खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
परिच्छेद ] व्याप्ति और व्याप्तिग्रहोपाय का खण्डन २५५
इत्येकस्यान्ययेऽपरस्यान्यय इत्युक्तं स्यात् । एवञ्च सति पार्थिवत्व-लोहलेख्यत्वयो-
रन्वयो व्याप्तिः स्यात् ।
न क्वाचित्कः सम्बन्धो व्याप्तिः , सार्वत्रिकस्य तथात्वेन विवक्षितत्वादिति
चेत् । किमिदं सार्वत्रिकत्वं सम्बन्धस्य ? सर्वासु तज्जातीयव्यक्तिषु विद्यमानतेति
चेत् ; नेयं सर्वतज्जातीयव्यक्त्यपरिज्ञाने शक्याऽवधारणा । न च सर्वास्ता व्यक्तयो
विशेषतो ज्ञातुं शक्याः , तत्तत्प्रमितिकरणासम्भवात् ।
इन्द्रियेण सामान्यलक्षणया प्रत्यासत्त्या व्याप्तिग्रहणकाले सर्वास्तज्जातीय-
व्यक्तयो गृह्यन्ते, यदनभ्युपगमे षण्डकसमुद्वाह्य मुग्धायाः पुत्रप्रार्थनमिवेति
वाचस्पतिरुपालम्भमवादीदिति चेत् । मैवम् ; सामान्यलक्षणया प्रत्यासत्त्या
व्याप्तिं गृह्णतः सार्वज्ञप्रसङ्गात् ।
क्वचिदप्यज्ञानं ते न स्यादिति च सार्वज्ञापादनमिति न प्रतिकृत्याऽपि ।
लोहलेख्यत्व ( कुठारादिच्छेद्यत्व ) रूप साध्य की पार्थिवत्व में व्याप्ति हो जायगी ।
कारण पार्थिवत्व का जिस काष्ठादि में अन्वय है, वहाँ लोहलेख्यत्व का भी अन्वय है ही ।
समर्थन — काचित्क सम्बन्ध अर्थात् अन्वय व्याप्ति नहीं, किन्तु सार्वत्रिक अन्वय ही
व्याप्ति है। एवञ्च पार्थिवत्व का लोहलेख्यत्व से सार्वत्रिक अन्वय नहीं है, कारण वज्र
( हीरे ) में वह व्यभिचरित हो जाता है । खंडन — सम्बन्ध में सार्वत्रिकत्व क्या
वस्तु है ? यदि 'तज्जातीय सर्वव्यक्तियों में विद्यमानता' है, तो जबतक सर्वव्यक्तियों
का ज्ञान न हो, तबतक सर्वव्यक्तियों में सम्बन्ध की विद्यमानता का भी ज्ञान हो नहीं
सकता । सब व्यक्तियों का विशेषरूप से ज्ञान हो नहीं सकता; क्योंकि उक्त ज्ञान के
लिए करणभूत इन्द्रियसन्निकर्ष ही नहीं है।
समर्थन — चक्षुरिन्द्रिय से सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति ( सन्निकर्ष ) द्वारा व्याप्ति-
ग्रहकाल में धूमत्वेन सभी धूम और वह्नित्वेन सभी वह्नि व्यक्तियों का ग्रहण हो ही
सकता है । सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति न मानकर व्याप्तिग्रह का स्वीकार करना षण्ढ
से विवाहकर मुग्धा स्त्री द्वारा पुत्र-प्रार्थना के तुल्य ही है, यह उपालम्भ तो श्रीवाचस्पति
मिश्र दे ही चुके हैं । खंडन —यदि सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति से व्याप्तिग्रहण-काल
में सभी व्यक्तियों का ग्रहण मानें, तो प्रमेयत्व और अभिधेयत्व के व्याप्तिग्रह-काल में
प्रमेयमात्र का ग्रह हो जाने से मनुष्यमात्र को सर्वज्ञ हो जाना चाहिए ।
प्रतिबन्दी प्रश्न — सर्वज्ञत्व का प्रसङ्ग हो जायगा, यह दोष भी सर्व के ज्ञान के
बिना हो नहीं सकता। कारण जब आप सर्व को जानते ही नहीं, तो मुझमें सर्वज्ञान का
२५६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
प्रमेयत्या व्याप्तिग्रहणकाले सर्वतज्जातीयव्यक्तिग्रहणे प्रमेयत्वादिसर्वं तदा ज्ञायत
एव, न तु रूपान्तरेणेति चेन्न । यदि रूपान्तरेण तत् प्रमेयं तदा रूपान्तरवतोऽपि
प्रमेयत्वाधारतया कथमग्रहणम् । अथ न प्रमेयं नास्त्येव रूपान्तरेण तत् । येन तु
रूपेणास्ति तेन सर्वेण प्रमेयमिति यावद्विद्यमानाकारेण ज्ञातत्वप्रसङ्गः । तथात्व-
स्वीकारे च ज्ञायतां प्रमेयत्वदर्शिना भवता मामकी चित्तवृत्तिः, ततः श्रद्धास्ये ।
स्यादेतत्—यथा भेदोऽन्योन्याभाववैधर्म्यादिः पृथक्, तथैक्यमपि वस्तूनाम् ।
ततः प्रमेयत्वाद्यपि धर्मिणामेकत्वमेकमेव । ततः प्रमेयत्वेन ज्ञायमानं तत् सर्वमपि
तेनैक्येन प्रतीयमानैकव्यक्त्यात्मकमेव ज्ञायमानं भवतीति कथं तदेकत्ववेदिनः
सार्वज्ञम् । न च वाच्यं नानात्वमपि व्यक्तीनां प्रमेयमिति तदपि धर्मितया
आरोप कैसे करेंगे ? तब तो आपमें भी सर्वज्ञता की आपत्ति आ जायगी । उत्तर—
यह प्रतिकृत्या (प्रतिबन्दी) भी युक्त नहीं है । कारण 'मेरे चित्त में क्या है' इस
प्रश्न का उत्तर न देने से मेरी हृद्गत वस्तु को आप नहीं जानते, यह बात स्पष्ट है,
जो मेरी हृद्गत वस्तु के जान लेने पर सिद्ध नहीं हो सकती—यही यहाँ सर्वज्ञत्वापादन
का आशय है । अनिष्टकारक देवता को 'कृत्या' कहते हैं और उस देवता की
निवारक देवता को 'प्रतिकृत्या' कहते हैं । प्रकृतमें लक्षणा से 'प्रतिकृत्या' शब्द
प्रतिबन्दीपरक है ।
समर्थन—सामान्यलक्षणा से प्रमेयत्वरूप से सर्व का ग्रहण होने पर भी रूपान्तर
(तत्तद्रूप) से सर्व का ग्रहण नहीं होता, अतः सर्वज्ञत्व का प्रसङ्ग नहीं है । खंडन—
यदि तत्तद्रूप से तत्-तत् वस्तु प्रमेय हैं, तो तत्तद्रूपविशिष्ट तत्तद्वस्तु भी प्रमेयत्व की
आधार हैं ही । फलतः प्रमेयत्व रूप से उनका ग्रहण क्यों न हो ? यदि अन्यरूप से
वे प्रमेय नहीं हैं, तो अन्यरूप से वे हैं ही नहीं । जिस रूप से वे हैं, उस रूप
से प्रमेय ही हैं । अतः यावत् विद्यमान आकारों से उसका ग्रहण होने लगेगा । यदि
आप यह मान लें कि यावत् विद्यमान आकारों से सभी वस्तु ज्ञेय हैं, तो प्रमेयत्व से सब
वस्तुओं को देखनेवाले आप मेरे चित्त में विद्यमान वस्तु को भी जान लें, तभी आपके
वचन में मैं श्रद्धा करूँगा ।
समर्थन—जैसे अन्योन्याभाव, वैधर्म्य आदि रूपभेद, वस्तुओं में पृथक्त्वरूप
हैं, वैसे ही एकत्व, प्रमेयत्व आदि भी वस्तुओं के ऐक्यरूप ही हैं । एवञ्च प्रमेयत्व
आदि भी धर्मियों के ऐक्यरूप ही हैं । तस्मात् प्रमेयत्व रूप से ज्ञायमान वह सर्ववस्तु
परिच्छेद ] व्याप्ति और व्याप्तिग्रहोपाय का खण्डन २५७
ग्राह्यमेवेति; यतस्तदपि प्रमेयत्वादिनो गृह्यमाणमेकमेव गृहीतं भवतीति । तस्मात्
“एको भावस्तत्त्वतो येन दृष्टः सर्वे भावास्तत्त्वतस्तेन दृष्टाः ।"—इति । तत्त्वतः =
ताद्रूप्येण एकीभूता इति ।
तदेतदपि नोपपन्नम् ; नानैकमिति व्याहतप्रतीत्यापत्तेः । अथ रूपान्तरेण
नानात्वं प्रमेयत्वादिना चैक्यमिति व्यवस्थित्या न व्याघातः स्यात्; तर्हि
प्रमेयत्वाद्याधारस्य व्यक्तिभेदस्य कृत्स्नस्य ग्रहणात् सार्वज्ञापत्तिस्तादवस्थ्येवेति ।
किञ्च—सामान्यलक्ष्णया प्रत्यासत्त्या तज्जातीयविशेषग्रहणे तासु सर्वासु
व्यक्तिषु सम्बन्धास्तित्वे किं प्रमाणम् ?
