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कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

४२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
णेन विक्षिपति ॥१८॥ सारूपवत्से शकृत्पिण्डान् गुग्गु-
ललवणे प्रतिनीय पश्चादग्नेर्निखनति ॥१९॥ तिसृणां
प्रातरश्नाति ॥२०॥ विकृते संपन्नम् ॥२१॥ आयमगन्नयं
प्रतिसरोऽयं मे वरणोऽरातीयोरिति मन्त्रोक्तान् वासि-
तान् बध्नाति ॥२२॥ उत्तमस्य चतुरो जातरूपशकलेनानु-
सूत्रं गमयित्वावभुज्य त्रैधं पर्यस्यति ॥२३॥ एतमिध्ममि-
त्युपसमाधाय ॥२४॥ तमिमं देवता इति वासितमुल्लुप्य
ब्रह्मणा तेजसेति बध्नाति ॥२५॥ उत्तमो असीति मंत्रोक्तम्
दिशा में फेक देवे ॥१८॥ सारूपवत्सवाली गौ के गोबर-पिण्डों को,
गुग्गुल लवण में लाकर अग्नि के पश्चिम भाग में गाड़ देवे ॥१९॥ तीन
रात बीत जाने पर प्रातःकाल उसे उखाड़ कर खावे ॥२०॥ और भूमि
में गाड़े हुए पीयूष को निकालने पर वह तय्यार हुआ कि नहीं इसकी
परीक्षा-उसका गन्ध, स्वाद, और रूप की देखभाल चखकर जानना ।
क्योंकि विकार रहित होने ही से यह ठीक हुआ समझना चाहिये ॥२१॥
“आयमग्न०” इत्यादि मंत्र से मणि द्रव्यों को मंत्रों से अभिमंत्रण कर
वासित करके त्रयोदशी आदि नियमों से वासित मणियों को “पुष्टिफ-
लत्वं मह्यं ददतु पुष्टये ।” “अयमागन्न०” से पलाशमणि, आदि वृक्षोंके
“अयं प्रतिसर ।” “अयं मे वरण” से वरण, आडे खादिर, चिबुका ( मुचु-
कुन्दवृक्ष ) ॥ उक्त मणि के सोने की ४ माला लाइ के साथ गांधने के
योग्य करके टेढा करके एक २ माला को तीन २ बार लपेट कर बगल
में सब तरफ लोहे के मोटे पत्तर से एक सौ दक्षिण सुवर्ण सूत्र करे ॥
॥ तात्पर्य यह है कि यह प्रकरण सब कामनाओं की सिद्धि हेतु सर्व-
काममणि शान्ति कहाता है ॥ पलाश मणि को तीन बार वासित करके
डालकर अभिमंत्रण कर त्रयोदशी, चतुर्दशी, अमावास्या इन तीन
तिथियों में दही, मधु में वासना देकर मणि को धारण करे ॥ २२ ॥
॥ २३ ॥, “एतमिध्मम्०” से उपसमाधान करके “तमिमं देवता०”
से मणि को छेदकर “ब्रह्मणा तेजसा०” से अपने उत्तमाङ्ग में बान्धे
॥ २४ ॥ ॥ २५ ॥ “उत्तमो अस्योषधीनां तव वृक्षा०” से जिस द्रव्य का⁻

॥२६॥ अक्षितास्त इति यवमणिम् ॥२७॥ प्रथमा ह
व्युवास सेत्यष्टक्याया वपां सर्वेण सूक्तेन त्रिर्जुहोति
॥२८॥ समवत्तानां स्थालीपाकस्य ॥२९॥ सहहुतानाज्य-
मिश्रान्हुत्वा पश्चादग्नेर्वाग्यतः संविशति ॥३०॥ महा-
भूतानां कीर्तयन् संजीहिते ॥३१॥२॥१९॥
सीरा युञ्जन्तीति युगलाङ्गलं प्रतनोति ॥१॥ दक्षिण-
मुष्टारं प्रथमं युनक्ति ॥२॥ एहि पूर्णकेत्युत्तरम् ॥३॥
कीनाशा इतरान् ॥४॥ अश्विना फालं कल्पयतामुपावतु
मणि हो उसी को इस मंत्र से बान्धे ॥२६॥ “अक्षितास्त०” से यव
मणि को बान्धे ॥ २७॥ माघ मास की अष्टका में पूर्वाह्न समय
यज्ञोपवीती होकर यज्ञशाला निवेशन के लिये पञ्च भूसंस्कार करके
उपवास रहकर भात खाकर स्नानकर अखण्ड नये वस्त्र को पहन ओढ़-
कर-रात्रि में प्रयोग करे अर्थात् वश्य तन्त्रानुसार पाकयज्ञ विधान से
धान आदि को पकाकर आज्यभागान्त होम करके अग्नि के पूर्वभाग
में पश्चिम में गौ को धरे ॥ अग्नि के पश्चिम भाग में पूर्व मुख बैठ कर
अन्वारब्ध हुआ शान्त्युदक करे ॥ “प्रथमा ह व्युवास स०” इत्यादि सम्पूर्ण
सूक्त से घी की आहुति देवे ॥ सूक्त को तीन बार पढ़कर आहुतियां
करे । इसके अनन्तर मांस होम में “प्रथमा ह व्युवास स०” इत्यादि
सम्पूर्ण सूक्त से तीन बार आहुतियां देवे ॥ फिर ‘प्रथमा ह व्युवास०”
सम्पूर्ण सूक्त से स्थालीपाक की आहुति देवे ॥२९॥ सह हवन क्रियों के
साथ आज्य मिला आहुति देकर अग्नि के पश्चिम भाग में वाक् संयम
कर बैठे ॥३०॥ महाभूतों ( पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और आकाश )
के गुणों के वर्णन करता रहे, जिससे नीन्द न आवे ॥३१॥२॥१९॥ यह
उन्नीसवी कंडिका पूरी हुई ॥१९॥
“सीरायुञ्जन्ति०” इत्यादि से कर्त्ता हलके दहिने भाग मे और “उष्टारं प्रजन-
यितारं०” मंत्र पढ़कर दाहिने युग धुरि में । उत्तरां युगं धुरि सेक्तारमेव
“एहि पूर्णक०” से वाम भाग में बैल जोते। “युनक्तसीरावियुगातनोत०”
को पढ़कर जोतने वाले से कहे कि तुम खेत जोतो और अलग २ सीरोरे
कर जोतो' ऐसा कहने पर कर्षक खेत जोते ॥१॥२॥३॥४॥ “अश्विना

