लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४११
(झलि) झल् परे होने पर या (पदस्य) पद के (अन्ते) अन्त में (चोः) चवर्ग के
स्थान पर (कुः) कवर्ग आदेश हो जाता है।
'सुयुज्' यहां पद के अन्त में चवर्ग-जकार को कवर्ग-गकार हो कर वाऽवसाने
(१४६) सूत्र से वैकल्पिक चर्त्व-ककार करने पर—'सुयुक्, सुयुग्' ये दो रूप सिद्ध
होते हैं। रूपमाला यथा—
प्र० सुयुक्-ग् सुयुजौ सुयुजः | प० सुयुजः सुयुग्भ्याम्* सुयुग्भ्यः*
द्वि० सुयुजम् ,, ,, | प० ,, सुयुजोः सुयुजाम्
तृ० सुयुजा सुयुग्भ्याम्* सुयुग्भिः* | स० सुयुजि ,, सुयुक्षु‡
च० सुयुजे ,,* सुयुग्भ्यः* | सं० हे सुयुक्-ग् ! हे सुयुजौ ! हे सुयुजः!
- चोः कुः (३०६) से कुंत्व हो जाता है।
‡ चोः कुः (३०६) से जकार को गकार, आदेशप्रत्यययोः(१५०) से सकार को
षकार तथा खरि च (७४) से गकार को ककार हो कर क्+ष् के योग से 'क्ष्'
आकृति बन जाती है।
खञ्ज् (लङ्गड़ा)। खजिँ गतिवैकलव्ये (भ्वा० प०) इत्यस्माद्धातोः क्विपि,
इदित्त्वान्नुमि, नश्चापदान्तस्य झलि (७८) इत्यनुस्वारे, अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः
(७६) इति परसवर्णे ञकारे च कृते 'खञ्ज्' इति शब्दो निष्पद्यते। कृदन्त होने से
'खञ्ज्' शब्द की प्रातिपदिकसञ्ज्ञा हो कर स्वादि प्रत्यय उत्पन्न होते हैं।
खञ्ज् + स् (सुँ) । हल्ङ्याब्भ्यः० (१७६) से सुँलोप, संयोगान्तस्य लोपः
(२०) से जकारलोप, निमित्तापाये नैमित्तिकस्याप्यपायः इस न्यायानुसार ञकार को
पुनः नकार हो कर 'खन्' प्रयोग सिद्ध होता है। यहां संयोगान्तलोप के असिद्ध होने से
न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य(१८०)द्वारा नकार का लोप नहीं होता। किञ्च—क्विन्-
प्रत्ययान्त न होने से क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४) द्वारा नकार को ङकार आदेश भी नहीं
होता। रूपमाला यथा—
प्र० खन् खञ्जौ खञ्जः | प० खञ्जः खन्भ्याम्† खन्भ्यः†
द्वि० खञ्जम् ,, ,, | प० ,, खञ्जोः खञ्जाम्
तृ० खञ्जा खन्भ्याम्† खन्भिः† | स० खञ्जि ,, खन्त्सु, खन्सु*
च० खञ्जे ,,† खन्भ्यः† | सं० हे खन् ! हे खञ्जौ ! हे खञ्जः !
† संयोगान्तस्य लोपः (२०) से जकार का लोप हो जाता है। - संयोगान्तलोप हो कर नश्च (८७) से वैकल्पिक 'धुट्' पुनः चर्त्व।
राज् (दीप्तिमान्, राजा)। राजूँ दीप्तौ (भ्वा० उ०) इत्यस्मात्क्विपि तस्य च
सर्वापहारलोपे 'राज्' इति शब्दो निष्पद्यते। कृदन्त होने से स्वादिप्रत्यय उत्पन्न होते हैं।
राज् + स् (सुँ)। यहां हल्ङ्याब्भ्यः० (१७६) से सुँलोप हो कर अग्रिमसूत्र
प्रवृत्त होता है—
४१२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३०७) व्रश्च-भ्रस्ज-सृज-मृज-यज-राज-भ्राजच्छशां
षः ।८।२।३६॥
व्रश्चादीनां सप्तानां छशान्तयोश्च षकारोऽन्तादेशः स्याज् झलि पदान्ते
च । जश्त्व-चर्वे । राट्, राड् । राजौ । राजः । राड्भ्याम् । एवं विभ्राट् ।
देवेद् । विश्वसृट् ॥
अर्थ—झल् परे होने पर या पदान्त में व्रश्च्, भ्रस्ज्, सृज्, मृज्, यज्, राज्,
भ्राज् इन सात धातुओं को तथा छकारान्त और शकारान्तों को षकार अन्तादेश हो
जाता है।
व्याख्या—व्रश्च-भ्रस्ज—छशाम् ।८।२। षः ।१।१। झलि ।८।२। (झलो झलि
से) । पदस्य ।८।१। (यह अधिकृत है) । अन्ते ।८।२। (स्कोः संयोगाद्योरन्ते च से)।
समास—व्रश्चश्च भ्रस्जश्च सृजश्च मृजश्च यजश्च राजश्च भ्राजश्च छश्च शश्च—
व्रश्च-भ्रस्ज—भ्राजच्छशः, तेषाम् = व्रश्च-भ्रस्ज—भ्राजच्छशाम्, इतरेतरद्वन्द्वः । व्रश्चा-
दिष्वकार उच्चारणार्थः । यहां 'व्रश्च्' आदि सात धातु हैं तथा छ्, श् ये दो वर्ण हैं।
ये दोनों वर्ण 'शब्दस्वरूपम्' विशेष्य के विशेषण हैं। शब्दानुशासन का सम्पूर्ण अष्टा-
ध्यायी में अधिकार होने से 'शब्दस्वरूपम्' यह उपलब्ध हो जाता है। तब तदन्तविधि
हो कर शकारान्त छकारान्त शब्दस्वरूप ऐसा अर्थ हो जाता है। अर्थः—(व्रश्च-भ्रस्ज
—छशाम्) व्रश्च्, भ्रस्ज्, सृज्, मृज्, यज्, राज्, भ्राज् तथा छकारान्त और शकारान्त
शब्दों के स्थान पर (ष) 'ष्' आदेश हो जाता है (झलि) झल् परे होने पर या
(पदस्य) पद के (अन्ते) अन्त में। अलोऽन्त्यविधि से यह आदेश अन्त्य अल् के स्थान
पर होता है।
'राज्' यहां पदान्त में प्रकृत-सूत्र से जकार को षकार हो कर झलां जशोऽन्ते
(६७) से षकार को डकार तथा वाऽवसाने (१४६) सूत्र से वैकल्पिक चर्व-टकार
करने पर 'राट्, राड्' ये दो रूप सिद्ध होते हैं। सम्पूर्ण रूपमाला यथा—
प्र० राट्-ड् राजौ राजः प० राजः राड्भ्याम्† राड्भ्यः†
द्वि० राजम् ,, ,, ष० ,, राज्ञो राजाम्
तृ० राज्ञा राड्भ्याम्† राड्भिः† स० राज्ञि ,, राट्सु-ट्त्सु*
च० राज्ञे ,,† राड्भ्यः† स० हे राट्-ड् ! हे राजौ ! हे राजः !
† व्रश्च-भ्रस्ज० (३०७) इति षत्वे, झलां जशोऽन्ते (६७) इति डकारः ।
- षत्वे जश्त्वे च कृते ङः सि धुँट् (८४) इति वा धुँडागमे खरि च (७४)
इति चर्वम् ।
विभ्राज् (विशेष शोभायुक्त) । 'वि' पूर्वक भ्राजृ दीप्तौ (भ्वा० आ०)
धातु से कर्त्ता में क्विप् प्रत्यय करने पर 'विभ्राज्' शब्द सिद्ध होता है। कृदन्त होने
से इस की प्रातिपदिकसञ्ज्ञा हो कर सुं आदि प्रत्यय उत्पन्न होते हैं—
विभ्राज्+स् (सुँ) । हल्ङ्याब्भ्यो ० (१७६) से सकारलोप, व्रश्च-भ्रस्ज०
•हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४१३
(३०७) से जकार को षकार, झलां जशोऽन्ते (६७) से षकार को डकार तथा वाऽव-
साने (१४६) से वैकल्पिक चर्त्व-टकार करने से 'विभ्राट्, विभ्राड्' ये दो रूप सिद्ध
होते हैं। रूपमाला यथा—
प्र० विभ्राट्-ड् विभ्राजौ विभ्राजः | प० विभ्राजः विभ्राड्भ्याम् विभ्राड्भ्यः
द्वि० विभ्राजम् ,, ,, | ष० ,, विभ्राजोः विभ्राजाम्
तृ० विभ्राजा विभ्राड्भ्याम् विभ्राड्भिः | स० विभ्राजि ,, विभ्राट्सु,ट्सु
च० विभ्राजे ,, विभ्राड्भ्यः | सं० हे विभ्राट्! विभ्राजौ! विभ्राजः!
भ्यामादिषु व्रश्च-भ्रस्ज० (३०७) इति षत्वे झलां जशोऽन्ते (६७) इति
जश्त्वम् । सुपि षत्वे, जश्त्वे, वा धुँडागमे चर्त्वम् ।
देवेज् (देवताओं का यजन करने वाला) । देवान् यजत इति देवेद् । 'देव'-
कर्मोपपदाद् यजतेः (भ्वा० उभ०) क्विपि, कित्त्वाद्, वचिस्वपिजादीनां किति (५४७)
इति सम्प्रसारणे, सम्प्रसारणाच्च (२५८) इति पूर्वरूपे, गुणे च कृते 'देवेज्' इति शब्दो
निष्पद्यते । कृदन्त होने से प्रातिपदिक-सञ्ज्ञा हो कर स्वादि प्रत्यय उत्पन्न होते हैं ।
इस की रूपमाला यथा—
प्र० देवेद्-ड् देवेजौ देवेजः | प० देवेजः देवेड्भ्याम् देवेड्भ्यः
द्वि० देवेजम् ,, ,, | ष० ,, देवेजोः देवेजाम्
तृ० देवेजा देवेड्भ्याम् देवेड्भिः | स० देवेजि ,, देवेद्त्सु-ट्सु
च० देवेजे ,, देवेड्भ्यः | सं० हे देवेद् ! हे देवेजौ ! हे देवेजः !
