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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

कवितावली ३६
उनके मुख कमलके समान और नेत्र भी कमलके ही समान
सुन्दर थे तथा भौंहें कामदेवके धनुषके समान बनी हुई थीं। उनके
अति सुन्दर और सुकुमार श्याम-गौर शरीर थे, किशोर अवस्था थी
एवं सिरपर जटाएँ सुशोभित थीं तथा वे कमरमें तरकस कसे और
धनुष-बाण लिये थे । जिस समयसे अचानक ही उनकी
तिरछी निगाह मुझपर पड़ी है, अरी सखि ! तुझसे किस प्रकार
कहूँ, वे दोनों मृदुल मूर्तियाँ मेरे मनमें बसकर मोहित कर रही हैं।
वनमें
प्रेमसों पीछें तिरीछें प्रियाहि चितै चितु दै चले लै चितु चोरें ।
स्याम सरीर पसेउ लसै, हुलसै 'तुलसी' छबि सो मन मोरें ॥
लोचन लोल, चलैं भुकुटीं कल काम-कमानहु सो तृनु तोरैं ।
राजत रामु कुरंगके संग निषंगु कसें, धनुसों सरु जोरैं ॥
( श्रीराम ) पीछेकी ओर प्रेमपूर्वक तिरछी दृष्टिसे दत्तचित्तसे
प्रियाकी ओर निहारकर उनका चित्त चुराकर (आखेटको) चले।
तुलसीदासजी कहते हैं- (प्रभुके) श्याम शरीरमें पसीना सुशोभित
है, वह छबि मेरे हृदयमें हुलास भर देती है। प्रभुके नेत्र चञ्चल
हैं और सुन्दर भौंहें चलायमान हो रही हैं, जिन्हें देखकर कामदेव-
की जो कमान है वह भी तृण तोड़ती अर्थात् लज्जित होती है।
इस प्रकार तरकस बाँधे तथा धनुषपर बाण चढ़ाये भगवान् राम
हरिणके साथ (दौड़ते हुए) बड़े ही सुशोभित हो रहे हैं।
सर चारिक चारु बनाइ कसें कटि, पानि सरासनु सायकु लै ।
बन खेलत रामु फिरैं मृगया, 'तुलसी' छबि सो बरनै किमि कै ॥

३७ अयोध्याकाण्ड
अवलोकि अलौकिक रूपु मृगीं मृग चौंकि चकें, चितवैं चितु दै ।
न डगैं, न भगैं जियँ जानि सिलीमुख पंच धरैं रतिनायकु है ॥
श्रीरामचन्द्रजी वनमें शिकार खेलते फिरते हैं । उन्होंने दो-
चार सुन्दर बाण बड़ी सुघरतासे कमरमें खोंस रक्खे हैं तथा हाथमें
धनुष-बाण लिये हुए हैं । गोस्वामीजी कहते हैं कि उस शोभाका
मैं कैसे वर्णन करूँ ? उनके अलौकिक रूपको देखकर मृग और
मृगी चौंककर चकित हो जाते हैं और चित्त लगाकर देखने लगते
हैं । वे यह जानकर कि पाँच बाण धारण किये साक्षात् कामदेव
ही हैं, न तो हिलते हैं और न भागते ही हैं ।
बिंधिके बासी उदासी तपी ब्रतधारी महा बिनु नारि दुखारे ।
गौतमतीय तरी 'तुलसी', सो कथा सुनि भे मुनिवृंद सुखारे ॥
है हैं सिला सब चंद्रमुखीं परसें पद मंजुल कंज तिहारे ।
कीन्ही भली रघुनायकजू ! करुना करि काननको पगु धारे ॥
विन्ध्यपर्वतपर रहनेवाले महाव्रतधारी उदासी और तपस्वी लोग
बिना स्त्रीके दुखी थे । वे मुनिगण यह सुनकर बड़े प्रसन्न हुए कि
इनके कारण गौतमकी स्त्री अहल्या तर गयी, [ और बोले ] अब सब
पत्थर आपके सुन्दर चरण-कमलोंके स्पर्शसे चन्द्रमुखी स्त्री हो
जायँगे । हे रघुनन्दनजी ! आपने अच्छा किया जो कृपाकर
वनमें पधारे ।
इति अयोध्याकाण्ड