सर्वव्यक्तिवत् तत्सम्बन्धग्रहेऽपि व्याप्तिग्राहकमिन्द्रियमेव प्रमाणमिति चेत्;
तर्हि क्वचिदेवमवधारितस्य यद्व्यभिचारो दृश्यते, तन्न स्यात्, इन्द्रियेण
तत्सम्बन्धस्य प्रमितत्वात् ।
ऐक्यरूप से प्रतीयमान एकरूपात्मक ही ज्ञात होता है। अतः एकत्ववेत्ता पर
सर्वज्ञत्व का प्रसङ्ग कैसे आ सकता है ? यदि कहें कि व्यक्तियों का नानात्व भी प्रमेयत्व
रूप से ज्ञात होता है। अतः वस्तु नाना हैं, तो वह युक्त नहीं है। कारण; प्रमेयत्व रूप
से गृहीत नानात्व भी एक ही होता है। कहा भी है : 'जिस पुरुष ने एक भाव
( वस्तु ) को प्रमेयत्वादि रूप से देख लिया, उसने संपूर्ण भावों को प्रमेयत्वादि रूप
से एकता-प्राप्त ही देखा है।'
खण्डन—यदि ऐसा मानें, तो 'नाना एक हैं' ऐसी व्याहत प्रतीति होने लगेगी ।
यदि कहें कि अन्य रूपों से नाना हैं तथा प्रमेयत्व रूप से एक है, अतः व्याहत प्रतीति
नहीं होगी, तो प्रमेयत्व के आधारभूत सभी भिन्न-भिन्न व्यक्तियों का ग्रहण हो जाने से
सर्वज्ञत्व की आपत्ति पूर्ववत् ही बनी रही ।
किञ्च—सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति से सब व्यक्तियों का ज्ञान होने पर भी उनमें
व्याप्तिरूप सम्बन्ध है, इसमें क्या प्रमाण है ?
समर्थन—सभी व्यक्तियों के तुल्य उनके व्याप्तिरूप सम्बन्ध के ज्ञान में भी इन्द्रिय
करण और सामान्यलक्षणा ही प्रत्यासत्ति ( सन्निकर्ष ) है। अतः सम्बन्ध-ज्ञान में प्रत्यक्ष ही
प्रमाण है । खण्डन—यदि सम्बन्ध-ज्ञान में प्रत्यक्ष को प्रमाण मानें, तो 'यत्र यत्र पार्थिवत्वं
तत्र तत्र लोहलेख्यत्वम्' ऐसा व्याप्ति-निश्चय होने पर भी वज्र में देखा जानेवाला व्यभिचार
न होना चाहिए, कारण प्रत्यक्ष से व्याप्तिरूप सम्बन्ध प्रमित ही है।
३३
भ्रान्तिस्तत्र सम्बन्धप्रतीतिः पश्चाद् बाधादिति चेन्न । सामग्र्यभेदे काचिद्
भ्रान्तिः, काचिदभ्रान्तिरिति विभागाद्युपपत्तेः । दोषादोषवैचित्र्यविवेचनस्य च
दुष्करत्वात् ।
कार्यभेदादेव सामग्रीभेदोऽप्युन्नेय इति चेत् । उन्नीयताम् ; स एव तु कीदृगुन्नेय
इति वाच्यम् । न तावत्सार्वत्रिकसम्बन्धाभावाभावात्मकः, तदानीं भाविनां सम्बन्धा-
नामसत्त्वेनाकारणत्वात् । सामान्यतश्च तज्जातीययोः सम्बन्धस्य प्रतीतेः पूर्वं
सत्त्वं भ्रान्त्यभ्रान्तिसाधारणम् । क्वचिदपि सम्बन्धाभावे भ्रान्तेरनुत्पादात् ।
किमेतावता, अन्य एव तर्हि कार्यभेदात्कारणभेदः कल्पयिष्यत इति चेत्; स
हि किमिन्द्रियसहकारिभूतः करणान्तरमेव वा कल्पनीय इति वाच्यम् । नाद्यः ;
इन्द्रियस्य भाविभूतसम्बन्धांशे प्रमाणत्वकल्पनायां प्रमाणाभावात् । प्रत्युत
समर्थन—वहां व्याप्तिरूप सम्बन्ध की प्रतीति भ्रमरूप है, कारण पीछे वह बाधित
हो जाती है । खण्डन—धूम में वह्नि के व्याप्तिग्रह के इन्द्रिय, सामान्यलक्षणा
प्रत्यासत्ति आदि जो कारण हैं, वे ही तो पार्थिवत्व और लोहलेख्यत्व के व्याप्तिग्रह में भी
कारण हैं। फिर जब कारण एक हैं, तो पूर्वस्थल में अभ्रान्ति और उत्तरस्थल में भ्रान्ति
है, यह विभाग हो नहीं सकता । पूर्वस्थल में दोष नहीं है और उत्तरस्थल में दोष है,
यह वैचित्र्य-विवेचन भी दुष्कर है।
समर्थन—कार्य के भेद से अर्थात् पूर्वस्थल में प्रमारूप तथा उत्तरस्थल में भ्रमरूप
व्याप्तिग्रह होता है इससे सामग्रीभेद की अनुमिति करेंगे । खण्डन—भले ही अनुमिति
कीजिये, किन्तु यह कहिये कि वह सामग्रीभेद क्या है? वह्नि-धूमस्थल में सार्वत्रिक सम्बन्ध
है और लोहलेख्यत्व-पार्थिवत्वस्थल में सार्वत्रिक सम्बन्ध नहीं है, यह सामग्रीभेद तो आप
कह नहीं सकते । कारण व्याप्तिग्रहकाल में भावी सम्बन्ध तो है नहीं, अतः व्याप्तिग्रह
के भावी सम्बन्ध कारण नहीं हो सकते । यदि कहें कि सामान्यरूप से वह्नि-धूमजातीय
का सम्बन्ध व्याप्तिग्रह से पूर्व विद्यमान ही है, तो लोहलेख्यत्व और पार्थिवत्व का सम्बन्ध
भी सामान्यरूप से काष्ठादि में व्याप्तिग्रहकाल में विद्यमान है। यदि कहीं भी
लोहलेख्यत्व और पार्थिवत्व के सम्बन्ध का ग्रह न हो, तो भ्रान्ति कैसे होगी ?
समर्थन—कार्यभेद से कारणभेद की कल्पना करेंगे और वह सार्वत्रिक सम्बन्ध से
अन्य ही मानेंगे । खण्डन—वह कारण क्या इन्द्रिय का सहकारी है या स्वतन्त्र
(इन्द्रिय-निरपेक्ष) अन्य ही? प्रथम पक्ष युक्त नहीं, क्योंकि इन्द्रियों को भावि-भूत के
सम्बन्धांश (व्याप्ति-अंश) में करण मानने में कोई प्रमाण नहीं है। इसके विपरीत
परिच्छेद ] व्याप्ति और व्याप्तिग्रहोपाय का खण्डन २५६
व्युपरतेन्द्रियव्यापारस्यापि विचारयतः पूर्वप्रतीतसम्बन्धधर्मिद्वयस्य व्याप्स्यव-
धारणदर्शनात् ।
तदाऽपि मनोऽस्तीन्द्रियमिति चेत् । अस्तु ; तस्मिन् कार्ये मनसः करणत्वे तु
प्रमाणाभावः, अवश्यपरिकल्पनीयेनान्येनैव सर्वानुपपत्त्युपशान्तेः । कारणत्वमात्रं
तु चक्षुरादिज्ञानवन्मनसस्तत्र स्यात् ।
चक्षुरादिवत्करणमन्यदेव तत्कल्पनीयमिति सप्तममिन्द्रियं प्रमाणान्तरं वा
प्रसज्येत । अन्यथा चाक्षुषादिप्रतीतावपि चक्षुरादेः करणत्वं न स्यात् । शक्यते
तत्रापि वक्तुं मन एव तत्र सुखादिप्रतीतिवत्करणम्, चक्षुरादयस्तु सहकारिमात्रम् ।
नापि द्वितीयः ; इन्द्रियान्तरप्रसङ्गात्, प्रमाणान्तरप्रसङ्गाद्वा ।
नापि विनाभाव एकस्य व्यतिरेकेणापरस्याव्यतिरेकः, तन्निषेधोऽविनाभाव
इन्द्रिय-व्यापार विरत होने पर भी 'वह्नि की व्याप्ति धूम में न हो, तो धूम और वह्नि का
भूयः सहदर्शन नहीं हो सकता' यह विचार करनेवाले मनुष्य को पूर्वप्रतीत परस्परसम्बद्ध
व्याप्य-व्यापक धर्मिद्वय का व्याप्तिग्रह (ज्ञान) देखा ही जाता है।
यदि कहें कि चक्षुरादि के उपरामकाल में भी मनरूप इन्द्रिय तो है ही, तो
वह भी युक्त नहीं। कारण चाक्षुषादि ज्ञान के तुल्य व्याप्तिग्रह में भी मन कारण तो है,
किन्तु अवश्य परिकल्पनीय सहकारी कारणों से ही सर्वदोषों की निवृत्ति होने से मन
को व्याप्तिग्रह में करण मानने में कोई प्रमाण नहीं है।
यदि कहें कि जैसे चाक्षुषादि ज्ञान में चक्षु करण है, वैसे ही व्याप्तिग्रह में भी
मन से अन्य ही कोई करण मानेंगे, तो वह भी ठीक नहीं। वैसी स्थिति में यदि आप
व्याप्तिग्रह को प्रत्यक्ष मानें, तो सप्तम इन्द्रिय हो जायगी और यदि परोक्ष मानें, तो
सप्तम प्रमाण हो जायगा, क्योंकि वह व्याप्यादिनिरपेक्ष होने से लिङ्गादि से विलक्षण
है। एवञ्च अपसिद्धान्त हो जायगा। अन्यथा यदि मन को ही करण मानें, तो चाक्षु-
षादिज्ञान में भी चक्षु करण न होगा। कारण कह सकते हैं कि मन ही सुखानुभव की
तरह चाक्षुष में भी करण है, चक्षु तो सहकारिमात्र है।
'वह कारण इन्द्रिय से निरपेक्ष अर्थात् स्वतन्त्र कारण है' यह द्वितीय पक्ष भी
ठीक नहीं; क्योंकि फिर तो वह पूर्वोक्त रीति से सप्तम इन्द्रिय या सप्तम प्रमाण
हो जायगा।
'एक के व्यतिरेक से अपर का अव्यतिरेक विनाभाव है और उसका निषेध अवि-
नाभाव है' यह द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं। कारण ऐसा होने पर लोहलेख्यत्व
२६० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्ये [ प्रथम
इति द्वितीयः पक्षः । एवं हि लोहलेख्यत्वव्यतिरेकश्च पार्थिवत्वव्यतिरेकश्च
क्वचिदस्तीति पार्थिवत्वलोहलेख्यत्वयोरप्यविनाभावः प्रसज्येत ।
सार्वत्रिकं व्यतिरेकयौगपद्यं विवक्षितम्, न तु काचित्कम् । अत एवोच्यते—
अविनाभावनियम इति चेन्न । सार्वत्रिकान्वयावधारणनिरासन्यायेन सार्वत्रिक-
व्यतिरेकावधारणास्याप्यशक्यत्वात् । शक्यत्वे चाऽन्वयावधारणमेवास्तु सार्वत्रिकम्,
कृतं व्यतिरेकावधारणकुटिलिकया ।
यत्र विपक्षे वृत्तौ बाधकमस्ति, तयोरन्वयो व्याप्तिरिति केचित् । तन्न; यत्तु
विपक्षे वृत्तौ बाधकं तत्प्रमाणं वा तर्को वा स्यात् ?
