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सर्वकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 282, कुल 610 में से

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पृष्ठ 282

परिच्छेद ] व्याप्ति और व्याप्तिग्रहोपाय का खण्डन २६५
दर्शनं तत्र व्याप्तिरिति चेत्, अत्रापि व्यभिचारो न द्रक्ष्यत इत्यत्रापि
नियामकादर्शनात् ।
नापि विपक्षे बाधकस्तर्को वाच्यः; तर्कस्य व्याप्तिमूलत्वाभ्युपगमेऽनवस्था-
प्रसङ्गात् । तदनभ्युपगमे मूलशैथिल्येन तर्काभासत्वापातात् ।
अथ ब्रूषे—न शक्यमिदं वक्तुम् । तथा हि, अग्निधूमव्यभिचारशङ्कायां
बाधकस्तर्कोऽयमभिधीयते —'यदि धूमोऽग्निं व्यभिचरेत्, अकारणकः सन्नित्यः
स्यात्, न स्यादेव वा ।' स चायमनुत्तरस्तर्कः; तत्र शङ्कायां व्याघातापत्तेः। तदेव
ह्याशङ्क्यते, यस्मिन्नाशङ्क्यमाने स्वक्रियाव्याघातादयो दोषा नावतरन्तीति
लोकमर्यादा । एवं सर्वत्रानुत्तरस्तर्को बाधकोऽभिधेय इति ।
व्यभिचार-दर्शन नहीं होता, वहीं व्याप्ति रहती है। खंडन—यदि ऐसा कहें, तो कहीं भी
व्याप्ति नहीं होगी। कारण वह्नि का धूम में कहीं भी व्यभिचार नहीं देखा जायगा,
इसमें कुछ प्रमाण नहीं ।
समर्थन—इस तरह भले ही विपक्ष में हेतु की वृत्तित्ता में कोई प्रमाण बाधक न
हो, किन्तु तर्क तो हो ही सकता है। खंडन—तर्क को भी विपक्ष में हेतु के वृत्तित्व
का बाधक नहीं कह सकते। कारण यदि आपाद्य-आपादक की व्याप्ति को तर्क का मूल
मानें, तो 'व्याप्ति का ज्ञान तर्क से और उस तर्क की मूलभूत व्याप्ति का ज्ञान अन्य तर्क
से एवं उस तर्क की मूल व्याप्ति का ज्ञान अन्य तर्क से' इस प्रकार अनवस्था अथवा
'व्याप्ति के ज्ञान से तर्क की प्रवृत्ति और तर्क से व्याप्ति का ज्ञान' इस प्रकार अन्योन्याश्रय
आदि हो जायेंगे । यदि आपाद्य-आपादक की व्याप्ति को तर्क का मूल न मानें, तो तर्क
में कोई मूल ( प्रमाण ) न होने से वह तर्काभास ही हो जायगा ।
समर्थन — तर्क को व्याप्तिमूलक मानने पर अनवस्था होगी, यह आप नहीं कह
सकते । देखिये—धूम में अग्नि के व्यभिचार की शङ्का होने पर यह तर्क करेंगे कि
'यदि धूम अग्नि का व्यभिचारी होता, तो अकारण होकर नित्य हो जाता अथवा नहीं
ही होता ।' यह तर्क अकाट्य है, अर्थात् इस तर्क की मूलभूत व्याप्ति के निर्णयार्थ
तर्कान्तर अपेक्षित नहीं है। कारण उसमें यदि शङ्का हो, तो व्याघात हो जायगा ।
वही शङ्का हो सकती है, जिसमें स्वक्रिया-व्याघात आदि दोष न होते हों। ऐसा
होने पर सर्वत्र व्यभिचार की शङ्का में तर्क ही अकाट्य बाधक होंगे ।
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