लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४२३
युष्मद् + औ, अस्मद् + औ—यहां ङे प्रथमयोरम् (३११) सूत्र से औकार को
अम् आदेश हो जाता है । 'युष्मद् + अम्, अस्मद् + अम्' । अब इस दशा में अग्रिमसूत्र
प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३१४) युवावौ द्विवचने ।७।२।६२॥
द्वयोरुक्तावनयोर्मपर्यन्तस्य युवावौ स्तो विभक्तौ ॥
अर्थः—विभक्ति परे होने पर द्वित्वकथन में युष्मद् और अस्मद् को म्पर्यन्त
क्रमशः युव और आव आदेश हो जाते हैं ।
व्याख्या—विभक्तौ ।७।१। (अष्टन आ विभक्तौ से) । युष्मदस्मदोः ।६।२।
(युष्मदस्मदोरनादेशे से)। मपर्यन्तस्य ।६।१। (अधिकृत है)। युवावौ ।१।२। द्विवचने
।७।१। समासः—द्वयोर् वचनम् (कथनम्) द्विवचनम्, तस्मिन् = द्विवचने । षष्ठी-
तत्पुरुषः । यहां 'द्विवचने' का 'विभक्तौ' के साथ सामानाधिकरण्य कर लेने से 'द्विवचन
विभक्ति परे होने पर' ऐसा अर्थ अभीष्ट नहीं । क्योकि यदि ऐसा अभीष्ट होता तो
महामुनि 'द्विवचने' न कहकर 'द्वित्वे' ही कह देते । उन के 'द्वित्वे' न कह कर 'द्विवचने'
कथन का यह तात्पर्य है कि चाहे एकवचन, द्विवचन, बहुवचन जो भी विभक्ति परे
हो द्वित्वकथन में युष्मद् और अस्मद् को म्पर्यन्त युव, आव आदेश हो जाते हैं ।
यथा—युवाम् अतिक्रान्तः=अतियुवाम्, आवाम् अतिक्रान्तः=अत्यावाम् । यहां सुं परे
होने पर भी युव और आव आदेश हो जाते हैं । यहां का विशेष विचार सिद्धान्त-
कौमुदी में देखें । अर्थः—(विभक्तौ) विभक्ति परे होने पर (द्विवचने) द्वित्वकथन में
(युष्मदस्मदोः) युष्मद् और अस्मद् शब्दों के (मपर्यन्तस्य) म्पर्यन्त भाग के स्थान
पर (युवावौ) क्रमशः युव और आव आदेश हो जाते हैं ।
युष्मद् + अम्, अस्मद् + अम्—यहां द्वित्वकथन में युवावौ द्विवचने (३१४)
सूत्र द्वारा म्पर्यन्त क्रमशः युव, आव आदेश करने पर—युव अद् + अम्, आव अद् +
अम् । अब अन्तरङ्ग होने से प्रथम अतो गुणे (२७४) से पररूप एकादेश हो जाता
है—युवद् + अम्, आवद् + अम् । इस स्थिति में अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३१५) प्रथमायाश्च द्विवचने भाषायाम् ।७।२।८८॥
औङ्चेतयोरात्वं लोके । युवाम् । आवाम् ॥
अर्थः—लोक में प्रथमा का द्विवचन परे होने पर युष्मद् और अस्मद् को
आकार आदेश हो जाता है ।
व्याख्या—प्रथमायाः ।६।१। च इत्यव्ययपदम् । द्विवचने ।७।१। भाषायाम्
।७।१। युष्मदस्मदोः ।६।२। (युष्मदस्मदोरनादेशे से) । आ ।१।१। (अष्टन आ विभक्तौ
से)। अर्थः—(भाषायाम्) लोक में (प्रथमायाः) प्रथमाविभक्ति के (द्विवचने)
व्याश्रय (भिन्न भिन्न आश्रय) में यह परिभाषा प्रवृत्त नहीं होती । यहां प्रकृत में
शेषे लोपः तो विभक्ति को निमित्त मानता है और अतो गुणे 'अ' को । अतः
भिन्न भिन्न आश्रय होने से यह परिभाषा प्रवृत्त नहीं होती ।