४४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।

बृहस्पतिः। यथासदद्बहुधान्यमयदमं बहुपूरुषमिति फाल-
मतिकर्षति ॥५॥ इरावानसि धार्तराष्ट्रे तव मे सत्रे
राध्यतामिति प्रतिमिमीते ॥६॥ अपहताः प्रतिष्ठा इत्य-
पूपैः प्रतिहत्य कृषति ॥७॥ सूक्तस्य पारं गत्वा प्रयच्छति
॥८॥ तिस्रः सीताः प्राचीर्गमयन्ति कल्याणीर्वाचो वदन्तः
॥९॥ सीते वन्दामहे त्वेत्यावर्तयित्वोत्तरस्मिन् सीता-
न्ते पुरोडाशेनेन्द्रं यजते ॥१०॥ अश्विनौ स्थालीपाकेन ॥११॥
सीतायां संपातानानयन्ति ॥१२॥ उदपात्र उत्तरान् ॥१३॥
शष्पहविषामवधाय ॥१४॥ सर्वमनक्ति ॥१५॥ यत्रसंपा-
तानानयति ततो लोष्टं धारयन्तं पत्नी पृच्छत्यकृक्षतेति
॥१६॥ अकृक्षामेति ॥१७॥ किमाहार्षीरिति ॥१८॥ वित्तिं
भूतिं पुष्टिं प्रजां पशूनन्नमन्नाद्यमिति ॥१९॥ उत्तरतो मध्य-


फालम्०” इत्यादि से फाल को अभिमंत्रित करे ॥५॥ “इरावानसि०”
इत्यादि से खेत को नाप कर जोते ॥६॥ “अपहताः प्रतिष्ठा०” इत्यादि से
फाल को अपूपों से वेष्टित कर जोते ॥ अपूप घी में पका हो । “लांगलं
पवीरवत्” इत्यादि मंत्र पढ़कर जोते ॥७॥ और कर्त्ता हल को कर्षकों
को देवे-तब तक स्वयं जोते जब तक पूरा सूक्त पढ़ना समाप्त न हो ॥८॥
“अभिवर्षतु निष्पद्यतां बहुधान्यं, आरोग्यम्” इत्यादि कल्याणी बातों को
बोले जब तक तीन सीरावर पश्चिम की ओर जोते ॥९॥ “सीते वन्दा-
महे त्वं०” इत्यादि मंत्र को जाप करते हुए लोट पोट करता रहे तब तक
पुरोडाश से इन्द्रदेवता की पूजा करे ॥१०॥ “अश्विनौ०” देवता को
स्थालीपाक से पूजा करे ॥११॥ सीरावरों पर आहुतियों का घार देवे
॥१२॥ जलपात्र को उत्तर दिशा में घरे ॥१३॥ शल्य ( हरी दूब ) की
आहुति करके सब हलों को प्रक्षालन करे ॥ जहां सम्पातों को लावे वहां
से ढेला लेते हुए को पत्नी पूछे तुमने जोता ? कारयिता कहे मैं सम्पातों
को जोतता हूं । मट्टी के पिण्ड को लेकर घरे पत्नी (स्वामिनी) पूछे “अकृ-
ष्याम०”१४।१५।१६।१७। फिर पत्नि पति को पूछे “किमाहार्षीः” तो उत्तर
में पत्नी कहे-वित्ति, भूति, पुष्टि, प्रजा, पशु, अन्न, और अन्नाद्य इनको

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ४५
सायां निवपति ॥२०॥ अभ्यज्योत्तरफालं प्रातरायोजनाय
निदधाति ॥२१॥ सीताशिरःसु दर्भानास्तीर्य प्लक्षौदुम्ब-
रस्य त्रींस्त्रींश्चमसान्निदधाति ॥२२॥ रसवतो दक्षिणे
शष्पवतो मध्यमे पुरोडाशवत उत्तरे ॥२३॥ दर्भान् प्रत्य-
वभज्य संवपति ॥२४॥ सारूपवत्से शकृत्पिण्डान् गुग्गुलु-
लवणेप्रतीनीयाश्नाति ॥२५॥अनडुत्सांपदम् ॥२६॥३॥२०॥
पयस्वतीरिति स्फातिकरणम् ॥१॥ शान्तफलशिला-
कृतिलोष्टवल्मीकराशिवापं त्रीणि कूदीप्रान्तानि मध्य-
मपलाशे दर्भेन परिवेष्ट्य राशिपल्येषु करोति ॥२॥ सायं
भुञ्जते ॥३॥ प्रत्यावपन्ति शेषम् ॥४॥ आ भक्तयातनात्
लेती हूं ॥१९॥ बीच के सीरवर में के ढेला को वरे । और उत्तर देश में
अश्विनौ देवता को स्थालीपाक से पूजे ॥२०॥ पूजाकर उस उत्तर सम्पादि
संस्कृत जल से दूसरे दिन प्रातःकाल आयोजना होगी उसके लिये रख छोड़े
॥२१॥ सीता के शिर पर कुशों को आस्तरण करके प्लक्ष, गूलर के तीन २
इध्म को डाले ॥२२॥ रसवाले दक्षिण में शष्पवाले बीच में पुरोडाश
वाले उत्तर में डाले ॥२३॥ कुशों को टेढा करके चमसों पर डाले ॥२४॥
सरूपवत्सा गौ के गोबर के पिण्डों को गुग्गुल लवण में मिलाकर
खावे ॥२५॥ अनडुत्साम्पद् (हमको बहुत बैल हो एसी इच्छावाले)
करे ॥२६॥३॥२०॥ यह बीसवी कण्डिका पूरी हुई ॥२०॥
“पयस्वतीः०” इत्यादि से स्फातिकरण (किसी पदार्थ की वृद्धि) कर्म
को करे ॥१॥ शान्तफल, शिलाकृति, मट्टी का ढेला, दीमक के मट्टी के
ढेर को तीन कूदीप्रान्तों को, पलाश के पत्ते में कुश के साथ लपेट कर
बान्धे और अन्न के ढेर पर या वखार में धरे ॥२॥ अन्न को नाप कर
सायंकाल में भोजन करे ॥३॥ मनुष्य के हिसाब से अधिक कोष्ठागार
में धरे और शेष को आहुति करे ॥४॥ जब २ भात पकावे, तब २ उसे
अभिमंत्रित करे । और जब २ छाटने, कूटने, साफ करने, रंधन करने,
परीक्षण करने, छन देने का काम करे तब २ उसे अभिमंत्रण करे ॥५॥

