी तो ये कञ्-क्विन् न होंगे, तब कर्मण्यण् (७६०) से अण्
४५८ भैम्याख्ययोपेताया लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
सूत्र से कञ् और पक्ष में क्विन् प्रत्यय होकर—१ कञ्पक्ष में —तद् दृश् +कञ्¹=
तद् दृश् + अ = तद् दृश । क्विन्-पक्ष में—तद् दृश्+क्विन्= तद् दृश् । अब दोनों
पक्षों में अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३४८) आ सर्वनाम्नः ।६।३।९०॥
सर्वनाम्न आकारोऽन्तादेशः स्याद् दृग्दृशवतुंषु । तादृक्, तादृग् ।
तादृशी । तादृशः । तादृग्भ्याम् ॥
अर्थ—दृग्, दृश या वतुं परे हो तो सर्वनाम को आकार अन्तादेश हो।
व्याख्या—दृग्दृशवतुंषु ।७।३। (दृग्दृशवतुंषु में) । सर्वनाम्नः ।६।१। आ ।१।१।
(छन्दोवत्सूत्राणि भवन्ति इस अतिदेश से यहां सुपां सुलुक्० द्वारा प्रथमा का लुक् हो
जाता है) । अर्थ —(दृग्दृशवतुंषु) दृग्, दृश या वतुं परे होने पर (सर्वनाम्नः) सर्वनाम
के स्थान पर (आ) आकार आदेश हो जाता है। अलोऽन्त्यविधि से यह आदेश सर्व-
नाम के अन्त्य अन् के स्थान पर होता है।
यहां 'दृग्' से तात्पर्य क्विबन्त दृश् से तथा 'दृश' से तात्पर्य कञन्त दृश् से है।
इस सूत्र से दोनों पक्षों में 'तद्' इस सर्वनाम के दकार को आकार हो कर
सवर्णदीर्घ करने से कञ्पक्ष में 'तादृश' और क्विन्पक्ष में 'तादृश्' बना। कञ्पक्ष वाले
'तादृश' शब्द का उच्चारण पुल्लिङ्ग में 'राम'शब्दवत् होता है। यथा—
प्र० तादृश तादृशौ तादृशा | प० तादृशात् तादृशाभ्याम् तादृशेभ्यः
द्वि० तादृशम् ,, तादृशान् | ष० तादृशस्य तादृशयोः तादृशानाम्
तृ० तादृशेन तादृशाभ्याम् तादृशैः | स० तादृशे ,, तादृशेषु
च० तादृशाय ,, तादृशेभ्यः | सं० हे तादृश ! हे तादृशौ ! हे तादृशाः !
सम्बोधन का प्रयोग प्रायः नहीं देखा जाता। इसी प्रकार—१ यादृश = जैसा
२. एतादृश = ऐसा । ३. त्वादृश = तुझ जैसा । ४. मादृश = मुझ जैसा । ५ अस्मादृश
= हम जैसा । ६ युष्मादृश = तुम सब जैसा । ७ भवादृश = आप जैसा । ८ कीदृश²
= कैसा । ६ ईदृश = ऐसा । इत्यादि शब्दों के कञ्पक्ष में रूप बनते हैं³ ।
'तादृश्' यहां क्विबन्तपक्ष में प्रक्रिया यथा—'तादृश् + स्' यहां सुँ लोप हो कर
प्रत्यय होगा । यथा—तम्पश्यतीति तादृशं । यहां अण् परे रहते लघूपधगुण हो कर
उपपदसमास हो जाता है ।
१. कञ् में ककार की लशक्वतद्धिते (१३६) से तथा ञकार की हलन्त्यम् (१) से
इत्सञ्ज्ञा हो जाती है। 'अ' मात्र शेष रहता है। क्विन् प्रत्यय का पूर्वोक्तरीत्या
सर्वापहारलोप हो जाता है।
२. इदम्किमोरीश्की (११६७) सूत्र से इदम् को 'ईश्' तथा किम् को 'की' आदेश ।
३ स्त्रीलिङ्ग में टिड्ढाणञ्० (१२४७) से ङीप् हो कर 'नदी' की तरह तथा नपुंसक
में 'ज्ञान' की तरह रूप होंगे। वत्वन्त में आत्व के उदाहरण—'यावत्, तावत्,
एतावत्' आदि समझने चाहिये ।
हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४५६
क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४) सूत्र के असिद्ध होने से व्रश्च-भ्रस्ज० (३०७) सूत्र द्वारा
शकार को षकार हो जाता है—तादृष्। झलां जशोऽन्ते (६७) से षकार को डकार
तथा क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४) से डकार को गकार हो कर—'तादृग्'। अब वाऽवसाने
(१८४६) से वैकल्पिक चर्त्व करने पर—'तादृक्, तादृग्' ये दो रूप बनते हैं। क्विबन्त
'तादृश्' की समग्र रूपमाला यथा—
प्र० तादृक्-ग् तादृशौ तादृशः | प० तादृशः तादृग्भ्याम् तादृग्भ्यः
द्वि तादृशम् ,, तादृशः | ष० ,, तादृशोः तादृशाम्
तृ तादृशा तादृग्भ्याम्‡ तादृग्भिः | स० तादृशि ,, तादृक्षु†
च० तादृशे ,, तादृग्भ्यः | सं० हे तादृक्-ग्! तादृशौ! तादृशः!
