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कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Kularnava Tantra with Hindi Commentary

भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished84 पृष्ठ

प्रकाशक

साधनमाला—षष्ठ वर्ष—मणि २
हिन्दी कुलार्णव
कश्मीर शैव मठिका पुस्तकालय 54-A.
गुप्तगंगा निशात
प्रवेशांक नं०:-
सम्पादक
श्री भद्रशील शर्मा
NO. 57
𑁍
प्रकाशक
कल्याण मन्दिर, कटरा, प्रयाग
प्रथम संस्करण ] चैत्र पूर्णिमा [ मूल्य २-५०
५०० संवत् २०२१ विक्रमी सजिल्द ३-००

𑁍 विषय-प्रवेश 𑁍
१ भूमिका .... क
२ पहला उल्लास—जीव की स्थिति .... १
३ दूसरा उल्लास—कुलधर्म का माहात्म्य .... ४
४ तीसरा उल्लास—ऊर्ध्वाम्नाय और प्रासाद-परामन्त्र की
महिमा .... ६
५ चौथा उल्लास—श्री प्रासादपरामन्त्र एवं महाषोढा .... १०
६ पाँचवाँ उल्लास—आधार, पात्र और कुलद्रव्य .... २५
७ छठा उल्लास—पूजा-रहस्य और द्रव्य-संस्कार .... २८
८ सातवाँ उल्लास—बटुक और शक्ति पूजन .... ३३
६ आठवाँ उल्लास—उल्लास एवं पाठ-भेद .... ३८
१० नवाँ उल्लास—योग-योगीश-लक्षण और कौलपूजा.... ४३
११ दसवाँ उल्लास—विशेष दिवसों के पूजन .... ४७
१२ ग्यारहवाँ उल्लास—कुलाचार-कथन .... ५२
१३ बारहवाँ उल्लास—पादुका-कथन .... ५५
१४ तेरहवाँ उल्लास—गुरु-शिष्य-लक्षण .... ५७
१५ चौदहवाँ उल्लास—गुरु-शिष्य-परीक्षा .... ५६
१६ पन्द्रहवाँ उल्लास—पुरश्चरण-कथन .... ६२
१७ सोलहवाँ उल्लास—काम्यकर्म का विधान .... ६६
१८ सत्रहवाँ उल्लास—गुरुनामादि की भावना .... ६६
🙤 ❀ 🙦

भूमिका
'कुलार्णव तन्त्र' की गणना आगम ग्रन्थों में हुई है। अतः
इसका महत्व यहाँ स्पष्ट करने का आवश्यकता नहीं है। किन्तु
यह अवश्य उल्लेखनीय है कि यह तन्त्र कौलधर्म के सिद्धान्तो की
स्पष्ट अभिव्यक्ति करने में अग्रगण्य है। इससे इसकी उपयोगिता
बहुत अधिक मानी गई है और सभी साधक बड़े आदर के साथ
इसका मनन किया करते हैं।
इसके सत्रह उल्लासों में विविध विषयों का जो विवेचन
किया गया है, वह बहुत कुछ सूत्रात्मक है। उसका स्पष्टीकरण
सुचारु रूप से करना अधिकारी विद्वानों का काम है। इन पंक्तियों
का लेखक न तो विद्वान् है और न ही ऐसे महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ की
रहस्यपूर्ण उक्तियों की व्याख्या करने का अधिकारी है। उसने
किसी प्रकार इस ग्रन्थ का सारांश हिन्दी भाषा में लिखकर
अध्यात्म प्रेमियों के समक्ष इस उद्देश्य से प्रस्तुत किया है कि वे
इस अनूठे आगम साहित्य की विशेषता को अनुभव करें और
अधिकारी विद्वानों से इसकी बातों को विस्तार के साथ समझने
को सचेष्ट हों। बहुत संभव है कि एक ओर अपनी अल्पज्ञता
और दूसरी ओर विषय की रहस्यात्मकता के कारण लेखक ने
सारांश प्रस्तुत करने में कहीं कुछ त्रुटियाँ भी की हों। इसके लिये
वह क्षमाप्रार्थी है और आशा करता है कि जो पाठक बन्धु