॥५॥ अनुमन्त्रयते ॥६॥ अयं नो नभसस्पतिरिति पल्येऽ-
श्मानं सम्प्रोक्ष्यान्वृचं काशीनोप्यावापयति ॥७॥ आ गाव
इति गा आयतीः प्रत्युत्तिष्ठति ॥८॥ प्रावृषि प्रथमधार-
स्येन्द्राय त्रिर्जुहोति ॥९॥ प्रजावतीरिति प्रतिष्ठमाना
अनुमन्त्रयते ॥१०॥ कर्कीप्रवादानां द्वादशदाम्यां सम्पा-
तवत्यामयं घास इह वत्सामिति मन्त्रोक्तम् ॥११॥ यस्ते
शोकायेति वस्त्रसाम्पदी ॥१२॥ तिस्रः कूदीमयोरूर्णनाभि-
कुलाय परिहिता अन्वक्ता आदधाति ॥१३॥ अद्यन्तेषीका
मौञ्जपरिहिता मधुना प्रलिप्य चिक्रशेषु पर्यस्य ॥१४॥
उत पुत्र इति ज्येष्ठं पुत्रमवसाययति ॥१५॥ मितशरणः
साम्पदं कुरुते ॥१६॥ अर्धमर्धेनेत्यार्द्रपाणी रसं ज्ञात्वा
प्रयच्छति ॥१७॥ शान्तशाखया प्राग्भागमपाकृत्य ॥१८॥
॥६॥ “अयं नो नभसस्पतिः” से धान्यराशि में पत्थर को संप्रोक्षण करके
प्रत्येक ऋचा से निर्वाप करे और दूसरा पुरुष आवपन करावे ॥७॥ यह
स्फाति कर्म्म समाप्त हुआ ॥ जब गौयें जंगल आदि से चर कर गोशाला
में आवें तो “आ गाव” से प्रत्युपस्थान करे ॥८॥ वर्षाऋतु में “प्रथमधा-
रस्येन्द्राय” की आहुति देवे ॥१०॥ “कर्कीप्रवाद०” मंत्रों में से द्वादश
नाम वाली ऋचा ( सूर्यस्य रश्मीक इत्यादि ) से सम्पातवती करके
“अयं घास इह वत्सां” इत्यादि “इह वत्सां निबध्नीम०” इत्यादि से बच्चों
के पैरों में बान्धे” “अयं घास०” से खाने को घास देवे गौ और बच्छरे
दोनों की यह गोशान्ति समाप्त हुई ॥ “यस्ते शोकाय०” इत्यादि से
वस्त्र की प्राप्ति होती है ॥१२॥ तीन कूदीमयी मकरे के जालमें बनी हुई
को घी से चपोड़कर आहुति देवे और इषीका ( शरपत की ) को मूँजमें
लपेट कर मधु से लीप कर तीन जौ के चिकसा से सब ओर प्रक्षिप्तकर
तीन समिधोंकी आहुतियां देवे ॥१३॥१४॥ “उत पुत्र” मंत्र से ज्येष्ठ पुत्र
से पिता अवशान करावे अर्थात् पुत्रों में घर बटवा देवे ॥१५॥ ज्येष्ठ पुत्र
घर बना कर इसी में अवशान कर्म करे ॥१६॥ ज्येष्ठ पुत्र हाथ पैर
धोकर “अर्धमर्धेन०” से “ददामि” ऐसा समझ कर देवे ॥१७॥ शान्त-

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ४७
प्रत्यग्नि परिचृतति ॥१९॥ तस्या अमावास्यायां तिस्रः
प्रादेशमात्रीरादधाति ॥२०॥ स्वे क्रतुमिति रसप्राशनी
॥२१॥ रसकर्माणि कुरुते ॥२२॥ स्तुष्व वर्ष्मन्निति प्राजा-
पत्यामावास्यायामस्तमिते वल्मीकशिरसि दर्भांवस्तोर्णेऽ-
ध्यधिदीपं धारयंस्त्रिर्जुहोति ॥२३॥ तण्डुलसंपातानानीय
रसैरुपसिच्याश्नाति ॥२४॥ एवं पौर्णमास्यामाज्योतान्
॥२५॥४॥२१॥
ऋधग्द्व्यन्त्रस्तदिदासेति मैश्रधान्यं भृष्टपिष्टं लोहि-
तालंकृतं रसमिश्रमश्नाति ॥१॥ अभृष्टं प्लक्षोदुम्बरस्यो-
त्तरतोऽग्नेस्त्रिषु चमसेषु पूर्वाह्नस्य तेजसाग्रमन्नस्य
प्राशिषमिति पूर्वाह्ने ॥२॥ मध्यन्दिनस्य तेजसा मध्य-
वृक्ष की शाखा से गौ आदि के भागों को लेकर देवे ॥१८॥ विभक्त हुए
पुत्र गण अपने २ घरों में प्रति अग्नि में शान्तवृक्ष की शाखा को बान्धे
॥१९॥ उस शाखा की तीन समिधाओं को ( प्रादेश परिमिता ) अग्नि में
डाले ॥२०॥ “त्वे क्रतु०” इत्यादि से रसास्तनपा प्राशन्तः रसा अनया
प्राश्यन्ते । रस कर्मों को इसी से करे ॥२२॥ “स्तुष्व वर्ष्मन्०” इत्यादि
की देवता प्रजापति है। इस ऋचा से अमावास्या को सूर्य्य के अस्त
होने पर दीमक की मट्टी के ढेर पर कुशों को बिछाकर उस पर खपर
धरकर उसमें अग्नि स्थापन करे और दीप जला देवे, और तीन बार
आहुतियां देवे ॥२३॥ चावल के सम्पातों को लाकर रसों से उसका उप-
सेचन कर खावे ॥२४॥ और पौर्णमासी को आज्य से उपसेचन कर
खावे ॥२५॥४॥२१॥ यह इक्कीसवी कण्डिका समाप्त हुई ॥२१॥
‘ऋधग्द्व्यन्त्रस्तदिदास०” इत्यादि मंत्र से मैश्रधान्य को भूनकर उसके
सत्तू को लोहित ( रक्तचन्दन या लाल 'शोभांज वृक्ष ) से अलंकृत
रस को मिलाकर खावे ॥१॥ बिना भूने हुए मिश्रधान्य के सत्तू को
अग्नि के उत्तर भाग में लक्ष, गूलर के तीन चमसों को पूर्वाह्न समय
“पूर्वाह्नस्य तेजसाग्रमन्नस्य प्राशिषम्” इत्यादि से आहुति देवे ॥२॥

मन्दस्य प्राशिषमिति मध्यन्दिने ॥३॥ अपराह्नस्य
तेजसा सर्वमन्नस्य प्राशिषमित्यपराह्ने ॥४॥ ऋतु-
मत्या स्त्रिया अङ्गुलिभ्यां लोहितम् ॥५॥ यत् क्षेत्रं काम-
यते तस्मिन् कीलालं दधिमधुमिश्रम् ॥६॥ संवत्सरं
स्त्रियमनुपेत्य शुक्त्यां रेत आनीय तण्डुलमित्रं सप्तग्रामम्
॥७॥ द्वादशीममावास्येति क्षीरभक्षो भवत्यमावास्यायां
दधिमधुभक्षस्तस्य मूत्र उदकदधिमधुपल्पूलनान्यासिश्च्य
॥८॥ क्रव्यादं नाडी प्रविवेशाग्निं प्रजाभाङ्गिरतो माययैतौ ।
आवां देवी जुषाणे घृताची इममन्नाद्याय प्रविशतं
स्वाहेति ॥६॥ निशायामाग्रयणतण्डुलानुदक्यान्मधु-
मिश्रान्निदधात्या यवानां पङ्क्तेः ॥१०॥ एवं यवानुभया-
न्समोप्य ॥११॥ त्रिवृति गोमयपरिचये शृतमश्नाति ॥१२॥
“मध्यन्दिनस्य तेजसा मध्यमन्नस्य प्राशिषम्” इत्यादि से मध्यान्ह
में आहुति देवे ॥ ३॥ “अपराह्नस्य तेजसा सर्वमन्नस्य प्राशिषम्”
इत्यादि से अपराह्न समय आहुति देवे ॥४॥ ऋतुमती स्त्री को गर्भकाल
युक्त होने से उसके योनि से रुधिर निकलता है उस रुधिर को तर्जनी
एवं मध्यमा अङ्गुलियों से अपने कुल की पुष्टि के लिये पीवे ॥५॥ जिस
खेत की कामना हो उसमें जाकर जल, दही, मधु मिलाकर खावे ॥६॥
एक वर्ष तक स्त्री के पास न जाकर सीप में अपने वीर्य्य को लेकर उसमें
चावल मिलाकर खावे तो सात ग्राम का लाभ होगा ॥७॥ द्वादशी से लेकर
अमावास्या पूर्व केवल क्षीर खावे, और अमावास्या को दही, मधु, खावे,
और इन तीन दिनों में क्षीर खावे, तो उस पुरुष के जल में जल, दही,
मधु, पल्पूलन को आसेचन करके खावे ॥ ८॥ “क्रव्यादं नाडी०”
इत्यादि मंत्र से स्वाहा करे ॥ रात्रि में अगहनी धान के चावलों में
(चावलों को धो करके) मधु मिलाकर आहुति देवे ॥ शरद् ऋतु में जिस
किसी रात्रि में व्रीहि तण्डुल और श्यामा मधु मिलाकर जब तक व्रीहि
को जव की पंक्तिमें दोनों को न डाले ॥ इस प्रकार दोनों यवों को
डाल कर ॥११॥ तीन बार गोबर एकत्र ढेर पर पका कर खावे ॥ १२ ॥