‡ भ्याम् आदि में क्रमशः षत्व, डत्व और कुत्व हो जाते हैं।
† षत्व, डत्व और कुत्व हो कर खरि च (७४) के असिद्ध होने से प्रथम
आदेशप्रत्यययोः (१५०) से षत्व कर पुनः चर्त्व हो जाता है।
इसी प्रकार—१. यादृश् = जैसा। २. एतादृश् = ऐसा। ३. त्वादृश् = तुझ
जैसा। ४. मादृश् = मुझ जैसा। ५. अस्मादृश् = हम जैसा। ६. युष्मादृश् = तुम सब
जैसा। ७. भवादृश् = आप जैसा। ८. कीदृश् = कैसा। ६. ईदृश् = ऐसा। इत्यादि
क्विबन्त शब्दों के रूप बनते हैं। स्त्रीलिङ्ग में भी क्विन्-प्रत्ययान्तों के इसी प्रकार
रूप बनते हैं। नपुंसक में प्रथमा-द्वितीया को छोड़ कर इसी तरह।
[लघु०] व्रश्च० (३०७) इति षः। जश्त्व-चर्त्वे। विट्, विड्। विशौ।
विशः। विड्भ्याम्॥
व्याख्या—विश् = वैश्य अथवा प्रजा। विश प्रवेशने (तुदा० प०) धातु से
क्विँप् प्रत्यय करने से 'विश्' शब्द निष्पन्न होता है।
विश्+स्। सुँलोप, व्रश्च-भ्रस्ज० (३०७) से शकार को षकार, जश्त्व से
षकार को डकार तथा वाऽवसाने (१८४६) द्वारा वैकल्पिक चर्त्व-टकार करने पर 'विट्,
विड्' दो प्रयोग सिद्ध होते हैं। रूपमाला यथा—
प्र० विट्,-ड् विशौ विशः | प० विशः विड्भ्याम् विड्भ्यः
द्वि० विशम् ,, ,, | ष० ,, विशोः विशाम्
तृ० विशा विड्भ्याम्* विड्भिः | स० विशि ,, विट्सु,-ट्सुं†
च० विशे ,, विड्भ्यः | सं० हे विट्,-ड्! हे विशौ! हे विशः!
- व्रश्च० (३०७) द्वारा षत्व तथा झलां जशोऽन्ते (६७) से डत्व होता है।
† षत्व, डत्व तथा धुट्प्रक्रिया (८४)।
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३४६) नशोर्वा ।८।२।६३॥
नशोः कवर्गोऽन्तादेशो वा स्यात् पदान्ते। नक्, नग्। नट्, नड्। नशौ।
नशः। नग्भ्याम्, नड्भ्याम्॥
अर्थः—पदान्त में नश् शब्द को विकल्प कर के कवर्ग अन्तादेश होता है।
४६० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
व्याख्या—नशो ।६।१। वा इत्यव्ययपदम् । कु ।१।१। (क्विन्प्रत्ययस्य कु म्)।
पदस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। अन्ते ।७।१। (स्कोः संयोगाद्योरन्ते च स) । अर्थ —
(नशेः) नश् के स्थान पर (वा) विकल्प करके (कु) कवर्ग आदेश होता है (पदस्य)
पद के (अन्ते) अन्त में । अलोऽन्त्यविधि से यह आदेश अन्त्य अल् के स्थान पर
होगा ।
नश् (नाश होने वाला, नश्वर) । णश अदर्शने (दिवा० प०) धातु से क्विप्
प्रत्यय करने पर 'नश्' शब्द निष्पन्न होता है । नश्यतीति नक् ।
नश् + सु् । सुँलोप होकर नशोर्वा (८ २ ६३) के असिद्ध होने से व्रश्च-भ्रस्ज०
(८ २ ३६) द्वारा शकार को षकार तथा झलां जशोऽन्ते (६७) से षकार को डकार
हो कर—नड् । अब एक पक्ष में नशोर्वा (३४६) से कवर्ग—गकार हो जाता है, तब
वैकल्पिक चर्त्व करने पर—'नक्, नग्' । दूसरे पक्ष में केवल चर्त्व करने में—'नट्,
नड्' । इस प्रकार चार प्रयोग सिद्ध होते हैं । रूपमाला यथा—
प्रथमा नक्, नग्, नट्, नड् नशौ नशः
द्वितीया नशम् " "
तृतीया नशा नग्भ्याम्, नड्भ्याम्* नग्भिः, नड्भिः *
चतुर्थी नशे " " नग्भ्यः, नड्भ्यः *
पञ्चमी नशः " " " "
षष्ठी " नशोः नशाम्
सप्तमी नशि " नक्षु, नट्त्सु, नट्सु†
सम्बोधन हे नक्, नग्, नट्, नड् ! हे नशौ ! हे नशः !
- षत्वे, जश्त्वेन डत्वे, नशोर्वा (३४६) इति विकल्पेन कुत्वे रूपद्वयम् ।
† षत्वे डत्वे वा कुत्वम् । कुत्वे चर्त्वं कुत्वाभावे धुट्प्रक्रियाविकल्पः ।
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३५०) स्पृशोऽनुदके क्विन् ३।२।५८॥
अनुदके सुंप्युपपदे स्पृशेः क्विन् । घृतस्पृक्, घृतस्पृग् । घृतस्पृशौ ।
घृतस्पृशः ॥
अर्थ—'उदक' शब्द से भिन्न अन्य सुबन्त उपपद हो तो 'स्पृश्' धातु से परे
क्विन् प्रत्यय होता है ।
व्याख्या—स्पृशः ।५।१। अनुदके ।७।१। क्विन् ।१।१। सुपि ।७।१। (सुपि स्थ
से) । अर्थ—(अनुदके) उदकभिन्न' (सुंपि) सुबन्त उपपद हो तो (स्पृशः) स्पृश्
धातु से परे (क्विन्) क्विन् प्रत्यय होता है ।
१ यदि 'उदक' उपपद हो तो स्पृश् में क्विन् नहीं होगा, किन्तु कर्मण्यण् (७६०)
द्वारा सामान्यविहित अण् प्रत्यय होकर 'उदकस्पर्श' बन जायगा । यद्यपि 'उदक'
उपपद होने पर क्विप् प्रत्यय करने में भी 'उदकस्पृश्' शब्द निष्पन्न हो सकता
है और क्विन्प्रत्ययस्य कु (३०४) में बहुव्रीहिसमास के आश्रयण से कुत्व भी हो
हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४६१
घृतस्पृश् (घी को छूने वाला) । घृतं स्पृशतीति घृतस्पृक् । यहां स्पृश् (तुदा०
प०) धातु के उपपद में 'उदक' शब्द नहीं है किन्तु 'घृत' सुबन्त है, अतः स्पृशोऽनुदके
क्विन् (३५०) से क्विन्प्रत्यय, उस का सर्वापहारलोप तथा उपपदसमास करने से
'घृतस्पृश्' शब्द निष्पन्न होता है ।
घृतस्पृश् + स् । सुँलोप, व्रश्चभ्रस्ज० (३०७) से शकार को षकार, झलां
जशोऽन्ते (६७) से षकार को डकार, क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४) से डकार को गकार
तथा वाऽवसाने (१४६) में वैकल्पिक चर्व-ककार करने पर—'घृतस्पृक्, घृतस्पृग्' ये
दो रूप सिद्ध होते हैं । समग्र रूपमाला यथा —
प्र० घृतस्पृक्-ग् घृतस्पृशौ घृतस्पृशः | प० घृतस्पृशः घृतस्पृग्भ्याम् घृतस्पृग्भ्यः
द्वि० घृतस्पृशम् ,, ,, | प० ,, घृतस्पृशोः घृतस्पृशाम्
तृ० घृतस्पृशा घृतस्पृग्भ्याम् घृतस्पृग्भिः | स० घृतस्पृशि ,, घृतस्पृक्षु
च० घृतस्पृशे ,, घृतस्पृग्भ्यः | सं० हे घृतस्पृक्-ग्! घृतस्पृशौ! घृतस्पृशः!