यहां 'यज्' होने से पदान्त में पूर्ववत् व्रश्च-भ्रस्ज० (३०७) सूत्र से षत्व तथा
झलां जशोऽन्ते (६७) से जश्त्व-डकार हो जाता है ।
विशेष—क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४) सूत्र में बहुव्रीहिसमास के आश्रयण के
कारण यहां कुत्व प्राप्त था परन्तु भाष्यकार के 'उपयद् काम्यति' प्रयोग के निर्देश से
नहीं होता । यह विषय विस्तारपूर्वक सिद्धान्तकौमुदी में देखें ।
विश्वसृज् (जगत् के रचयिता, भगवान्) । विश्वं सृजतीति विश्वसृट् । विश्व-
कर्मोपपदात् सृज विसर्गे (तुदा० प०) इत्यस्मात्कर्त्तरि क्विपि 'विश्वसृज्' इतिशब्दो
निष्पद्यते । इस की रूपमाला यथा—
प्र० विश्वसृट्-ड्, विश्वसृजौ, विश्वसृजः । द्वि० विश्वसृजम्, विश्वसृजौ,
विश्वसृजः । तृ० विश्वसृजा, विश्वसृड्भ्याम्, विश्वसृड्भिः । च० विश्वसृजे, विश्वसृड्-
भ्याम्, विश्वसृड्भ्यः । प० विश्वसृजः, विश्वसृड्भ्याम्, विश्वसृड्भ्यः । ष० विश्वसृजः,
विश्वसृजोः, विश्वसृजाम् । स० विश्वसृजि, विश्वसृजोः, विश्वसृट्सु-ट्सु । सं० हे विश्व-
सृट्-ड् ! हे विश्वसृजौ ! हे विश्वसृजः ! ।
यहां 'सृज्' धातु होने से व्रश्च-भ्रस्ज० (३०७) सूत्र से पदान्त में जकार को
षकार तथा झलां जशोऽन्ते (६७) से षकार को डकार हो जाता है । 'रज्जुसृड्भ्याम्'
इस भाष्यप्रयोग से यहां पर कुत्व नहीं होता । विशेष सिद्धान्तकौमुदी में देखें ।
४१४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
परिव्राज् (सन्न्यासी) । इस की सिद्धि के लिये उणादिसूत्र उद्धृत करते हैं—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—परौ व्रजेः षः पदान्ते (उणादि० २।१८) ।
परावुपपदे व्रजेः क्विब्व् स्याद् दीर्घश्च पदान्ते षत्वमपि। परिव्राट्,
परिव्राड्। परिव्राजौ ॥
अर्थ —'परि' उपपद होने पर 'व्रज्' (भ्वा० प०) धातु से क्विब्व् प्रत्यय हो
और धातु के अकार को दीर्घ हो। किञ्च—पदान्त में षत्व भी होना चाहिये।
व्याख्या —यह शाकटायनमुनिप्रणीत उणादिसूत्र (२।१८) है। परौ ।७।१।
व्रजेः ।५।१। क्विव्व् ।१।१। (क्विव्व् वचिप्रच्छ्यायस्तू० से) । पदान्ते ।७।१। षः ।१।१।
अर्थ —(परौ) 'परि' उपपद होने पर (व्रजेः) व्रज् धातु से (क्विव्व्) क्विब्व् प्रत्यय
तथा (दीर्घः) दीर्घ होता है। किञ्च (पदान्ते) पदान्त में (षः) षकार भी हो
जाता है।
जिस पद के साथ रहने पर कोई कार्य विधान किया जाता है उसे 'उपपद'
कहते हैं, उपपद सदा पूर्व में ही प्रयुक्त हुआ करता है। [देखें—तत्रोपपदं सप्तमीस्थम्
(६५३), उपपदमतिङ् (६५४)]। यहां 'परि' उपपद होने पर 'व्रज्' धातु से क्विब्व्
का विधान है। इस का तात्पर्य यह हुआ कि परिपूर्वक व्रज् धातु से क्विब्व् हो अन्यथा
नहीं।
क्विब्व् के साथ धातु को दीर्घ करने का भी विधान है। ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत
अचों के ही धर्म हैं अतः बिना कहे भी ये अचों के स्थान पर समझने चाहियें। अतः
यहां 'व्रज्' धातु के अन्तर्गत रेफोत्तर अकार को ही दीर्घ होगा।
पदान्त में विहित षत्व अलोऽन्त्यविधि से जकार के स्थान पर होगा।
परि+व्रज्+क्विब्व् = परिव्राज्+क्विब्व्। क्विब्व् का सर्वापहार लोप करने से —
परिव्राज्। कृदन्त होने से प्रातिपदिकसञ्ज्ञा हो कर स्वादियो की उत्पत्ति होती है।
परिव्राज्+स् (सुं) यहां हल्ङ्याब्भ्यो० (१७६) से सकार का लोप कर पदान्त
में षत्व करने पर—परिव्राष्। झलां जशोऽन्ते (६७) से जश्त्व—डकार तथा वाऽवसाने
(१४६) से वैकल्पिक चर्त्व-टकार करने से 'परिव्राट्, परिव्राड्' ये दो रूप सिद्ध होते
हैं। रूपमाला यथा—
प्र० परिव्राट्-ड्, परिव्राजौ, परिव्राजः। द्वि० परिव्राजम्, परिव्राजौ, परिव्राजः।
तृ० परिव्राजा, परिव्राड्भ्याम्, परिव्राड्भिः। च० परिव्राजे, परिव्राड्भ्याम्,
परिव्राड्भ्यः। प० परिव्राजः, परिव्राड्भ्याम्, परिव्राड्भ्यः। ष० परिव्राजः, परिव्राजोः,
परिव्राजाम्। स० परिव्राजि, परिव्राजोः, परिव्राट्सु-ट्सु। सं० हे परिव्राट्-ड् !,
हे परिव्राजौ !, हे परिव्राजः ! ।
पदान्त में सर्वत्र परौ व्रजेः षः पदान्ते द्वारा षत्व तथा झलां जशोऽन्ते (६७)
से जश्त्व हो जाता है।
विश्वराज् (विश्वपति, भगवान्) । विश्वस्मिन् राजत इति विश्वाराट्।
हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४१५
विश्वोपपदाद् राजतेः (भ्वा० उ०) सत्सूद्विष० (३.२.६१) इति क्विपि, उपपदसमासे
'विश्वराज्' इतिशब्दो निष्पद्यते ।
विश्वराज् + स् (सुँ) । यहां सकारलोप हो व्रश्च-भ्रस्ज० (३०७) सूत्र से
जकार को षकार, झलां जशोऽन्ते (६७) द्वारा षकार को डकार तथा वाऽवसाने
(१४६) से वैकल्पिक चर्त्व-टकार करने पर—'विश्वराट्, विश्वराड्' । अब इन दोनों
अवस्थाओं में अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३०८) विश्वस्य वसुराटोः ।६।३।१२७॥
विश्वशब्दस्य दीर्घोऽन्तादेशः स्याद् वसौ राट्शब्दे च परे । विश्वाराट्,
विश्वाराड् । विश्वराजौ । विश्वाराड्भ्याम् ॥
अर्थः—वसु अथवा राट् परे होने पर विश्व शब्द को दीर्घ अन्तादेश हो ।
व्याख्या—विश्वस्य ।६।१। दीर्घः ।१।१। (ढ्रलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः से) । वसु-
राटोः ।७।२। अर्थः—(वसुराटोः) वसु अथवा राट् शब्द परे होने पर (विश्वस्य)
'विश्व' शब्द के स्थान पर (दीर्घः) दीर्घ आदेश हो जाता है । अलोऽन्त्यविधि से यह
दीर्घ अन्त्य अच् के स्थान पर होगा । यहां 'राट्' का ग्रहण पदान्त का उपलक्षण है;
अतः 'राट्' हो या 'राड्', दोनों अवस्थाओं में दीर्घ हो जाता है ।
इस सूत्र से दीर्घ करने पर—'विश्वाराट्, विश्वाराड्' ये दो प्रयोग सिद्ध होते
हैं। रूपमाला यथा—
प्र० विश्वाराट्-ड्, विश्वराजौ, विश्वराजः । द्वि० विश्वराजम्, विश्वराजौ,
विश्वराजः । तृ० विश्वराजा, विश्वाराड्भ्याम्, विश्वाराड्भिः । च० विश्वराजे,
विश्वाराड्भ्याम्, विश्वाराड्भ्यः । प० विश्वराजः, विश्वाराड्भ्याम्, विश्वाराड्भ्यः ।
ष० विश्वराजः, विश्वराजोः, विश्वराजाम् । स० विश्वराजि, विश्वराजोः, विश्वराट्त्सु-
ट्सु । सं० हे विश्वाराट्-ड् !, हे विश्वराजौ !, हे विश्वराजः ! ।
भ्याम्, भिस्, भ्यस् और सुप् में षत्व और डत्व हो कर दीर्घ हो जाता है ।
