लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
DevanagariHindipublished633 पृष्ठ
पृष्ठ 435, कुल 633 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 435४२० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
४२० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
युष्मद्¹ = तुम अस्मद् = मैं
प्र० त्वम् युवाम् यूयम् प्र० अहम् आवाम् वयम्
द्वि० त्वाम् " युष्मान् द्वि० माम् " अस्मान्
तृ० त्वया युवाभ्याम् युष्माभि तृ० मया आवाभ्याम् अस्माभि
च० तुभ्यम् " युष्मभ्यम् च० मह्यम् " अस्मभ्यम्
प० त्वत्-द् " युष्मत्-द् प० मत्-द् " अस्मत्-द्
ष० तव युवयो युष्माकम् ष० मम आवयो अस्माकम्
स० त्वयि " युष्मासु स० मयि " युष्मासु
युष्मद् और अस्मद् दोनों शब्दों में एक समान सूत्र प्रवृत्त होते हैं अतः हम
भी इन की सिद्धि इकट्ठी दिखायेंगे ।
युष्मद् + सुँ, अस्मद् + सुँ । यहां अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३११) ङे प्रथमयोरम् ।७।२।२८॥
युष्मदस्मद्भ्यां परस्य 'ङे' इत्येतस्य प्रथमाद्वितीययोश्चामादेश ॥
अर्थ—युष्मद् और अस्मद् शब्दों से परे 'ङे' को तथा प्रथमा और द्वितीया
विभक्ति को अम् आदेश हो ।
व्याख्या—युष्मदस्मद्भ्याम् ।५।२। (युष्मदस्मद्भ्यां ङसोऽश् मे) । ङे ।६।१।
(यहां षष्ठीविभक्ति का लुक् समझना चाहिये) । प्रथमयो ।६।२। अम् ।१।१। समास—
प्रथमा च प्रथमा च = प्रथमे, तयो = प्रथमयो, एकशेष । यहां पहले 'प्रथमा' शब्द से
प्रथमाविभक्ति तथा दूसरे 'प्रथमा' शब्द से द्वितीया विभक्ति अभिप्रेत है²। अर्थ—
(युष्मदस्मद्भ्याम्) युष्मद् और अस्मद् शब्दो से परे (ङे) ङे के स्थान पर तथा
(प्रथमयो ) प्रथमा वा द्वितीया विभक्ति के स्थान पर (अम्) 'अम्' आदेश हो जाता है ।
इस सूत्र से सुँ को अम् आदेश हो कर—युष्मद् + अम्, अस्मद् + अम् । यहां
हलन्त्यम् (१) द्वारा अम् के मकार की इत्संज्ञा नही होती । न विभक्तौ तुस्मा (१३१)
सूत्र से निषेध हो जाता है । अब अग्रिम सूत्र प्रवृत्त होना है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३१२) त्वाहौ सौ ।७।२।९४॥
अनयोर्मपर्यन्तस्य त्वाहावादेशौ स्त (सौ परे) ॥
अर्थ.—सुँ परे होने पर युष्मद् और अस्मद् शब्दों को म्पर्यन्त (म् भी साथ
लेना है) क्रमशः त्व, अह आदेश हो जाते हैं ।
१ युष्यसिभ्यां मद्दिकू (उणा० १३६) इति शब्दावेतो सिध्यतः । युषि मौत्र ।
२ पहले 'प्रथमा' शब्द से मात्र विभक्तियों में से प्रथमाविभक्ति का ग्रहण हो जाता है,
शेष द्वितीया आदि छ विभक्तियां बच रहती हैं। अब दूसरे 'प्रथमा' शब्द से उन
छ अवशिष्ट विभक्तियो में से प्रथमाविभक्ति अर्थात् द्वितीया विभक्ति का ग्रहण
हो जाना है ।