भ्याम् आदियों में क्रमशः षत्व, डत्व और कुत्व हो जाता है ।
इसी प्रकार—मन्त्रस्पृश्, जलस्पृश्, तृणस्पृश्, वारिस्पृश्, स्पृश् (यह क्विबन्त
है, यहां भी 'क्विन्प्रत्ययो यस्मात्' इस प्रकार बहुव्रीहि के आश्रयण से कुत्व हो जाता
है) आदि शब्दों के रूप बनते हैं ।
(यहां शकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है ।)
अब षकारान्त पुंल्लिङ्गों का वर्णन करते हैं—
[लघु०] दधृक्, दधृग् । दधृषौ । दधृषः । दधृग्भ्याम् ॥
व्याख्या—'दधृष्' शब्द ऋत्विग्दधृक्० (३०१) सूत्र द्वारा धिष्णीं (ग्वा०
प०) धातु से क्विबन्त निपातित होता है ।
दधृष् + स् । सुँ-लोप, जश्त्व से डकार, क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४) से गकार
तथा वैकल्पिक चर्व से ककार होकर—'दधृक्, दधृग्' ये दो प्रयोग सिद्ध होते हैं ।
- दधृष् (तिरस्कार करने वाला) शब्द की रूपमाला यथा—
प्र० दधृक्-ग् दधृषौ दधृषः | प० दधृषः दधृग्भ्याम् दधृग्भ्यः
द्वि० दधृषम् ,, ,, | प० ,, दधृषोः दधृषाम्
तृ० दधृषा दधृग्भ्याम्† दधृग्भिः | स० दधृषि ,, दधृक्षु
च० दधृषे ,, दधृग्भ्यः | सं० हे दधृक्-ग्! हे दधृषौ! हे दधृषः!
† क्रमशः जश्त्व से डकार और कुत्व से गकार हो जाता है ।
सकता है तथापि 'अनुदके' कथन के कारण क्विन् भी नहीं होता, ऐसा काशिका-
कार आदि प्राचीन वैयाकरणों का मत है; परन्तु नव्य लोगों का कथन है कि
क्विन् प्रत्यय तो हो जाता है परन्तु 'अनुदक' कथन के सामर्थ्य से कुत्व नहीं होना ।
अतः क्विबन्त के 'उदकस्पृट्' आदि रूप बनते हैं ।
४६२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
[लघु०] रत्नमुट्, रत्नमुड् । रत्नमुषौ । रत्नमुड्भ्याम् ॥
व्याख्या - रत्नमुष् (रत्न चुराने वाला) । रत्नानि मुष्णातीति रत्नमुट् ।
रत्नकर्म के उपपद होने पर मुष स्तेये (क्र्या० प०) धातु से क्विप् प्रत्यय करने पर
उपपदसमास होकर 'रत्नमुष्' शब्द निष्पन्न होता है। यह क्विबन्त नहीं अतः क्विन्प्रत्य-
यस्य कु (३०४) द्वारा कुत्व नहीं होता ।
रत्नमुष् + स् । सुँलोप, जश्त्व से डकार तथा वैकल्पिक चर्त्व से टकार हो
कर— 'रत्नमुट्, रत्नमुड्' ये दो प्रयोग सिद्ध होते हैं। इस की रूपमाला यथा —
प्र० रत्नमुट्-ड् रत्नमुषौ रत्नमुषः प० रत्नमुषः रत्नमुड्भ्याम् रत्नमुड्भ्यः
द्वि० रत्नमुषम् ,, ,, ष० ,, रत्नमुषोः रत्नमुषाम्
तृ० रत्नमुषा रत्नमुड्भ्याम् रत्नमुड्भिः स० रत्नमुषि ,, रत्नमुट्सु,-ट्सु
च० रत्नमुषे ,, रत्नमुड्भ्यः स० हे रत्नमुट्-ड्! रत्नमुषौ! रत्नमुषः!
