लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४१७
(८) पदान्त में पकार के स्थान पर किस सूत्र से जश्त्व होता है ? और वह
जश्त्व कौन सा वर्ण होना चाहिये ? सोपपत्तिक स्पष्ट करें।
(६) कृदतिङ् सूत्र पर 'अत्र धात्वधिकारे' का क्या अभिप्राय है ?
(१०) 'राजा' यह किस शब्द का किस विभक्ति का रूप है ?
(उत्तर—राजन् सुँ, राज् टा)
(यहां जकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।)
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अब दकारान्त पुंल्लिङ्गों का वर्णन करते हैं—
त्यद् (वह)। त्यजि-तनि-यजिभ्यो डित् (उणा० १२६) इस सूत्र द्वारा त्यज
हानौ (भ्वा० प०) धातु से डित् 'अदि' प्रत्यय करने से टि का लोप कर देने पर
'त्यद्' शब्द निष्पन्न होता है। इस का लोक में प्रयोग नहीं देखा जाता। वेद में इस
का प्रचुर प्रयोग होता है¹। अकेले ऋग्वेद में ही पुंल्लिङ्ग त्यद् के प्रथमा के एकवचन
का प्रायः छत्तीस बार प्रयोग हुआ है। सर्वादिगणान्तर्गत होने से इसे सर्वनामकार्य
होते हैं।
त्यद् + स् (सुँ)। यहां त्यदादीनामः (१६३) सूत्र द्वारा दकार को अकार तथा
अतो गुणे (२७४) सूत्र से पररूप एकादेश करने पर—त्य+स्। यही बात ग्रन्थकार
निर्देश करते हैं—
[लघु०] त्यदाद्यत्वम्पररूपत्वञ्च ॥
अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्— (३१०) तदोः सः सावनन्त्ययोः ।७।२।१०६॥
त्यदादीनां तकारदकारयोरनन्त्ययोः सः स्यात् सौ। स्यः। त्यौ। त्ये।
सः। तौ। ते। यः। यौ। ये। एषः। एतौ। एते। अन्वादेशे —एनम्। एनौ।
एनान्। एनेन। एनयोः २ ॥
१. परन्तु स्यश्छन्दसि बहुलम् (६.१.१२६) सूत्र के निर्देश से इस का लोक में भी प्रयोग
अशुद्ध प्रतीत नहीं होता। अत एव वेणीसंहारनाटक में—सूतो वा सूतपुत्रो वा
यो वा स्यो वा भवाम्यहम् (३.३५) ऐसा क्वचित् पाठ-भेद पाया जाता है।
त्यजि-तनि० (उणा० १२६) सूत्र पर पेरुसूरि के श्लोक भी द्रष्टव्य हैं—
त्यत्तद्यदस्त्रयः सर्वादिगणे पठिता अमी।
तत्राद्यौ तु परोक्षार्थौ तृतीयस्तन्निरूपकः ॥१॥
आद्यस्य लोके न क्वापि प्रयोगः परिदृश्यते।
वेदे त्वेष स्य वाजीति प्रभृतिष्वथ गम्यते ॥२॥
स्यश्छन्दसीतिसूत्रस्थच्छन्दोग्रहणलिङ्गतः।
लोकेऽप्यस्य प्रयोगोऽस्तीत्येतदभ्युपगम्यते ॥३॥
ल० प्र० (२७)