अरण्यकाण्ड
—:-०००००-:—
मारीचानुधावन
पंचवटीं बर पर्नकुटी तर बैठे हैं रामु सुभायँ सुहाए ।
सोहै प्रिया, प्रिय बंधु लसै, 'तुलसी' सब अंग घने छबि-छाए ॥
देखि मृगा मृगनैनी कहे प्रिय बैन, ते प्रीतमके मन भाए ।
हेमकुरंगके संग सरासनु सायकु लै रघुनायकु धाए ॥
पञ्चवटीमें सुन्दर पर्णकुटीके समीप स्वभावसे ही सुन्दर
श्रीरामचन्द्रजी बैठे हैं । ( साथमें ) प्रिया ( श्रीजानकीजी ) और
प्रिय बन्धु शोभित हैं । गोसाईं जी कहते हैं—उनके सब अङ्ग बड़े
ही शोभायमान हैं । उस समय एक ( सोनेके ) मृगको देखकर
मृगनयनी ( श्रीजानकीजी ) ने [ उसे लानेके लिये ] जो प्रिय
वचन कहे वे प्रियतमके मनको बहुत प्रिय लगे, तब रघुनाथजी
धनुष-बाण ले उस सोनेके मृगके पीछे दौड़ पड़े ।
इति अरण्यकाण्ड
—:-०००००-:—

किष्किन्धाकाण्ड
——————
समुद्रोल्लङ्घन
जब अंगदादिनकी मति-गति मंद भई,
पवनके पूतको न कूदिबेको पलु गो।
साहसी है सैलपर सहसा सकेलि आइ,
चितवत चहूँ ओर, औरनिको कलु गो॥
'तुलसी' रसातलको निकसि सलिलु आयो,
कोलु कलमल्यो, अहि कमठको बलु गो।
चारिहू चरनके चपेट चाँपें चिपिटि गो,
उचकें उचकि चारि अंगुल अचलु गो॥१॥
जब अङ्गदादि वानरोंकी गति और बुद्धि मन्द पड़ गयी
[अर्थात् किसीने पार जाना स्वीकार नहीं किया] तब वायुकुमार
हनुमान्‌जीको कूदनेमें पलमात्रकी भी देरी नहीं हुई। वे साहसपूर्वक
सहसा कौतुकसे ही पर्वतपर आ चारों ओर देखने लगे। इससे
शत्रुओंकी शान्ति भंग हो गयी। गोसाईं जी कहते हैं कि रसातलसे
जल निकल आया, वाराह भगवान् कलमला गये तथा शेष और
कच्छप बलहीन हो गये। चारों चरणोंसे जोरसे दबानेसे पर्वत
पृथ्वीमें चिपट गया और फिर उनके कूदनेपर पर्वत भी चार
अंगुल उचक गया।
इति किष्किन्धाकाण्ड
——————

सुन्दरकाण्ड
अशोकवन
बासव-बरुन-विधि-बनतें सुहावनो
दसाननको काननु बसंतको सिंगारु सो ।
समय पुराने पात परत, डरत बातु,
पालत लालत रति-मारको विहारु सो ॥
देखें बर वापिका तड़ाग बागको बनाउ, •
रागवस भो विरागी पवनकुमारु सो ।
सीयकी दसा विलोकि बिटप असोक तर,
'तुलसी' विलोक्यो सो तिलोक-सोक-सारु सो॥१॥
गोसाईंजी कहते हैं कि रावणका वन इन्द्र, वरुण और
ब्रह्माके वनसे भी अधिक सुहावना था । वह मानो वसन्तका
श्रृङ्गार ही था । (तात्पर्य यह कि सब वन और उपवनोंका शृङ्गार
वसन्त ऋतु है परन्तु रावणका बाग वसन्त ऋतुकी भी शोभा
बढ़ानेवाला था । ) पुराने पत्ते (पतझड़के) समय ही गिरते हैं;
क्योंकि वायु यहाँ आते हुए डरता था और उसके बागका
लालन-पालनं रति और कामदेवके विहार-स्थलके समान करता
था । उत्तम बावली, तालाब और बागकी बनावट देखकर
हनुमान्जी-जैसे वैराग्यवान् भी रागके वशीभूत-से हो गये ।
(किन्तु) जब उन्होंने अशोक वृक्षके तले श्रीजानकीजीकी

दशा देखी तो उन्हें वह बाग तीनों लोकोंके शोकका सार-सा
दिखायी दिया ।
माली मेघमाल, बनपाल बिकराल भट,
नीकें सब काल सींचैं सुधासार नीरके।
मेघनाद तें दुलारो, प्रान तें पिआरो बागु,
अति अनुरागु जियँ जातुधान धीर कें ॥
‘तुलसी’ सो जानि-सुनि, सीयको दरसु पाइ,
पैठो बाटिकाँ बजाइ बल रघुबीर कें।
बिद्यमान देखत दसाननको काननु सो
तहस-नहस कियो साहसी समीर कें ॥ २ ॥
वहाँ मेघोंके समूह माली हैं और बड़े-बड़े बिकराल भट उस
बागके रक्षक हैं। वे सब समय अमृतके सार-सदृश मीठे जलसे उसे
अच्छी प्रकार सींचते हैं। धीर-बीर रावणके चित्तमें उस बागके प्रति
अत्यन्त अनुराग था। उसे वह मेघनादसे भी अधिक दुलारा और
प्राणोंसे भी अधिक प्यारा था। गोसाईंजी कहते हैं—यह सब जान-
सुनकर भी श्रीहनुमान्जी जानकीजीका दर्शन पा श्रीरामचन्द्रजीके
बलसे बागमें निःशङ्क घुस गये; और रावणके रहते और देखते हुए
भी साहसी वायुनन्दनने उस वनको तहस-नहस कर दिया।
लंकादहन
बसन बटोरि बोरि-बोरि तेल तमीचर,
खोरि-खोरि धाइ आइ बाँधत लँगूर हैं।