सुप् में डत्व हो कर वैकल्पिक धुँट् का आगम तथा चर्त्व विशेष हैं ।
भ्रूस्ज् (भठियारा वा भड़भूंजा) । भ्रस्जँ पाके (तुदा० उभ०) धातु से क्विँप्,
ग्रहिज्या० (६३४) से सम्प्रसारण तथा सम्प्रसारणाच्च (२५८) से पूर्वरूप करने से
'भृस्ज्' शब्द बनता है । भृज्जतीति = भृट् ।
भृस्ज् + स् । सकार का लोप (१७६) हो कर—भृस्ज् । अब संयोगान्तस्य
लोपः (२०) से जकारलोप के प्राप्त होने पर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम् —(३०६) स्कोः संयोगाद्योरन्ते च ।८।२।२६॥
पदान्ते झलि च परे यः संयोगस्तदाद्योः सकारककारयोर्लोपः स्यात् ।
भृट् । सस्य श्चुत्वेन शः। झलां जश्झशि (१६) इति शस्य जः। भृज्जौ।
भृड्भ्याम् ॥
४१६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
अर्थ—पदान्त में या झल् परे होने पर संयोग के आदि वाले सकार ककार
का लोप हो जाता है।
व्याख्या—स्कोः ।६।२। संयोगाद्योः ।६।२। लोपः ।१।१। (संयोगान्तस्य लोपः
से)। झलि ।७।१। (झलो झलि से)। पदस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। अन्ते ।७।१।
च इत्यव्ययपदम्। समास—स् च् क् च=स्कौ, तयोः =स्कोः। इतरेतरद्वन्द्वः। संयो-
गस्य आदी =संयोगादी तयोः =संयोगाद्योः। षष्ठीतत्पुरुषः। अर्थः--(झलि) झल्
परे होने पर या (पदस्य) पद के (अन्ते) पदान्त में स्थित (संयोगाद्योः) जो संयोग,
उस के आदि सकार ककार का (लोपः) लोप हो जाता है।
यद्यपि यह सूत्र संयोगान्तस्य लोपः (२०) की दृष्टि में असिद्ध है तथापि
वचनसामर्थ्य से यह उस का अपवाद है—अपवादो वचनप्रामाण्यात्।
'भ्रस्ज्' यहां पदान्त में प्रकृतसूत्र से संयोग के आदि सकार का लोप हो—
'भृज्'। व्रश्च-भ्रस्ज० (३०७) सूत्र से जकार को षकार, जश्त्व से षकार को डकार
तथा वैकल्पिक चर्त्व में टकार करने पर—'भृट्, भृड्' ये दो रूप सिद्ध होते हैं।
'भ्रस्ज्+औ' यहां पदान्त वा झल् परे न होने से संयोगादि सकार का लोप
नहीं होता। झलां जश्झशि (१६) और स्तोः श्चुना श्चुः (६२) दोनों प्राप्त हैं।
जश्त्व के असिद्ध होने से प्रथम श्चुत्व से सकार को शकार हो—भृश्ज्+औ। पुनः
झलां जश्झशि (१६) से तालुस्थानिक शकार के स्थान पर तादृश जश्—जकार करने
पर 'भृज्जौ' प्रयोग सिद्ध होता है। रूपमाला यथा—
प्र० भृट्-ड् भृज्जौ भृज्जः प० भृज्जः भृड्भ्याम् भृड्भ्यः
द्वि० भृज्जम् ,, ,, ष० ,, भृज्ज्योः भृज्जाम्
तृ० भृज्जा भृड्भ्याम् भृड्भिः स० भृज्जि ,, भृट्त्सु-ड्त्सु
च० भृज्जे ,, भृड्भ्यः सं० हे भृट्-ड् ! हे भृज्जौ ! हे भृज्ज !
अभ्यास (४१)
(१) 'ऋत्विक्' आदि में चोः कुः अथवा क्विन्प्रत्ययस्य कुः किसी एक के द्वारा
कार्य्य सिद्ध हो सकता है, पुनः दो सूत्रों का निर्माण क्यों ?
(२) युञ्जौ, युञ्जः—आदि में चोः कुः द्वारा कुत्व क्यों नहीं होता ?
(३) क्विन् का सर्वापहार लोप कैसे और क्यों किया जाता है ? ससूत्र लिखें।
(४) युजेरसमासे में 'युजि' के साथ इकार जोड़ने का क्या अभिप्राय है ?
(५) निम्नलिखित सूत्रों की सोदाहरण विस्तृत व्याख्या करें—
स्कोः ०, ऋत्विग्दधृक्०, क्विन्प्रत्ययस्य कुः, युजेरसमासे।
(६) १ स्रग्भ्यां २ परिव्राट्, ३. विश्वराट्, ४. भृट्, ५ भृज्जौ, ६ यु-
ङ्भ्याम्, ७ विदवत्सृट्, ८ देवेड्भ्याम्, ६ ऋत्विक्षु—इन प्रयोगों की
ससूत्र सिद्धि लिखें।
(७) जब संयोगान्तलोप की दृष्टि में स्कोः संयोगाद्योरन्ते च सूत्र असिद्ध है,
तो पुनः वह उस का कैसे बाध कर लेता है ?
हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४१७
(८) पदान्त में पकार के स्थान पर किस सूत्र से जश्त्व होता है ? और वह
जश्त्व कौन सा वर्ण होना चाहिये ? सोपपत्तिक स्पष्ट करें।
(६) कृदतिङ् सूत्र पर 'अत्र धात्वधिकारे' का क्या अभिप्राय है ?
(१०) 'राजा' यह किस शब्द का किस विभक्ति का रूप है ?
(उत्तर—राजन् सुँ, राज् टा)
(यहां जकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।)
—::o::—
अब दकारान्त पुंल्लिङ्गों का वर्णन करते हैं—
त्यद् (वह)। त्यजि-तनि-यजिभ्यो डित् (उणा० १२६) इस सूत्र द्वारा त्यज
हानौ (भ्वा० प०) धातु से डित् 'अदि' प्रत्यय करने से टि का लोप कर देने पर
'त्यद्' शब्द निष्पन्न होता है। इस का लोक में प्रयोग नहीं देखा जाता। वेद में इस
का प्रचुर प्रयोग होता है¹। अकेले ऋग्वेद में ही पुंल्लिङ्ग त्यद् के प्रथमा के एकवचन
का प्रायः छत्तीस बार प्रयोग हुआ है। सर्वादिगणान्तर्गत होने से इसे सर्वनामकार्य
होते हैं।
त्यद् + स् (सुँ)। यहां त्यदादीनामः (१६३) सूत्र द्वारा दकार को अकार तथा
अतो गुणे (२७४) सूत्र से पररूप एकादेश करने पर—त्य+स्। यही बात ग्रन्थकार
निर्देश करते हैं—
[लघु०] त्यदाद्यत्वम्पररूपत्वञ्च ॥
अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्— (३१०) तदोः सः सावनन्त्ययोः ।७।२।१०६॥
त्यदादीनां तकारदकारयोरनन्त्ययोः सः स्यात् सौ। स्यः। त्यौ। त्ये।
सः। तौ। ते। यः। यौ। ये। एषः। एतौ। एते। अन्वादेशे —एनम्। एनौ।
एनान्। एनेन। एनयोः २ ॥
१. परन्तु स्यश्छन्दसि बहुलम् (६.१.१२६) सूत्र के निर्देश से इस का लोक में भी प्रयोग
अशुद्ध प्रतीत नहीं होता। अत एव वेणीसंहारनाटक में—सूतो वा सूतपुत्रो वा
यो वा स्यो वा भवाम्यहम् (३.३५) ऐसा क्वचित् पाठ-भेद पाया जाता है।
त्यजि-तनि० (उणा० १२६) सूत्र पर पेरुसूरि के श्लोक भी द्रष्टव्य हैं—
त्यत्तद्यदस्त्रयः सर्वादिगणे पठिता अमी।
तत्राद्यौ तु परोक्षार्थौ तृतीयस्तन्निरूपकः ॥१॥
आद्यस्य लोके न क्वापि प्रयोगः परिदृश्यते।
वेदे त्वेष स्य वाजीति प्रभृतिष्वथ गम्यते ॥२॥
स्यश्छन्दसीतिसूत्रस्थच्छन्दोग्रहणलिङ्गतः।
लोकेऽप्यस्य प्रयोगोऽस्तीत्येतदभ्युपगम्यते ॥३॥
ल० प्र० (२७)
४१८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
अर्थ —'सुं' परे होने पर त्यदादियो के अनन्त्य (अन्त मे न रहने वाले) तकार
दकार को सकार आदेश हो जाता है ।
व्याख्या—त्यदादीनाम् ।६।३। (त्यदादीनाम से)। तदो ।६।२। स ।१।१। सौ
।७।१। अनन्त्ययो ।६।२। समास —न अन्त्ययो =अनन्त्ययो, नञ्समास । अर्थ —
(सौ) सुं परे होने पर (त्यदादीनाम्) त्यदादियो के (अनन्त्ययो ) अनन्त्य (तदो )
तकार दकार को (स ) सकार आदेश हो जाता है !