( ख )
अधिकारी विद्वानों की सहायता से इस ग्रन्थ का मनन करने को
सक्रिय होंगे, वे सहज ही उन त्रुटियों का संशोधन कर लेने की
कृपा करेंगे। वैसे यथाशक्ति यह प्रयत्न किया गया है कि मूल ग्रन्थ
की कोई भी महत्त्वपूर्ण बात छूटने न पावे और सारांश करने में
कहीं कोई त्रुटि न रह जाय। तथापि वास्तविक जिज्ञासु बन्धुओं
से हमारा यहो अनुरोध है कि वे इस ग्रन्थ के मूल संस्करण का
अध्ययन किसी योग्य अधिकारी की सहायता से करें। तभी वे
इसके महत्व को भले प्रकार समझ सकेंगे और इसमें निहित ज्ञान
से लाभान्वित हो सकेंगे। मूल 'कुलार्णव तन्त्र' भी कल्याण मन्दिर
द्वारा 'गुप्तावतार दुर्लभ तन्त्रमाला' के अन्तर्गत प्रकाशित किया
जा चुका है।
आशा है कि इस संक्षिप्त 'हिन्दी कुलार्णव' से उक्त प्रसिद्ध
आगम ग्रन्थ के महत्त्व की कुछ झाँकी अध्यात्म-प्रेमियों को मिल
सकेगी। यही लेखक को अभीष्ट है।
—लेखक

हिन्दी कुलार्णव
पहला उल्लास
जीव की स्थिति
श्री देवी ने ईश्वर से कहा—हे भगवन् ! इस सारहीन
कठिन संसार में नाना प्रकार के शरीरों से अनन्त जीवराशियाँ
स्थित होकर उत्पन्न होती हैं और मरती हैं और उनका कोई
अन्त नहीं है । घोर दुःख से व्याकुल होकर वे कभी सुखी नहीं
होतीं । हे प्रभो ! किस उपाय से वे मुक्त हो सकती हैं, यह
आप मुझे बतलाइये ।
ईश्वर ने उत्तर दिया—हे देवि ! सुनो। तुमने मुझसे जो
पूछा है, उसे बताता हूँ। इसके सुनने मात्र से मनुष्य संशय
से मुक्त हो जायगा । हे देवि ! परब्रह्मस्वरूपी शिव निष्कल है ।
वह सर्वज्ञ, सर्वकर्ता, सर्वेश और निर्मलहृदय है। वह आदि-
अन्त से रहित एक ज्योति है तथा निर्विकार, पर से भी परे,
निर्गुण और सच्चिदानन्द है। जीव-संज्ञावाले उसी के अंश हैं,
जो असत्य विद्या के द्वारा भिन्न हुए हैं जैसे कि अग्नि में से चिन-
गारियाँ फूटती हैं। वे विभिन्न उपाधियों और अनादि कर्मों
आदि के कारण उससे पृथक् रहते हैं तथा अपने सुख एवं
दुखदायक पुण्य-पापों से नियन्त्रित रहते हैं। अपने कर्मा-