आद्ये न तावदिन्द्रियम् ; तदसम्भवात् । अन्यथा व्यभिचाराव्यभिचारसंशयो
न स्यात् ।
का व्यतिरेक (अभाव) और पार्थिवत्व का व्यतिरेक भी कहीं आकाश में है;
अतः पार्थिवत्व और लोहलेख्यत्व का भी अविनाभाव (व्याप्ति) हो जायगा ।
समर्थन—व्यतिरेक का सार्वत्रिक साहित्य विवक्षित है, क्वाचित्क साहित्य विवक्षित
नहीं है । अतएव 'अविनाभाव का नियम व्याप्ति है' ऐसा कहा जाता है । खंडन—
सामान्यलक्षणा के न होने से सार्वत्रिक अन्वयज्ञान के तुल्य सार्वत्रिक व्यतिरेक-
ज्ञान भी अशक्य ही है । किसी प्रकार वह अवधारण (ज्ञान) शक्य भी हो, तो
अन्वय का अवधारण ही व्याप्ति मान लें, 'व्यतिरेक का अवधारण व्याप्ति है' यह
वक्रोक्ति व्यर्थ है ।
समर्थन—कोई आचार्य कहते हैं कि जिन साध्य-साधनों के बीच साधन के
विपक्ष-वृत्तित्व (साध्याभावाधिकरण-वृत्तित्व) में बाधक हो, उन दोनों का अन्वय व्याप्ति
है । खण्डन—यह भी युक्त नहीं है, कारण विपक्ष में साधन के वृत्तित्व का बाधक
क्या है—प्रमाण या तर्क ?
यदि प्रमाण बाधक हों, तो उनमें चक्षुरादि इन्द्रियाँ तो हो नहीं सकतीं;
क्योंकि इन्द्रियाँ सम्बद्धमात्र को ही ग्रहण करती हैं । अतः उनसे अतीत, अनागत
और असन्निकृष्ट विपक्षों का ज्ञान हो नहीं सकता । यदि इन्द्रियों द्वारा हेतु में
अतीत, अनागत विपक्ष-वृत्तित्वाभाव का भी ग्रहण मानें, तो कहीं भी व्यभिचार का
सन्देह नहीं होना चाहिए ।
परिच्छेद ] व्याप्ति और व्याप्तिग्रहोपाय का खण्डन २६१
नाप्यनुमानम्; अनवस्थाप्रसङ्गात् ।
नाप्यर्थापत्तिः ; अनुमानाव्यतिरेकात् । व्यतिरेके वा यदि लिङ्गिव्यतिरेकेण
लिङ्गस्यानुपपत्तिः, तदा तत एव लिङ्गिसिद्धेः कृतमनुमानेन । अनेवम्भावे च
तयोः किमायातम् ।
अस्तु वा कथमपि तावदर्थापत्तिर्बाधिका; तथापि कीदृग्भ्युपगम इति
प्रष्टव्यम् । किं विपक्षवृत्तित्त्वबाधकसह्रीचीनो यत्र क्वचिदन्वयो व्याप्तिः, उत तत्सहितः
सार्वत्रिकोऽन्वयः, उत किं नो विशेषगवेषणेन तत्सध्रीचीनः सामान्यतोऽन्वयो
व्याप्तिः, उत सार्वत्रिकान्वयः, स च विपक्षे बाधकादवगम्यते ?
नाद्यः ; विकल्पानुपपत्तेः । तथा हि—किं विपक्षे वृत्तौ बाधकं सर्वव्यक्ति-
“ह्रदादिः धूमाभाववान् वह्नयभावात्” इत्याकारक अनुमान भी विपक्ष-वृत्तित्व का
बाधक प्रमाण नहीं हो सकता । कारण उक्त स्थल में वह्नयभाव में धूमाभाव की जो व्याप्ति
है, उसके घटक विपक्ष का बाधक भी अनुमान ही होगा; इस प्रकार अनवस्था हो जायगी ।
अर्थापत्ति भी विपक्ष-वृत्तित्व में बाधक प्रमाण नहीं है। कारण अनुमान में ही
अर्थापत्ति का अन्तर्भाव है । यदि अर्थापत्ति को अनुमान से पृथक् भी मानें और उसका
स्वरूप साध्य के अभाव में हेतु की अनुपपत्तिरूप मानें, तो उसीसे ( अर्थापत्ति से ही )
साध्य की सिद्धि हो जाने पर अनुमान व्यर्थ हो जायगा । यदि अन्य रूप अर्थात् कारण
आदि के बिना कार्य आदि की अनुपपत्तिरूप मानें, तो उससे प्रकृत ( विपक्षबाधक स्थल )
में धूमाभावरूप साध्य तथा वह्नयभावरूप हेतु को क्या लाभ हुआ, अर्थात् अर्थापत्ति
से विपक्ष में धूम के बाध की सिद्धि नहीं हुई ।
किसी प्रकार विपक्ष में हेतु की वृत्तित्ता का बाधक अर्थापत्तिरूप प्रमाण मान भी लें,
तब भी यह पूछा जायगा कि फिर व्याप्ति का स्वरूप क्या हुआ ? क्या 'विपक्षवृत्तित्व
के बाधक से सहित जिस किसी अधिकरण में अन्वय' व्याप्ति है या 'विपक्षवृत्तित्व
के बाधक से सहित सार्वत्रिक अन्वय' व्याप्ति है' अथवा विशेष विचार से क्या लाभ,
'विपक्ष-वृत्तित्व के बाधक से सहित सामान्यतः अन्वय' व्याप्ति है या 'सार्वत्रिक
अन्वय व्याप्ति है और उसका ज्ञान विपक्ष में बाधक प्रमाण से होता है ?
इनमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, कारण विकल्प की उपपत्ति ही नहीं है। देखिये—
क्या विपक्ष में हेतु के वृत्तित्व का बाधक सर्वव्यक्तिविषयक होना चाहिए या सामान्य-
विषयक ? प्रथम कल्प में जिस पक्ष में साध्य की अनुमिति करनी है, उस पक्ष में
२६२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
विषयम्, उत सामान्यविषयम् ? आद्ये यत्राप्यनुमानं प्रवर्तनीयं तत्रावश्योपस्था-
प्यया अन्यथाभावबाधकभूतयाऽर्थापत्त्यैव साध्यसिद्धेः शान्तमनुमानव्यसनेन ।
द्वितीये क्वचिद्व्यभिचारेऽपि क्वचिदव्यभिचारमाश्रित्य बाधकस्य चरितार्थ-
त्वम् । धूमवत्तमात्रमग्निमत्तामात्रव्यतिरेकीत्येवंरूपो हि सामान्यतो विपक्षपक्षः,
तत्र च बाधकं तयोर्विरोधे पर्यवस्यति । अविरोधश्च क्वचित्साहित्याद् भवत्येवेति
पार्थिवत्वलोहलेख्यत्वयोरपि एवम्भूतव्याप्तप्रसङ्गः ।
नापि द्वितीयः ; विशेषणवैयर्थ्यात् । सार्वत्रिकोऽन्वय इत्येवोच्यताम् । न च
सोऽपि सङ्गत इत्युक्तम् ।
नापि तृतीयः ; बाधकस्य सामान्यविशेषविषयताविकल्पोक्तयुक्त्यैव
निरस्तत्वात् ।
भी 'अग्न्यभावे सति धूमाभावः' इस अन्यथाभाव की बाधक अर्थापत्ति ( अन्यभावे
धूमाभावोऽनुपपन्नः इति धूमभावेन वह्निभावः कल्प्यते ) से ही साध्य की सिद्धि हो
जाने से अनुमान का व्यसन व्यर्थ है ।
द्वितीय कल्प में कहीं वज्रादि में व्यभिचार होने पर भी कहीं काष्ठादि में अव्यभि-
चार का आश्रयणकर बाधक अर्थापत्ति चरितार्थ हो सकती है । कारण धूम का अधि-
करणत्वमात्र अग्नि के अधिकरणत्वमात्र का व्यतिरेकी ( विरोधी ) है—ऐसा सामान्यतः
विपक्ष है । वहाँ बाधक अर्थापत्ति 'धूमवत्तामात्रमग्निमत्तामात्रविरोधीति अनुपपन्नमिति
धूमवत्तामात्रम् अग्निमत्तामात्राविरोधि' इस प्रकार उन दोनों के अविरोध में पर्यवसित होता
है । अविरोध कहीं साहित्य से भी होता ही है, अतः लोहलेख्यत्व की पार्थिवत्व में
व्याप्ति हो जायगी ।
द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं है । कारण 'सार्वत्रिक अन्वय व्याप्ति है' इतना मात्र
कहने से ही कोई दोष नहीं होता, फिर 'विपक्षवृत्तिबाधकसहित' यह विशेषण व्यर्थ
हो जायगा । सार्वत्रिक अन्वय भी ग्राहक प्रमाण न होने से व्याप्ति नहीं है, यह हम
पीछे कह ही चुके हैं ।
तृतीय पक्ष भी युक्त नहीं । कारण विपक्ष में बाधक सर्वव्यक्तिविषयक हो या
यत्किञ्चिद्विषयक, इस प्रकार विकल्पकर प्रथम पक्ष के तुल्य यह पक्ष भी खण्डित हो
जाता है ।
परिच्छेद ] व्याप्ति और व्याप्तिग्रहोपाय का खण्डन २६३
नापि चतुर्थः । तथा हि—यद्धूमवत् तदग्निमदित्यत्रेद मन्वयस्य सार्वत्रिकत्वं
वाच्यम्--यत्सर्वासां धूमव्यक्तीनामग्निसम्बन्धित्वम्, तद्यदि व्याप्तिग्रहकाले
गृहीतम्, तदा पक्षस्यापि धूमवद्व्यक्तेरग्निमत्त्वं प्राक् गृहीतं स्मर्यत एवेति
गतमनुमानम् ।
सामान्यतोऽग्निमत्त्वं तस्यापि गृहीतमेव, विशेषतस्त्वनुमीयत इति चेन्न ।
विशेषत इति किमग्निमत्त्वस्य विशेषो व्यक्तिरूपो विवक्षितः, उत कालदेशादि-
सम्बन्धस्तस्य ?
नाद्यः ; सर्वव्यक्तीनां व्याप्तौ प्रतीतत्वेन भवतैवाङ्गीकारात् । नापि द्वितीयः ;
अग्निमद्रूपतया स्मृतस्य पक्षीभूतस्य धूमवद्विशेषस्य चक्षुरादिभिरेव पर्वतत्वादि-
देशकालविशेषादिमत्तया परिच्छेदात् । यथा प्राक्प्रत्ययाहितसंस्कारसचीनैश्चक्षु-
रादिभिः परिच्छिद्यमानेदानोम्भावदेशविशेषावस्थानादेः स एवायमिति प्रत्यभिज्ञाय-
मानताऽङ्गीक्रियते, तथैव अत्राऽप्यस्तु, कृतमनुमानेन ।
नाप्युपमानं बाधकं विपक्षे शक्यं वक्तुम् ; तस्य नियतविषयत्वेनैतादृशे
विषयेऽनुदयात् ।
चतुर्थ पक्ष भी युक्त नहीं । कारण 'यत् धूमवत् तत् वह्निमत्' यहाँ अन्वय का
सार्वत्रिकत्व है—सर्वधूमवत् व्यक्तियों का अग्निसम्बन्धित्व । वह यदि व्याप्तिग्रहकाल
में गृहीत है, तो धूमवत् पर्वत व्यक्ति का अग्निमत्त्व पहले से ही गृहीत है, उसीका
स्मरण होगा । फलतः अनुमान व्यर्थ हो जायगा ।
समर्थन—सामान्यतः धूमवत्पर्वत का अग्निमात्र गृहीत ही है, किन्तु विशेष रूप
अग्निमत्त्व की अनुमिति तो हो ही सकती है । खंडन—अग्निमत्त्व का विशेष क्या
है, क्या वह व्यक्तिरूप है या देश-कालसम्बन्धरूप ?
प्रथम पक्ष युक्त नहीं, कारण व्याप्ति में सभी व्यक्ति सामान्यलक्षणा से प्रतीत
होते हैं, यह आप भी मानते हैं । द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं, कारण 'अग्निमत् है'
इस रूप से स्मृत, पक्षभूत धूमवत् व्यक्ति की चक्षुरादि से ही पर्वतादि देश तथा
वर्तमानादि काल-सम्बन्धिरूप से प्रतीति होगी । जैसे पूर्वकाल में ज्ञात ज्ञान से
जन्य संस्कार से युक्त चक्षुरादि से एतद्देशकालयुक्त कार्षापण आदि की 'स एव
अयम्' इत्याकारक प्रत्यभिज्ञा होती है, वैसे ही अनुमितिसथल में भी है। फिर
अनुमान व्यर्थ ही है ।
उपमान भी विपक्ष में बाधक नहीं है; कारण उपमान से केवल संज्ञासंज्ञी-
भाव का ही निश्चय होता है ।
२६४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
नापि शब्दः ; आप्तोपदेष्टुरभावे व्याप्त्यनवगमप्रसङ्गात् ।
अभावस्तु कदाचित् स्यात्, सोऽपि निरूप्यमाणो न घटते । एवं स वाच्यः—
यदि वह्निव्यतिरेकेण धूमः स्यात्तदा तथोपलभ्येत, न चोपलभ्यते, अतोऽनुपलम्भा-
न्नास्ति तद्व्यतिरेकेणेति । तच्च न । तथा हि—क्वचिद्व्यभिचारादर्शनाद्वा अयमभावः
प्रवर्तते, सर्वत्र व्यभिचारादर्शनाद्वा ? नाद्यः ; पार्थिवत्वलोहलेख्यत्वयोरपि
व्याप्तत्वप्रसङ्गात् । न द्वितीयः ; सर्वत्र योग्यानुपलम्भो वाऽनुपलम्भमात्रं वा
वाच्यम् ? नाद्यः ; सर्वत्र योग्यानुपलम्भासम्भवात् । नापि द्वितीयः ; पार्थिवत्वलोह-
लेख्यत्वयोरपि सम्भवात् ।
तत्र वज्र एव व्यभिचार इति चेन्न । तदीयादर्शनदशायां व्यभिचारानवग-
तात् । तद्दर्शनदशायां तावदस्ति व्यभिचारः । यत्र तु न कदाचिदपि व्यभिचार-
शब्द भी विपक्षवृत्तित्व में बाधक नहीं है; कारण जहाँ आप्त-उपदेष्टा का अभाव
है, वहाँ व्याप्ति का ग्रह ही नहीं होगा ।
विपक्ष में हेतु के वृत्तित्व का बाधक कथञ्चित् अभाव (अनुपलब्धि) हो सकता
है, किन्तु विचार करने पर वह भी युक्तिसिद्ध नहीं है। देखिये—अभाव का आकार
यह होता है कि 'यदि वह्नि के अभावाधिकरण में धूम होता, तो धूम का उपलम्भ
(प्रत्यक्ष) होता । चूँकि उसका उपलम्भ नहीं होता, अतः वह्नि के अभाव में धूम