त्य + स् । यहा प्रकृतसूत्र स त्यद् शब्द के अनन्त्य तकार को सकार हो कर—
स्य् + स् । प्रत्यय के सकार को रुत्व और रेफ को विसर्ग करने पर—'स्य ' प्रयोग
सिद्ध हुआ । इस की रूपमाला यथा—
प्र० स्य त्यौ त्ये | प० त्यस्मात् त्याभ्याम् त्येभ्य
द्वि० त्यम् ,, त्यान् | ष० त्यस्य त्ययो त्येषाम्
तृ० त्येन त्याभ्याम् त्यै | स० त्यस्मिन् ,, त्येषु
च० त्यस्मै ,, त्येभ्य | सम्बोधन प्राय नही होता ।
यहा सर्वत्र त्यदाद्यत्व और पररूप कर प्रथम 'त्य' इस प्रकार अदन्त सर्वनाम
बना लेना चाहिये । तब इस की प्रक्रिया 'सर्व'शब्दवत् चलती है । केवल 'स्य ' मे कुछ
विशेष है जो बताया जा चुका है ।
तद् (वह) । यह शब्द भी तनुं विस्तारे (तना० उभ०) धातु से त्यजि-तनि०
(उणा० १२६) सूत्र द्वारा डित् 'अदि' प्रत्यय करने मे निष्पन्न होता है ।
तद् + स्(सुँ)। यहा भी त्यदाद्यत्व तथा पररूप होकर—'त + स' । पुन तदो'
स ० (३१०) सूत्र से अनन्त्य तकार को सकार आदेश कर रुँत्व विसर्ग करने मे--
'स ' प्रयोग सिद्ध होता है । इस की रूपमाला यथा—
प्र० सः तौ ते | प० तस्मात् ताभ्याम् तेभ्य
द्वि० तम् ,, तान् | ष० तस्य तयो तेषाम्
तृ० तेन ताभ्याम् तै | स० तस्मिन् ,, तेषु
च० तस्मै ,, तेभ्य | ———०———
यहा भी पूर्ववत् त्यदादीनाम (१६३) से दकार को अकार तथा अतो गुणे
(२७४) से पररूप होकर 'त' इस प्रकार अदन्त सर्वनाम बन जाता है । तब इस की
प्रक्रिया 'सर्व'शब्दवत् होती है । सुँ विभक्ति मे ही विशेष है ।
यद् (जो)। यह शब्द भी यजं देवपूजासगतिकरणदानेषु (भ्वा० उभ०) धातु
से त्यजि-तनि-यजिभ्यो डित् (उणा० १२६) सूत्र द्वारा 'अदि' प्रत्यय करने से सिद्ध
होता है । इस की रूपमाला यथा—
प्र० य यौ ये | प० यस्मात् याभ्याम् येभ्य
द्वि० यम् ,, यान् | ष० यस्य ययो येषाम्
तृ० येन याभ्याम् यै | स० यस्मिन् ,, येषु
च० यस्मै ,, येभ्य | ———०———
हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४१६
यहाँ भी पूर्ववत् त्यदाद्यत्व और पररूप कर सर्वनामकार्य हो जाते हैं । अनन्त्य
तकार दकार न होने से सुँ में तदोः सः० (३१०) प्रवृत्त नहीं होता ।
एतद् (यह) । इण् गतौ (अदा० प०) धातु से एतेस्तुट् च (उणा० १३०)
सूत्र द्वारा अदि प्रत्यय तथा 'तुट्' का आगम करने पर 'एतद्' शब्द निष्पन्न होता है ।
एतद् + स् (सु) । यहां त्यदादीनामः (१६३) से दकार को अकार, अतो गुणे
(२७४) से पररूप, तदोः सः० (३१०) से अनन्त्य तकार को सकार तथा आदेश-
प्रत्यययोः (१५०) से उस सकार को षकार करने पर—एषस् = 'एषः' प्रयोग सिद्ध
होता है । रूपमाला यथा—
प्र० एषः एतौ एते | प० एतस्मात् एताभ्याम् एतेभ्यः
द्वि० एतम् ” एतान् | प० एतस्य एतयोः एतेषाम्
तृ० एतेन एताभ्याम् एतैः | स० एतस्मिन् ” एतेषु
च० एतस्मै ” एतेभ्यः | ——————०——————
यहाँ भी सर्वत्र त्यदाद्यत्व और पररूप होकर 'एत' शब्द बन जाने पर सर्व-
शब्द की तरह सर्वनामकार्य होते हैं । सुँ विभक्ति का विशेष बता चुके हैं ।
अन्वादेश में द्वितीयाटौस्स्वेनः (२८०) सूत्र द्वारा द्वितीया, टा और ओस्
विभक्तियों में 'एतद्' शब्द के स्थान पर 'एन' आदेश हो जाता है । शेष विभक्तियों में
कुछ अन्तर नहीं पड़ता । अन्वादेश में रूपमाला यथा—
प्र० एषः एतौ एते | प० एतस्मात् एताभ्याम् एतेभ्यः
द्वि० एनम्* एनौ* एनान्* | ष० एतस्य एनयोः* एतेषाम्
तृ० एनेन* एताभ्याम् एतैः | स० एतस्मिन् ” * एतेषु
च० एतस्मै ” एतेभ्यः | *द्वितीयाटौस्स्वेनः (२८०)
नोट—त्यदादियों का प्रायः सम्बोधन नहीं हुआ करता—यह हम पीछे लिख
चुके हैं । यदि बनेगा भी तो प्रथमावत् बनेगा । सम्बुद्धि में एड्ह्रस्वात्० (१३४) का
ध्यान रख लेना चाहिये ।
सूचना—ऊपर त्यदादियों के पुंल्लिङ्ग के रूप दिये गये हैं । स्त्रीलिङ्ग और
नपुंसकलिङ्ग के रूप आगे तत्तत्प्रकरणों में देखें ।
अब दकारान्तों में युष्मद् और अस्मद् शब्दों का प्रकरण आरम्भ किया जाता
है । युष्मद् और अस्मद् शब्द तीनों लिङ्गों में एक समान होते हैं—यह हम पीछे
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरण में 'कति' शब्द पर लिख चुके हैं ।
युष्मद् और अस्मद् शब्दों की सिद्धि में अनेक सूत्र प्रयुक्त होते हैं, अतः यह
बालकों को कठिन प्रतीत होती है । हम इसे यथाशक्ति सरल तथा सुबोध बनाने का
प्रयास करेंगे । बालकों को इन की सिद्धि से पूर्व इन के उच्चारण भली-भांति कण्ठस्थ
कर लेने चाहियें । ऐसा करने से एक तो ये शब्द सरल दूसरे झटिति समझ में आ
जाते हैं । इन दोनों की रूपमाला यथा—
४२० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
युष्मद्¹ = तुम अस्मद् = मैं
प्र० त्वम् युवाम् यूयम् प्र० अहम् आवाम् वयम्
द्वि० त्वाम् " युष्मान् द्वि० माम् " अस्मान्
तृ० त्वया युवाभ्याम् युष्माभि तृ० मया आवाभ्याम् अस्माभि
च० तुभ्यम् " युष्मभ्यम् च० मह्यम् " अस्मभ्यम्
प० त्वत्-द् " युष्मत्-द् प० मत्-द् " अस्मत्-द्
ष० तव युवयो युष्माकम् ष० मम आवयो अस्माकम्
स० त्वयि " युष्मासु स० मयि " युष्मासु
युष्मद् और अस्मद् दोनों शब्दों में एक समान सूत्र प्रवृत्त होते हैं अतः हम
भी इन की सिद्धि इकट्ठी दिखायेंगे ।
युष्मद् + सुँ, अस्मद् + सुँ । यहां अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३११) ङे प्रथमयोरम् ।७।२।२८॥
युष्मदस्मद्भ्यां परस्य 'ङे' इत्येतस्य प्रथमाद्वितीययोश्चामादेश ॥
अर्थ—युष्मद् और अस्मद् शब्दों से परे 'ङे' को तथा प्रथमा और द्वितीया
विभक्ति को अम् आदेश हो ।
व्याख्या—युष्मदस्मद्भ्याम् ।५।२। (युष्मदस्मद्भ्यां ङसोऽश् मे) । ङे ।६।१।
(यहां षष्ठीविभक्ति का लुक् समझना चाहिये) । प्रथमयो ।६।२। अम् ।१।१। समास—
प्रथमा च प्रथमा च = प्रथमे, तयो = प्रथमयो, एकशेष । यहां पहले 'प्रथमा' शब्द से
प्रथमाविभक्ति तथा दूसरे 'प्रथमा' शब्द से द्वितीया विभक्ति अभिप्रेत है²। अर्थ—
(युष्मदस्मद्भ्याम्) युष्मद् और अस्मद् शब्दो से परे (ङे) ङे के स्थान पर तथा
(प्रथमयो ) प्रथमा वा द्वितीया विभक्ति के स्थान पर (अम्) 'अम्' आदेश हो जाता है ।
इस सूत्र से सुँ को अम् आदेश हो कर—युष्मद् + अम्, अस्मद् + अम् । यहां
हलन्त्यम् (१) द्वारा अम् के मकार की इत्संज्ञा नही होती । न विभक्तौ तुस्मा (१३१)
सूत्र से निषेध हो जाता है । अब अग्रिम सूत्र प्रवृत्त होना है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३१२) त्वाहौ सौ ।७।२।९४॥
अनयोर्मपर्यन्तस्य त्वाहावादेशौ स्त (सौ परे) ॥
अर्थ.—सुँ परे होने पर युष्मद् और अस्मद् शब्दों को म्पर्यन्त (म् भी साथ
लेना है) क्रमशः त्व, अह आदेश हो जाते हैं ।
१ युष्यसिभ्यां मद्दिकू (उणा० १३६) इति शब्दावेतो सिध्यतः । युषि मौत्र ।
२ पहले 'प्रथमा' शब्द से मात्र विभक्तियों में से प्रथमाविभक्ति का ग्रहण हो जाता है,