२ हिन्दी कुलार्णव
नुसार प्राप्त अमुक-अमुक जाति से युक्त देह, आयु और
प्रारब्ध का वे जन्म-जन्मान्तरों में भोग करते रहते हैं, जिसका
कोई अन्त नहीं है। अच्छे कर्मों के फलस्वरूप वे मानव होकर
जब ज्ञानी होते हैं, तब मोक्ष को प्राप्त करते हैं और मोक्ष का
कारण हे महेश्वरि ! साक्षात् तत्त्वज्ञान है। न तो वेदों के
अध्ययन से मुक्ति मिलती है, न दर्शनों के मनन से। यही बात
सभी शास्त्रों पर लागू होती है। ज्ञान ही से मुक्ति मिलती है।
मुक्तिदायिनी एकमात्र गुरुवाणी है, शेष सभी विद्याएँ विडम्बना
मात्र हैं। शिव के द्वारा कथित अद्वैत तत्त्व तो क्रियारूपी परि-
श्रम से रहित है। उसे गुरुमुख से प्राप्त करना चाहिये। ज्ञान
दो प्रकार का बताया गया है—एक तो आगम से प्राप्त होता
है और दूसरा विवेक से। आगम से प्राप्त ज्ञान शब्दब्रह्म-परक
होता है और विवेक से प्राप्त ज्ञान परब्रह्म का निदर्शक होता
है। कुछ लोग द्वैत को चाहते हैं तो कुछ अद्वैत को, किन्तु मेरे
तत्त्व को जाननेवाले द्वैत-अद्वैत से रहित होते हैं। 'मेरा है' और
'मेरा नहीं है'—ये दो पद क्रमशः बन्धन और मोक्षकारक हैं।
वही वास्तव में कर्म है, जो बन्धनकारक न हो और वही विद्या
है, जो मुक्तिकारिणी हो। जब तक कामना उत्तेजित रहती है,
सांसारिक इच्छाएँ बनी रहती हैं, इन्द्रियाँ चञ्चल रहती हैं, तब
तक तत्त्व की बात कहाँ ? जब तक प्रयत्नरूपी रोग है, संकल्प
की कल्पना बनी है, मन में स्थिरता नहीं है, तब तक तत्त्व की
बात कहाँ ? जब तक देहाभिमान है, ममता बनी है, गुरु की
दया प्राप्त नहीं है, तब तक तत्त्व की कथा कहाँ ? जब तक तप,
व्रत, तीर्थ, जप, होम, अर्चन आदि हैं और वेद-शास्त्र-आगम
की चर्चा है, तब तक तत्त्व की कथा कहाँ ? अतएव हे देवि !
यदि आत्मसिद्धि की इच्छा है तो सभी प्रयत्नों से सभी
अवस्थाओं में सदैव तत्त्वनिष्ठ रहे। तापत्रय के कष्ट से

साधनमाला ३
पीड़ित स्वधर्मज्ञान रूपी पुष्प और स्वकुलोक्त ( अर्थात् अपने
कुल में जो बातें प्रचलित हैं, ऐसे ) फलवाले कल्पवृक्ष की छाया
का आश्रय ग्रहण करे । हे पार्वति ! अधिक कहने से क्या
लाभ । रहस्य की बात सुनो । कुलधर्म के सिवा मुक्ति नहीं है,
यह सत्य है, इसमें सन्देह नहीं है । गुरुमुख से उस तत्त्व को
जानकर हे देवि ! इस घोर संसार के बन्धन से जीव सहज ही
मुक्त हो जाता है ।

दूसरा उल्लास
कुलधर्म का माहात्म्य
श्री देवी ने पूछा—हे कुलेश ! आपने कुलधर्म के सम्बन्ध
में तो बताया, किन्तु उसे पर प्रकाश नहीं डाला। उस सर्व-
धर्मोत्तम धर्म का माहात्म्य बताने की कृपा करें।
ईश्वर ने उत्तर दिया—हे देवि ! सुनो, जो तुम पूछती हो,
उसे मैं कहूँगा। परम्परा के क्रम से आनेवाला और एक मुख
से दूसरे मुख में स्थित होनेवाला वह तत्त्व यद्यपि अकथनीय
है, तथापि परमार्थ की दृष्टि से मैं उसे कहता हूँ। सबसे उत्तम
वेद हैं, वेदों से उत्तम वैष्णव हैं, वैष्णव से उत्तम शैव, शैव
से उत्तम दक्षिण, दक्षिण से उत्तम वाम, वाम से उत्तम सिद्धान्त,
सिद्धान्त से उत्तम कौल और कौल से उत्तम कोई नहीं है। वेद
और आगम रूपी महा समुद्र को ज्ञानरूपी मथानी से मथकर
मैंने इस कुलधर्म को प्रकट किया है। कुलधर्म का आश्रय लेकर
श्रेष्ठ मनुष्य स्वर्ग से दूसरे लोक को जाकर मोक्षरूपी रत्न को
प्राप्त करता है। जो योगी होता है, वह भोगी नहीं होता और
जो भोगी होता है, वह योग को नहीं जानता किन्तु कौल भोग
और योग दोनों से युक्त है। अतः हे प्रिये ! वह सबसे श्रेष्ठ
है। भोग साक्षात् योग का रूप ले लेता है, पातक सुकृत बन
जाता है और संसार मोक्ष का साधन हो जाता है; हे कुलेश्वरि !
यही कुलधर्म है। कुलधर्म के महामार्ग से जाकर अविलम्ब
ही मुक्तिपुरी में पहुँचा जाता है, इसमें संदेह नहीं। अतएव
कौल मार्ग का आश्रय ग्रहण करना चाहिये। लोग चाहे प्रशंसा