समृद्धमिति काङ्कायनः ॥१३॥ ममाग्नेवर्च इति सात्रि-
कानग्नीन्दर्भपूतीकभाङ्गाभिः परिस्तीर्य गार्हपत्यशृतं
सर्वेषु सम्पातवन्तं गार्हपत्यदेशेऽश्नाति ॥१४॥ एवं पूर्व-
स्मिन्नपरयोरुपसंहृत्य ॥१५॥ एवं द्रोणकलशे रसानु-
क्तम् ॥१६॥५॥२२॥
यजूंषि यज्ञ इति नवशालायां सर्पिर्मधुमिश्रमश्नाति
॥१॥ दोषो गायेति द्वितीयाम् ॥२॥ युक्ताभ्यां तृतीयाम्
॥३॥ आनुमतीं चतुर्थीम् ॥४॥ शालामङ्गुलिभ्यां सम्प्रोक्ष्य
तो इससे समृद्धि होती है ऐसा काङ्कायन आचार्य्य कहते हैं॥१३॥ “ममा-
ग्ने वर्च०” इत्यादि से सात्रिक ( याज्ञिक ) अग्नियों को दर्भपूतिक भाङ्ग-
द्वारा परिस्तरण करके अर्थात् शत्रुदेश में जा कर गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि
और आहवनीय अग्नियों में कर्म करे । इसके अनन्तर गार्हपत्य अग्नि में
अभ्यातानान्त आहुति करके “ममाग्ने वर्च” इत्यादि से सारूपवत्स गौ के
दूध को गर्म कर पहिले उतार कर तब उत्तर तन्त्र करके पूतीक दर्भ
से स्तरण करे । तब अभ्यातानान्त करके सारूपवत्स दूध को अग्नि पर से
उतार के फिर आह्वनीयाग्नि के पास स्तरण करे । तब उसी सारूपवत्स
दूध को उतार कर इसी सूक्त से एकवार अभिमंत्रण करके खावे । तब
गार्हपत्य प्रभृति उत्तर तंत्र को करे । गार्हपत्य देश में भोजन करे । उत्तर
तंत्र, व्रतग्रहणादि करे । दक्षिणाग्नि, गार्हपत्याग्नि, आहवनीयाग्नियों में
यथाक्रमसे व्रतग्रहणादि करे ॥ गार्हपत्याग्नि का स्तरण कुशों से, दक्षि-
णाग्नि का पूतीक काष्ठों से और भाङ्ग से आहवनीयाग्नि का स्तरण करे ॥
यह समुद्र कर्म समाप्त हुआ ॥१५॥१६॥५॥२२॥
यह बाईसवी कण्डिका पूरी हुई ॥२२॥
अब नूतन घर, गोशाला, अग्निशाला, या गाँव या पुर या अन्यत्र
अभिमत स्थानों में कर्मों को करे ॥ चाहे घर पत्थर, काठ, फुस,
या इंटों के बने हों सर्वत्र नये मकानों में गृह प्रवेश कर्म करे । घी, मधु
मिला करे । अर्थात् “यजूंषि यज्ञ” इत्यादि से आज्य द्वारा अंग होम
और प्रधान होम सर्पिष में मधु मिला कर करे ॥१॥ “दोषो गाय”० से
दूसरी, दोनों मंत्रों को मिला कर तीसरी, और “अनुमति सर्वम्”-इस
७

्मर्णमौदु-
Wait, is there an anusvara before ष्म? No.
So वाष्मर्णमौदु-.

Wait! Let's check L3:
म्बरं मन्थप्रतिरूपमभिजुहोति ॥७॥ असङ्ख्याता अधि-
Let's check:
"म्बरं मन्थप्रतिरूपमभिजुहोति ॥७॥ असङ्ख्याता अधि-"

  • 'म्बरं' : म् + ब + र + ं = म्बरं.
  • 'मन्थप्रतिरूपमभिजुहोति' : म, न्था? No, म, न् + थ = मन्थ. प्रतिरूपमभिजुहोति.
  • '॥७॥'
  • 'असङ्ख्याता' : अ, स, ङ् + ख्य + ा = ङ्ख्या, त, ा = असङ्ख्याता.
  • 'अधि-' : अ, ध, ि, hyphen.

L4:
श्रुत्य सप्तागमशष्कुलीः ॥८॥ त्वष्टा म इति प्रातर्विभु-

  • 'श्रुत्य' : श्र, ु, त, ्य = श्रुत्य. Wait, is it श्रुत्य or श्रित्य?
    Look at the letter:
    It has श, with a subscript: is it ऋ or ु?
    In Kausika Sutra: "असङ्ख्याता अधिश्रित्य" (adhikṣ