शेष द्वितीया आदि छ विभक्तियां बच रहती हैं। अब दूसरे 'प्रथमा' शब्द से उन
छ अवशिष्ट विभक्तियो में से प्रथमाविभक्ति अर्थात् द्वितीया विभक्ति का ग्रहण
हो जाना है ।
हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४२१
व्याख्या—युष्मदस्मदोः ।६।२। (युष्मदस्मदोरनादेशे से) । मपर्यन्तस्य ।६।१।
(यह अधिकृत है) । त्वाहौ ।१।२। सौ ।७।१। समासः—त्वश्च अहश्च = त्वाहौ, इतरे-
तरद्वन्द्वः । अर्थः—(सौ) सुँ परे होने पर (मपर्यन्तस्य = मपर्यन्तयोः) 'म्' तक (युष्मद-
स्मदोः) युष्मद् और अस्मद् के स्थान पर (त्वाहौ) क्रमशः त्व और अह आदेश
हो जाते हैं ।
युष्मद् में युष्म् और अस्मद् में अस्म् ये म्पर्यन्त भाग हैं । सुँ परे होने पर
इन के स्थान पर क्रमशः 'त्व' और 'अह' आदेश होते हैं ।
युष्मद् + अम्, अस्मद् + अम्—यहां सुं के स्थान पर हुए अम् आदेश को
स्थानिवद्भाव से सुँ मान कर प्रकृतसूत्र से क्रमशः म्पर्यन्त त्व और अह आदेश करने
से—'त्व अद् + अम्, अह अद् + अम्' । अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३१३) शेषे लोपः ।७।२।९०॥
एतयोष्टिलोपः । त्वम् । अहम् ॥
अर्थः—युष्मद् और अस्मद् की टि अर्थात् 'अद्' भाग का लोप हो जाता है ।
व्याख्या—युष्मदस्मदोः ।६।२। (युष्मदस्मदोरनादेशे से) । मपर्यन्तात् ।५।१।
(मपर्यन्तस्य इस अधिकृत का अपकर्ष कर विभक्तिविपरिणाम हो जाता है) । शेषे
।७।१। (स्थानषष्ठी के अर्थ में अधिकरणत्व की विवक्षा से सप्तमी हुई है) । लोपः
।१।१। अर्थः—(युष्मदस्मदोः) युष्मद् और अस्मद् शब्दों के (मपर्यन्तात्) म्पर्यन्त
भाग से आगे (शेषे) शेष भाग में (लोपः) लोप प्रवृत्त होता है ।
म्पर्यन्त भाग से आगे शेष भाग 'अद्' होता है। इस के लोप का इस सूत्र से
विधान किया गया है। यह 'अद्' भाग युष्मद् और अस्मद् का 'टि' भाग ही होता है,
अतः वृत्ति में टि के लोप का कथन किया गया है।
सावधानता—यहां यह नहीं समझना चाहिये कि युष्मद् और अस्मद् शब्द में
म्पर्यन्त आदेशों से अवशिष्ट शेष भाग का लोप होता है, यथा यहां त्व और अह
आदेश हो चुकने पर 'अद्' भाग शेष रहता है। यदि ऐसा मानेंगे तो यहां तो कार्य्य
चल जायेगा, परन्तु 'युष्मभ्यम्, अस्मभ्यम्' आदियों में न हो सकेगा । क्योंकि वहां
'युष्मद्, अस्मद्' शब्दों के स्थान पर कुछ आदेश नहीं होता । अतः यहां 'मपर्यन्तस्य'
का अपकर्षण कर म् से आगे के भाग अर्थात् 'अद्' को शेष समझना चाहिये ।
इस सूत्र का दूसरा अर्थ भी होता है और कही २ लघुकौमुदी में वह उपलब्ध
भी होता है । वह यह है—
आत्व-यत्वनिमित्तेतरविभक्तौ परतो युष्मदस्मदोरन्त्यस्य लोपः स्यात् ।
अर्थः—जिस विभक्ति के परे होने पर आत्व और यत्व विधान नहीं होते, उस
विभक्ति के परे होने पर युष्मद् और अस्मद् शब्दों के अन्त्य अर्थात् दकार का लोप हो
जाता है ।
व्याख्या—अष्टन आ विभक्तौ से 'विभक्तौ' पद की अनुवृत्ति आ जाने से इस
४२२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
अर्थ की उत्पत्ति इस प्रकार होती है—(शेषे) शेष (विभक्तौ) विभक्ति परे होने पर
(युष्मदस्मदो) युष्मद् और अस्मद् का (लोप) लोप हो जाता है। अलोऽन्त्यविधि
से यह लोप अन्त्य अल् दकार के स्थान पर होता है।
इस सूत्र से पूर्व अष्टाध्यायी में—युष्मदस्मदोरनादेशे (७।२।८६), द्वितीया-
याञ्च (७।२।८७), प्रथमायाश्च द्विवचने भाषायाम् (७।२।८८), योऽचि (७।२।८६)
—इन चार सूत्रों के द्वारा कुछ विशिष्ट विभक्तियों के परे होने पर आत्व और यत्व
का विधान किया गया है। यदि आत्व और यत्व निमित्तक विभक्तियों से भिन्न अन्य
शेष विभक्तियां परे हों तो दकार का लोप हो जाता है। काशिकाकार ने उन सब
शेष विभक्तियों की गणना एक श्लोक में कर दी है जिन में आत्व और यत्व प्रवृत्त
नहीं हो सकते। तथाहि—
पञ्चम्यांश्च चतुर्थ्यांश्च, षष्ठीप्रथमयोरपि।
यान्यद्विवचनान्यत्र, 'शेषे लोपो' विधीयते॥
अर्थात् पञ्चमी, चतुर्थी, षष्ठी तथा प्रथमा विभक्तियों के एकवचन और बहु-
वचन शेषविभक्तियां हैं। इन के परे होने पर शेषे लोपः (३१३) से युष्मद् और
अस्मद् के अन्त्य दकार का लोप हो जाता है।
त्व अद्+अम्, अह अद्+अम् –यहां अन्तरङ्ग होने से प्रथम अतो गुणे
(२७४) से पररूप एकादेश हो 'त्वद्+अम्, अहद्+अम्'। अब शेषे लोपः (३१३) से
अद् भाग का लोप हो कर—'त्व्+अम्=त्वम्, अह्+अम्=अहम्' ये रूप सिद्ध
होते हैं।¹ अन्त्यलोप वाले पक्ष में केवल दकार का लोप हो कर अमि पूर्वः (१३५)से
पूर्वरूप करने से इन प्रयोगों की निष्पत्ति होती है—यही विशेष है।
१. त्व अद्+अम्, अह अद्+अम्—यहां शेषे लोप (३१३) से अद् भाग का लोप
और अतो गुणे (२७४) से पररूप दोनों युगपत् प्राप्त होते हैं। शेषे लोप (३१३)
सूत्र अष्टाध्यायी में पर होते हुए भी प्रथम प्रवृत्त नहीं होता क्योंकि वह अङ्गाधि-
कार में पठित होने से विभक्ति प्रत्यय सापेक्ष होने के कारण बहिरङ्ग है और
अतो गुणे (२७४) सूत्र अन्तर्गतवर्णद्वयापेक्ष होने से अन्तरङ्ग है। असिद्धं बहिरङ्ग-
मन्तरङ्गे—इस परिभाषा के अनुसार अन्तरङ्गकार्य अतो गुणे प्रथम हो जाता
है। शेषे लोपः बहिरङ्ग होने से अन्तरङ्ग के बाद प्रवृत्त होता है।
यहां यह भी ध्यातव्य है कि वार्णादाङ्गं बलीयः (वर्णकार्य की अपेक्षा
अङ्गकार्य बलवान् होता है) परिभाषा के आश्रय से वर्णकार्य अतो लोप की
अपेक्षा अङ्गकार्य शेषे लोपः को बलवान् नहीं माना जा सकता, क्योंकि जहां
याङ्ग और वार्ण कार्य समानाश्रय हों वहीं पर यह परिभाषा प्रवृत्त होती है।
जैसे धृ+ण्वुल्=धृ+अक यहां 'ऋ' को प्रत्यय के णित् होने से आङ्गकार्य
अचो ञ्णिति (१८२) से वृद्धि प्राप्त होती है तथा इसी ऋ को वार्णकार्य यण्
(र्) भी प्राप्त होता है। इस परिभाषा से आङ्गकार्य वृद्धि हो जाती है। परन्तु
हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४२३
युष्मद् + औ, अस्मद् + औ—यहां ङे प्रथमयोरम् (३११) सूत्र से औकार को
अम् आदेश हो जाता है । 'युष्मद् + अम्, अस्मद् + अम्' । अब इस दशा में अग्रिमसूत्र
प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३१४) युवावौ द्विवचने ।७।२।६२॥
द्वयोरुक्तावनयोर्मपर्यन्तस्य युवावौ स्तो विभक्तौ ॥
अर्थः—विभक्ति परे होने पर द्वित्वकथन में युष्मद् और अस्मद् को म्पर्यन्त
क्रमशः युव और आव आदेश हो जाते हैं ।
व्याख्या—विभक्तौ ।७।१। (अष्टन आ विभक्तौ से) । युष्मदस्मदोः ।६।२।
(युष्मदस्मदोरनादेशे से)। मपर्यन्तस्य ।६।१। (अधिकृत है)। युवावौ ।१।२। द्विवचने
।७।१। समासः—द्वयोर् वचनम् (कथनम्) द्विवचनम्, तस्मिन् = द्विवचने । षष्ठी-
तत्पुरुषः । यहां 'द्विवचने' का 'विभक्तौ' के साथ सामानाधिकरण्य कर लेने से 'द्विवचन
विभक्ति परे होने पर' ऐसा अर्थ अभीष्ट नहीं । क्योकि यदि ऐसा अभीष्ट होता तो
