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सर्वकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

पृष्ठ 43, कुल 228 में से

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पृष्ठ 43

सुन्दरकाण्ड
अशोकवन
बासव-बरुन-विधि-बनतें सुहावनो
दसाननको काननु बसंतको सिंगारु सो ।
समय पुराने पात परत, डरत बातु,
पालत लालत रति-मारको विहारु सो ॥
देखें बर वापिका तड़ाग बागको बनाउ, •
रागवस भो विरागी पवनकुमारु सो ।
सीयकी दसा विलोकि बिटप असोक तर,
'तुलसी' विलोक्यो सो तिलोक-सोक-सारु सो॥१॥
गोसाईंजी कहते हैं कि रावणका वन इन्द्र, वरुण और
ब्रह्माके वनसे भी अधिक सुहावना था । वह मानो वसन्तका
श्रृङ्गार ही था । (तात्पर्य यह कि सब वन और उपवनोंका शृङ्गार
वसन्त ऋतु है परन्तु रावणका बाग वसन्त ऋतुकी भी शोभा
बढ़ानेवाला था । ) पुराने पत्ते (पतझड़के) समय ही गिरते हैं;
क्योंकि वायु यहाँ आते हुए डरता था और उसके बागका
लालन-पालनं रति और कामदेवके विहार-स्थलके समान करता
था । उत्तम बावली, तालाब और बागकी बनावट देखकर
हनुमान्जी-जैसे वैराग्यवान् भी रागके वशीभूत-से हो गये ।
(किन्तु) जब उन्होंने अशोक वृक्षके तले श्रीजानकीजीकी