कवितावली ४२
तैसो कपि कौतुकी डेरात ढीले गात कै-कै,
लातके अघात सहै, जीमें कहै, कूर हैं ॥
बाल किलकारी कै-कै, तारी दै-दै गारी देत,
पाछें लागे, बाजत निसान ढोल तूर हैं।
बालधी बढ़न लागी, ठौर-ठौर दीन्ही आगी,
बिंधिकी दवारि कैधौं कोटिसत सूर हैं ॥ ३ ॥
राक्षस लोग गली-गली दौड़कर, कपड़े बटोरकर और उन्हें
तेलमें डुबा-डुबाकर आकर हनुमान्‌जीकी पूँछमें बाँधते हैं। वैसे ही
खिलाड़ी हनुमान्‌जी भी डरते हुए-से शरीरको ढीला कर-करके उनकी
लातोंके आघात सहन करते हैं और मन-ही-मन कहते हैं कि ये
सब कायर हैं। बालक किलकारी मारकर ताली बजा-बजाकर गाली
देते हुए पीछे लगे हैं, तथा नगाड़े, ढोल और तुरुही बजाये जा रहे
हैं। पूँछ बढ़ने लगी और [राक्षसोंने उसमें] जहाँ-तहाँ आग लगा
दी, जिससे वह ऐसी जान पड़ती थी मानो वह विन्ध्य पर्वतकी दावाग्नि
हो अथवा सौ करोड़ सूर्य हों।
लाइ-लाइ आगि भागे बालजाल जहाँ तहाँ,
लघु ह्वै निबुकि गिरि मेरुतें बिसाल भो।
कौतुकी कपीसु कूदि कनक-कँगूराँ चढ़्यो,
रावन-भवन चढ़ि ठाढ़ो तेहि काल भो ॥
‘तुलसी’ बिराज्यो ब्योम बालधी पसारि भारी,
देखें हहरात भट, कालु सो कराल भो।

तेजको निधानु मानो कोटिक कृसानु-भानु,
नख विकराल, मुखु तैसो रिस लाल भो ॥ ४ ॥
बालसमूह [पूँछमें] आग लगा-लगाकर जहाँ-तहाँ भाग गये
और हनुमान्‌जी छोटे हो फंदेसे निकलकर फिर सुमेरु पर्वतसे भी
विशाल हो गये। तदनन्तर खिलाड़ी हनुमान् कूदकर सोनेके कँगूरेपर
चढ़ गये और वहाँसे उसी समय रावणके राजमहलपर चढ़कर खड़े
हो गये। गोसाईंजी कहते हैं, (उस समय) वे आकाशमें अपनी
लंबी पूँछ फैलाये हुए सुशोभित थे। उसको देखकर वीर लोग हहर
(थर्रा) जाते थे; (उस समय) वे कालके समान भयङ्कर हो गये।
वे तेजके पुञ्ज-से जान पड़ते थे, मानो करोड़ों अग्नि और सूर्य हैं।
उनके नख बड़े विकराल थे और वैसे ही मुख भी क्रोधसे लाल
हो रहा था।
बालधी बिसाल बिकराल ज्वालजाल मानो
लंक लीलिबेको काल रसना पसारी है।
कैधौं ब्योमबीथिका भरे हैं भूरि धूमकेतु,
बीररस बीर तरवारि सो उघारी है॥
'तुलसी' सुरेस-चापु, कैधौं दामिनि-कलापु,
कैधौं चली मेरु तें कृसानु-सरि भारी है।
देखें जातुधान-जातुधानीं अकुलानी कहैं,
काननु उजारयो, अब नगरु प्रजारिहै ॥ ५ ॥
भयंकर ज्वालमालाके सहित विशाल पूँछ ऐसी जान पड़ती थी
मानो लंकाको निगलनेके लिये कालने जीभ फैलायी है, अथवा मानो
आकाशमार्गमें अनेकों धूमकेतु भरे हैं, अथवा वीररस-रूपी वीरने

कवितावली ५४
मानो तलवार निकाल ली है। गोसाईंजी कहते हैं कि यह इन्द्रधनुष
है अथवा बिजलीका समूह है या सुमेरु पर्वतसे अग्निकी भारी नदी
बह चली है। उसे देखकर राक्षस और राक्षसियाँ व्याकुल होकर
कहती हैं—यह वनको तो उजाड़ चुका, अब नगरको और जलावेगा।