नहीं है।' यह हो नहीं सकता, कारण यदि कहीं साध्य-व्यतिरेक हेतु के अदर्शन
से यह अभाव प्रवृत्त होता हो, तो आकाशादि में लोहलेख्यत्व के अभाव में पार्थिवत्व
के अदर्शन से अभाव प्रवृत्त होने से लोहलेख्यत्व का पार्थिवत्व में व्याप्तिमत् हो
जायगा । यदि सर्वत्र साध्य के अभाव में हेतु के अदर्शन से अभाव-प्रमाण की प्रवृत्ति
मानें, तो क्या सर्वत्र वह योग्यानुपलम्भ से प्रवृत्त होता है या अनुपलम्भमात्र से ? प्रथम
कल्प युक्त नहीं है; कारण अतीत, अनागत, विप्रकृष्टादि सर्वत्र योग्यता का अभाव है ।
द्वितीय कल्प भी युक्त नहीं है, कारण लोहलेख्यत्वाभाव के अधिकरण आकाश में पार्थि-
वत्व के अदर्शन से लोहलेख्यत्व की पार्थिवत्व में व्याप्ति हो जायगी ।
समर्थन—वज्र में लोहलेख्यत्व के व्यतिरेक में पार्थिवत्व का दर्शन है, अतः व्याप्ति
नहीं है । खंडन—वज्र की अदर्शन-दशा में पार्थिवत्व में व्यभिचार न दीखने से
व्याप्ति बन जायगी ।
समर्थन—वज्र की दर्शन-दशा में तो व्यभिचार है ही । जिस स्थल में कदापि
परिच्छेद ] व्याप्ति और व्याप्तिग्रहोपाय का खण्डन २६५
दर्शनं तत्र व्याप्तिरिति चेत्, अत्रापि व्यभिचारो न द्रक्ष्यत इत्यत्रापि
नियामकादर्शनात् ।
नापि विपक्षे बाधकस्तर्को वाच्यः; तर्कस्य व्याप्तिमूलत्वाभ्युपगमेऽनवस्था-
प्रसङ्गात् । तदनभ्युपगमे मूलशैथिल्येन तर्काभासत्वापातात् ।
अथ ब्रूषे—न शक्यमिदं वक्तुम् । तथा हि, अग्निधूमव्यभिचारशङ्कायां
बाधकस्तर्कोऽयमभिधीयते —'यदि धूमोऽग्निं व्यभिचरेत्, अकारणकः सन्नित्यः
स्यात्, न स्यादेव वा ।' स चायमनुत्तरस्तर्कः; तत्र शङ्कायां व्याघातापत्तेः। तदेव
ह्याशङ्क्यते, यस्मिन्नाशङ्क्यमाने स्वक्रियाव्याघातादयो दोषा नावतरन्तीति
लोकमर्यादा । एवं सर्वत्रानुत्तरस्तर्को बाधकोऽभिधेय इति ।
व्यभिचार-दर्शन नहीं होता, वहीं व्याप्ति रहती है। खंडन—यदि ऐसा कहें, तो कहीं भी
व्याप्ति नहीं होगी। कारण वह्नि का धूम में कहीं भी व्यभिचार नहीं देखा जायगा,
इसमें कुछ प्रमाण नहीं ।
समर्थन—इस तरह भले ही विपक्ष में हेतु की वृत्तित्ता में कोई प्रमाण बाधक न
हो, किन्तु तर्क तो हो ही सकता है। खंडन—तर्क को भी विपक्ष में हेतु के वृत्तित्व
का बाधक नहीं कह सकते। कारण यदि आपाद्य-आपादक की व्याप्ति को तर्क का मूल
मानें, तो 'व्याप्ति का ज्ञान तर्क से और उस तर्क की मूलभूत व्याप्ति का ज्ञान अन्य तर्क
से एवं उस तर्क की मूल व्याप्ति का ज्ञान अन्य तर्क से' इस प्रकार अनवस्था अथवा
'व्याप्ति के ज्ञान से तर्क की प्रवृत्ति और तर्क से व्याप्ति का ज्ञान' इस प्रकार अन्योन्याश्रय
आदि हो जायेंगे । यदि आपाद्य-आपादक की व्याप्ति को तर्क का मूल न मानें, तो तर्क
में कोई मूल ( प्रमाण ) न होने से वह तर्काभास ही हो जायगा ।
समर्थन — तर्क को व्याप्तिमूलक मानने पर अनवस्था होगी, यह आप नहीं कह
सकते । देखिये—धूम में अग्नि के व्यभिचार की शङ्का होने पर यह तर्क करेंगे कि
'यदि धूम अग्नि का व्यभिचारी होता, तो अकारण होकर नित्य हो जाता अथवा नहीं
ही होता ।' यह तर्क अकाट्य है, अर्थात् इस तर्क की मूलभूत व्याप्ति के निर्णयार्थ
तर्कान्तर अपेक्षित नहीं है। कारण उसमें यदि शङ्का हो, तो व्याघात हो जायगा ।
वही शङ्का हो सकती है, जिसमें स्वक्रिया-व्याघात आदि दोष न होते हों। ऐसा
होने पर सर्वत्र व्यभिचार की शङ्का में तर्क ही अकाट्य बाधक होंगे ।
३४
१६६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
मैवम्; किमित्येवं शङ्कितव्यं यद्धेतुफलभाव एव न भविष्यति । एवं तु
शङ्कितव्यम्—'अग्निं विहायान्यस्मादपि हेतोरयमुदेष्यतो'ति ।
न च वाच्यम्—एवं हि सति धूमस्यैकजातित्वं न स्यादिति ; क्वचिदिन्द्रिय-
जन्यत्वे क्वचिदनुमानादिजन्यत्वेऽपि ज्ञानैकजात्यवत्तदुपपत्तेः ।
तत्रेन्द्रियादीनामवान्तरसामान्ये साक्षात्कारित्वादौ प्रयोजकत्वम् , न ज्ञान-
तायामिति चेन्न । ज्ञानत्वस्याऽऽकस्मिकत्वपरिहारार्थं तत्कारणस्यानुगतस्य
भवताऽवश्यं वक्तव्यत्वात् । धूमेऽपि वह्नेर्विशेष एव प्रयोजकत्वस्य तद्वच्छङ्कितुं
शक्यत्वात् ।
न दृश्यते तावदग्निप्रयोज्यो धूमे विशेष इति च न वाच्यम् ; तद्दर्शनस्य
आपाततो हेत्वन्तरप्रयोज्यावान्तरजात्यदर्शनेन अयोग्यतयाऽविकल्प्यत्वादप्यु-
पपत्तेः। यदा तु हेत्वन्तरप्रयोज्यो धूमस्य विशेषो द्रक्ष्यते, तदाऽसौ विकल्पिष्यत
इति सम्भावनाया दुर्वारत्वात् ।
खण्डन—ऐसी शङ्का ही क्यों करें कि 'धूम यदि वह्निव्यभिचारी हो, तो दोनों में
कार्यकारणभाव ही नहीं होगा', जिससे व्याघात हो । किन्तु ऐसी शङ्का तो हो ही सकती
है कि 'शायद अग्नि से अन्य कारण से भी धूम होता हो, तो वह वह्नि का व्यभिचारी
हो सकता है।'
समर्थन—यदि धूम वह्नि से अन्य और किसी कारण से भी होता, तो एकजातीय
(तुल्य) नहीं होता । किन्तु वह एकजातीय है, अतः वह्नि से अन्य से जन्य
नहीं है। खंडन—कहीं इन्द्रिय तो कहीं अनुमान से जन्य होने पर भी जैसे ज्ञान
एकजातीय होता है, वैसे ही कहीं वह्नयतिरिक्त से जन्य होने पर भी धूम
एकजातीय हो सकता है।
समर्थन—ज्ञानस्थल में इन्द्रियादि अवान्तर (विशेष साक्षात्कारित्व आदि) में
प्रयोजक हैं, ज्ञानत्व में नहीं। खंडन—ज्ञानत्व आकस्मिक (प्रयोजक से रहित) न हो,
इसलिए उसका कोई अनुगत प्रयोजक कहना ही होगा। वैसे ही वह्नि भी धूमविशेष में
ही प्रयोजक है, ऐसी शङ्का हो सकती है।
समर्थन—धूम में अग्निकृत कोई विशेष देखने में नहीं आता ? खंडन—यह
कथन भी युक्त नहीं है; कारण धूम में अग्निकृत विशेष का न दीखना आपाततः
अन्य हेतु से प्रयोज्य जातिविशेष के अदर्शन से भी उपपन्न हो सकता है। कारण जब
वह्नि से अन्य हेतुजन्य धूम का विशेष देखा जायगा, तब धूम के विशेष का ज्ञान
होगा, ऐसी सम्भावना करने में कोई बाधक नहीं है ।
परिच्छेद ] व्याप्ति और व्याप्तिग्रहोपाय का खण्डन २६७
अस्त्यात्ममनोयोगोऽनुगतं कारणं ज्ञानोत्पत्ताविति चेन्न । यद्यात्ममनोयोगा-
दुत्पद्यमानं ज्ञानं स्यादिच्छादयोऽपि ज्ञानं प्रसज्येरन् । यदि त्वदृष्टविशेषो वा
शक्तिभेदो वा ज्ञानत्वजातिर्वा ज्ञानप्राग्भावो वा तत्रानुगतं कारणमुच्यते, तदा
तदितरत्रापि वह्निव्यभिचारे धूमस्यैकजात्यप्रयोजकतया शक्यत एव शङ्कितुम् ।
दृष्टे व्यभिचारे युक्तमदृष्टादेरैकजात्यपरिकल्पनमिति चेत् ; अस्तु दृष्टे तन्नि-