भ्याम् आदियों में झलां जशोऽन्ते (६७) में जश्त्व-डकार हो जाता है ।
[लघु०] षट्, षड् । षड्भिः । षड्भ्यः २ । षण्णाम् । षट्सु, षट्सु ॥
व्याख्या — षो अन्तकर्मणि (दिवा० प०) धातु से पृषोदरादीनि यथोपदिष्टम्
(६ ३ १०८) द्वारा 'षष्' (छ) शब्द निष्पन्न होता है। यह नित्य बहुवचनान्त है।
षष् + अस् (जस् वा शस्) । ष्णान्ता षट् (२६७) से षट्संज्ञा होकर
षड्भ्यो लुक् (१८६) से जस् वा शस् का लुक् हो जाता है। अतः झलां जशोऽन्ते
(६७) से जश्त्व डकार तथा वाऽवसाने (१४६) में वैकल्पिक चर्त्व टकार हो कर—
'षट्, षड्' ये दो प्रयोग सिद्ध होते हैं।
भिस् वा भ्यस् में जश्त्व हो जाता है— षड्भिः, षड्भ्यः ।
षष् + आम् । षट्संज्ञा होकर षट्चतुर्भ्यश्च (२६६) सूत्र से आम् को नुट्
का आगम हो जाता है— षष् + नाम् । अब 'आम्' अजादि नहीं रहा अतः भसंज्ञा न
हुई, स्वादिष्वसर्वनामस्थाने (१६४) में पदसंज्ञा होकर झलां जशोऽन्ते (६७) से
जश्त्व— डकार, ष्टुना ष्टुः (६४) से नकार को णकार तथा प्रत्यये भाषायां नित्यम् (वा०
११) से डकार को भी णकार करने पर 'षण्णाम्' प्रयोग सिद्ध होता है । ध्यान रहे कि
यहां पदान्त होने पर भी न पदान्ताट्टोरनाम् (६५) सूत्र से ष्टुत्व का निषेध नहीं
होता, क्योंकि उस में 'अनाम्' कह कर 'नाम्' के विषय में छूट दे दी गई है ।
षष् + सु(सुप्) यहां पदान्त में जश्त्व - डकार होकर ङः सि धुट् (८४) से
वैकल्पिक धुट् आगम तथा खरि च (७४) में यथासम्भव दोनों पक्षों में चर्त्व करने से
— 'षट्सु, षट्सु' ये दो प्रयोग सिद्ध होते हैं । रूपमाला यथा—
विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्र० ० ० षट्, षड् प० ० ० षड्भ्यः
द्वि० ० ० ,, ,, ष० ० ० षण्णाम्
तृ० ० ० षड्भिः स० ० ० षट्सु षट्सु
च० ० ० षड्भ्यः सम्बोधन प्रायः नहीं होता ।
हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४६३
ध्यान रहे कि 'पप्' शब्द षट्सञ्ज्ञक होने से तीनों लिङ्गों में एक समान है।
पिपठिष् (पढ़ने की इच्छा करने वाला)। पठितुमिच्छतीति—पिपठीः। पठ्
व्यक्तायां वाचि (भ्वा० प०) धातु से सन्प्रत्यय, द्वित्व, अभ्यासकार्य, अभ्यास को
इकारादेश, इट् आगम तथा आदेशप्रत्यययोः (१५०) से सकार को षकार हो कर—
'पिपठिष'। अब सनाद्यन्ता धातवः (४६८) सूत्र से धातुसञ्ज्ञा कर क्विँप्प्रत्यय, उस
का सर्वापहारलोप तथा अतो लोपः (४७०) से अकार का भी लोप करने पर—
'पिपठिष्' शब्द निष्पन्न होता है। कृदन्त होने से इस की प्रातिपदिकसञ्ज्ञा हो कर
सुँ आदि प्रत्यय उत्पन्न होते हैं।
पिपठिष् + स्। हल्ङ्याब्भ्यो० (१७६) से सुँलोप हो कर—'पिपठिष्'। अब
यहां पदान्त में षकार को रुँत्व करना है परन्तु ससजुषो रुँः (१०५) द्वारा पदान्त
सकार को ही रुँत्व हो सकता है षकार को नहीं, तो यहां कैसे उस की प्रवृत्ति हो ?
इस शङ्का को मन में रख कर इस का समाधान करते हुए ग्रन्थकार लिखते हैं—
[लघु०] रुँत्वं प्रति षत्वस्याऽसिद्धत्वात् ससजुषो रुँः (१०५) इति रुँत्वम्॥
अर्थः—रुँत्वविधि के प्रति षत्वविधि असिद्ध है अतः ससजुषो रुँः (१०५) से
रुँ आदेश हो जायेगा।
व्याख्या—ससजुषो रुँः (८.२.६६) की दृष्टि में आदेशप्रत्यययोः (८.३.५६)
सूत्र त्रिपादी में पर होने के कारण पूर्वत्रासिद्धम् (३१) द्वारा असिद्ध है अतः उस के
किये षकार को वह सकार ही देखता है। इस से 'पिपठिष्' यहां पदान्त में ससजुषो रुँः
(१०५) की प्रवृत्ति हो कर—पिपठिर्ँ = 'पिपठिर्' हुआ। अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता
है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्— (३५१) र्वोरुपधाया दीर्घ इकः ।८।२।७६॥
रेफान्तस्य धातोरुपधाया इको दीर्घः स्यात् पदान्ते। पिपठीः।
पिपठिषौ। पिपठीर्भ्याम् ॥
अर्थः—पदान्त में रेफान्त और वकारान्त धातु की उपधा के इक् को दीर्घ हो।
व्याख्या—र्वोः ।६।२। (धातोः का विशेषण होने से तदन्तविधि हो जाती है)।
धातोः ।६।१। (सिपि धातो र्रुर्वा से)। उपधायाः ।६।१। इकः ।६।१। दीर्घः ।१।१।
पदस्य ।६।१। (अधिकृत है)। अन्ते ।७।१। (स्कोः संयोगाद्योरन्ते च से)। समासः—
र् च व् च—र्वौ, तयोः = र्वोः, इतरेतरद्वन्द्वः। अर्थः—(र्वोः) रेफान्त और वकारान्त
(धातोः = धात्वोः) धातुओं की (उपधायाः) उपधा के (इकः) इक् के स्थान पर (दीर्घः)
दीर्घ हो जाता है (पदस्य) पद के (अन्ते) अन्त में।
'पिपठिर्' यहां रेफान्त धातु है अतः पदान्त में प्रकृतसूत्र से इस की उपधा