जहाँ-तहाँ बुबुक विलोकि बुबुकारी देत,
जरत निकेतु धावौ, धावौ, लागी आगि रे।
कहाँ तातु, मातु, भ्रात-भगिनी, भामिनी-भाभी,
ढोटा छोटे छोहरा अभागे भौंडे भागि रे ॥
हाथी छोरौ, घोरा छोरौ, महिष-वृषभ छोरौ,
छेरी छोरौ, सोवै सो, जगावौ, जागि, जागि रे।
'तुलसी' बिलोकि अकुलानी जातुधानीं कहैं,
बार-बार कह्यौं, पिय ! कपिसों न लागि रे ॥ ६ ॥

जहाँ-तहाँ आगकी भभकको देखकर पुकार देते हैं—'अरे !
भागो, भागो। आग लग गयी है, घर जल रहा है। अरे अभागे !
माता-पिता, भाई-बहिन, स्त्री-भौजाइ, लड़के-बच्चे, कहाँ हैं ? अरे
गँवार ! भाग, भाग। हाथी खोलो, घोड़ा खोलो, भैंस और बैल खोलो
तथा बकरियोंको भी खोल दो। वह सोता है, उसे जगा दो। अरे
जागो ! जागो !!' गोसाईंजी कहते हैं कि इस दशाको देखकर
राक्षसस्त्रियाँ व्याकुल होकर अपने-अपने पतियोंसे कहती हैं—'हे
प्रियतम ! हमने बार-बार कहा था कि इस बंदरके मुँह मत लगो।

देखि ज्वालाजालु, हाहाकारु दसकंध सुनि,
कह्यो, धरो, धरो, धाए बीर बलवान हैं।

४५ सुन्दरकाण्ड
लिएँ सूल-सेल, पास-परिघ, प्रचंड दंड,
भाजन सनीर, धीर धरें धनु-बान हैं॥
'तुलसी' समिध सौंज, लंक जग्यकुंडु लखि,
जातुधान पुंगीफल जव तिल धान हैं।
सुवा सो लँगूल, बलमूल प्रतिकूल हबि,
स्वाहा महा हाँकि हाँकि हुनैं हनुमान हैं॥७॥
उस (धधकते हुए) अग्निसमूहको देख और लोगोंका हाहाकार
सुन रावणने कहा 'अरे ! इसे पकड़ो ! इसे पकड़ो !!' यह सुनकर
बहुत-से बलवान् योद्धा त्रिशूल, बर्छी, फाँसी, परिघ, मजबूत डंडे
और पानी भरे हुए बरतन लिये दौड़े और कुछ धीर लोगोंने धनुष-
बाण भी धारण कर रक्खे थे। श्रीगोसाईंजी कहते हैं कि लंकाको
यज्ञकुण्ड समझो और वहाँकी सामग्री लकड़ी हैं तथा राक्षसगण सुपारी,
जौ, तिल और धान हैं। हनुमान्जीकी पूँछ सुवा है, बलवान् शत्रु हवि
हैं और उच्च हाँकरूपी स्वाहामन्त्रद्वारा हनुमान्जी हवन कर रहे हैं।
गाज्यो कपि गाज ज्यों, बिराज्यो ज्वालजालजुत,
भाजे बीर धीर, अकुलाइ उठ्यो रावनो।
धावौ, धावौ, धरौ, सुनि धाए जातुधान धारि,
बारिधारा उलदै जलदु जौन सावनो॥
लपट-झपट झहराने, हहराने बात,
भहराने भट, पर्यो प्रबल परावनो।
ढकनि ढकेलि, पेलि सचिव चले लै ठेलि,
नाथ ! न चलैगो बलु, अनलु भयावनो॥८॥

कवितावली ४६
हनुमान्जी धधकते हुए अग्निसमूहसे सुशोभित हुए और
बादलकी भाँति गरजे । इससे बड़े धीर-वीर योद्धा भाग गये और रावण
भी व्याकुल हो उठा और बोला, 'दौड़ो, दौड़ो, इसे पकड़ लो।' यह
सुनकर राक्षसोंकी सेना दौड़ी, मानो सावनका बादल जल बरसा रहा
हो। वे योध्यालोग आगकी लपटोंकी झपटसे झुलसकर और वायुके
झकोरोंसे घबड़ाकर व्याकुल हो गये । इस प्रकार उस समय वहाँ
भारी भगदड़ पड़ गयी । रावणको भी मन्त्रीलोग धक्कोंसे ढकेलकर और
ज़बरदस्ती ठेलकर ले चले और कहने लगे-हे नाथ ! आग भयंकर
है, इसमें बल नहीं चलेगा ।
बड़ो बिकराल बेषु देखि, सुनि सिंघनादु,
उठ्यो मेघनादु, सविषाद कहै रावनो ।
बेग जित्यो मारुतु, प्रताप मारतंड कोटि,
कालऊ करालताँ, बड़ाईं जित्यो बावनो ॥
'तुलसी' सयाने जातुधान पछिताने कहैं,
जाको ऐसो दूत, सो तो साहेबु अबै आवनो ।
काहेको कुसल रोषें राम बामदेवहू की,
बिषम बलीसों बादि बैरको बढ़ावनो ॥ ९ ॥
हनुमान्जीका बड़ा भयंकर वेष देख और उनका सिंहनाद सुन
मेघनाद उठा और रावण भी चिन्तायुक्त होकर बोला- इसने तो
वेगमें वायुको, प्रतापमें करोड़ों सूर्योंको, करालतामें कालको और बड़ाई
(विशालता) में भगवान् वामनको भी जीत लिया । तुलसीदासजी
कहते हैं—उस समय जो समझदार राक्षस थे, वे पश्चात्ताप करते
हुए कहने लगे, 'जिसका दूत ऐसा (प्रचण्ड) है, वह स्वामी तो