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ५१
लोहितं निर्मृज्य रसमिश्रमश्नाति ॥१५॥ सर्वमौदुम्बरम्
॥१६॥ यस्येदमा रज इत्यायोजनानामप्ययः ॥१७॥६॥२३॥
उच्छ्रयस्वेति बीजोपहरणम् ॥१॥ आज्यमिश्रान्य-
वानुर्वरायां कृष्टे फालेनोडुह्यान्वृचं काशीन्निनयति निव-
ति ॥२॥ अभि त्यमिति महावकाशेऽरण्य उन्नते विमिते
प्राग्द्वारप्रत्यग्द्वारेष्वप्सु सम्पातानानयति ॥३॥ कृष्णा-
जिने सोमांशून् विचिनोति ॥४॥ सोममिश्रेण सम्पात-
वन्तमश्नाति ॥५॥ आदीप्ते सम्पन्नम् ॥६॥ तां सवित-
रिति गृष्टिदाम बध्नाति ॥७॥ सं मा सिञ्चन्त्विति सर्वो-
दके मैश्रधान्यम् ॥८॥ दिव्यं सुपर्णमित्यृषभदण्डिनो
इक्षु काश के कण्डी से रुधिर का मार्जन कर उसमें रस मिला कर पान
करावे ॥१४॥१५॥ इन कर्मों को गूलर के काठ से करे ॥१६॥ “यस्येदमा
रज०” इत्यादि से यज्ञ सम्बन्धि सामग्रियों के आयोजन में करे ॥१७॥
६॥२३॥ यह तेईसवी कण्डिका समाप्त हुई ॥
“उच्छ्रयस्व०” इत्यादि से बीज को अभिमन्त्रण करके बीज को बोने
के लिये खेत में ले जावे ॥१॥ और उसमें से तीन मुठ्ठी लेकर खेत में
धर कर उसे मट्टी से ढक देवे । और तब तय्यार खेत में प्रति ऋचा से
बीज बोवे ॥२॥ उच्च स्थान में जाकर अभ्यातानान्त करके “अभित्यं०”
इत्यादि ४ ऋचा वाले सूक्त से जलपात्र धर करके उस जलपात्र में सोम
रस मिला कर सारूपवत्स गौ के दूध में ओदन पकाकर अभिमंत्रण
करके भोजन करे । तब उत्तर तंत्र करे । यह कर्म मण्डप के पूर्व तथा
पश्चिम द्वार पर करे । मण्डप के पश्चिम अग्नि से जलावे ॥३॥४॥५॥६॥
काले मृग के चर्म पर सोमांशू को बखेर देवे और सोम रस मिले को
खावे ॥५॥ यदि वह सोमरस मिला-सम्पात वाला-काल पाकर स्वयं
जल उठे तो जानो कि मनोरथ सफल हुआ ॥६॥ “तां सवित०”
इत्यादि से गो दामन बान्धे ॥७॥ “संमासिञ्चन्तु०” से सर्वोदक में मैश्र
धान्य को स्थालीपाक पका कर खावे ॥८॥ “दिव्यं सुपर्णं” इत्यादि से

५२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
वपयेन्द्रं यजते ॥६॥ अनुबद्धशिरःपादेन गोशालां चर्म-
णावच्छाद्यावदानकृतं ब्राह्मणान् भोजयति ॥१०॥ प्रोष्य
समिध आदायोर्जं बिभ्रदिति गृहसङ्काशे जपति ॥११॥
सव्येन समिधो दक्षिणेन शालावलीकं संस्तभ्य जपति
॥१२॥ अतिव्रज्य समिध आधाय सुमङ्गलि प्रजावति
सुसीमेऽहं वां गृहपतिर्जीव्यासमिति स्थूणे गृह्णात्यु-
पतिष्ठते ॥१३॥ यद्वदामीति मन्त्रोक्तम् ॥१४॥ गृहप-
त्न्यासाद् उपविश्योदपात्रं निनयति ॥१५॥ इहैव स्तेति
प्रवत्स्यन्नवेक्षते ॥१६॥ सूयवसादिति सूयवसे पशून्निष्ठा-
पयति ॥१७॥ दूर्वाग्रैरञ्जलावप आनीय दर्शं दाशर्भि-
गौओं में जो सबसे बली हो उसकी वपा से 'वृषभेन्द्र की'पूजा करे वशा
विधान की रीति से ॥९॥ शिर पैर को बान्धकर गोशाला में धर कर चमड़े
से ढक देवे ॥ और टुकड़े २ करके ब्राह्मणों को भोजन करावे ॥१०॥
भूमि को प्रोक्षण कर समिध लाकर "ऊर्जं बिभ्रत्०"इत्यादि मंत्र का जप
करे । अर्थात् जहाँ २ देशान्तर में जाकर जंगल से समिधाओं को लाकर
जहाँ २ घर में मिले वहाँ २ उक्त मंत्र का जप करे और समिदाधान करे
और मकान के छप्पर को छूकर"ऊर्जं बिभ्रत्०"इत्यादि मन्त्र का जप करे
॥११॥ बाँये हाथ से समिधा को एवं दहिने से मकान के छप्पर को
स्पर्श कर मंत्र का जप करे ॥१२॥ बहुत दूर जाकर समिदाधान कर
"सुमङ्गलि०" इत्यादि से घर के स्थूणा को पकड़ कर उपस्थान करे ॥
"यद्वदामि०" से घरवालों से प्रियवचन बोले ॥१४॥ और घर के
स्वामिनी के रंधन गृह में बैठ कर जलपात्र को लावे ॥१५॥ उपवास
किया हुआ "इहैव स्त०" से घर और मनुष्यों को देखे ॥१६॥ "सूयव-
सात्" से सूयवस पशुओं को स्थिर करे ॥१४॥ यजमान के गृहप्रवेश
कर्म को कहते हैं ॥ यजमान मौन होकर समिदाधान करके घर को
देख कर "ऊर्जं बिभ्रत्"८ छः ऋचावाले सूक्त का जप करे । वाम हाथ से
समिधाओं को लेकर दहिने से शाला के छप्पर को स्पर्श कर"ऊर्जंबिभ्रत्०"
सूक्त का अप करे । तब अग्नि में समिध डाले । और "सुमङ्गलि०"

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ५३


रुपतिष्ठते ॥१८॥ इन्द्रस्य कुक्षिः साहस्त्र इत्यृषभं सम्पात-
वन्तमतिसृजति ॥१९॥ रेतोधायै त्वातिसृजामि वयोधायै
त्वातिसृजामि यूथस्वायै त्वातिसृजामि गणस्वायै त्वाति-
सृजामि सहस्रपोषायै त्वातिसृजाम्यपरिमितपोषायै त्वा-
तिसृजामि॥२०॥ एतं वो युवानमिति पुराणं प्रवृत्त्य नव-
मुत्सृजते सम्प्रोक्षति ॥२१॥ उत्तरेण पुष्टिकाम ऋषभेनैन्द्रं
यजते ॥२२॥ सम्पत्कामः श्वेतेन पौर्णमास्याम् ॥२३॥
सत्यं बृहदित्यग्रहायण्याम् ॥२४॥ पश्चादग्नेर्दर्भेषु ख-
दायां सर्वहुतम् ॥२५॥ द्वितीयं सम्पातवन्तमश्नाति
॥२६॥ तृतीयस्यादितः सप्तभिर्भूमे मातरिति त्रिर्जुहोति
॥२७॥ पश्चादग्नेर्दर्भेषु कशिप्वास्तीर्य विसृग्वरोमित्युप
विशति ॥२८॥ यास्ते शिवा इति संविशति ॥२९॥ यच्छ-