श्चयः । अत्रापि व्यभिचारो न द्रक्ष्यत इत्यत्र नियामकाभावात् शङ्क्येत ।
एवं शङ्किष्यमाणस्य भवतो न क्वचिदनुमानं स्यात् । प्रतिवाद्यात्माद्यनुमानादि-
व्यतिरेकेण कथायामेव प्रवृत्त्यनुपपत्त्या स्वयं स्वकर्त्तव्येष्वनुमानेष्वेतादृशशङ्का-
क्रमणात् स एव व्याघात इति चेन्न । धूमवद्व्यक्तेरपि वह्निकारणविशेषानुमानस्यैवं
सति सदनुमानत्वप्रसङ्गात् । सामग्रीसाम्येन प्रमाप्रमावैचित्र्यानुपपत्तेः ।
साधारणधर्मदर्शनविशेषादर्शनादौ सत्यपि शङ्कायाश्चानुदये सामग्र्यां
समर्थन—ज्ञानत्व का प्रयोजक आत्ममनःसंयोगरूप अनुगत कारण है । किन्तु
वह्निव्यतिरिक्त कारणजन्यत्वरूप से सम्भावित धूमसाधारण धूमत्व का प्रयोजक कोई
अनुगत कारण नहीं है । खंडन —यदि आत्ममनोयोग को ज्ञानत्व का प्रयोजक मानें, तो
इच्छा आदि भी ज्ञान हो जायेंगे । यदि अदृष्टविशेष, शक्तिविशेष, ज्ञानत्वजाति या ज्ञानके
प्राग्भाव को ज्ञान का अनुगत कारण मानें, तो धूमस्थल में भी वह्नि के व्यभिचार में
धूम के एकजात्य के प्रयोजक अदृष्टादि हैं—ऐसी शङ्का हो ही सकती है ।
समर्थन--व्यभिचार देखने पर अदृष्ट को ऐकजात्य का प्रयोजक मानना उचित
भी होता है । किन्तु धूमस्थल में व्यभिचार तो दीखता नहीं, फिर अदृष्टादि को प्रयोजक
मानना कहाँ तक उचित है ? खंडन—यह ठीक है कि व्यभिचार होने पर ही ऐक-
जात्य की कल्पना युक्त है । किन्तु धूमस्थल में व्यभिचार देखा ही न जायगा, इसमें
प्रमाण नहीं है, इसलिए व्यभिचार-शंका हो सकती है ।
समर्थन--इस तरह शङ्का करनेवाले आप कहीं भी अनुमान न कर सकेंगे ।
फिर जबतक प्रतिवादी की आत्मा का अनुमान न हो, तबतक कथा में प्रवृत्ति ही न
होगी । और यदि अनुमान करें, तो स्वकर्तव्य अनुमान में भी ऐसी ही शङ्का होगी ।
अतः वही व्याघात आपके ऊपर भी हो जायगा ।
खण्डन—आपका क्या अभिप्राय है ? क्या जहाँ व्यभिचार की शङ्का हो, वहाँ
अनुमिति में दोष नहीं, होता, यह अभिप्राय है अथवा सदोष भी अनुमान प्रमाण है, यह
अभिप्राय है ? आप इनमें प्रथम पक्ष का स्वीकार नहीं कर सकते । कारण आप शङ्कितो-
२६८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्ये [ प्रथम
सत्यामपि कार्यानुदयात् परप्रतिपत्त्युत्पादनार्थं वचनादिरूपां प्रतिपत्तिसामग्री-
मुत्पादयितुं यतमानस्य भवतोऽपि स्वक्रियाव्याघातस्तुल्यः ।
व्याघातस्यैव विशेषत्वात् तद्दर्शनेन शङ्कासामग्र्येव नास्ति मत्पक्षे, कुतो व्या-
घातसाम्यमिति चेन्न । तद्धि न तावत् आहार्यादिकारणाज्जायमानमेष्टव्यम्, कूट-
विषयस्य तस्यातिप्रसञ्जकत्वात् । कूटभिन्नः प्रसञ्जकः प्रमितस्यैव स्यादिति चेन्न ।
तस्य तर्कावसरे निरस्यत्वात् ।
तस्मात् यदैतद्व्याघातरूपस्य विशेषस्य दर्शनं शङ्काप्रतिपक्षभूतमुच्यते, तत्
किं प्रमाणात् कुतश्चिदुपजायमानं वक्तव्यं तर्काद्वा ? यदि प्रथमः ; शङ्कास्तित्वमपि
पाधि को दोष मानते हैं । यदि द्वितीय मानें, तो जैसे धूम से वह्नि की अनुमिति
प्रमिति है, वैसे ही वह्नि से वह्नि के कारण तृणादि की अनुमिति भी प्रमिति हो जायगी ।
जब सामग्री समान है, अर्थात् पक्षधर्मता, व्यभिचारशङ्का आदि दोनों स्थलों में एक-से
हैं, तो धूम से वह्नि की अनुमिति प्रमिति है और वह्नि से वह्नि के कारण-विशेष की
अनुमिति अप्रमिति है, यह नहीं कहा जा सकता ।
समर्थन—व्याघात के भय से 'यदि वह्निविरहिण्यपि धूमः स्यात्' यह शङ्का
( सन्देह ) ही नहीं हो सकती । खण्डन—व्याघात के भयमात्र से यदि साधारण-
धर्मदर्शन, विशेषादर्शन आदि शङ्का के कारण होने पर भी शङ्का न हो, तो पर के ज्ञान
के लिए वचनादि रूप ( ज्ञान ) सामग्री के उत्पादन में आपकी प्रवृत्ति भी नहीं
होनी चाहिए ।
समर्थन—व्याघात ही विशेष है, अतः उस व्याघात-विशेष का दर्शन होने से
हमारे मत में शङ्का की सामग्री ही नहीं है । फिर व्याघात का साम्य कैसे होगा ?
खंडन—वह व्याघात आहार्य ( बाधकालिक इच्छाजन्य ) अर्थात् भ्रमरूप व्याप्य के
आरोपरूप कारण से जन्य ही तो इष्ट है नहीं, कारण 'यदि पार्थिवत्व लोहलेख्यत्व का
व्यभिचारी होता, तो प्रमेय ही नहीं होता' इस आभासजन्य व्याघात से पार्थिवत्व की
लोहलेख्यत्व में भी व्याप्ति गृहीत हो जायगी । अनाहार्य प्रमाणरूप व्याप्य के आरोप-
रूप कारण से जन्य व्याघात विशेष है—इसका निरास तर्क के खण्डन के समय चतुर्थ
परिच्छेद में करेंगे ।
किञ्च—आप जिस व्याघातरूप विशेष के दर्शन को शङ्का का विरोधी कहते हैं,
क्या वह किसी प्रमाण से होता है या तर्क से ? यदि प्रमाण से कहें, तो शङ्का का
तेनैव प्रमाणेनोपनेयम्, शङ्कायां सत्यां व्याघातात् । यदि च शङ्कां विनाऽपि
व्याघातः, तदा शङ्कमानांशङ्कमानयोर्व्याघातस्य साम्यं सिद्धमेव ।
भवतु शङ्कायामपि तत्प्रमाणम्, किमेतावता ? प्रथमोपजातशङ्कामवलम्ब्य
व्यवस्थितस्य व्याघातरूपस्य विशेषस्य दर्शनात् शङ्कान्तरं नोत्पद्यत इति चेन्न ।
व्याघातसत्ताकाले तदवलम्ब्यया शङ्कयैव शङ्कयमानव्यभिचारता, तस्याः
शङ्काया व्युपरमे च तदवलम्बिनो व्याघातरूपस्य विशेषस्याभावात् कः शङ्का-
न्तरोत्पत्तेर्वारयितेति वक्तव्यम् ।
मा नामास्तु तदा व्याघातात्मा विशेषः; तदवगमस्तदाहितो वा संस्कारस्तावद-
स्ति । विशेषावगमतत्संस्कारौ च शङ्काविरोधि नौ, न तु स्वरूपेण क्वचिदपि विशेष-
स्यावस्थानं तथेति चेन्न । अयावदाश्रयभाविनो विशेषस्य पूर्वस्थितस्य यद्दर्शनं
तदाहितो वा संस्कारः, तस्य कालान्तरेऽपि तत्प्रतिधर्मसंशयविरोधित्वे अवयवि-
पाकपक्षे कुम्भस्य परमाणुपाकपक्षे परम्परया तदारम्भकस्य परमाणोः पूर्वं
श्यामत्या ज्ञातस्य कालान्तरे सम्भावितपाकस्य पाकजन्यरूपविशेषवत्तायां संशयो
न स्यात् ।
अस्तित्व भी उसी प्रमाण से सिद्ध हुआ, क्योंकि शङ्का होने पर ही व्याघात होगा ।
यदि बिना शङ्का के व्याघात हो, तो जैसे शङ्का करने पर मेरे पक्ष में आप व्याघात
देते हैं, वैसे ही बिना शङ्का के आपके पक्ष में हम भी व्याघात दे सकेंगे ।
समर्थन — शङ्का में भी वह व्याघात ग्राहक प्रमाण रहे, इससे हानि क्या हुई ?
प्रथम शङ्का के अवलम्बन से उत्पन्न व्याघातरूप विशेष-दर्शन से ही अन्य शङ्का न
होगी और उसीसे व्याप्तिग्रह हो जायगा । खंडन—व्याघात के सत्ताकाल में उसकी
अवलम्बभूत शङ्का से ही व्यभिचार की शङ्का है और उस शङ्का का उपरम होने पर उसके
अवलम्ब से उत्पन्न व्याघात को अभाव होने से अन्य शङ्का की निवृत्ति कौन करेगा ?
