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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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४७ सुन्दरकाण्ड
अभी आना बाकी ही है।' भला रामके क्रोधित होनेपर शिवजीकी
भी कुशल कैसे हो सकती है ? ऐसे बाँके वीरसे वैर बढ़ाना व्यर्थ
ही है।
पानी ! पानी ! पानी ! सब रानी अकुलानी कहें,
जाति हैं परानी, गति जानी गजचालि है।
बसन बिसारैं, मनिभूषन सँभारत न,
आनन सुखाने, कहैं, क्योंहू कोऊ पालिहै ॥
'तुलसी' मंदोवै मीजि हाथ, धुनि माथ कहै,
काहूँ कान कियो न, मैं कह्यो केतो कालि है।
बापुरें बिभीषन पुकारि बार-बार कह्यो,
बानरु बड़ी बलाइ घने घर घालिहै ॥१०॥
सब रानियाँ व्याकुल होकर 'पानी-पानी' चिल्लाती हैं और
दौड़ी चली जा रही हैं। गजकी-सी चालसे ही उनकी गति
पहचाननेमें आती है। वे वस्त्र लेना भूल गयी हैं और मणिजटित
आभूषणोंको भी नहीं सँभाल सकी हैं। उनके मुख सूख रहे हैं और
वे कहती हैं--'क्या किसी प्रकार भी कोई हमारी रक्षा करेगा?'
गोसाईंजी कहते हैं-मन्दोदरी हाथ मल-मलकर और सिर धुन-धुनकर
कहती है कि अहो ! कल मैंने कितना कहा, फिर भी किसीने उसपर
कान नहीं दिया। बेचारे विभीषणने भी बार-बार पुकारकर कहा कि
यह वानर बड़ी भारी बला है और बहुत-से घरोंको चौपट कर देगा।
काननु उजारथो तो उजारथो, न बिगारथो कछु,
बानरु बेचारो बाँधि आन्यो हठि हारसों ।