इत्यादि से स्थूणा को पकड़ कर उपस्थान करे । “यददामि०” ऋचा से
वाक् संयम को छोड़ देवे । गृहपत्नी के रंधन घर में बैठकर जलपात्र
को तूष्णीं लावे ।। दूर्वा हाथ में लिये अंजुलि बनाकर “दूर्वापरं ०” इत्यादि
छः ऋचावाले सूक्त का जप करे ॥१८॥ अब वृषोत्सर्ग की विधि को कहते
हैं ।। वृषभ को लाकर विवाह की भाँति अग्नि प्रणयन करके वत्सतरियों
के साथ “इन्द्रस्य कुक्षिः साहस्त्र०” इत्यादि से वृषभ को छोड़े ॥१९॥ “रेतो
धायै त्वा० युवानं” इस अन्त के मंत्रों को पढ़ कर पुराने वृषभ का त्याग
कर नये वृषभ को संप्रोक्षण कर छोड़े ॥२०॥२१॥ पुष्टि की इच्छा वाला
नवीन ऋषभ द्वारा इन्द्र की पूजा करे ॥२२॥ सम्पत् चाहनेवाला श्वेत वृषभ
द्वारा पौर्णमासी को इन्द्र की पूजा करे ॥२३॥ अग्रहायणी पौर्णमासी की
रात में अभ्यातानान्त होम करके चार चरु स्थालीपाक से पकावे । और
“सत्यं बृहत्” इस अनुवाक से अग्नि के पश्चाद् भाग में कुशों पर (भूमि
पर) गढे में एक चरु की एक बार सर्वहुत आहुति देवे ॥२४॥२५॥ दूसरी
चरु सम्पात वाले को खावे और तीसरे को स्थालीपाक से पका कर
“सत्यं बृहत्” इत्यादि सात ऋचा से और “भूमे मातः०” इत्यादि अष्टमी
ऋचा से तीन बार आहुति देवे ॥२६॥२७॥ अग्नि के पश्चिम भाग में वस्त्र

५४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
यान इति पर्यावर्तते ॥३०॥ नवभिः शन्तिवेति दशम्यो-
दायुषेत्युपोत्तिष्ठति ॥३१॥ उद्वयमित्युत्क्रामति ॥३२॥
उदीराणा इति त्रीणि पदानि प्राङ्गोदङ् बाह्येनोपनि-
ष्क्रम्य यावत्त इति वोक्षते ॥३३॥ उन्नताच ॥३४॥ पुर-
स्तादग्नेः सीरं युक्तमुदपात्रेण सम्पातवतावसिञ्चति ॥३५॥
आयोजनानामप्ययः ॥३६॥ यस्यां सदोहविर्धाने इति
जुहोति वरो म आगमिष्यतीति ॥३७॥ यस्यामन्नमुप-
तिष्ठते ॥३८॥ निधिं बिभ्रतीति मणिं हिरण्यकामः ॥३६॥
एवं वित्त्वा ॥४०॥ यस्यां कृष्णमिति वार्षकृतस्याचा-
मति शिरस्यानयते ॥४१॥ यं त्वा पृषती रथ इति द्यौः
को बिछा कर “विमृग्वरी०” इत्यादि से उसपर बैठे ॥२८॥ “यास्ते शिवा०’
इत्यादि से वस्त्र पर भलीभाँति बैठे ॥२९॥ “यच्छयान०” इत्यादि से
अपने स्थान को लौट जावे ॥३०॥ “सत्यं बृहत्” इत्यादि नौ और “शान्ति-
वा०” इत्यादि दशमी इन ग्यारह ऋचाओं से उपस्थान करे ॥३१॥
“उद्वयं” इत्यादि से शयन से उठ कर जावे ॥३२॥ “उदीराणा०” से
तीन पग पूर्व वा उत्तर बाहर निकल कर “यावत्त०” से देखे ॥३३॥ उँचे
स्थान पर चढ़कर वहाँ से देखे ॥३४॥ अग्नि के पूर्व भाग में हल को धर
कर जलपात्र से “सत्यं बृहत्०” इत्यादि सम्पात वाले मंत्र से जल का
सेचन करे ॥३५॥ कृषि कर्म की आयोजना करे ॥३६॥ “यस्यां सदोह-
विर्धाने०” इत्यादि तीन ऋचाओं से आज्य की आहुतियां देवे ।
तब उत्तर तंत्र की क्रिया करे ‘मुझे उत्कृष्ट फल की प्राप्ति हो” इत्यादि सर्व-
फलकाम पुरुष की सब कामनायें सिद्ध होंगी ॥३७॥ “यस्यामन्नं०”
इत्यादि से भूमि का उपस्थान करे ॥३८॥ “निधिं बिभ्रति०” इत्यादि दो
ऋचा से पृथिवी का उपस्थान करे ॥३९॥ ऐसा जानने वाला विधान
मणि, हिरण्य पाकर के भी उक्त दो मंत्रों से उपस्थान करे ॥४०॥ वर्षा-
काल में “यस्यां कृष्णं०” इत्यादि से नूतन जल को अभिमंत्रण करके
आचमन करे । इससे पुष्टि होती है और उस जल को शिरपर लावे ॥४१॥
“यं त्वा पृषती रथ०” इत्यादि । द्यौ पृषती नाम गौ है और आदित्य रोहित

पृषत्यादित्यो रोहितः ॥४२॥ पृषतों गां ददाति ॥४३॥
पृषत्या क्षीरौदनं सर्वहुतम् ॥४४॥ पुष्टिकर्मणामुपधानोप-
स्थानम् ॥ ४५ ॥ सलिलैः सर्वकामः सलिलैः सर्वकामः
॥४६॥७॥२४॥ इत्यथर्ववेदे कौशिकसूत्रे तृतीयोऽध्यायः
समाप्तः ॥३॥
अथ भेषज्यानि ॥१॥ लिङ्ग्युपतापो भैषज्यम् ॥२॥
वचनादन्यत् ॥३॥ पूर्वस्योदपात्रेण सम्पातवताऽङ्क्ते ॥४॥
वलीर्विमार्ष्टि ॥ ५ ॥ विद्या शरस्यादो यदिति मुञ्जशिरो
रज्वा बध्नाति ॥ ६ ॥ आकृतिलोष्टवल्मीकौ परि-
लिख्य पाययति ॥ ७ ॥ सर्पिषा लिम्पति ॥ ८॥ अपिध-
है ॥४२॥ ब्राह्मण को गौ देवे ॥४३॥ गौ के दूध में ओदन पकाकर क्षीरौ
दन से सर्वहुत करे ॥४४॥ पुष्टि कर्मों के आरम्भ एवं उपस्थान के मंत्र
कहे गये जानो ॥४५॥ सलिल गण के मंत्रों से सर्वकामनायें सिद्ध होती
हैं । सलिल गण के मंत्रों से सर्वकाम सिद्ध होते हैं ॥४६॥७॥२४॥ यह
चौबीसवी कण्डिका पूरी हुई ॥२४॥ और अथर्ववेद के कौशिकसूत्र के
तीसरे अध्याय का भाषानुवाद समाप्त हुआ ॥३॥
अब भैषज्य नाम रोगादि की दवा का वर्णन करेंगे ॥ रोग के समूल
नष्ट करने वाले उपायों का नाम भैषज्य है ॥ रोग दो प्रकार का है । एक
खान-पान के अपथ्य से, दूसरा'पूर्वजन्म कृत पाप से इनमें से खान-पान
के अपथ्य से हुए रोगों का प्रतीकार चरक, वाहड, सुश्रुत आदि वैद्यक ग्रन्थों
में उपदिष्ट उपायों से होता है और अशुभ वा पाप कृत कर्मों के कारण हुए
रोगों का उपशमन अथर्ववेद् विहित शान्तिक कर्मों से होता है ॥१॥२॥३॥
“ये त्रिषप्तीयेन ०” इत्यादि सूक्त से जलपात्र के जल से रोगी को प्रोक्षण करे
और मुख और अङ्ग वली का मार्जन करे ॥४॥५॥ “विद्या शरस्यादो यत्”
इत्यादि से ज्वरातिसार का रोगी मुञ्ज पुष्प मणि को मुंज की रस्सी से
बान्ध कर पहने ॥६॥ आकृति लोष्ट, दीमक की मट्टी को चूर्ण कर रोगी
को पिलावे और घी में डालकर उसका लेप करे ॥७॥ अतिसार और
बहुमूल की बीमारी में अतिसार वाले को दिशामार्ग में धसन करे एवं