४७ सुन्दरकाण्ड
अभी आना बाकी ही है।' भला रामके क्रोधित होनेपर शिवजीकी
भी कुशल कैसे हो सकती है ? ऐसे बाँके वीरसे वैर बढ़ाना व्यर्थ
ही है।
पानी ! पानी ! पानी ! सब रानी अकुलानी कहें,
जाति हैं परानी, गति जानी गजचालि है।
बसन बिसारैं, मनिभूषन सँभारत न,
आनन सुखाने, कहैं, क्योंहू कोऊ पालिहै ॥
'तुलसी' मंदोवै मीजि हाथ, धुनि माथ कहै,
काहूँ कान कियो न, मैं कह्यो केतो कालि है।
बापुरें बिभीषन पुकारि बार-बार कह्यो,
बानरु बड़ी बलाइ घने घर घालिहै ॥१०॥
सब रानियाँ व्याकुल होकर 'पानी-पानी' चिल्लाती हैं और
दौड़ी चली जा रही हैं। गजकी-सी चालसे ही उनकी गति
पहचाननेमें आती है। वे वस्त्र लेना भूल गयी हैं और मणिजटित
आभूषणोंको भी नहीं सँभाल सकी हैं। उनके मुख सूख रहे हैं और
वे कहती हैं--'क्या किसी प्रकार भी कोई हमारी रक्षा करेगा?'
गोसाईंजी कहते हैं-मन्दोदरी हाथ मल-मलकर और सिर धुन-धुनकर
कहती है कि अहो ! कल मैंने कितना कहा, फिर भी किसीने उसपर
कान नहीं दिया। बेचारे विभीषणने भी बार-बार पुकारकर कहा कि
यह वानर बड़ी भारी बला है और बहुत-से घरोंको चौपट कर देगा।
काननु उजारथो तो उजारथो, न बिगारथो कछु,
बानरु बेचारो बाँधि आन्यो हठि हारसों ।

कवितावली ४८
निपट निडर देखि काहूँ न लख्यो बिसेषि,
दीन्हो ना छुड़ाइ कहि कुलके कुठारसों ॥
छोटे औ बड़ेरे मेरे पूतऊ अनेरे सब,
साँपनि सों खेलैं, मेलैं गरे छुराधार सों ।
'तुलसी' मँदोवै रोइ-रोइ कै बिगोवै आपु,
बार-बार कह्यो मैं पुकारि दाढ़ीजारसों ॥११॥
'वनको उजाड़ा, तो उजाड़ा, उससे कुछ बिगाड़ नहीं हुआ
था; किन्तु ये बेचारे इस बन्दरको उपवनसे हठात् बाँधकर ले आये ।
उसे बिल्कुल निडर देखकर भी किसीने कुछ विशेष नहीं समझा और
न कुलकुठार मेघनादसे कहकर किसीने उसे छुड़ाया ही । मेरे छोटे
बड़े सभी पुत्र अन्यायी हैं, ये साँपोंसे खेलवाड़ करते हैं और छूरेकी
धारमें अपनी गर्दनें रखते हैं।' गोसाईंजी कहते हैं कि मन्दोदरी
रो-रोकर अपनेको क्षीण करती है और कहती है कि मैंने इस
दाढ़ीजार (मेघनाद) से बार-बार पुकारकर कहा (परन्तु इसने
मेरी एक बात न सुनी) ।
रानीं अकुलानी सब डाढ़त परानी जाहिं,
सकें न बिलोकि बेषु केसरीकुमारको ।
मीजि-मीजि हाथ, धुनैं माथ दसमाथ-तिय,
'तुलसी' तिलौ न भयो बाहेर अगारको ॥
सबु असबाबु डाढ़ो, मैं न काढ़ो, तैं न काढ़ो,
जियकी परी, सँभारै सहन-भँडार को ।
खीझति मँदोवै सबिषाद देखि मेघनादु,
बयो लूनिअत 'सब याही दाढ़ीजारको ॥१२॥

