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सर्वकोश
कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Kularnava Tantra with Hindi Commentary

भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished84 पृष्ठ

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साधनमाला ५
करें, चाहे निन्दा करें; लक्ष्मी चाहे जाए, चाहे रहे; मृत्यु चाहे
आज हो, चाहे युग के अन्त में; कौल मार्ग को कभी न छोड़े।
न तो धन के लोभ से, न क्रोधवश, न द्वेष के कारण, न ईर्ष्या
से, न कामवश और न भय से ही प्राप्त कुलधर्म का त्याग करे।
गुरु की दया से युक्त, दीक्षा-द्वारा पाप-मुक्त, कुलपूजा में
तल्लीन-यह हे देवि ! कौल ही है, कोई अन्य नहीं। वे पुण्य-
कर्मवाले धन्य हैं, वे ही सन्त और योगी हैं, जिन्हें भाग्यवश
कुल का ज्ञान प्राप्त होता है। हे महादेवि ! जीवन्मुक्ति का सरल
उपाय कुलशास्त्रों में छिपा हुआ है। कुल के ज्ञाताओं में भी
जो ऊर्ध्वाम्नाय से प्रसिद्ध हैं, उनका ज्ञान श्रेष्ठ है। हे पार्वति !
सभी कुलशास्त्रों को मैंने ही कहा है। अतः वे स्वतः प्रमाण हैं,
इसमें संदेह नहीं। देवताओं और पितरों के लिए समर्पित
किया जानेवाला मद्य अमृतस्वरूप हो जाता है और पुरुष पशु
की बलि देकर उसके मांस को विधिवत् स्वर्णपात्र में रखकर
प्रसाद रूप में ग्रहण करने से अविलम्ब ही सर्व पापों का नाश
होकर तत्त्वज्ञान की उपलब्धि होती है। हे अम्बिके ! कुल का
यह कुछ माहात्म्य मैंने संक्षेप में यहाँ कहा है। अब क्या सुनना
चाहती हो ?