ठकारोत्तर इकार को दीर्घ कर—पिपठीर्। अब रेफ को विसर्ग आदेश करने पर—
'पिपठीः' प्रयोग सिद्ध होता है।
पिपठिष् + औ = पिपठिषौ। इत्यादि।
४६४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
'पिपठिष् + भ्याम्' । यहा भी रुँत्व तथा दीर्घ हो कर —पिपठीर्भ्याम् ।
'पिपठिष् + सु' (सुप्)। रुँत्व तथा दीर्घ हो कर—पिपठीर् + सु। अब आदेश-
प्रत्यययो (१५०) से षत्व तथा खरवसानयोर्विसर्जनीय (६३) मे विसर्ग आदेश युग-
पत् प्राप्त होते हैं । परन्तु षत्व के असिद्ध होने से प्रथम विसर्ग आदेश हो जाता है —
पिपठीः सु । पुन वा शरि (१०४) मे विकल्प कर के विसर्ग को विसर्ग और पक्ष में
विसर्जनीयस्य स (१०३) से सकार आदेश हो जाना है—१ पिपठीः सु २ पिपठीस्सु ।
अब इन दोनो रूपो मे क्रमश विसर्ग और सकार का व्यवधान पडने से ईकार—इण्
से परे सकार को आदेशप्रत्यययो (१५०) से षत्व प्राप्त नही हो सकता । इस पर
षत्व करने के लिये अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३५२) नुम्विसर्जनीयशर्व्यवायेऽपि ।८।३।५८॥
एतै प्रत्येक व्यवधानेऽपि इण्कुभ्या परस्य सस्य मूर्धन्यादेश स्यात् ।
ष्टुत्वेन पूर्वस्य ष —पिपठीष्षु । पिपठीः षु ।।
अर्थ —नुम्, विसर्जनीय और शर् इन मे किसी एक के व्यवधान होने पर भी
इण् कवर्ग से परे सकार को मूर्धन्य आदेश हो जाता है ।
व्याख्या—इण्को ।५।२। (यह अधिकृत है) । नुम्विसर्जनीयशर्व्यवाये ।७।१।
अपि इत्यव्ययपदम् । स ।६।१। (सहे साडः स से) । मूर्धन्य ।१।१। (अपदान्तस्य
मूर्धन्य ग) । समास —नुम् च विसर्जनीयश्च शर् च=नुम्विसर्जनीयशर, इतरेतर-
द्वन्द्व । तेषा व्यवाय (व्यवधानम्) =नुम्विसर्जनीयशर्व्यवाय, तस्मिन्=नुम्विसर्ज-
नीयशर्व्यवाये, षष्ठीतत्पुरुष । यहा भाष्यकार ने प्रत्येक का व्यवधान स्वीकार किया
है [प्रत्येक व्यवायशब्द परिसमाप्यत इति भाष्यम्] । अर्थ —(इण्को ) इण् प्रत्या-
हार अथवा कवर्ग से परे (स ) स् के स्थान पर (मूर्धन्य ) मूर्धन्य आदेश (नुम्विसर्ज-
नीयशर्व्यवाये) नुम्, विसर्ग अथवा शर् इन मे से किसी एक का व्यवधान होने पर
(अपि) भी हो जाता है । सकार को मूर्धन्य (मूर्धा स्थान वाला) षकार हो जाता
है—यह पीछे आदेशप्रत्यययो (१५०) सूत्र पर स्पष्ट कर चुके हैं ।
'पिपठीः सु' यहा विसर्ग का व्यवधान तथा 'पिपठीस्सु' यहा शर्-सकार का
व्यवधान होने पर भी इण् ईकार से परे दोनों जगह प्रकृतसूत्र से सकार को मूर्धन्य
षकार हो जाता है—१ पिपठीः षु, २ पिपठीस् षु । अब सकारपक्ष मे ष्टुना ष्टुः (६४)
से सकार को षकार होकर—'१ पिपठीः षु, २ पिपठीष्षु' इस प्रकार दो रूप निष्पन्न
होते हैं । इसकी समग्र रूपमाला यथा—
प्र० पिपठीः , पिपठिषौ पिपठिष | ष० पिपठिष विपठिषो पिपठिषाम्
द्वि० पिपठिषम् ,, ,, | स० पिपठिषि ,, { पिपठीः षु
तृ० पिपठिषा पिपठीर्भ्याम् पिपठीर्भिः | { पिपठीष्षु
च० पिपठिषे , पिपठीर्भ्य | स० हे पिपठीः ! विपठिषौ ! विपठिष !
प० पिपठिष ,, पिपठीर्भ्य | —०—
हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४६५
[लघु०] चिकीः। चिकीर्षौ। चिकीर्भ्याम्। चिकीर्षु ॥
व्याख्या—चिकीर्षू (करने की इच्छा वाला) । कर्तुमिच्छतीति चिकीः।
डुकृञ् करणे (तना० उभ०) धातु से धातोः कर्मणः० (७०५) से सन्प्रत्यय, इको झल्
(७०६) से कित्त्व के कारण गुणाभाव, अज्झनगमां सनि (७०८) से दीर्घ, ऋत इद्धातोः
(६६०) से इत्त्व, रपर, हलि च (६१२) ने उपधादीर्घ, द्वित्व, अभ्यासकार्य, कुहोश्चुः
(४५४) से चुत्व तथा आदेशप्रत्यययोः (१५०) से षत्व हो कर—'चिकीर्ष'। अब
सनाद्यन्ता धातवः (४६८) से धातुसञ्ज्ञा होकर कर्त्ता में क्विँप्, उस का सर्वापहार-
लोप तथा अतो लोपः (४७०) ने अकार का लोप करने पर—'चिकीर्षू' शब्द निष्पन्न
होता है। कृदन्त होने से प्रातिपदिकसंज्ञा हो कर इस से स्वादिप्रत्यय उत्पन्न होते हैं।
'चिकीर्षू + स्' यहाँ सुँलोप होकर संयोगान्तस्य लोपः (२०) के प्राप्त होने
पर रात्सस्य (२०६) के नियमानुसार सकार का लोप हो जाता है—'चिकीर्'। अब
अवसान में खरवसानयोः० (६३) से रेफ को विसर्ग करने पर—'चिकीः' प्रयोग सिद्ध
होता है। इस की रूपमाला यथा—
प्र० चिकीः चिकीर्षौ चिकीर्षः । प० चिकीर्षः चिकीर्भ्याम् चिकीर्भ्यः
द्वि० चिकीर्षम् " " । ष० " चिकीर्षोः चिकीर्षाम्
तृ० चिकीर्षा चिकीर्भ्याम् चिकीर्भिः स० चिकीर्षि " चिकीर्षु*
च० चिकीर्षे " चिकीर्भ्यः सं० हे चिकीः ! चिकीर्षौ ! चिकीर्षः !