साधनमाला ५
करें, चाहे निन्दा करें; लक्ष्मी चाहे जाए, चाहे रहे; मृत्यु चाहे
आज हो, चाहे युग के अन्त में; कौल मार्ग को कभी न छोड़े।
न तो धन के लोभ से, न क्रोधवश, न द्वेष के कारण, न ईर्ष्या
से, न कामवश और न भय से ही प्राप्त कुलधर्म का त्याग करे।
गुरु की दया से युक्त, दीक्षा-द्वारा पाप-मुक्त, कुलपूजा में
तल्लीन-यह हे देवि ! कौल ही है, कोई अन्य नहीं। वे पुण्य-
कर्मवाले धन्य हैं, वे ही सन्त और योगी हैं, जिन्हें भाग्यवश
कुल का ज्ञान प्राप्त होता है। हे महादेवि ! जीवन्मुक्ति का सरल
उपाय कुलशास्त्रों में छिपा हुआ है। कुल के ज्ञाताओं में भी
जो ऊर्ध्वाम्नाय से प्रसिद्ध हैं, उनका ज्ञान श्रेष्ठ है। हे पार्वति !
सभी कुलशास्त्रों को मैंने ही कहा है। अतः वे स्वतः प्रमाण हैं,
इसमें संदेह नहीं। देवताओं और पितरों के लिए समर्पित
किया जानेवाला मद्य अमृतस्वरूप हो जाता है और पुरुष पशु
की बलि देकर उसके मांस को विधिवत् स्वर्णपात्र में रखकर
प्रसाद रूप में ग्रहण करने से अविलम्ब ही सर्व पापों का नाश
होकर तत्त्वज्ञान की उपलब्धि होती है। हे अम्बिके ! कुल का
यह कुछ माहात्म्य मैंने संक्षेप में यहाँ कहा है। अब क्या सुनना
चाहती हो ?

तीसरा उल्लास
ऊर्ध्वाम्नाय और प्रासादपरा मन्त्र की महिमा
श्री देवी ने कहा—हे प्रभो ! मैं सर्वोत्तम ऊर्ध्वाम्नाय की
महिमा सुनना चाहती हूँ। आप उसके मन्त्र को बताइये।
ईश्वर बोले—हे देवि ! सुनो। मैंने अपने पाँच मुखों से—
पूर्वाम्नाय, पश्चिमाम्नाय, दक्षिणाम्नाय, उत्तराम्नाय और ऊर्ध्वा-
म्नाय—ये पाँच आम्नाय कहे हैं। ये पाँचों मोक्ष-मार्ग के रूप
में प्रसिद्ध हैं। इनमें से प्रत्येक आम्नाय के मन्त्र भुक्ति और मुक्ति
के देनेवाले हैं तथा उसके उपमन्त्र भी तत्त्वदायक होने से
प्रसिद्ध हैं। संसार के कल्याण की इच्छा से मैंने ही उन
सबको कहा है। उन सब मन्त्रों के देवता उन उन फलों को
देते हैं। केवल एक आम्नाय को जो जान लेता है, वह मुक्त हो
जाता है,इसमें संदेह नहीं। फिर चार आम्नायों के ज्ञाता की क्या
बात; साक्षात् शिव हो जाता है। चार आम्नायों के विशेष ज्ञान
से भी श्रेष्ठ ऊर्ध्वाम्नाय है। अतएव यदि आत्मसिद्धि की इच्छा
है, तो उसी को जानना चाहिये। सब धर्मों से ऊर्ध्व होने के
कारण ऊर्ध्वाम्नाय श्रेष्ठ है। निम्न स्थित व्यक्ति को ऊर्ध्वगामी
करने से यह ऊर्ध्वाम्नाय कहलाता है। इसका तत्त्व उच्चस्तर
का है, यह संसार-सागर को नष्ट करता है और ऊर्ध्वलोक
इसकी सेवा करते हैं—अतएव यह ऊर्ध्वाम्नाय कहलाता है।
इसलिये हे देवेशि ! मोक्ष के एकमात्र साक्षात् साधन-स्वरूप
ऊर्ध्वाम्नाय का ज्ञान प्राप्त करे, जो सब आम्नायों से अधिक
फल देनेवाला और पर से भी परे है। पूर्वाम्नाय सृष्टिरूप है