४९ सुन्दरकाण्ड
रानियाँ सब जलती हुई घबड़ाकर दौड़ी चली जाती हैं। वे
केशरीनन्दन (हनूमान्‌जी) के (विकराल) वेषको देख नहीं
सकतीं। रावणकी स्त्रियाँ हाथ मल-मलकर रह जाती हैं और सिर
धुन-धुनकर कहती हैं कि तिलभर वस्तु भी घरके बाहर नहीं हो
सकी। सब असबाब जल गया, न मैंने ही निकाला और न तूने
ही निकाला। सबको अपने-अपने जीकी पड़ी थी, घर-आँगन कौन
सँभालता। मेघनादको देखकर मन्दोदरी दुःखपूर्वक क्रोधित होती है
और कहती है कि इसी दाढ़ीजारका बोया हुआ सब काट रहे हैं
[यदि यह इस बंदरको पकड़कर न लाता तो ऐसी आफत क्यों
आती?]
रावनकी रानीं बिलखानी कहैं जातुधानीं,
हाहा! कोऊ कहै बीसबाहु दसमाथ सों।
काहे मेघनाद! काहे, काहे रे महोदर! तूँ,
धीरजु न देत, लाइ लेत क्यों न हाथसों॥
काहे अतिकाय! काहे, काहे रे अकंपन!
अभागे तीय त्यागे भोंड़े भागे जात साथसों।
'तुलसी' बढ़ाई वादि सालतें बिसाल बाहें,
याहीं बल बालिसो बिरोधु रघुनाथसों॥१३॥
राक्षसियाँ जो रावणकी रानियाँ थीं, बिलख-बिलखकर कहती
हैं—'हाय! हाय!! कोई यह हाल बीस भुजा और दस सिरवाले
रावणको सुनावे। क्यों रे मेघनाद! क्यों रे महोदर! तुम हमें
धैर्य क्यों नहीं बँधाते और अपने हाथोंमें आश्रय क्यों नहीं देते?
क्यों रे अतिकाय! क्यों रे अकम्पन! अरे अभागे गँवारो! क्यों
स्त्रियोंको त्यागकर साथसे भागे जाते हो? तुमलोगोंने व्यर्थ ही
क० ४---

कवितावली ५०
सालवृक्षके समान बड़ी-बड़ी भुजाएँ बढ़ा रक्खी हैं ? अरे मूर्खों !
इसी बलसे रघुनाथजीसे वैर बढ़ाया है ?'
हाट-बाट, कोट-ओट, अटनि, अगार, पौरि,
खोरि-खोरि दौरि-दौरि दीन्ही अति आगि है।
आरत पुकारत, सँभारत न कोऊ काहू,
ब्याकुल जहाँ सो तहाँ लोक चले भागि हैं॥
बालधी फिरावै, बार-बार झहरावै, झरैं
बुँदिया-सी, लंक पघिलाइ पाग पागि है।
'तुलसी' बिलोकि अकुलानी जातुधानीं कहैं,
चित्रहू के कपि सों निसाचरु न लागिहै ॥१४॥
(इस प्रकार हनुमान्‌जीने ) हाट-बाट, किले-प्राकार, अटारी,
घर-दरवाजे और गली-गलीमें दौड़-दौड़कर भारी आग लगा दी।
सब लोग आर्तनाद कर रहे हैं, कोई किसीको नहीं सँभालता। सब
लोग व्याकुल होकर जहाँ-तहाँ भाग चले। हनुमान्‌जी पूँछको
घुमाकर बार-बार झाड़ते हैं, उससे बुँदियाकी भाँति चिनगारियाँ झड़
रही हैं, मानो लङ्काको पिघलाकर उसकी चासनीमें उस बुँदियाको
पागेंगे। यह देखकर राक्षसियाँ व्याकुल होकर कहती हैं कि अब
राक्षसलोग चित्रके वानरसे भी नहीं भिड़ेंगे।
लगी, लागी आगि, भागि-भागि चले जहाँ-तहाँ,
धीयको न माय, बाप पूत न सँभारहीं।
छूटे बार, बसन उघारे, धूम-धुंद अंध,
कहैं बारे-बूढ़े 'बारि, बारि' बार बारहीं ॥