महामुनि 'द्विवचने' न कहकर 'द्वित्वे' ही कह देते । उन के 'द्वित्वे' न कह कर 'द्विवचने'
कथन का यह तात्पर्य है कि चाहे एकवचन, द्विवचन, बहुवचन जो भी विभक्ति परे
हो द्वित्वकथन में युष्मद् और अस्मद् को म्पर्यन्त युव, आव आदेश हो जाते हैं ।
यथा—युवाम् अतिक्रान्तः=अतियुवाम्, आवाम् अतिक्रान्तः=अत्यावाम् । यहां सुं परे
होने पर भी युव और आव आदेश हो जाते हैं । यहां का विशेष विचार सिद्धान्त-
कौमुदी में देखें । अर्थः—(विभक्तौ) विभक्ति परे होने पर (द्विवचने) द्वित्वकथन में
(युष्मदस्मदोः) युष्मद् और अस्मद् शब्दों के (मपर्यन्तस्य) म्पर्यन्त भाग के स्थान
पर (युवावौ) क्रमशः युव और आव आदेश हो जाते हैं ।
युष्मद् + अम्, अस्मद् + अम्—यहां द्वित्वकथन में युवावौ द्विवचने (३१४)
सूत्र द्वारा म्पर्यन्त क्रमशः युव, आव आदेश करने पर—युव अद् + अम्, आव अद् +
अम् । अब अन्तरङ्ग होने से प्रथम अतो गुणे (२७४) से पररूप एकादेश हो जाता
है—युवद् + अम्, आवद् + अम् । इस स्थिति में अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३१५) प्रथमायाश्च द्विवचने भाषायाम् ।७।२।८८॥
औङ्चेतयोरात्वं लोके । युवाम् । आवाम् ॥
अर्थः—लोक में प्रथमा का द्विवचन परे होने पर युष्मद् और अस्मद् को
आकार आदेश हो जाता है ।
व्याख्या—प्रथमायाः ।६।१। च इत्यव्ययपदम् । द्विवचने ।७।१। भाषायाम्
।७।१। युष्मदस्मदोः ।६।२। (युष्मदस्मदोरनादेशे से) । आ ।१।१। (अष्टन आ विभक्तौ
से)। अर्थः—(भाषायाम्) लोक में (प्रथमायाः) प्रथमाविभक्ति के (द्विवचने)
व्याश्रय (भिन्न भिन्न आश्रय) में यह परिभाषा प्रवृत्त नहीं होती । यहां प्रकृत में
शेषे लोपः तो विभक्ति को निमित्त मानता है और अतो गुणे 'अ' को । अतः
भिन्न भिन्न आश्रय होने से यह परिभाषा प्रवृत्त नहीं होती ।
४२४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
द्विवचन के पर होने पर (च) भी (युष्मदस्मदोः) युष्मद् और अस्मद् के स्थान पर
(आ) आकार आदेश हो जाता है। अलोऽन्त्यविधि से यह आकार आदेश अन्त्य अल्
—दकार के स्थान पर होता है।
युवद् + आम् आवद् + आम्। यहां प्रकृतसूत्र से दकार को आकार आदेश
होकर— युव आ+अम्, आव आ+अम् हुआ। अब अकः सवर्णे दीर्घः (४२) से
सवर्णदीर्घ और अमि पूर्वः (१३५) से पूर्वरूप करने पर— 'युवाम्, आवाम्' प्रयोग
सिद्ध होते हैं। [भाषाग्राम्य कथन में वद से युवम् आवम् बनेंगे]।
युष्मद् + जस् अस्मद् + जस् —यहां ङे प्रथमयोरम् (३११) से जस् को अम्
आदेश हो जाता है। 'युष्मद्+अम्, अस्मद्+अम्' इस स्थिति में अग्रिमसूत्र प्रवृत्त
होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्— (३१६) यूयवयौ जसि ॥७।२।६३॥
अनयोर्मपर्यन्तस्य यूयवयौ स्तो जसि। यूयम्। वयम्॥
अर्थ —जस् परे होने पर युष्मद् और अस्मद् शब्दों का म्पर्यन्त क्रमशः यूय
और वय आदेश हो जाते हैं।
व्याख्या—युष्मदस्मदोः ।६।२। (युष्मदस्मदोरनादेशे से)। मपर्यन्तस्य ।६।१।
(यह अधिकृत है)। यूयवयौ ।१।२। जसि ।७।१। अर्थ —(जसि) जस् परे होने पर
(युष्मदस्मदोः) युष्मद् और अस्मद् शब्दों के (मपर्यन्तस्य) म्पर्यन्त भाग के स्थान
पर क्रमशः (यूयवयौ) यूय और वय आदेश होते हैं।
'युष्मद्+अम्, अस्मद्+अम्' यहां अम् को स्थानिवद्भाव से जस् मान कर
उस के परे होने पर प्रकृतसूत्र द्वारा म्पर्यन्त क्रमशः यूय और वय आदेश हो—'यूय
अद् +अम्, वय अद्+अम्'। अब अतो गुणे (२७४) से पररूप करने पर—यूयद+
अम्, वयद्+अम्। पुनः शेषे लोपः (३१३) से अद् भाग का लोप होकर—यूय्
+अम् = 'यूयम्', वय्+अम्= 'वयम्' रूप सिद्ध होते हैं। अन्त्यलोपपक्ष में शेषे लोपः
(३१३) से जब केवल दकार का लोप होता है, तब अमि पूर्वः (१३५) से पूर्वरूप
करने से उक्त रूप सिद्ध होते हैं।
द्वितीया के एकवचन में—'युष्मद् + अम्, अस्मद् + अम्'। यहां अग्रिमसूत्र
प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३१७) त्वमावेकवचने ॥७।२।६७॥
एकस्योक्तावनयोर्मपर्यन्तस्य त्वमौ स्तो विभक्तौ॥
अर्थ —विभक्ति परे होने पर एकत्व कथन में युष्मद् और अस्मद् को म्पर्यन्त
त्व और म आदेश हो जाते हैं।
व्याख्या—विभक्तौ ।७।१। (अष्टन आ विभक्तौ से)। युष्मदस्मदोः ।६।२।
(युष्मदस्मदोरनादेशे से)। मपर्यन्तस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। त्वमौ ।१।२। एक-
वचने ।७।१। समास —एकस्य वचनम्—वचनम् = एकवचनम्, तस्मिन् = एकवचने।
हलन्त-पुँल्लिङ्ग-प्रकरणम्
षष्ठीतत्पुरुषसमासः। यहां 'एकवचने' का 'विभक्तौ' के साथ सामानाधिकरण्य करके
'एकवचन विभक्ति परे होने पर' ऐसा अर्थ अभीष्ट नहीं। क्योंकि तब आचार्य 'एक-
वचने' न कह कर 'एकत्वे' ऐसा कह देते। अतः यहां 'एकवचने' कहने का यह तात्पर्य
है कि चाहे एकवचन, द्विवचन वा बहुवचन जो भी विभक्ति परे हो युष्मद् और
अस्मद् को एकत्वकथन में मपर्यन्त त्व और म आदेश हो जाते हैं। यथा—त्वाम्
अतिक्रान्तो = अतित्वम्, माम् अतिक्रान्ती = अतिमाम्। यहां द्विवचन परे होने पर भी
युष्मद् और अस्मद् के एकार्थवाची होने से 'त्व, म' आदेश हो जाते हैं। विशेष
सिद्धान्तकौमुदी में देखें।
'युष्मद् + अम्, अस्मद् + अम्' यहां क्रमशः मपर्यन्त 'त्व, म' आदेश होकर—
'त्व अद् + अम्, म अद् + अम्'। अतो गुणे (२७४) से पररूप करने पर—'त्वद् +
अम्, मद् + अम्'। अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३१८) द्वितीयायाञ्च ७।२।८७॥
अनयोरात् स्यात्। त्वाम्। माम् ॥
अर्थः—द्वितीया विभक्ति परे होने पर युष्मद् और अस्मद् शब्दों को आकार
आदेश हो।
व्याख्या—युष्मदस्मदोः ।६।२। (युष्मदस्मदोरनादेशे से)। आ ।१।१। (अष्टन
आ विभक्तौ से)। द्वितीयायाम् ।७।१। च इत्यव्ययपदम्। अर्थः—(द्वितीयायाम्)
द्वितीया विभक्ति परे होने पर (च) भी (युष्मदस्मदोः) युष्मद् और अस्मद् शब्दों के
स्थान पर (आ) आकार आदेश हो जाता है। अलोऽन्त्यविधि द्वारा यह आदेश अन्त्य
दकार के स्थान पर होता है।
'त्वद् + अम्, मद् + अम्' यहां द्वितीया परे है अतः प्रकृतसूत्र से दकार को
आकार आदेश होकर—'त्व आ + अम्, म आ + अम्' हुआ। अब अकः सवर्णे दीर्घः
(४२) से सवर्णदीर्घ तथा अमि पूर्वः (१३५) से पूर्वरूप करने पर 'त्वाम्, माम्' प्रयोग
सिद्ध होते हैं।
युष्मद् + औट्, अस्मद् + औट्—यहां ङे प्रथमोयोर्म् (३११) सूत्र से अम् आदेश
होकर—'युष्मद् + अम्, अस्मद् + अम्'। युवावौ द्विवचने (३१४) से मपर्यन्त युव
और आव हो—'युव अद् + अम्, आव अद् + अम्'। अतो गुणे (२७४) से पररूप
करने से—'युवद् + अम्, आवद् + अम्'। अब द्वितीयायां च (३१८) से दकार को
आकार, अकः सवर्णे दीर्घः (४२) से सवर्णदीर्घ तथा अमि पूर्वः (१३५) से पूर्वरूप
एकादेश करने से 'युवाम्, आवाम्' प्रयोग सिद्ध होते हैं।
विशेष—प्रथमाविभक्ति के 'युवाम्, आवाम्' की प्रक्रिया में तथा द्वितीया