५६ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
मति ॥ ६ ॥ विद्या शरस्येति प्रमेहणं बध्नाति ॥ १० ॥
आखुकिरिपूतीकमथितजरत्प्रमन्दसावस्कान् पाययति
॥ ११ ॥ उत्तमाभ्यामास्थापयति ॥ १२ ॥ यानमारो-
हयति ॥१३॥ इषुं विसृजति ॥१४॥ वस्तिं विष्यति ॥१५॥
वर्त्तिं बिभैति ॥ १६ ॥ एकविंशतिं यवान् दोहन्यामद्भि-
रानीय द्रुघनीं जघने संस्तभ्य फलतोऽवसिञ्चति ॥ १७ ॥
आलबिसोलं फाण्टं पाययति ॥ १८ ॥ उदावर्तिने च
॥१९॥ अम्बयो यन्ति वायोः पूत इति च शान्ताः ॥२०॥
मूत्र एवं मल के अवरोधमें “विद्या शरस्य०” से हरीतकी या कपूर को
सम्पातन कर अभिमंत्रितकरके बान्धे ॥ मूत्र और पुरीष के रुकाव में हरें
आदि रेचक दवा नाभि के नीचे उपस्थेन्द्रिय के ऊपर छः अङ्गुल पर बान्धे
अर्थात् अपान या शिश्न या ब्रह्ममुख को अतिसारी फुकवावे ॥८॥९॥१०॥
“विषितां तेऽस्ति बिलं०” इत्यादि दो ऋचाओं को मूस्त की फेकी मट्टी के
ऊपर बैठ कर जप करे । तृण पर बैठकर अभिमंत्रण करे । वस्ति बिलमुख
का अभिमंत्रण करे । ( पुराने काठ के चीरने से जो बुरादा गिरता है
उसको तक्ष कहते हैं । ) काठ को तक्ष के शकलों पर, दधि मथित पर
बैठ कर अभिमंत्रण करे । पुराने प्रमन्द पर बैठकर अभिमंत्रण करे । और
काठ के तक्ष के शकलों पर रोगी को बैठा कर अभिमंत्रण करे । मूत्रादि
के रुकावट में “मूत्रं मुच्यताम्” पढ़कर अभिमंत्रण करे ॥११॥१२॥ रोगी
को घोड़े आदि के रथों पर सवार करावे ॥१३॥ रोगी बाण छोड़े ॥१४॥
शरशिश्न को अभिमंत्रण करके शिश्न को चमड़े से बाहर करे ॥१५॥
लोह शलाका को “प्रते भिनद्मि मेहनं०” इत्यादि से अभिमंत्रित कर
शिश्न में उसे पैठावे और मूत्र के प्रवाह को खोल देवे ॥१६॥ “विद्या
शरस्य०” द्वितीय सूक्त से जघन में शिश्न देश में उपर को करके गो-
दोहनी में जल भर कर उसमें २१ जौ डालकर उस जल से धनुष पर
फल धर कर उसको जल सेक करे, सूक्त जपकर जिस प्रकार जल शिश्न
में जावे वैसा करे ॥१७॥ गोधूम पञ्चमूल, कस्तूरिका इनका काथ करके
अभिमंत्रित कर रोगी को पिलावे ॥१८॥ उदावर्त्त के रोगी को प्रमेहण
आदि पूर्वोक्त सबही कर्म्म होंगे ॥१९॥ सर्वरोग भैषज्य को कहेंगे । प्रथम

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ५७
उत्तरस्य ससोमाः॥२१॥ चातनानामपनोदनेन व्याख्या-
तम् ॥२२॥ त्रपुसमुसलखदिरतार्ष्टाघानामादधाति ॥२३॥
अयुग्मान् खादिराञ्छङ्कनक्ष्यौ निविध्येति पश्चादग्नेः समं
भूमि निहन्ति ॥ २४ ॥ एवमायसलोहान् ॥ २५ ॥ तप्त-
शर्कराभिः शयनं राशिपल्यानि परिकिरति ॥ २६ ॥
अमावास्यायां सकृद्गृहीतान्यवाननपहतानप्रतीहार-
पिष्टानाभिचारिकंपरिस्तीर्य तार्ष्टाघेध्म आवपति ॥२७॥
य आगच्छेत्तं ब्रूयाच्छणशुल्बेन जिह्वां निर्मृजानः शा-
लायाः प्रस्कन्देति ॥ २८ ॥ तथा कुर्वन्नाद्ये ह्वाने ॥२९॥
वीरणतूलमिश्रमिङ्गिडं प्रपुटे जुहोति ॥३०॥ इध्माबर्हिः
अभ्यातानान्त करके “अम्बयो यन्ति वायोः पूत०” इस सूक्त से आज्य
की आहुतियां देवे और पलाश उदुम्बरादि काठों की समिधों का
आधान करे ॥२०॥ अब सोम भक्षण में भैषज्य को कहते हैं ॥ सोम-
पवन, सोमरसायन, सोमयान, सोम के अभिषव में और सोमविषय में
जो रोग उत्पन्न होता है ॥२१॥ चातनों के अपनोदन के साथ पूर्व में कहा
गया जानो ॥२२॥ कर्कटीवृक्ष, मुसल, खैर, सर्षप के डांट का इध्म, इनकी
आहुति करने से पिशाच भाग जाता है ॥२३॥ खैर की १२ अंगुल की ७
या नौ शङ्कु को अग्नि के पश्चिम भाग में “अक्ष्यौ निविध्य”
इत्यादि से गाड़े । इसी प्रकार लोहे के कीलों को अग्नि के पश्चिम भाग में
समभूमि में उक्त मंत्र से गाड़े ॥२४ ॥२५॥ तप्त शर्कराओं को और धान्य
के पोआड को पिशाच ग्रस्त रोगी के शयन स्थान के चारो ओर विखेर
देवे ॥२६॥ और अमावश्या को अभ्यातानान्त होम करके शरमय कुश
का स्तरण करके सर्षप के इध्मों का आधान करे और एकही बार में सत्तू
को लेकर आहुति देवे । इस मन्त्र में यवराशि के मध्य से एक मुट्ठी लेकर
उलूखल में कूट २ कर पीस लेवे तब रोगी को नीचे लेटाकर शणसूत्र से
उसके जीभ का मार्जन करे । इस पर अग्निदेव आवेंगे उनसे पूछे कि
ग्रहमुक्त हुआ ? वीरिण के रुई मिली इङ्गुड को पलाश के पत्ते में धरकर
हवन करे ॥३०॥ और इसके पूर्व दिन इध्म और कुश शाला में रक्खे.

