खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
यदि च शङ्कायां व्याघातस्तदा शङ्काश्रयस्य विशेषरूपस्य व्याघातस्य
दर्शनात् शङ्कायां शङ्कान्तरं मा भूत् । यदि तु व्यभिचाराश्रयस्तदा व्यभिचारः
स्यादेव, व्याघाताश्रयस्य व्यभिचारस्यापि प्रमित्यापत्तेः ।
अनादिसिद्धव्याप्तिकास्ते तर्का इति चेन्न। तद्बुद्धेः प्रमितित्वासिद्धेः, शरीरे
स्वात्मप्रत्ययस्य तादृशस्याप्यप्रमात्वोपगमात्, अनादित्वासिद्धेश्चोभयत्राविशेषात् ।
नापि यद्यत्र व्यभिचारः शङ्क्येत, तदा व्याघातः स्यादित्येवंरूपात् तर्का-
द्व्याघातावगमः, व्याघातप्रतिपादकस्य तर्कस्य मूलशैथिल्ये तर्काभासत्वापातात् ।
तादृशस्यापि व्याघातोपनायकत्वे व्याघातापत्तेश्च साम्यम् । शक्यत एव तर्का-
भासाद् भवतोऽपि व्याघात उपनेतुम् ।
यदि शङ्का में व्याघात है, तो शङ्काश्रय व्याघातरूप विशेष के दर्शन से शङ्का में
अन्य शङ्का न हो, किन्तु प्रथम शङ्का होने से व्याप्तिग्रह नहीं होगा । व्यभिचार में
व्याघात दें, तो व्याघात को विषय करनेवाला प्रमा का विषय होने से व्यभिचार अवश्य
होगा ।
समर्थन--विपक्ष में बाधक तर्क के व्याप्तिमूलक होने पर जो अनवस्था दोष देते
हैं, वह ठीक नहीं । कारण जिनसे व्याप्तिग्रह होता है, उन तर्कों को हम अनादिसिद्ध
व्याप्तिवाले मानते हैं । एवञ्च अनादि पुरुष-परम्परा में तद्बुद्धिधारा का अस्तित्व अनादि-
सिद्ध है । अतः अनादिसिद्ध होने से युगपत् व्याप्तिग्रह की अपेक्षा नहीं है, इसलिए
अनवस्था नहीं है । तथा च असञ्जात विरोधित्वेन लब्धप्रतिष्ठ होने से तर्क बलवत्तर हों,
तो वे आगन्तुक व्यभिचार-शंका का सहज ही निरास कर देंगे । खण्डन--अनादिसिद्ध
होने मात्र से तर्क-मूलभूता व्याप्ति प्रमित ( प्रमात्मक ज्ञान की विषय ) नहीं हो सकती,
क्योंकि प्रमेय का सत्त्व प्रमाधीन ही हुआ करता है । अन्यथा अनादिसिद्ध होने से
शरीर में आत्मबुद्धि भी प्रमित हो जायगी । यदि कहें कि किन्हीं विवेकयों को शरीर
में आत्मबुद्धि अनादिसिद्ध नहीं है, तो तत्त्वज्ञ या मुक्तों को उक्त व्याप्तिबुद्धि भी
अनादिसिद्ध नहीं है, उभयत्र अनादित्वासिद्धि तुल्य ही है ।
समर्थन--अत्र ( वह्नि-धूमस्थल में ) व्यभिचारः स्यात्तदा व्याघातः स्यात्' इस तर्क
से ही व्याघात का ज्ञान हो जायगा । खंडन--व्याघात के प्रतिपादक उक्त तर्क का
मूल शिथिल ( व्याप्तिहीन ) हो, तो यह तर्क तर्काभास हो जायगा । यदि
तर्काभास से भी व्याघात का प्रतिपादन करें, तो आपके प्रति हम भी 'तर्कः
आभास उपपादकश्च' ऐसा विरुद्ध-समुच्चयरूप व्याघात दे ही सकते हैं । आप भी