समर्थन —उस काल में व्याघातरूप विशेष न रहे, तो क्या हानि है ? व्याघात का
ज्ञान या ज्ञान से आहित (कृत) संस्कार ही शङ्का का विरोधी है। स्वरूप
से विशेष कहीं भी नहीं रहता । खंडन —यदि यावत् आश्रयकाल में न होनेवाले
पूर्वस्थित विशेष के दर्शन को या विशेषदर्शन से जन्य संस्कार को कालान्तर में
उत्पन्न उस विशेष के विरोधी धर्मविषयक संशय का विरोधी मानें, तो पूर्वकाल में
श्यामत्वरूप से ज्ञात अवयविपाकवादी के मत में कुम्भ में तथा परमाणुपाकवादी के मत
में परम्परा से घटारम्भक परमाणु में अन्य काल में पाक से सम्भावित रक्तत्वरूप
का सन्देह न होगा ।
२७० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
यदि च शङ्कायां व्याघातस्तदा शङ्काश्रयस्य विशेषरूपस्य व्याघातस्य
दर्शनात् शङ्कायां शङ्कान्तरं मा भूत् । यदि तु व्यभिचाराश्रयस्तदा व्यभिचारः
स्यादेव, व्याघाताश्रयस्य व्यभिचारस्यापि प्रमित्यापत्तेः ।
अनादिसिद्धव्याप्तिकास्ते तर्का इति चेन्न। तद्बुद्धेः प्रमितित्वासिद्धेः, शरीरे
स्वात्मप्रत्ययस्य तादृशस्याप्यप्रमात्वोपगमात्, अनादित्वासिद्धेश्चोभयत्राविशेषात् ।
नापि यद्यत्र व्यभिचारः शङ्क्येत, तदा व्याघातः स्यादित्येवंरूपात् तर्का-
द्व्याघातावगमः, व्याघातप्रतिपादकस्य तर्कस्य मूलशैथिल्ये तर्काभासत्वापातात् ।
तादृशस्यापि व्याघातोपनायकत्वे व्याघातापत्तेश्च साम्यम् । शक्यत एव तर्का-
भासाद् भवतोऽपि व्याघात उपनेतुम् ।
यदि शङ्का में व्याघात है, तो शङ्काश्रय व्याघातरूप विशेष के दर्शन से शङ्का में
अन्य शङ्का न हो, किन्तु प्रथम शङ्का होने से व्याप्तिग्रह नहीं होगा । व्यभिचार में
व्याघात दें, तो व्याघात को विषय करनेवाला प्रमा का विषय होने से व्यभिचार अवश्य
होगा ।
समर्थन--विपक्ष में बाधक तर्क के व्याप्तिमूलक होने पर जो अनवस्था दोष देते
हैं, वह ठीक नहीं । कारण जिनसे व्याप्तिग्रह होता है, उन तर्कों को हम अनादिसिद्ध
व्याप्तिवाले मानते हैं । एवञ्च अनादि पुरुष-परम्परा में तद्बुद्धिधारा का अस्तित्व अनादि-
सिद्ध है । अतः अनादिसिद्ध होने से युगपत् व्याप्तिग्रह की अपेक्षा नहीं है, इसलिए
अनवस्था नहीं है । तथा च असञ्जात विरोधित्वेन लब्धप्रतिष्ठ होने से तर्क बलवत्तर हों,
तो वे आगन्तुक व्यभिचार-शंका का सहज ही निरास कर देंगे । खण्डन--अनादिसिद्ध
होने मात्र से तर्क-मूलभूता व्याप्ति प्रमित ( प्रमात्मक ज्ञान की विषय ) नहीं हो सकती,
क्योंकि प्रमेय का सत्त्व प्रमाधीन ही हुआ करता है । अन्यथा अनादिसिद्ध होने से
शरीर में आत्मबुद्धि भी प्रमित हो जायगी । यदि कहें कि किन्हीं विवेकयों को शरीर
में आत्मबुद्धि अनादिसिद्ध नहीं है, तो तत्त्वज्ञ या मुक्तों को उक्त व्याप्तिबुद्धि भी
अनादिसिद्ध नहीं है, उभयत्र अनादित्वासिद्धि तुल्य ही है ।
समर्थन--अत्र ( वह्नि-धूमस्थल में ) व्यभिचारः स्यात्तदा व्याघातः स्यात्' इस तर्क
से ही व्याघात का ज्ञान हो जायगा । खंडन--व्याघात के प्रतिपादक उक्त तर्क का
मूल शिथिल ( व्याप्तिहीन ) हो, तो यह तर्क तर्काभास हो जायगा । यदि
तर्काभास से भी व्याघात का प्रतिपादन करें, तो आपके प्रति हम भी 'तर्कः
आभास उपपादकश्च' ऐसा विरुद्ध-समुच्चयरूप व्याघात दे ही सकते हैं । आप भी
परिच्छेद ] व्याप्ति और व्याप्तिग्रहोपाय का खण्डन २७१
अथ तर्कस्य व्याप्तिर्मूलभूताऽभ्युपगम्यते । तत्रापि व्यभिचारशङ्कायां पुन-
रनवस्थैव । तत्रापि व्याघातापादने पुनरुत्थितमनवस्थैव ।
तस्मादस्माभिरप्यस्मिन्नर्थे न खलु दुष्पठा ।
त्वद्गाथैवान्यथाकारमक्षराणि कियन्त्यपि ॥ ४४ ॥
व्याघातो यदि शङ्काऽस्ति न चेच्छङ्का ततस्तराम् ।
व्याघातावधिराशङ्का तर्कः शङ्कावधिः कुतः ॥ ४५ ॥
अव्यभिचारश्च एकपरित्यागव्यवच्छेदेनापरान्वयः, समकालदृष्टे नष्टेऽदृष्टः
शङ्क्यत इत्याहुः ।
तर्काभास से व्याघात का परिहार करते हैं, तो हम भी व्याप्तिविहीन उक्त
व्याघातरूप तर्क दे ही सकते हैं ।
यदि तर्क का मूल व्याप्ति को मानें, तो उस मूल व्याप्ति में भी व्यभिचार
की शङ्का होने पर अन्य तर्क का आश्रयण करना होगा एवं उस तर्क की मूल
व्याप्ति में व्यभिचार की शङ्का होने पर अन्य तर्क का आश्रयण—इस तरह
अनवस्था-प्रसङ्ग होगा। यदि कहें कि 'अनवस्था होने पर कहीं भी अनुमान न होने
से परप्रतिपत्त्यर्थ वचन में प्रवृत्तिरूप व्याघात होगा, अतः अनवस्था नहीं है', तो
जिस तर्क से अनवस्था में व्याघात का आपादन आप करते हैं, उस तर्क के मूल
व्याप्ति में भी व्यभिचार की शङ्का होने से पुनः अनवस्था दोष होगा ।
तस्मात् इस विषय में हम भी कुछ ही अक्षरों को बदलकर तुम्हारी ही गाथा को
पढ़ सकते हैं कि 'यदि व्याघात प्रामाणिक है, तो शंका अवश्य है। कारण शंका होने
पर ही व्याघात होता है । यदि व्याघात नहीं है, तो प्रतिबन्धक के न होने से अवश्यमेव
शङ्का है । शङ्का की अवधि (अवसान) व्याघात कैसे हो सकता है और तर्क शङ्का
की अवधि कैसे होगा। कारण तर्क के मूल व्याप्ति में भी शङ्का तदवस्थ ही है ।
समर्थन—व्यभिचार की शङ्का में अव्यभिचार भी एक कोटि है, कारण शङ्का
(सन्देह) उभयकोटिक होती है । अतः किसी अधिकरण में अव्यभिचार का निश्चय
होने पर अनुमिति हो जायगी ? यदि अव्यभिचार कहीं भी सिद्ध न हुआ, तो शंका ही
अनुपपन्न हो जायगी । खंडन—एक (साध्य) के अभाव के अनधिकरण में हेतु का
अन्वय (वृत्तित्व) रूप अव्यभिचार, समकाल में ज्ञात दृष्ट तथा नष्ट दो पदार्थों में है,
वहीं शङ्का में अपर कोटि की सिद्धि हो जायगी । यदि कहें कि उसी स्थल में अनुमिति
हो जायगी, तो वह युक्त नहीं । कारण ऐसा स्थल कहीं दृष्ट नहीं है ।
२७२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
स्वाभाविकः सम्बन्धो व्याप्तिरित्यपरः । स प्रष्टव्यः—कस्य स्वाभाविकः, किं
सम्बन्धिनो उत अन्यस्य ? न चरमः ; वैपरीत्यापत्तेः ।
आद्ये कः स्वाभाविकशब्दार्थ इति प्रष्टव्यम्—किं सम्बन्धिस्वभावाश्रितः, अथ
सम्बन्धिस्वभावजन्यः , अथ सम्बन्धित्वविवक्षितस्वभावानतिरिक्तः, अथ सम्बन्धि-
स्वभावव्याप्यः , अथवा सम्बन्धिस्वभावादन्येन न प्रयुक्तः , उतान्य एव
कश्चिद्विवक्षितः ?