साधनमाला ७
और दक्षिणाम्नाय स्थितिरूप; पश्चिमाम्नाय संहाररूप है और
उत्तराम्नाय अनुग्रहरूप है। दूसरे प्रकार से पूर्वाम्नाय मन्त्रयोग
है और दक्षिणाम्नाय भक्तियोग; पश्चिमाम्नाय कर्मयोग है और
उत्तराम्नाय ज्ञानयोग है। हे कुलनायिके ! ये सब तत्व ऊर्ध्वा-
म्नाय में विद्यमान हैं। साक्षात् ज्ञान-स्वरूप होने से इस
आम्नाय में कुछ भी कर्म शेष नहीं रहता। ऊर्ध्वाम्नाय की यह
कुछ महिमा मैंने संक्षेप में यहाँ कही है। अब इसके उत्तम
मन्त्र का माहात्म्य कहता हूँ—
ऊर्ध्वाम्नाय में 'पराप्रासाद मन्त्र' अधिष्ठित है, जो हम
दोनों का परमस्वरूप है। उसे जो जानता है, वह स्वयं शिव
हो जाता है। पराप्रासाद मन्त्र का ज्ञाता सर्वकर्मविहीन होते
हुए भी सहज ही जिस गति को प्राप्त करता है, उसे कोई भी
धार्मिक व्यक्ति प्राप्त नहीं कर पाता। उसके घर में चिन्तामणि,
कामधेनु और कल्पतरु सदैव विद्यमान रहते हैं। पराप्रासाद
का जप करनेवालों की साक्षात् कुबेर सेवा करते हैं। परा-
प्रासाद मन्त्र का ज्ञाता जो करता है, जो चाहता है और जो
बोलता है, वह सब हे महेशानि ! तप, ध्यान, जप स्वरूप ही
होता है। दीक्षापूर्वक क्रमयुक्त जो पराप्रासाद मन्त्र को जानता
है, वह 'मैं' ही हूँ, इसमें संदेह नहीं। चाहे ब्राह्मण हो या
अन्त्यज, चाहे पवित्र हो या अपवित्र—जो पराप्रासाद का जप
करनेवाला है, वह निस्सन्देह मुक्त है। चाहे चलते हुए जपे
या बैठे हुए, चाहे जगते हुए जपे या सोते हुए, यह पराप्रासाद
मन्त्र हे देवेशि ! कभी निष्फल नहीं होता। प्रचलित सहस्रों
मन्त्रों में से प्रत्येक पर्याप्त विलम्ब से केवल एक फल प्रदान
करता है। किन्तु हे कुलेशि ! यह मन्त्रराज शीघ्र ही सर्व फलों
को प्रदान करता है। यह पराप्रासाद मन्त्र सब मन्त्रों में श्रेष्ठ
है। चाहे ज्ञानपूर्वक भजन करे या अज्ञानपूर्वक, यह मन्त्र सदैव