† यहां पदान्त में रात्सस्य (२०६) के नियमानुसार सकार का लोप हो जाता
है। ध्यान रहे कि रात्सस्य (८.२.२४) की दृष्टि में षत्व (८.३.५६) असिद्ध है।
वह इसे सकार ही समझता है।
- यहां रोः सुपि (२६८) के नियमानुसार रेफ को विसर्ग आदेश नहीं होता।
अभ्यास (४५)
(१) 'उपपद' किसे कहते हैं ? सूत्र बता कर व्याख्यान करें।
(२) स्पृशोऽनुदके क्विन् सूत्र में 'अनुदके' कथन का क्या प्रयोजन है ?
(३) 'चिकीर्षु' में खर् परे होने पर भी रेफ को विसर्ग क्यों नहीं होता ?
(४) पिपठिष्, तादृश्, चिकीर्षू, घृतस्पृश्— शब्दों की प्रकृतिप्रत्ययनिर्देशपुरःसर
शब्दनिष्पत्ति करें।
(५) 'चिकीर्षू + सुप्' यहां षकार में रात्सस्य सूत्र कैसे प्रवृत्त हो सकता है ?
(६) निम्नलिखित रूपों की सूत्रनिर्देशपूर्वक सिद्धि करें—
१. षट् । २. यादृक् । ३. नक् । ४. षण्णाम् । ५. दधृग्भ्याम् । ६. घृत-
स्पृक् । ७. पिपठीः । ८. विट् । ६. चिकीः । १०. पिपठिष्षु ।
(७) नुम्विसर्जनीयशर्व्यवायेऽपि, र्वोरुपधाया दीर्घ इकः, आ सर्वनाम्नः—इन
सूत्रों की सविस्तर व्याख्या करें।
(८) चिकीर्षू, पिपठिष्, ईदृश्, उदकस्पृश्—शब्दों की रूपमाला लिखें ।
(यहां षकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है ।)
—: : ० : : —
ल० प्र० (३०)
४६६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
अब सकारान्त पुँल्लिङ्ग शब्दों का निरूपण करते हैं—
[लघु०] विद्वान्। विद्वांसौ। हे विद्वन् १॥
व्याख्या—विद् ज्ञाने (अदा० प०) धातु से लँट्, उसके स्थान पर शतृँ, शप्,
उस का लुक् तथा विदेः शतुर्वसुः (८३३) से शतृँ को वसुँ आदेश करने से 'विद्वस्'
शब्द निष्पन्न होता है। वसुँ आदेश में उकार की इत्सञ्ज्ञा होती है अतः 'विद्वस्' शब्द
उगित् है। यह शब्द विशेष्यलिङ्ग के आश्रित होने से त्रिलिङ्गी है। यहां पुँल्लिङ्ग में
इस के रूप दर्शाये जायेंगे।
विद्वस् + सु। उगित् होने से उगिदचां० (२८६) द्वारा नुँम् आगम, सान्त-
महत संयोगस्य (३८२) म सान्तसंयोग के नकार की उपधा को दीर्घ होकर—
विद्वान्स् + स्। अब सुँलोप तथा संयोगान्तस्य लोप (२०) से संयोगान्तलोप करने
से 'विद्वान्' प्रयोग सिद्ध होता है। संयोगान्तलोप के असिद्ध होने से नकार का लोप
नहीं होता। किञ्च सान्त-वस्वन्त न होने म वसुंस्रंसुध्वंस्वनडुहां द (२६२) द्वारा
दत्व भी नहीं होता।
'विद्वस् + औ'। नुँम् आगम तथा सान्तमहत ०(३४२) स दीर्घ हो—विद्वान्स्
- औ। नश्चापदान्तस्य झलि (७८) म नकार को अनुस्वार करने पर 'विद्वांसौ'
प्रयोग सिद्ध होता है। ध्यान रहे कि यय् परे न होने स अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः
(७६) सूत्र प्रवृत्त नहीं होना। कई लोग 'विद्वासौ' वा 'विद्वान्सौ' लिखते हैं—वे ठीक
नहीं। इसी प्रकार—'विद्वांसः' आदि बनते हैं।
विद्वस् + अम् (शस्)। यहां अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३५३) वसोः सम्प्रसारणम् ॥६।४।१३१॥
वस्वन्तस्य भस्य सम्प्रसारणं स्यात्। विदुषः। वसुंस्रंसु० (२६२)
इति द—विद्वद्भ्याम्॥
अर्थ—वसुंप्रत्ययान्त भसञ्ज्ञक अङ्ग को सम्प्रसारण हो जाता है।
व्याख्या—वसोः ६।१। (भस्य का विशेषण होने से अथवा प्रत्यय होने से
तदन्तविधि हो जाती है)। भस्य ६।१। (अधिकृत है)। अङ्गस्य ६।१। (अधिकृत
है)। सम्प्रसारणम् १।१। अर्थ—(वसोः = वस्वन्तस्य) वसुंप्रत्ययान्त (भस्य)
भसञ्ज्ञक (अङ्गस्य) अङ्ग के स्थान पर (सम्प्रसारणम्) सम्प्रसारण हो जाता है।
विद्वस् + शस्। यहां 'विद्वस्' यह वसुंप्रत्ययान्त भसञ्ज्ञक अङ्ग है अतः इस के
द्वितीय वकार [न सम्प्रसारणे सम्प्रसारणम् (२६१) का ध्यान कर लें] को उकार
सम्प्रसारण होकर—विद् उस् + अस्। सम्प्रसारणाच्च (२५८) से पूर्वरूप तथा आदेश-
प्रत्यययो (१५०)१ म प्रत्यय के सकार को षकार करने पर—विदुषस् = 'विदुषः'
१. ऋग्वेद (१।२५।६) के भाष्य में सायणमाधव ने 'दाशुषे' प्रयोग में शासिवसि-
घसीनां च (५५४) में षत्व किया है, पर यह ठीक नहीं। पूर्वोत्तरसाहचर्य से
हलन्त-पुलिंङ्ग-प्रकरणम् ४६७
प्रयोग सिद्ध होता है । इसीप्रकार आगे भी अजादि विभक्तियों में प्रक्रिया होती है ।
‘विद्वस् + भ्याम्’ यहां वसुस्रंसु० (२६२) से पदान्त सकार को दकार होकर
—विद्वद्भ्याम् । इसीप्रकार अन्य हलादि विभक्तियों में भी ।
हे विद्वस् + स् । यहां नुँम्, सुँलोप तथा संयोगान्तलोप करने से—हे विद्वन् ।
सम्बुद्धि परे होने से सान्तमहतः० (३४२) से दीर्घ न होगा ।
विद्वस् (विद्वान्) शब्द की रूपमाला यथा—
प्र० विद्वान् विद्वांसौ विद्वांसः | प० विदुषः विद्वद्भ्याम् विद्वद्भ्यः
द्वि० विद्वांसम् ,, विदुषः | ष० ,, विदुषोः विदुषाम्
तृ० विदुषा विद्वद्भ्याम् विद्वद्भिः | स० विदुषि ,, विद्वत्सु
च० विदुषे ,, विद्वद्भ्यः | सं० हे विद्वन्! हे विद्वांसौ! हे विद्वांसः!