५१ सुन्दरकाण्ड
हय हिहिनात, भागे जात गहरात गज,
भारी भीर ठेलि-पेलि रौंदि-खौंदि डारहीं।
नाम लै चिलात, बिललात अकुलात अति,
'तात तात ! तौंसिअत, झौंसिअत, झारहीं' ॥१५॥
आग लग गयी, आग लग गयी, ऐसा पुकारते हुए सब लोग
जहाँ-तहाँ भाग चले। न माँ लड़कीको सँभालती है और न पिता
पुत्रको सँभालता है। केश और वस्त्र खुल गये हैं, सब लोग नंगे
हो गये हैं, और धुएँकी धुंधसे अंधे होकर लड़के-बूढ़े सब बार-बार
'पानी-पानी' पुकार रहे हैं। घोड़े हिनहिनाते हुए भागे जाते हैं,
हाथी चिग्घार मारते हैं और जो बड़ी भारी भीड़ लगी हुई थी, उसे
धक्कोंसे ढकेलकर पैरोंसे कुचले डालते हैं। सब लोग नाम ले-लेकर
पुकार रहे हैं, और अत्यन्त बिलबिलाते तथा अकुलाते हुए कहते
हैं, 'बाप रे बाप ! आगकी लपटोंसे तो झुलसे जाते हैं, तपे जाते हैं।'
लपट कराल ज्वालजालमाल दहूँ दिसि,
धूम अकुलाने, पहिचानै कौन काहि रे।
पानीको ललात, बिललात, जरे गात जात,
परे पाइमाल जात 'भात ! तूँ निवाहि रे ॥
प्रिया ! तूँ पराहि, नाथ ! नाथ ! तूँ पराहि, बाप !
बाप ! तूँ पराहि, पूत ! पूत ! तूँ पराहि रे' ।
'तुलसी' बिलोकि लोग ब्याकुल बेहाल कहैं,
लेहि दससीस ! अब बीस चख चाहि रे ॥१६॥

कवितावली ५२
दसों दिशाओंमें ज्वालमालाओंकी भयंकर लपटें फैल गयी हैं ।
सब लोग धुएँसे व्याकुल हो रहे हैं । उस धूममें कौन किसे पहचान
सकता था । लोग पानीके लिये लालायित होकर बिलबिला रहे हैं,
शरीर जला जाता है, सब लोग तबाह हुए जाते हैं और कहते
हैं—'भैया ! बचाओ ! प्रिये ! तुम भागो । हे नाथ ! हे नाथ !
भागो । पिताजी ! पिताजी ! दौड़ो । अरे बेटा ! ओ बेटा ! भाग ।'
तुलसीदासजी कहते हैं—सब लोग व्याकुल और परेशान होकर
कह रहे हैं—'अरे दशशीश रावण ! अब बीसों आँखोंसे अपनी
करतूत देख ले ।'
बीथिका-बज़ार प्रति, अटनि अगार प्रति,
पवरि-पगार प्रति बानरु बिलोकिए ।
अध-ऊर्ध बानर, बिदिसि-दिसि बानरु है,
मानो रह्यो है भरि बानरु तिलोकिएँ ॥
मूँदें आँखि हियमें, उघारें आँखि आगें ठाढ़ो,
धाइ जाइ जहाँ-तहाँ, और कोऊ कोकिए ।
लेहु, अब लेहु, तब कोउ न सिखावो मानो,
सोई सतराइ जाइ, जाहि-जाहि रोकिए ॥१७॥
[ हनुमान्‌जी ऐसी शीघ्रतासे घूम रहे हैं कि ] गली-गली,
बाजार-बाजार, अटारी-अटारी, घर-घर, द्वार-द्वार, दीवार-दीवारपर
वानर ही दिखायी पड़ रहा है । ऊपर-नीचे और दिशा-विदिशाओंमें
वानर ही दीखता है, मानो वह वानर तीनों लोकोंमें भर गया है ।
आँख मूँदनेसे हृदयमें और आँख खोलनेसे आगे खड़ा दिखायी देता
है । जहाँ और किसीको पुकारते हैं, वहाँ मानो हनुमान्‌जी ही जा

५३ सुन्दरकाण्ड
धमकते हैं। 'लो, अब लो; पहले तो किसीने हमारी शिक्षा नहीं
मानी'—इस प्रकार जिसे रोकते हैं, वही सतरा (चिढ़) जाता है।
एक करें धौंज, एक कहैं, काढ़ौ सौंज, एक
औंजि, पानी पीकै कहैं, बनत न आवनो।
एक परे गाढ़े, एक डाढ़त हीं काढ़े, एक
देखत हैं ठाढ़े, कहैं, पावकु भयावनो॥
'तुलसी' कहत एक 'नीकें हाथ लाए कपि,
अजहूँ न छाड़ै बालु गालको बजावनो'।
'धाओ रे, बुझाओ रे', 'कि बावरे हौ रावरे, या
औरै आगि लागी, न बुझावै सिंधु सावनो' ॥१८॥
कोई दौड़ लगाते हैं, कोई कहते हैं 'असबाब निकालो', कोई
ऊमससे घबड़ाकर पानी पीकर कहते हैं कि आते नहीं बनता,
कोई बड़े संकटमें पड़ गये हैं, कोई जलते ही निकाले जाते हैं,
कोई खड़े-खड़े देखते हैं और कहते हैं कि 'अग्नि बड़ी भयङ्कर
है।' तुलसीदासजी कहते हैं, कोई कहते हैं कि 'हनुमान्‌जीने
खूब हाथ लगाया, किन्तु यह मूर्ख अब भी गाल बजाना नहीं
छोड़ता।' कोई कहता है—'अरे दौड़ो, अरे बुझाओ।' दूसरा कहता
है—'क्या तुम बावले हुए हो ? यह कुछ और ही तरहकी आग
लगी है, जिसे समुद्र और सावनका मेघ भी नहीं बुझा सकते।'
कोपि दसकंध तब प्रलयपयोद बोले,
रावन-रजाइ धाइ आए जूथ जोरि कै।

