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सर्वकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 285

२६८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्ये [ प्रथम

सत्यामपि कार्यानुदयात् परप्रतिपत्त्युत्पादनार्थं वचनादिरूपां प्रतिपत्तिसामग्री-
मुत्पादयितुं यतमानस्य भवतोऽपि स्वक्रियाव्याघातस्तुल्यः ।
व्याघातस्यैव विशेषत्वात् तद्दर्शनेन शङ्कासामग्र्येव नास्ति मत्पक्षे, कुतो व्या-
घातसाम्यमिति चेन्न । तद्धि न तावत् आहार्यादिकारणाज्जायमानमेष्टव्यम्, कूट-
विषयस्य तस्यातिप्रसञ्जकत्वात् । कूटभिन्नः प्रसञ्जकः प्रमितस्यैव स्यादिति चेन्न ।
तस्य तर्कावसरे निरस्यत्वात् ।
तस्मात् यदैतद्व्याघातरूपस्य विशेषस्य दर्शनं शङ्काप्रतिपक्षभूतमुच्यते, तत्
किं प्रमाणात् कुतश्चिदुपजायमानं वक्तव्यं तर्काद्वा ? यदि प्रथमः ; शङ्कास्तित्वमपि
पाधि को दोष मानते हैं । यदि द्वितीय मानें, तो जैसे धूम से वह्नि की अनुमिति
प्रमिति है, वैसे ही वह्नि से वह्नि के कारण तृणादि की अनुमिति भी प्रमिति हो जायगी ।
जब सामग्री समान है, अर्थात् पक्षधर्मता, व्यभिचारशङ्का आदि दोनों स्थलों में एक-से
हैं, तो धूम से वह्नि की अनुमिति प्रमिति है और वह्नि से वह्नि के कारण-विशेष की
अनुमिति अप्रमिति है, यह नहीं कहा जा सकता ।
समर्थन—व्याघात के भय से 'यदि वह्निविरहिण्यपि धूमः स्यात्' यह शङ्का
( सन्देह ) ही नहीं हो सकती । खण्डन—व्याघात के भयमात्र से यदि साधारण-
धर्मदर्शन, विशेषादर्शन आदि शङ्का के कारण होने पर भी शङ्का न हो, तो पर के ज्ञान
के लिए वचनादि रूप ( ज्ञान ) सामग्री के उत्पादन में आपकी प्रवृत्ति भी नहीं
होनी चाहिए ।
समर्थन—व्याघात ही विशेष है, अतः उस व्याघात-विशेष का दर्शन होने से
हमारे मत में शङ्का की सामग्री ही नहीं है । फिर व्याघात का साम्य कैसे होगा ?
खंडन—वह व्याघात आहार्य ( बाधकालिक इच्छाजन्य ) अर्थात् भ्रमरूप व्याप्य के
आरोपरूप कारण से जन्य ही तो इष्ट है नहीं, कारण 'यदि पार्थिवत्व लोहलेख्यत्व का
व्यभिचारी होता, तो प्रमेय ही नहीं होता' इस आभासजन्य व्याघात से पार्थिवत्व की
लोहलेख्यत्व में भी व्याप्ति गृहीत हो जायगी । अनाहार्य प्रमाणरूप व्याप्य के आरोप-
रूप कारण से जन्य व्याघात विशेष है—इसका निरास तर्क के खण्डन के समय चतुर्थ
परिच्छेद में करेंगे ।
किञ्च—आप जिस व्याघातरूप विशेष के दर्शन को शङ्का का विरोधी कहते हैं,
क्या वह किसी प्रमाण से होता है या तर्क से ? यदि प्रमाण से कहें, तो शङ्का का