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सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 478, कुल 633 में से

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पृष्ठ 478

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४६३
ध्यान रहे कि 'पप्' शब्द षट्सञ्ज्ञक होने से तीनों लिङ्गों में एक समान है।
पिपठिष् (पढ़ने की इच्छा करने वाला)। पठितुमिच्छतीति—पिपठीः। पठ्
व्यक्तायां वाचि (भ्वा० प०) धातु से सन्प्रत्यय, द्वित्व, अभ्यासकार्य, अभ्यास को
इकारादेश, इट् आगम तथा आदेशप्रत्यययोः (१५०) से सकार को षकार हो कर—
'पिपठिष'। अब सनाद्यन्ता धातवः (४६८) सूत्र से धातुसञ्ज्ञा कर क्विँप्प्रत्यय, उस
का सर्वापहारलोप तथा अतो लोपः (४७०) से अकार का भी लोप करने पर—
'पिपठिष्' शब्द निष्पन्न होता है। कृदन्त होने से इस की प्रातिपदिकसञ्ज्ञा हो कर
सुँ आदि प्रत्यय उत्पन्न होते हैं।
पिपठिष् + स्। हल्ङ्याब्भ्यो० (१७६) से सुँलोप हो कर—'पिपठिष्'। अब
यहां पदान्त में षकार को रुँत्व करना है परन्तु ससजुषो रुँः (१०५) द्वारा पदान्त
सकार को ही रुँत्व हो सकता है षकार को नहीं, तो यहां कैसे उस की प्रवृत्ति हो ?
इस शङ्का को मन में रख कर इस का समाधान करते हुए ग्रन्थकार लिखते हैं—
[लघु०] रुँत्वं प्रति षत्वस्याऽसिद्धत्वात् ससजुषो रुँः (१०५) इति रुँत्वम्॥
अर्थः—रुँत्वविधि के प्रति षत्वविधि असिद्ध है अतः ससजुषो रुँः (१०५) से
रुँ आदेश हो जायेगा।
व्याख्या—ससजुषो रुँः (८.२.६६) की दृष्टि में आदेशप्रत्यययोः (८.३.५६)
सूत्र त्रिपादी में पर होने के कारण पूर्वत्रासिद्धम् (३१) द्वारा असिद्ध है अतः उस के
किये षकार को वह सकार ही देखता है। इस से 'पिपठिष्' यहां पदान्त में ससजुषो रुँः
(१०५) की प्रवृत्ति हो कर—पिपठिर्ँ = 'पिपठिर्' हुआ। अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता
है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्— (३५१) र्वोरुपधाया दीर्घ इकः ।८।२।७६॥
रेफान्तस्य धातोरुपधाया इको दीर्घः स्यात् पदान्ते। पिपठीः।
पिपठिषौ। पिपठीर्भ्याम् ॥
अर्थः—पदान्त में रेफान्त और वकारान्त धातु की उपधा के इक् को दीर्घ हो।
व्याख्या—र्वोः ।६।२। (धातोः का विशेषण होने से तदन्तविधि हो जाती है)।
धातोः ।६।१। (सिपि धातो र्रुर्वा से)। उपधायाः ।६।१। इकः ।६।१। दीर्घः ।१।१।
पदस्य ।६।१। (अधिकृत है)। अन्ते ।७।१। (स्कोः संयोगाद्योरन्ते च से)। समासः—
र् च व् च—र्वौ, तयोः = र्वोः, इतरेतरद्वन्द्वः। अर्थः—(र्वोः) रेफान्त और वकारान्त
(धातोः = धात्वोः) धातुओं की (उपधायाः) उपधा के (इकः) इक् के स्थान पर (दीर्घः)
दीर्घ हो जाता है (पदस्य) पद के (अन्ते) अन्त में।
'पिपठिर्' यहां रेफान्त धातु है अतः पदान्त में प्रकृतसूत्र से इस की उपधा
ठकारोत्तर इकार को दीर्घ कर—पिपठीर्। अब रेफ को विसर्ग आदेश करने पर—
'पिपठीः' प्रयोग सिद्ध होता है।
पिपठिष् + औ = पिपठिषौ। इत्यादि।