लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
[लघु०] रत्नमुट्, रत्नमुड् । रत्नमुषौ । रत्नमुड्भ्याम् ॥
व्याख्या - रत्नमुष् (रत्न चुराने वाला) । रत्नानि मुष्णातीति रत्नमुट् ।
रत्नकर्म के उपपद होने पर मुष स्तेये (क्र्या० प०) धातु से क्विप् प्रत्यय करने पर
उपपदसमास होकर 'रत्नमुष्' शब्द निष्पन्न होता है। यह क्विबन्त नहीं अतः क्विन्प्रत्य-
यस्य कु (३०४) द्वारा कुत्व नहीं होता ।
रत्नमुष् + स् । सुँलोप, जश्त्व से डकार तथा वैकल्पिक चर्त्व से टकार हो
कर— 'रत्नमुट्, रत्नमुड्' ये दो प्रयोग सिद्ध होते हैं। इस की रूपमाला यथा —
प्र० रत्नमुट्-ड् रत्नमुषौ रत्नमुषः प० रत्नमुषः रत्नमुड्भ्याम् रत्नमुड्भ्यः
द्वि० रत्नमुषम् ,, ,, ष० ,, रत्नमुषोः रत्नमुषाम्
तृ० रत्नमुषा रत्नमुड्भ्याम् रत्नमुड्भिः स० रत्नमुषि ,, रत्नमुट्सु,-ट्सु
च० रत्नमुषे ,, रत्नमुड्भ्यः स० हे रत्नमुट्-ड्! रत्नमुषौ! रत्नमुषः!
भ्याम् आदियों में झलां जशोऽन्ते (६७) में जश्त्व-डकार हो जाता है ।
[लघु०] षट्, षड् । षड्भिः । षड्भ्यः २ । षण्णाम् । षट्सु, षट्सु ॥
व्याख्या — षो अन्तकर्मणि (दिवा० प०) धातु से पृषोदरादीनि यथोपदिष्टम्
(६ ३ १०८) द्वारा 'षष्' (छ) शब्द निष्पन्न होता है। यह नित्य बहुवचनान्त है।
षष् + अस् (जस् वा शस्) । ष्णान्ता षट् (२६७) से षट्संज्ञा होकर
षड्भ्यो लुक् (१८६) से जस् वा शस् का लुक् हो जाता है। अतः झलां जशोऽन्ते
(६७) से जश्त्व डकार तथा वाऽवसाने (१४६) में वैकल्पिक चर्त्व टकार हो कर—
'षट्, षड्' ये दो प्रयोग सिद्ध होते हैं।
भिस् वा भ्यस् में जश्त्व हो जाता है— षड्भिः, षड्भ्यः ।
षष् + आम् । षट्संज्ञा होकर षट्चतुर्भ्यश्च (२६६) सूत्र से आम् को नुट्
का आगम हो जाता है— षष् + नाम् । अब 'आम्' अजादि नहीं रहा अतः भसंज्ञा न
हुई, स्वादिष्वसर्वनामस्थाने (१६४) में पदसंज्ञा होकर झलां जशोऽन्ते (६७) से
जश्त्व— डकार, ष्टुना ष्टुः (६४) से नकार को णकार तथा प्रत्यये भाषायां नित्यम् (वा०
११) से डकार को भी णकार करने पर 'षण्णाम्' प्रयोग सिद्ध होता है । ध्यान रहे कि
यहां पदान्त होने पर भी न पदान्ताट्टोरनाम् (६५) सूत्र से ष्टुत्व का निषेध नहीं
होता, क्योंकि उस में 'अनाम्' कह कर 'नाम्' के विषय में छूट दे दी गई है ।
षष् + सु(सुप्) यहां पदान्त में जश्त्व - डकार होकर ङः सि धुट् (८४) से
वैकल्पिक धुट् आगम तथा खरि च (७४) में यथासम्भव दोनों पक्षों में चर्त्व करने से
— 'षट्सु, षट्सु' ये दो प्रयोग सिद्ध होते हैं । रूपमाला यथा—
विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्र० ० ० षट्, षड् प० ० ० षड्भ्यः
द्वि० ० ० ,, ,, ष० ० ० षण्णाम्
तृ० ० ० षड्भिः स० ० ० षट्सु षट्सु
च० ० ० षड्भ्यः सम्बोधन प्रायः नहीं होता ।