कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 45, कुल 228 में से
संदर्भ में पढ़ेंकवितावली ४२
तैसो कपि कौतुकी डेरात ढीले गात कै-कै,
लातके अघात सहै, जीमें कहै, कूर हैं ॥
बाल किलकारी कै-कै, तारी दै-दै गारी देत,
पाछें लागे, बाजत निसान ढोल तूर हैं।
बालधी बढ़न लागी, ठौर-ठौर दीन्ही आगी,
बिंधिकी दवारि कैधौं कोटिसत सूर हैं ॥ ३ ॥
राक्षस लोग गली-गली दौड़कर, कपड़े बटोरकर और उन्हें
तेलमें डुबा-डुबाकर आकर हनुमान्जीकी पूँछमें बाँधते हैं। वैसे ही
खिलाड़ी हनुमान्जी भी डरते हुए-से शरीरको ढीला कर-करके उनकी
लातोंके आघात सहन करते हैं और मन-ही-मन कहते हैं कि ये
सब कायर हैं। बालक किलकारी मारकर ताली बजा-बजाकर गाली
देते हुए पीछे लगे हैं, तथा नगाड़े, ढोल और तुरुही बजाये जा रहे
हैं। पूँछ बढ़ने लगी और [राक्षसोंने उसमें] जहाँ-तहाँ आग लगा
दी, जिससे वह ऐसी जान पड़ती थी मानो वह विन्ध्य पर्वतकी दावाग्नि
हो अथवा सौ करोड़ सूर्य हों।
लाइ-लाइ आगि भागे बालजाल जहाँ तहाँ,
लघु ह्वै निबुकि गिरि मेरुतें बिसाल भो।
कौतुकी कपीसु कूदि कनक-कँगूराँ चढ़्यो,
रावन-भवन चढ़ि ठाढ़ो तेहि काल भो ॥
‘तुलसी’ बिराज्यो ब्योम बालधी पसारि भारी,
देखें हहरात भट, कालु सो कराल भो।