इसीप्रकार निम्नलिखित शब्दों के रूप होते हैं—
शब्द अर्थ प्रत्यय शस् का रूप
१. ऊषिवस् रह चुका क्वसुँ ऊषुपः१
२. तस्थिवस् ठहर चुका ,, तस्थुषः
३. सेदिवस् गमन कर चुका ,, सेदुषः
४. प्रसेदिवस् प्रसन्न हो चुका ,, प्रसेदुषः
५. निपेदिवस् बैठ चुका ,, निपेदुषः
६. निपेतिवस् गिर चुका ,, निपेतुषः
७. ददिवस् दे चुका ,, ददुषः
८. शुश्रुवस् सुन चुका ,, शुश्रुवुषः२
९. उपेयिवस् प्राप्त कर चुका ,, उपेयुषः
१०. अनाश्वस् भोजन न कर चुका ,, अनाशुषः
११. दाश्वस् दे चुका ,, दाशुषः
१२. अधिजिग्मिवस् प्राप्त कर चुका ,, अधिजिग्मुषः
इस सूत्र में ‘वस्’ धातु ही इष्ट है आदेश वा प्रत्यय नहीं । अतः यहां आदेश-
प्रत्यययोः (१५०) से ही षत्व करना चाहिये ।
१. इन में यथासम्भव प्राप्त इट् आगम भसञ्ज्ञकों में प्रवृत्त नहीं होता । अकृतव्यूहाः
पाणिनीयाः (५०) अर्थात् इस व्याकरण शास्त्र में निमित्त को विनाशोन्मुख देख
कर तत्प्रयुक्त कार्य नहीं करना चाहिये । जब ‘वसुँ’ प्रत्यय, भसञ्ज्ञकों में वकार
को सम्प्रसारण हो जाने से वलादि ही नहीं रहता तब तत्प्रयुक्त कार्य वलादि-
लक्षण इट् आगम भी नही होता ।
२. शुश्रुवस् + अस् (शस्) में सम्प्रसारण और पूर्वरूप हो कर ‘शुश्रुउस् + अस्’ इस
दशा में अचि श्नु० (१६६) से धातु के उकार को उवँङ् हो जाता है ।
४६८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
ईयसुन्प्रत्ययान्तों के रूप भी प्राय 'विद्वस्' शब्द की तरह होते हैं। केवल
शसादियों में सम्प्रसारणकार्य तथा भ्याम् आदि मे दत्त्व नहीं होता। निदर्शनार्थ
'श्रेयस्' (दोनों में अधिक अच्छा) शब्द की रूपमाला यथा—
प्र० श्रेयान् श्रेयांसौ श्रेयांस प० श्रेयस श्रेयोभ्याम् श्रेयोभ्यः
द्वि० श्रेयांसम् " श्रेयस प० ,, श्रेयसो. श्रेयसाम्
तृ० श्रेयसा श्रेयोभ्याम्‡ श्रेयोभि स० श्रेयसि " श्रेयस्सु, -स्सु†
च० श्रेयसे " श्रेयोभ्य स० हे श्रेयन् ! श्रेयांसौ ! श्रेयांसः !-
‡ ससजुषो रुः (१०५), हशि च (१०७) । † वा शरि (१०४) ।
इसीप्रकार निम्नस्थ ईयसुंन्प्रत्ययान्त शब्दों के रूप बनते हैं—
१ अणीयस् = दोनों में अधिक सूक्ष्म | १५ नेदीयस् = दोनों में अधिक निकट
२ अल्पीयस् = दोनों में अधिक थोड़ा | १६ पटीयस् = दोनों में अधिक चतुर
३, ऋजीयस् = दोनों में अधिक सरल | १७ पापीयम् – दोनों में अधिक पापी
४. कनीयम् = { दोनों में अधिक युवा | १८ प्रथीयरू = दोनों मे अधिक विस्तृत
{ दोनों मे अधिक छोटा | १६ प्रेयस् = दोनो में अधिक प्रिय
५ क्रशीयस् = दोनों में अधिक कृश | २०, बलीयस् = दोनों में अधिक बलवान्
६ क्षेपीयस् = दोनों में अधिक तेज | २१ भूयम् = दोनो में अधिक मात्रा वाला
७ क्षोदीयस् = दोनों में अधिक क्षुद्र | २२ महीयस् = दोनों में अधिक बड़ा
८ गरीयस् = दोनों में अधिक भारी | २३. म्रदीयम् = दोनों में अधिक मृदु
६. जवीयस् = दोनों में अधिक वेगवान् | २४ यवीयम् = दोनों में अधिक युवा
१०. ज्यायस् = { दोनों में अधिक प्रशस्य | २५ लघीयम् = दोनों में अधिक छोटा
{ दोनों में अधिक वृद्ध | २६. वरीयस् = दोनों में अधिक विशाल
११ दवीयस् = दोनों में अधिक दूर | २७. साधीयस् = दोनों में अधिक अच्छा
१२ द्रढीयस् = दोनों में अधिक दृढ | २८. स्थवीयस् = दोनों में अधिक स्थूल
१३ द्राघीयम् = दोनों में अधिक दीर्घ | २६. स्थेयस् = दोनों में अधिक स्थिर
१४ धनीयम् = दोनों में अधिक धनी | ३०. ह्रसीयस् = दोनों में अधिक छोटा
नोट–जब ईयसुंन्प्रत्ययान्त शब्द स्त्रीलिङ्ग में आते हैं तब उगिदचश्च (१२४६),
