खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
स्वाभाविकः सम्बन्धो व्याप्तिरित्यपरः । स प्रष्टव्यः—कस्य स्वाभाविकः, किं
सम्बन्धिनो उत अन्यस्य ? न चरमः ; वैपरीत्यापत्तेः ।
आद्ये कः स्वाभाविकशब्दार्थ इति प्रष्टव्यम्—किं सम्बन्धिस्वभावाश्रितः, अथ
सम्बन्धिस्वभावजन्यः , अथ सम्बन्धित्वविवक्षितस्वभावानतिरिक्तः, अथ सम्बन्धि-
स्वभावव्याप्यः , अथवा सम्बन्धिस्वभावादन्येन न प्रयुक्तः , उतान्य एव
कश्चिद्विवक्षितः ?
आद्ये पार्थिवत्वलोहलेख्यतयोरपि व्याप्तित्वप्रसङ्गः ।
न द्वितीयः ; अतिव्याप्तेरव्याप्तेश्च । अत एव न तृतीयः ।
नापि चतुर्थः; व्याप्त्यनिरुक्त्या व्याप्यत्वानिरुक्तेः । सम्बन्धस्य व्याप्यत्वे च
अन्य आचार्य कहते हैं कि स्वाभाविक सम्बन्ध व्याप्ति है । उनसे पूछना चाहिए
कि किसका स्वाभाविक सम्बन्ध व्याप्ति है, संवन्धियों का या अन्य का ? यदि अन्य का
कहें, तो जैसे असम्बन्धियों का सम्बन्ध व्याप्ति है, वैसे ही सम्बन्धियों का असम्बन्ध भी
व्याप्ति हो जायगा ।
यदि सम्बन्धियों का स्वाभाविक सम्बन्ध व्याप्ति है, तो कहिये कि 'स्वाभाविक'
शब्द का अर्थ क्या है ? जैसे वह्नि के स्वभाव ( स्वरूप ) के आश्रित औष्ण्य वह्नि का
स्वाभाविक है, वैसे ही सम्बन्धी के स्वभाव (स्वरूप) का आश्रित सम्बन्ध व्याप्ति है,
अथवा जैसे वसन्त से जन्य होने से वृक्षप्रसव वसन्त का स्वाभाविक है, वैसे ही सम्ब-
न्धी स्वभाव ( स्वरूप ) से जन्य सम्बन्ध व्याप्ति है, किंवा सम्बन्धित्वरूप से विवक्षित
सम्बन्धी के स्वभाव से अनतिरिक्त अर्थात् स्वभावस्वरूप सम्बन्ध ही व्याप्ति है अथवा
सम्बन्धी के स्वभाव से व्याप्य सम्बन्ध व्याप्ति है या सम्बन्धी के स्वभाव ( स्वरूप ) से
अन्य से प्रयुक्त ( जन्य ) न हो, ऐसा सम्बन्ध व्याप्ति है अथवा और ही कुछ वस्तु
व्याप्ति है ?
प्रथम पक्ष में पार्थिवत्व में लोहलेख्यत्व का सम्बन्ध व्याप्ति हो जायगा ।
द्वितीय पक्ष में जन्य होने से धूम का एकाश्रय में संयोगरूप सम्बन्ध वह्नि में
व्याप्ति हो जायगा तथा अजन्य होने से रूप-रस का एकाश्रयसमवायरूप सम्बन्ध
व्याप्ति न कहलायेगा ।
तृतीय पक्ष में वह्नि का धूम में एकाश्रयसंयोगरूप सम्बन्ध व्याप्ति न होगा,
कारण संयोग सम्बन्धी का स्वरूप नहीं, किन्तु अतिरिक्त है ।
चतुर्थ पक्ष भी युक्त नहीं है, कारण जबतक व्याप्ति की निरुक्ति नहीं होती, तब-
तक सम्बन्धी-स्वभाव व्याप्य-सम्बन्धरूप निरुक्त व्याप्ति की निरुक्ति नहीं हो सकती