कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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अरण्यकाण्ड
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मारीचानुधावन
पंचवटीं बर पर्नकुटी तर बैठे हैं रामु सुभायँ सुहाए ।
सोहै प्रिया, प्रिय बंधु लसै, 'तुलसी' सब अंग घने छबि-छाए ॥
देखि मृगा मृगनैनी कहे प्रिय बैन, ते प्रीतमके मन भाए ।
हेमकुरंगके संग सरासनु सायकु लै रघुनायकु धाए ॥
पञ्चवटीमें सुन्दर पर्णकुटीके समीप स्वभावसे ही सुन्दर
श्रीरामचन्द्रजी बैठे हैं । ( साथमें ) प्रिया ( श्रीजानकीजी ) और
प्रिय बन्धु शोभित हैं । गोसाईं जी कहते हैं—उनके सब अङ्ग बड़े
ही शोभायमान हैं । उस समय एक ( सोनेके ) मृगको देखकर
मृगनयनी ( श्रीजानकीजी ) ने [ उसे लानेके लिये ] जो प्रिय
वचन कहे वे प्रियतमके मनको बहुत प्रिय लगे, तब रघुनाथजी
धनुष-बाण ले उस सोनेके मृगके पीछे दौड़ पड़े ।
इति अरण्यकाण्ड
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