आद्ये पार्थिवत्वलोहलेख्यतयोरपि व्याप्तित्वप्रसङ्गः ।
न द्वितीयः ; अतिव्याप्तेरव्याप्तेश्च । अत एव न तृतीयः ।
नापि चतुर्थः; व्याप्त्यनिरुक्त्या व्याप्यत्वानिरुक्तेः । सम्बन्धस्य व्याप्यत्वे च
अन्य आचार्य कहते हैं कि स्वाभाविक सम्बन्ध व्याप्ति है । उनसे पूछना चाहिए
कि किसका स्वाभाविक सम्बन्ध व्याप्ति है, संवन्धियों का या अन्य का ? यदि अन्य का
कहें, तो जैसे असम्बन्धियों का सम्बन्ध व्याप्ति है, वैसे ही सम्बन्धियों का असम्बन्ध भी
व्याप्ति हो जायगा ।
यदि सम्बन्धियों का स्वाभाविक सम्बन्ध व्याप्ति है, तो कहिये कि 'स्वाभाविक'
शब्द का अर्थ क्या है ? जैसे वह्नि के स्वभाव ( स्वरूप ) के आश्रित औष्ण्य वह्नि का
स्वाभाविक है, वैसे ही सम्बन्धी के स्वभाव (स्वरूप) का आश्रित सम्बन्ध व्याप्ति है,
अथवा जैसे वसन्त से जन्य होने से वृक्षप्रसव वसन्त का स्वाभाविक है, वैसे ही सम्ब-
न्धी स्वभाव ( स्वरूप ) से जन्य सम्बन्ध व्याप्ति है, किंवा सम्बन्धित्वरूप से विवक्षित
सम्बन्धी के स्वभाव से अनतिरिक्त अर्थात् स्वभावस्वरूप सम्बन्ध ही व्याप्ति है अथवा
सम्बन्धी के स्वभाव से व्याप्य सम्बन्ध व्याप्ति है या सम्बन्धी के स्वभाव ( स्वरूप ) से
अन्य से प्रयुक्त ( जन्य ) न हो, ऐसा सम्बन्ध व्याप्ति है अथवा और ही कुछ वस्तु
व्याप्ति है ?
प्रथम पक्ष में पार्थिवत्व में लोहलेख्यत्व का सम्बन्ध व्याप्ति हो जायगा ।
द्वितीय पक्ष में जन्य होने से धूम का एकाश्रय में संयोगरूप सम्बन्ध वह्नि में
व्याप्ति हो जायगा तथा अजन्य होने से रूप-रस का एकाश्रयसमवायरूप सम्बन्ध
व्याप्ति न कहलायेगा ।
तृतीय पक्ष में वह्नि का धूम में एकाश्रयसंयोगरूप सम्बन्ध व्याप्ति न होगा,
कारण संयोग सम्बन्धी का स्वरूप नहीं, किन्तु अतिरिक्त है ।
चतुर्थ पक्ष भी युक्त नहीं है, कारण जबतक व्याप्ति की निरुक्ति नहीं होती, तब-
तक सम्बन्धी-स्वभाव व्याप्य-सम्बन्धरूप निरुक्त व्याप्ति की निरुक्ति नहीं हो सकती
परिच्छेद ] उपाधि-लक्षण का खण्डन २७३
सम्बन्धिनोर्व्यापकयोः सम्भावितसम्बन्धाधिकदेशकालतया एकसम्बन्धिदर्शने-
ऽपरानुमानाय नियामकत्वायोगात् ।
नापि पञ्चमः ; 'न प्रयुक्तः' इति यदि न जनितस्तदा सम्बन्धस्याकृतकत्वपक्षे
'अन्येने'ति विशेषणवैयर्थ्यम्, अकृतकस्य सम्बन्धिस्वभावेनाऽप्यजनितत्वात् ।
सम्बन्धस्य कृतकत्वपक्षे स्वरूपासिद्धिरेव स्यात् । सामग्र्याः सर्वसम्भवादन्ततः
कालदेशादृष्टादिभिरपि तज्जन्यत्वस्यावश्यकवक्तव्यत्वात् ।
नापि षष्ठः पक्षः ; तस्य निर्वक्तुमशक्यत्वात् । एवमेव विकल्प्यायं चरमविकल्पः
सर्वत्रोपन्यस्य दूष्यो न्यूनत्वशङ्काभयादिति ।
उपाधि-लक्षण-खण्डनम्
अनौपाधिकः सम्बन्धो व्याप्तिरित्यपरः । स प्रष्टव्यः—कोऽयमुपाधिर्नाम,
यच्छून्यत्वमनौपाधिकत्वम् ?
अर्थात् व्याप्ति के लक्षण में व्याप्ति का प्रवेश होने से आत्माश्रय दोष हो जायगा ।
किञ्च—यदि सम्बन्ध को व्याप्य मानेंगे, तो व्यापक सम्बन्धी अधिक देश-कालवृत्तित्व से
सम्भावित है । अतः एक सम्बन्धी के दर्शन से अन्य सम्बन्धी की अनुमति नहीं होगी ।
पञ्चम पक्ष भी युक्त नहीं है । कारण यदि 'अन्य से प्रयुक्त नहीं है' इसका 'अन्य
से जनित नहीं है' यह अर्थ करें, तो 'सम्बन्ध अकृतक (नित्य) है' इस पक्ष में 'अन्य
से' यह विशेषण व्यर्थ है। कारण जो अकृतक है, वह सम्बन्धी के स्वभाव से भी
अजन्य है । यदि 'सम्बन्ध कृतक है' यह पक्ष मानें, तो 'सम्बन्धी के स्वभाव से प्रयुक्त न
हो' यह स्वरूप ही असिद्ध है । कारण कार्यमात्र सामग्री से जन्य होता है । अतः देश,
काल, अदृष्ट आदि से वह व्याप्तिरूप सम्बन्धप्रयुक्त है, यह अवश्य मानना होगा ।
षष्ठ पक्ष भी युक्त नहीं है, कारण उसका निर्वचन नहीं हो सकता । इस रीति से
विकल्प कर इस चरम विकल्प का सर्वत्र खण्डन करना चाहिए । अन्यथा न्यूनता हो
जायगी । अर्थात् यदि वादी विकल्पित पक्षों से भिन्न पक्ष का आश्रयण करे, तो विकल्प
में न्यूनता हो जायगी । किन्तु यदि 'उक्त से अन्यत्व' रूप से भी विकल्प कर दें, तो
वादी से अवलम्बित पक्ष का उसमें अन्तर्भाव हो जाने से न्यूनता नहीं होगी ।
उपाधि-लक्षण का खण्डन
अन्य आचार्य कहते हैं कि उपाधिरहित सम्बन्ध व्याप्ति है । उनसे पूछना चाहिए
कि वह उपाधि क्या वस्तु है, जिससे शून्य को आप व्याप्ति कहते हैं ? साथ ही
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२७४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
उपाधिः साध्यव्यापकत्वे सति साधनाव्यापकः ।
अयञ्च—
‘एकसाध्याविनाभावे मिथः सम्बन्धशून्ययोः ।
साध्याभावाविनाभावी स उपाधिर्यदत्ययः ॥
इत्यस्य व्यतिरेकमुखस्य यदत्ययः, स उपाधिरिति योज्यमानस्य पर्यवसि-
तोऽर्थः । तद्धर्मभूता हि व्याप्तिर्जपाकुसुमरक्ततेव स्फटिके साधनाभिमते चकास्तीति
उपाधिरसावुच्यते ।’
तदिदमाहुः—
‘व्याप्तेश्च दृश्यमानायाः कश्चिद्धर्मः प्रयोजकः ।
अस्मिन्सत्यमुना भाव्यमिति यत्सा निरूप्यते ॥
अन्ये परप्रयुक्तानां व्याप्तीनामुपजीवकाः ।
तैर्दृष्टैरपि नैवेष्टा व्यापकांशावधारणा ॥’
स चोपाधिनिश्चित इवाऽऽशङ्कितश्च, यत्रेदमुच्यते—
‘यावद्व्याव्यतिरेकित्वं शतांशेनापि शङ्क्यते ।
विपक्षस्य कुतस्तावद्धे तोर्गमनिकाबलम् ॥’
लोहलेख्यत्व का पार्थिवत्व में एकार्थसमवायरूप सम्बन्ध भी व्याप्ति हो जायगा, कारण
समवाय सम्बन्धी का स्वरूप है ।
समर्थन—‘जो साध्य का व्यापक तथा साधन का अव्यापक हो, वह उपाधि है’—
ऐसा लक्षण करेंगे । यह उदयनाचार्य के व्यतिरेकमुख से कथित लक्षण-वाक्य का
फलितार्थ है । आचार्य के लक्षण-वाक्य का अक्षरार्थ तो यह है कि ‘साधन और उपाधित्व
से अभिमत—दोनों के मध्य जिसका अभाव साध्याभाव का व्याप्य हो, वह उपाधि है ।
वह्नि से धूम के अनुमितिस्थल में आर्द्रेन्धनसंयोग की उपाधि संज्ञा है । जैसे स्फटिक
में जपाकुसुम के रक्तत्व के भान के निमित्त जपाकुसुम को उपाधि कहते हैं, वैसे ही
आर्द्रेन्धनसंयोगनिष्ठ धूम की व्याप्ति के वह्नि में भान के निमित्त आर्द्रेन्धनसंयोग को
भी उपाधि कहते हैं ।
कहा भी है कि अन्य ( सोपाधिक ) हेतु उपाधिनिष्ठ व्याप्ति का अवलम्बन करते
हैं, वे सोपाधिक हेतु पक्ष में देखे भी जायँ, तो भी व्यापक की सिद्धि नहीं होती । वह
उपाधि निश्चित के तुल्य आशङ्कित भी होती है । यह भी कहा है कि ‘जब तक
विपक्ष में हेतु के शतांश से भी अर्थात् उपाधि की शङ्का से भी शङ्का हो, तब तक हेतु
में साध्यगमन की सामर्थ्य कैसे हो सकती है ?