कवितावली ५४
कह्यो लंकपति लंक बरत, बुताओ वेगि
वानरु बहाइ मारौ महावारि बोरि कै॥
‘भलें नाथ ! नाइ माथ चले पाथप्रदनाथ,
वरषैं मुसलधार बार-बार घोरि कै।
जीवनतें जागी आगी, चपरि चौगुनी लागी,
‘तुलसी’ भभरि मेघ भागे मुखु मोरि कै ॥१९॥
तब रावणने क्रोधित होकर प्रलयकालके मेघोंको बुलाया और
वे रावणकी आज्ञासे सब अपना दल बटोरकर दौड़े आये। उनसे
लङ्कापतिने कहा—‘अरे मेघो ! जलती हुई लङ्कापुरीको शीघ्र
बुझाओ और बंदरको बहाकर गम्भीर जलमें डुबाकर मार डालो।’
तब मेघोंके स्वामी ‘महाराज ! बहुत अच्छा’ ऐसा कहकर प्रणाम
करके चल दिये और बार-बार गरज-गरजकर मूसलधार पानी बरसाने
लगे। किन्तु जलसे अग्नि और भी प्रज्वलित हो गयी और चपलता-
पूर्वक चौगुनी बढ़ गयी। तुलसीदासजी कहते हैं—तब सब मेघ
घबड़ाकर मुँह मोड़कर भागे।
इहाँ ज्वाल जरे जात, उहाँ ग्लानि गरे गात,
सूखे सकुचात सब, कहत पुकार हैं।
‘जुग-षट भानु देखे, प्रलयकृसानु देखे,
सेष-मुख-अनल विलोके बार-बार हैं॥
‘तुलसी’ सुन्यो न कान सलिलु सर्पी-समान,
अति अचिरिजु कियो केसरीकुमार है’।
वारिद-बचन सुनि धुने सीस सचिवन्ह,
कहैं ‘दससीस ! ईस-वामता-विकार हैं' ॥२०॥

५५ सुन्दरकाण्ड
बादल इधर तो अग्निकी लपटोंसे जले जाते हैं और उधर
उनके शरीर ग्लानिसे गले जाते हैं। सब मेघ शुष्क हो सकुचाकर
पुकारने लगे—'हमलोगोंने बारहों सूर्य देखे, प्रलयका अग्नि देखा
और कई बार शेषजीके मुखकी ज्वाला देखी। परन्तु कभी जलको
घृतके समान हुआ नहीं सुना। यह महान् आश्चर्य केसरीनन्दन
(हनुमान्जी) ने कर दिखलाया।' मेघोंके वचन सुनकर मन्त्रीगण
सिर धुनने लगे और रावणसे बोले—'यह सब ईश्वरकी प्रतिकूलताका
विकार है।'
'पावकु, पवनु, पानी, भानु, हिमवानु, जमु,
कालु, लोकपाल मेरे डर डावाँडोल हैं।
साहेबु महेसु, सदा संकित रमेसु मोहिं,
महातप साहस विरंचि लीन्हें मोल हैं॥
'तुलसी' तिलोक आजु दूजो न बिराजै राजु,
बाजे-बाजे राजनिके बेटा-बेटी ओल हैं।
को है ईस नामको, जो वाम होत मोहूसे को,
मालवान ! रावरे के बावरे-से बोल हैं' ॥२१॥
तब रावणने कहा—'अग्नि, वायु, जल, सूर्य, हिमाचल, यम,
काल और लोकपाल (इन्द्रादि) मेरे डरसे डाँवाडोल रहते हैं अर्थात्
काँपते रहते हैं। हमारे स्वामी श्रीमहादेवजी हैं, लक्ष्मीपति विष्णु
भी हमसे सदा शङ्कित रहते हैं। मैंने साहसपूर्वक महान् तपस्या
करके ब्रह्माजीको भी मोल ले लिया है अर्थात् वे भी मेरे प्रतिकूल
नहीं जा सकते। तीनों लोकोंमें आज कोई दूसरा राजा विराजमान
नहीं है। और तो क्या, बाजे-बाजे राजाओंके बेटा-बेटीतक हमारे