विभक्ति के 'युवाम्, आवाम्' की प्रक्रिया में आकारविधायक सूत्र का भेद है। प्रथमा
में प्रथमायाश्च द्विवचने भाषायाम् (३१५) द्वारा तथा द्वितीया में द्वितीयायाञ्च (३१८)
से आकार आदेश होता है।
४२६ भैमोध्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
'युष्मद् + शस्, अस्मद् + शस्' यहां अनुबन्ध शकार का लोप होकर 'युष्मद् +
अस्, अस्मद् + अस्' । अब इस अवस्था में ङे प्रथमयोरम् (३११) द्वारा अम् आदेश
प्राप्त होने पर अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है।
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३१६) शसो न ।७।१।२६॥
आभ्यां शसो न स्यात् । अमोऽपवादः । आदेः परस्य (७२) । संयो-
गान्तलोपः । युष्मान् । अस्मान् ॥
अर्थः—युष्मद् या अस्मद् शब्दा से परे शस् को नकार आदेश हो ।
व्याख्या — युष्मदस्मद्भ्याम् ।५।२। (युष्मदस्मद्भ्यां ङसोऽश् से) । शसः ।६।१।
न ।१।१। (विभक्ति का लुक्) । अर्थ — (युष्मदस्मद्भ्याम्) युष्मद् और अस्मद् शब्दों
से पर (शसः) शस् के स्थान पर (न) न् आदेश हो जाता है । अम् आदेश के प्राप्त
होने पर यह आदेश विधान किया गया है अतः यह उस (३११) का अपवाद है । यह
नकारादश अलोऽन्त्यपरिभाषा से अन्त्य अल् अर्थात् सकार के स्थान पर प्राप्त था,
परन्तु आदेः परस्य (७२) से उस का बाध कर शस् = अस् के आदि अर्थात् अकार के
स्थान पर हो जाता है ।
'युष्मद् + अस्, अस्मद् + अस्' यहां प्रकृतसूत्र से शस् के अकार को नकार
आदेश हो 'युष्मद् + न्स्, अस्मद् + न्स्' । अब द्वितीयायाञ्च (३१८) सूत्र से दकार
को आकार तथा अकः सवर्णे दीर्घः (४२) से सवर्णदीर्घ हो—'युष्मान्स्, अस्मान्स्' ।
पुनः संयोगान्तस्य लोपः (२०) से सकार का लोप करने पर—'युष्मान्, अस्मान्' प्रयोग
सिद्ध होते हैं । ध्यान रहे कि यहां संयोगान्तलोप के असिद्ध होने से न लोप० (१८०)
द्वारा नकार का लोप नहीं होता किञ्च 'युष्मान्' में अट्कु० (१३८) द्वारा प्राप्त
णत्व का भी पदान्तस्य (१३६) द्वारा निषेध हो जाता है ।
युष्मद् + आ (टा), अस्मद् + आ (टा)—यहां एकत्वकथन होने के कारण
त्वामावेकवचने (३१७) से म्पर्यन्त त्व और म आदेश हो—'त्व अद् + आ, म अद् +
आ' । अतो गुणे (२७४) से पररूप हो—'त्वद् + आ, मद् + आ' । अब अग्रिमसूत्र
प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३२०) योऽचि ।७।२।८६॥
अनयोर्यकारादेशः स्यादनादेशेऽजादौ परतः । त्वया । मया ॥
अर्थः—अनादेश अजादि विभक्ति परे होने पर युष्मद् और अस्मद् शब्दों को
यकार आदेश हो ।
व्याख्या—युष्मदस्मदोः ।६।२। (युष्मदस्मदोरनादेशे से) । यः ।१।१। (यकारा-
दकार उच्चारणार्थः) । अनादेशे ।७।१। (युष्मदस्मदोरनादेशे से) । अचि ।७।१।
विभक्तौ ।७।१। (अष्टन आ विभक्तौ से) । 'अचि' यह 'विभक्तौ' का विशेषण है अतः
यस्मिन्विधिस्तदादावल्ग्रहणे द्वारा तदादिविधि हो कर 'अजादौ विभक्तौ' बन जाता है ।
हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४२७
अर्थः— (अनादेशे) अनादेश (अचि) अजादि (विभक्तौ) विभक्ति परे हो तो (युष्मद-
स्मदोः) युष्मद् और अस्मद् शब्दों के स्थान पर (यः) य् आदेश हो जाता है।
जिन विभक्तियों के स्थान पर कोई आदेश नही होता वे अनादेश विभक्तियां
कहाती हैं। अनादेश अजादि विभक्ति परे होने पर युष्मद् और अस्मद् को य् आदेश
हो जाता है। अलोऽन्त्यविधि से यह आदेश अन्त्य अल् दकार के स्थान पर होता है।
'त्वद्+आ, मद्+आ' यहां 'आ' यह अनादेश अजादि विभक्ति परे है अतः
प्रकृतसूत्र से दकार को यकार आदेश हो कर—त्वय्+आ='त्वया', मय्+आ=
'मया' प्रयोग सिद्ध होते हैं।
'अनादेश' कथन के कारण पञ्चमीबहुवचनान्त 'युष्मत्, अस्मत्' में यकारादेश
नहीं होत। क्योंकि यहां पञ्चमी के बहुवचन 'भ्यस्' के स्थान पर पञ्चम्या अत्
(३२५) द्वारा 'अत्' यह अजादि आदेश हुआ है।
'युष्मद्+भ्याम्, अस्मद्+भ्याम्' यहां युवावौ द्विवचने (३१४) से क्रमशः
म्पर्यन्त युव और आव आदेश हो कर 'युव अद्+भ्याम्, आव अद्+भ्याम्'। अतो
गुणे (२७४) से पररूप करने पर—'युवद्+भ्याम्, आवद्+भ्याम्'। अब अग्रिम-
सूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३२१) युष्मदस्मदोरनादेशे ७।२।८६॥
अनयोरात् स्याद् अनादेशे हलादौ विभक्तौ। युवाभ्याम्। आवाभ्याम्।
युष्माभिः। अस्माभिः॥
अर्थः—अनादेश हलादि विभक्तियों के परे होने पर युष्मद् और अस्मद् शब्दों
के स्थान पर आकार आदेश हो।
व्याख्या—युष्मदस्मदोः ।६।२। अनादेशे ।७।१। हलि ।७।१। (रायो हलि से)।
विभक्तौ ।७।१। आ ।१।१। (अष्टन आ विभक्तौ से)। अर्थः—(अनादेशे) अनादेश
(हलि =हलादौ) हलादि (विभक्तौ) विभक्ति परे होने पर (युष्मदस्मदोः) युष्मद्
और अस्मद् शब्दों के स्थान पर (आ) 'आ' यह आदेश हो जाता है। यह आकार
आदेश अलोऽन्त्यविधि से अन्त्य अल् दकार के स्थान पर होता है।
'युवद्+भ्याम्, आवद्+भ्याम्' यहां 'भ्याम्' यह अनादेश हलादि विभक्ति
परे है अतः दकार को आकार हो कर सवर्णदीर्घ करने से—'युवाभ्याम्, आवाभ्याम्'
प्रयोग सिद्ध होते हैं।
अनादेश के फलस्वरूप 'युष्मभ्यम्' आदि में भ्यम्-पक्ष में 'आ' आदेश न होगा।
'युष्मद्+भिस्, अस्मद्+भिस्' यहां युष्मदस्मदोरनादेशे (३२१) सूत्र से
दकार को आकार तथा सवर्णदीर्घ हो कर 'युष्माभिः, अस्माभिः' प्रयोग सिद्ध होते हैं।
'युष्मद्+ङे, अस्मद्+ङे' यहां ङे प्रथमयोरम् (३११) से ङे को अम् आदेश
हो कर 'युष्मद्+अम्, अस्मद्+अम्'। अब अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है—
४२८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
[लघु०] विधि-सूत्रम्— (३२२) तुभ्यमह्यौ ङयि ।७।२।९५॥
अनयोर्मपर्यन्तस्य । टिलोप । तुभ्यम् । मह्यम् ॥
अर्थ —'ङे' परे होने पर युष्मद् और अस्मद् शब्दों को मपर्यन्त क्रमशः तुभ्य
और मह्य आदेश हो जाते हैं।
व्याख्या—युष्मदस्मदो ।६।२। (युष्मदस्मदोरनादेशे स) । मपर्यन्तस्य ।६।१।
(यह अधिकृत है) । तुभ्यमह्यौ ।१।२। ङयि ।७।१। अर्थ —(ङयि) 'ङे' परे होने पर
(युष्मदस्मदो ) युष्मद् और अस्मद् शब्दो के (मपर्यन्तस्य) मकारपर्यन्त भाग के स्थान
पर क्रमश (तुभ्यमह्यौ) तुभ्य और मह्य आदेश हो जाते हैं ।
'युष्मद् + अम्, अस्मद् + अम्' यहा स्थानिवद्भाव से अम् को ङे मान कर
प्रकृतसूत्र से तुभ्य और मह्य आदेश हो कर 'तुभ्य अद् + अम्, मह्य अद् + अम्' ।
अतो गुणे (२७४) से पररूप हो—'तुभ्यद् + अम्, मह्यद् + अम्' । अब टिलोपपक्ष मे
शेषे लोप (३१३) से अद् भाग का लोप करने पर 'तुभ्यम्, मह्यम्' प्रयोग सिद्ध होते
हैं। अन्त्यलोपपक्ष मे शेषे लोप (३१३) से दकारलोप तथा अमि पूर्व. (१३५) से
पूर्वरूप करने पर उक्त रूपो की सिद्धि होती है ।
'युष्मद् + भ्यस्, अस्मद् + भ्यस्' यहा अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्— (३२३) भ्यसोऽभ्यम् ।७।२।३०॥
आभ्या परस्य भ्यसोऽभ्यम् इत्यादेश. स्यात् । युष्मभ्यम् । अस्मभ्यम् ॥
