सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 475, कुल 633 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 475

४६० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
व्याख्या—नशो ।६।१। वा इत्यव्ययपदम् । कु ।१।१। (क्विन्प्रत्ययस्य कु म्)।
पदस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। अन्ते ।७।१। (स्कोः संयोगाद्योरन्ते च स) । अर्थ —
(नशेः) नश् के स्थान पर (वा) विकल्प करके (कु) कवर्ग आदेश होता है (पदस्य)
पद के (अन्ते) अन्त में । अलोऽन्त्यविधि से यह आदेश अन्त्य अल् के स्थान पर
होगा ।
नश् (नाश होने वाला, नश्वर) । णश अदर्शने (दिवा० प०) धातु से क्विप्
प्रत्यय करने पर 'नश्' शब्द निष्पन्न होता है । नश्यतीति नक् ।
नश् + सु् । सुँलोप होकर नशोर्वा (८ २ ६३) के असिद्ध होने से व्रश्च-भ्रस्ज०
(८ २ ३६) द्वारा शकार को षकार तथा झलां जशोऽन्ते (६७) से षकार को डकार
हो कर—नड् । अब एक पक्ष में नशोर्वा (३४६) से कवर्ग—गकार हो जाता है, तब
वैकल्पिक चर्त्व करने पर—'नक्, नग्' । दूसरे पक्ष में केवल चर्त्व करने में—'नट्,
नड्' । इस प्रकार चार प्रयोग सिद्ध होते हैं । रूपमाला यथा—
प्रथमा नक्, नग्, नट्, नड् नशौ नशः
द्वितीया नशम् " "
तृतीया नशा नग्भ्याम्, नड्भ्याम्* नग्भिः, नड्भिः *
चतुर्थी नशे " " नग्भ्यः, नड्भ्यः *
पञ्चमी नशः " " " "
षष्ठी " नशोः नशाम्
सप्तमी नशि " नक्षु, नट्त्सु, नट्सु†
सम्बोधन हे नक्, नग्, नट्, नड् ! हे नशौ ! हे नशः !

  • षत्वे, जश्त्वेन डत्वे, नशोर्वा (३४६) इति विकल्पेन कुत्वे रूपद्वयम् ।
    † षत्वे डत्वे वा कुत्वम् । कुत्वे चर्त्वं कुत्वाभावे धुट्प्रक्रियाविकल्पः ।
    [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३५०) स्पृशोऽनुदके क्विन् ३।२।५८॥
    अनुदके सुंप्युपपदे स्पृशेः क्विन् । घृतस्पृक्, घृतस्पृग् । घृतस्पृशौ ।
    घृतस्पृशः ॥
    अर्थ—'उदक' शब्द से भिन्न अन्य सुबन्त उपपद हो तो 'स्पृश्' धातु से परे
    क्विन् प्रत्यय होता है ।
    व्याख्या—स्पृशः ।५।१। अनुदके ।७।१। क्विन् ।१।१। सुपि ।७।१। (सुपि स्थ
    से) । अर्थ—(अनुदके) उदकभिन्न' (सुंपि) सुबन्त उपपद हो तो (स्पृशः) स्पृश्
    धातु से परे (क्विन्) क्विन् प्रत्यय होता है ।
    १ यदि 'उदक' उपपद हो तो स्पृश् में क्विन् नहीं होगा, किन्तु कर्मण्यण् (७६०)
    द्वारा सामान्यविहित अण् प्रत्यय होकर 'उदकस्पर्श' बन जायगा । यद्यपि 'उदक'
    उपपद होने पर क्विप् प्रत्यय करने में भी 'उदकस्पृश्' शब्द निष्पन्न हो सकता
    है और क्विन्प्रत्ययस्य कु (३०४) में बहुव्रीहिसमास के आश्रयण से कुत्व भी हो