से ङीप् प्रत्यय होकर – श्रेयसी, अल्पीयसी, कनीयसी, प्रभृति शब्द बन जाते हैं। वसुं-
प्रत्ययान्तों में भी स्त्रीत्व में ङीप् होता है परन्तु सम्प्रसारण विशेष होता है। यथा—
विदुषी, स्तुषी आदि । इन सब का उच्चारण नदीशब्दवत् समझना चाहिये। नपुंसक
में वस्वन्तों को पदान्त मे दत्व होगा - विद्वत्, विदुषी, विद्वांसि आदि।
[लघु०] विधि-सूत्रम्— (३५४) पुंसोऽसुङ् ।७।१।८६॥
सर्वनामस्थाने विवक्षिते पुसोऽसुङ् स्यात् । पुमान् । हे पुमन् । पुमांसौ ।
पुंसः । पुम्भ्याम् । पुंसु ॥
अर्थ.—सर्वनामस्थान की विवक्षा हो तो 'पुस्' को असुङ् आदेश होता है।
व्याख्या—सर्वनामस्थाने ।७।१। (इतोऽत्सर्वनामस्थाने से) । पुमः ।६।१।
हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४६६
असुँङ् ।१।१। 'सर्वनामस्थाने' में परसप्तमी मानने से 'परमपुमान्' यहां अनिष्ट स्वर
प्राप्त होता है । अतः विषय-सप्तमी मान कर 'विवक्षिते' का अध्याहार कर लेते हैं।
अर्थः—(सर्वनामस्थाने) सर्वनामस्थान विवक्षित होने पर (पुंसः) पुंस् शब्द के स्थान
पर (असुंङ्) असुंङ् आदेश हो जाता है ।
सर्वनामस्थान (सुं, औ, जस्, अम्, औट्) लाने से पूर्व उस के लाने की इच्छा-
मात्र होने पर ही असुंङ् आदेश हो जाता है। असुंङ् डित् है, अतः वह ङिच्च (४६)
द्वारा 'पुंस्' के अन्त्य अल्-सकार के स्थान पर होता है ।
पुंस् (पुरुष)। पूञ् पवने(भ्वा० उभ०) धातु से पूजो डुम्सुन्¹(उणा० ६१८)
द्वारा 'डुम्सुन्' प्रत्यय हो कर उणादयो बहुलम् (८४८) सूत्र में बहुलग्रहणसामर्थ्य से
आदिर्निटुडवः(४६२) द्वारा डु की इत्सञ्ज्ञा नहीं होती किन्तु चुटू (१२६) से केवल
डकार की ही इत्सञ्ज्ञा होकर उस का तथा उँन् अनुबन्ध का लोप करने से—पू+
उम्स् । डित्त्वकरणसामर्थ्य से टि का भी लोप हो कर—प्+उम्स्=पुम्स् । अब
नश्चापदान्तस्य झलि (७८) द्वारा अपदान्त मकार को अनुस्वार करने पर 'पुंस्' शब्द
निष्पन्न होता है ।
अब 'सुं' सर्वनामस्थान करने की इच्छामात्र में, प्रत्यय करने से पूर्व हीं पुंसो-
ऽसुंङ् (३५४) द्वारा सकार को असुंङ् आदेश होने पर निमित्तापाये नैमित्तिकस्याप्यपायः
से अनुस्वार भी अपने पूर्वस्वरूप मकार में परिणत हुआ—पुमस् । अब सुंप्रत्यय लाने
पर उगिदचांम्०(२८६) से नुँम्, अनुबन्धलोप, सान्तमहत ० (३४२) से दीर्घ, सुंलोप
तथा संयोगान्तलोप होकर—'पुमान्' प्रयोग सिद्ध होता है ।
सम्बुद्धि में केवल सान्तमहतः०(३४२) से दीर्घ नहीं होता शेष सब प्रक्रिया
सुंप्रत्ययवत् जानें—हे पुमन् ! ।
पुंस्+औ=पुमस्+औ । नुँम्, दीर्घ तथा अनुस्वार होकर—पुमांसौ । इसी
प्रकार अन्य सर्वनामस्थान प्रत्ययों में भी जान लें ।
अब आगे शसादि विभक्तियों की विवक्षा में असुँङ् न होगा । पुंस्+अस्
(शस्) = पुंसः ।
पुंस्+भ्याम् । यहां संयोगान्तस्य लोपः (२०) से संयोगान्त² सकार का लोप
होकर निमित्तापाये नैमित्तिकस्याप्यपायः इस न्यायानुसार अनुस्वार पुनः मकाररूप में
परिणत हो जाता है—पुम्+भ्याम् । अब मोऽनुस्वारः (७७) से पदान्त मकार को
१. 'पातेर्डुम्सुन्' इति पाठान्तरम् । सूतेः सस्य पः ह्रस्वो म्सुंप्रत्यय इति स्त्रियामिति
सूत्रे भाष्य उक्तम् । न्यासे तु—'पुनातेर्मक्सुँन् ह्रस्वश्चे'ति पठितम् । उपेयप्रति-
पत्त्यर्था उपाया अव्यवस्थिता इति तत्त्वम् ।
२. अयोगवाहों (यम, अनुस्वार, विसर्ग, जिह्वामूलीय, उपध्मानीय) की गणना अट्-
प्रत्याहार तथा शर्प्रत्याहार में भाष्यकार ने स्वीकार की है । इस से अनुस्वार को
हल् मान कर हलोऽनन्तराः संयोगः(१३) से संयोगसञ्ज्ञा हो जाती है ।