अर्थ.—युष्मद् और अस्मद् शब्दो से परे भ्यस् को अभ्यम् आदेश हो ।
व्याख्या—युष्मदस्मद्भ्याम् ।५।२। (युष्मदस्मद्भ्याम् ङसोऽश् से) । भ्यस
।६।१। अभ्यम् ।१।१। अर्थ —(युष्मदस्मद्भ्याम्) युष्मद् और अस्मद् शब्दो से परे
(भ्यस.) भ्यस् के स्थान पर (अभ्यम्) अभ्यम् आदेश हो जाता है ।
'युष्मद् + भ्यस्, अस्मद् + भ्यस्' यहा भ्यस् को अभ्यम् आदेश हो कर शेषे लोप•
(३१३) से टिलोप' करने से 'युष्मभ्यम्, अस्मभ्यम्' प्रयोग सिद्ध होते हैं। अन्त्यलोप-
पक्ष मे केवल दकार का लोप हो कर अतो गुणे (२७४) से पररूप करने पर उक्त
रूप सिद्ध होंगे ।
ध्यान रहे कि शेषे लोपः (३१३) मे अन्त्यलोप मानने वाले कुछ वैयाकरण
'भ्यसो भ्यम्' इस प्रकार सूत्र पढ कर भ्यस् के स्थान पर भ्यम् आदेश करते हैं। अत
उन के मत मे पररूप किये बिना ही यथेष्ट रूप सिद्ध हो जाते हैं।२
१. यहा अनादेश अजादि विभक्ति न होने से योऽचि (३२०) सूत्र से यकारादेश
नही होता । एवम्—'भ्यम्' पक्ष मे भी युष्मदस्मदोरनादेशे (३२१) से आकारा-
देश की अप्रवृत्ति जाननी चाहिये ।
२ परन्तु इस प्रकार अन्त्यलोप करने पर 'युष्म + भ्यम्, अस्म + भ्यम्' इस अवस्था
मे बहुवचने झल्येत् (१४५) द्वारा एत्व प्राप्त होता है। इस का वारण सङ्गवृत्तो
पुनर्वृत्तो विधिरनिष्टितस्य इस परिभाषा से किया जाता है। किसी सङ्गाधि-
हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४२६
'युष्मद् + ङसिँ, अस्मद् + ङसिँ' यहां अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३२४) एकवचनस्य च ।७।१।३२॥
आभ्यां ङसेरत् । त्वत् । मत् ॥
अर्थः—युष्मद् और अस्मद् शब्दों से परे ङसिँ को 'अत्' आदेश हो ।
व्याख्या—युष्मदस्मद्भ्याम् ।५।२। (युष्मदस्मद्भ्याम् ङसोऽश् से) । पञ्चम्याः
।६।१। (पञ्चम्या अत् से) । एकवचनस्य ।६।१। च इत्यव्ययपदम् । अत् ।१।१।
(पञ्चम्या अत् से) । अर्थः—(युष्मदस्मद्भ्याम्) युष्मद् और अस्मद् शब्दों से परे
(पञ्चम्याः) पञ्चमी के (एकवचनस्य) एकवचन के स्थान पर (च) भी (अत्)
'अत्' यह आदेश हो जाता है ।
'युष्मद् + ङसिँ, अस्मद् + ङसिँ' यहां प्रकृतसूत्र से ङसिँ के स्थान पर अत्
आदेश (ध्यान रहे कि अत् आदेश अनेकाल् होने से सर्वादेश होता है) होकर—
'युष्मद् + अत्, अस्मद् + अत्' । त्वमावेकवचने (३१७) से मपर्यन्त 'त्व, म' होकर —
'त्व अद् + अत्, म अद् + अत्' । अतो गुणे (२७४) से पररूप हो—'त्वद् + अत्,
मद् + अत्' । अथ शेषे लोपः (३१३) से टि = अद् भाग का लोप करने पर—'त्व् +
अत् = त्वत्, म् + अत् = मत्' प्रयोग सिद्ध होते हैं । अन्त्यलोपपक्ष में केवल दकार
का लोप हो कर पररूप (२७४) करने से यही रूप सिद्ध होते हैं ।
नोट—'अत्' आदेश में हलन्त्यम् (१) द्वारा तकार की इत्सञ्ज्ञा नहीं होती,
न विभक्तौ तुस्माः (१३१) सूत्र निषेध करता है। अवसान में जश्त्व-चर्त्व तो होंगे ही ।
पञ्चमी के बहुवचन में 'युष्मद् + भ्यस्, अस्मद् + भ्यस्' यहां भ्यसोऽभ्यम्
(३२३) के प्राप्त होने पर उस का अपवाद अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३२५) पञ्चम्या अत् ।७।१।३१॥
आभ्यां पञ्चम्या भ्यसोऽत् स्यात् । युष्मत् । अस्मत् ॥
अर्थः—युष्मद् अस्मद् शब्दों से परे पञ्चमी के भ्यस् को 'अत्' आदेश हो ।
व्याख्या—युष्मदस्मद्भ्याम् ।५।२। (युष्मदस्मद्भ्यां ङसोऽश् से) । पञ्चम्याः
।६।१। भ्यसः ।६।१। (भ्यसोऽभ्यम् से) । अत् ।१।१। अर्थः —(युष्मदस्मद्भ्याम्) युष्मद्
और अस्मद् शब्दों से परे (पञ्चम्याः) पञ्चमी के (भ्यसः) भ्यस् के स्थान पर (अत्)
'अत्' आदेश हो जाता है । अनेकाल् होने से 'अत्' सर्वादेश होता है ।
'युष्मद् + भ्यस्, अस्मद् + भ्यस्' यहां प्रकृतसूत्र से पञ्चमी के भ्यस् को अत्
आदेश होकर — 'युष्मद् + अत्, अस्मद् + अत्' । अथ शेषे लोपः (३१३) से टिलोप
कारीय विधि के प्रवृत्त होने पर यदि परिनिष्ठित (व्यवहार्य) प्रयोग बन जाये
तो पुनः दूसरे अङ्गाधिकारीय कार्य की प्रवृत्ति नहीं करनी चाहिये । यहां शेषे
लोपः (३१३) इस अङ्गकार्य के प्रवृत्त होने पर लोकप्रसिद्ध 'युष्मभ्यम्, अस्म-
भ्यम्' प्रयोग बन चुके हैं अतः अब इन का रूप बिगाड़ने के लिये दूसरा अङ्ग-
कार्य बहुवचने झल्येत् (१४५) प्रवृत्त न होगा ।
४३० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
होकर युष्म्+अत् = युष्मत्, अस्म् + अत् -=अस्मत्' प्रयोग सिद्ध होते हैं। अन्त्य-
लोपपक्ष म अन्त्य दकार का लोप होकर अतो गुणे (२७४) द्वारा पररूप करने से—
'युष्मत्, अस्मत्' यही रूप सिद्ध होते हैं।
षष्ठी के एकवचन में 'युष्मद्+ङस्, अस्मद्+ङस्' यहा त्वमावेकवचने
(३१७) के प्राप्त होने पर उस का अपवाद अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्— (३२६) तवममौ ङसि।७।२।९६॥
अनयोर्मपर्यन्तस्य तवममौ स्तो ङसि ॥
अर्थ —'ङस्' परे होने पर युष्मद् और अस्मद् शब्दो को मपर्यन्त क्रमश 'तव'
और 'मम' आदेश होते हैं।
व्याख्या—युष्मदस्मदो ।६।२। (युष्मदस्मदोरनादेशे से) । मपर्यन्तस्य ।६।१।
(यह अधिकृत है)। तवममौ ।१।२। ङसि ।७।१। अर्थ — (ङसि) ङस् परे होने पर
(युष्मदस्मदो ) युष्मद् और अस्मद् शब्दो के (मपर्यन्तस्य) मकारपर्यन्त भाग के
स्थान पर क्रमश (तव ममौ) 'तव' और 'मम' आदेश होते हैं।
'युष्मद् + ङस्, अस्मद् + ङस्' यहा प्रवृत्तसूत्र से मपर्यन्त 'तव, मम' आदेश
करने पर—'तव अद्+ङस्, मम अद्+ङस्'। अतो गुणे (२७४) से पररूप कर—
'तवद्+ङस्, ममद्+ङस्' । अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३२७) युष्मदस्मद्भ्यां ङसोऽश् ।७।१।२७॥
[युष्मदस्मद्भ्यां परस्य ङसोऽशादेश स्यात्]। तव। मम। युवयोः।
आवयोः॥
अर्थ —युष्मद् और अस्मद् शब्दो से परे ङस् के स्थान पर 'अश्' आदेश हो।
व्याख्या—युष्मदस्मद्भ्याम् ।५।२। ङस ।६।१। अश् ।१।१। अर्थ —(युष्मद-
स्मद्भ्याम्) युष्मद् और अस्मद् शब्दो से परे (ङस ) ङस् के स्थान पर (अश्) अश्
आदेश हो जाता है। 'अश्' आदेश शित् होने से आदे. परस्य (७२) का बाघ कर
अनेकाल्शित्सर्वस्य (४५) से सर्वादेश होता है।
'तवद+ङस्, ममद्+ङस्' यहा अश् आदेश होकर—'तवद्+अ (अश्),
ममद +अ(अश)'। अब शेषे लोप (३१३) से अद् का लोप करने से—'तव, मम'
ये प्रयोग सिद्ध होते हैं। अन्त्यलोपपक्ष मे केवल दकार का लोप होकर पररूप एकादेश
करन से यही रूप सिद्ध हो जाते हैं।
'युष्मद्+ओस्, अस्मद्+ओम्' यहा युवावौ द्विवचने (३१४) मे मपर्यन्त
क्रमश युव, आव आदेश होकर—'युव अद्+ओस्, आव अद्+ओम्'। अतो गुणे
(२७४) से पररूप कर—'युवद् + ओम्, आवद् +ओम्'। अब अनादेश अजादि विभक्ति
ओम् के परे हान में योऽचि (३२०) मे दकार को यकार आदेश होकर—'युवय् +
ओस्=युवयो, आवय् +ओम्=आवयो' प्रयोग सिद्ध होते हैं।
'युष्मद् +आम् अस्मद् + आम्' अब अग्रिम सूत्र प्रवृत्त होता है—