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सर्वकोश
कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Kularnava Tantra with Hindi Commentary

भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished84 पृष्ठ

पृष्ठ 8, कुल 84 में से

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२ हिन्दी कुलार्णव
नुसार प्राप्त अमुक-अमुक जाति से युक्त देह, आयु और
प्रारब्ध का वे जन्म-जन्मान्तरों में भोग करते रहते हैं, जिसका
कोई अन्त नहीं है। अच्छे कर्मों के फलस्वरूप वे मानव होकर
जब ज्ञानी होते हैं, तब मोक्ष को प्राप्त करते हैं और मोक्ष का
कारण हे महेश्वरि ! साक्षात् तत्त्वज्ञान है। न तो वेदों के
अध्ययन से मुक्ति मिलती है, न दर्शनों के मनन से। यही बात
सभी शास्त्रों पर लागू होती है। ज्ञान ही से मुक्ति मिलती है।
मुक्तिदायिनी एकमात्र गुरुवाणी है, शेष सभी विद्याएँ विडम्बना
मात्र हैं। शिव के द्वारा कथित अद्वैत तत्त्व तो क्रियारूपी परि-
श्रम से रहित है। उसे गुरुमुख से प्राप्त करना चाहिये। ज्ञान
दो प्रकार का बताया गया है—एक तो आगम से प्राप्त होता
है और दूसरा विवेक से। आगम से प्राप्त ज्ञान शब्दब्रह्म-परक
होता है और विवेक से प्राप्त ज्ञान परब्रह्म का निदर्शक होता
है। कुछ लोग द्वैत को चाहते हैं तो कुछ अद्वैत को, किन्तु मेरे
तत्त्व को जाननेवाले द्वैत-अद्वैत से रहित होते हैं। 'मेरा है' और
'मेरा नहीं है'—ये दो पद क्रमशः बन्धन और मोक्षकारक हैं।
वही वास्तव में कर्म है, जो बन्धनकारक न हो और वही विद्या
है, जो मुक्तिकारिणी हो। जब तक कामना उत्तेजित रहती है,
सांसारिक इच्छाएँ बनी रहती हैं, इन्द्रियाँ चञ्चल रहती हैं, तब
तक तत्त्व की बात कहाँ ? जब तक प्रयत्नरूपी रोग है, संकल्प
की कल्पना बनी है, मन में स्थिरता नहीं है, तब तक तत्त्व की
बात कहाँ ? जब तक देहाभिमान है, ममता बनी है, गुरु की
दया प्राप्त नहीं है, तब तक तत्त्व की कथा कहाँ ? जब तक तप,
व्रत, तीर्थ, जप, होम, अर्चन आदि हैं और वेद-शास्त्र-आगम
की चर्चा है, तब तक तत्त्व की कथा कहाँ ? अतएव हे देवि !
यदि आत्मसिद्धि की इच्छा है तो सभी प्रयत्नों से सभी
अवस्थाओं में सदैव तत्त्वनिष्ठ रहे। तापत्रय के कष्ट से