५८ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
शालायामासजति ॥३१॥ अपरेद्युर्विकृते पिशाचतो रुजति
॥३२॥ उक्तो होमः ॥३३॥ वैश्रवणायाञ्जलिं कृत्वा जप-
न्नाचमयत्यभ्युक्षति ॥३४॥ निश्युल्मुके सङ्कर्षति ॥३५॥
स्वस्त्ययनं कुरुते ॥३६॥ अयं देवानामित्येकविंशत्या दर्भ-
पिञ्जूलीभिर्वलीकैः सार्धमधिशिरोऽवसिञ्चति ॥३७॥१।२५॥
जरायुज इति मेदो मधु सर्पिस्तैलं पाययति ॥ १ ॥
मौञ्जप्रश्नेन शिरस्यपिहितः सव्येन तितउनि पूल्यानि
॥३१॥ दूसरे दिन धरी हुई विकृत होजाने पर पिशाच गृहीत व्यक्ति को
पीड़ा होगी ॥३२॥ इससे जानना कि पिशाच अबही नहीं गया है। तो
पूर्वोक्त वीरणतूलादि उसे उसी भाँति करे जब तक पिशाच न छोड़े
॥३३॥ कुबेरदेव के लिये हाथ जोड़कर मंत्र जपता हुआ आचमन करके
रोगी को जलसे अभ्युक्षण करे ॥३४॥ रात्रि में उल्मुक को अभिमंत्रण
करे परस्पर दो उल्मुकों को घसे ॥३५॥ और रात्रि में स्वस्त्ययन गण के
मंत्रों “अमूपारे पातं न०” इत्यादि सूक्तका पाठ करे ॥३६॥ और “देवानाम्”
इत्यादि मंत्र से २१ (तीन कुशों को एकत्र लपेट कर बान्धने से पिञ्जुली
होती है।) दर्भ पिञ्जुलियों से वलीकों के द्वारा रोगी के शिर
से पैर तक सर्वाङ्ग को अव सेचन करे। जलोदरक रोगी की दवा—घड़े
में दर्भ पिञ्जुली डालकर २१ घर के छप्पर के ओलती के तृणों को
डालकर उस घड़े को अभिमंत्रित कर के तब रोगी को सिंचन कर मार्जन
करे ॥ ॥३७॥१॥२५॥ यह पचीसवीं कण्डिका समाप्त हुई ॥ २५ ॥
अब वात, पित्त, कफ के दवाओं का उपदेश करेंगे ॥ “जरायुज”
इत्यादि सूक्त ( तक्म नाशन गण ) मेद्, मधु, घी, तैल को अभिमंत्रित
करके वात विकार रोगी को मांस और मेद् को पिलावे। और मधुको
अभिमंत्रित करके कफ के रोगी को पिलावे। घृत को अभिमंत्रित करके
वात पित्त के रोगी को पिलावे। और वात, कफ के रोगी को तेल
पिलावे ॥१॥ अब अतिकास, शिर की पीड़ा इन रोगों की दवा का वर्णन
करते हैं ॥ रोगी के शिर में मूँज की पगड़ी पहिना देवे एवं वाम हाथ
से छलनी, लाजा को धारण करता हुआ दहिने हाथ से वपन को लाजा
सहित “जरायुज०” इस सूक्त से लाजा को व्याधि देश तक (जिस स्थान

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ५९

धारयमाणो दक्षिणेनावकिरन्व्रजति ॥२॥ सव्येन तितउ-
प्रश्नौ दक्षिणेन ज्यां द्रुघ्नीम् ॥३॥ प्रैषकृदग्रतः ॥४॥ यत्रैनं
व्याधिर्गृह्णाति तत्र तितउप्रश्नी निदधाति ॥ ५ ॥ ज्यां च
॥६॥ आव्रजनम् ॥७॥ घृतं नस्तः ॥८॥ पञ्चपर्वणा ललाटं
संस्तभ्य जपत्यमूर्या इति ॥ ९ ॥ पञ्चपर्वणा पांसुसिक्त-
ताभिः परिकिरति ॥१०॥ अर्मकपालिकां बध्नाति ॥११॥
पाययति ॥१२॥ चतुर्भिर्दूर्वाग्रैर्दधिपललं पाययति ॥१३॥
अनुसूर्यमिति मन्त्रोक्तस्य लोममिश्रमाचमयति ॥ १४ ॥
पृष्ठे चानीय ॥ १५ ॥ शङ्कुधानं चर्मण्यासीनाय दुग्धे
में रोग पैदा हुआ हो) छींटे ॥ इसी प्रकार बायें हाथ से छलनी और
मुंजकी पगड़ी को धारण करता हुआ (कर्ता) दहिने हाथ धनुष को ॥३॥
प्रैषकृत हो आगे २ चले ॥४॥ चलता हुआ जहाँ रोग अच्छा हो जावे वहाँ
पर छलनी, मुंज की पगड़ी और धनुष को धर देवे । जहाँ जाना बन्द
हो जावे अर्थात् रोगी को आगे कर के जिस स्थान में रोग उत्पन्न
हुआ हो वहाँ जाकर "जरायुज०" सूक्त पढ़कर मुंज की पगड़ी वपन कर
देवे ॥ एवं धनुष को तूष्णीं छोड़ देवे । वात ज्वर, कटिभङ्ग, शिरो रोग,
वात गुल्म, वात विकार, सब ही वात की बीमारी में यह दवा काम
करेगी । शिर की बीमारी में घी को अभिमंत्रित कर रोगी के नाक
में नस्य देवे ॥८॥ "जरा युज०" इत्यादि सूक्त से पाँच गिरह वाले डंडे
को अभिमंत्रित करके रोगी के ललाट में लगा कर खड़ा कर "अमूर्या"
इत्यादि का जप करे । शिरो रोग, कटिभङ्ग या वात गुल्म में रोगों की
दवा समाप्त हुई ॥९॥ शरीरमें किसी स्थान से या शरीर के बाहर रुधिर
स्राव हो उसकी दवा-पाँच गाठ वाले बांस के दण्डे को रुधिर वहन स्थान
में लगाकर "अमूर्या" सूक्त का जप करे और गली की धूलि को लेकर
उसे अभिमंत्रित कर रुधिर व्रण में डाले और केदार की सूखी मट्टी को
उक्त मंत्र से अभिमंत्रित कर रुधिर स्थान में बांधे ॥ ११ ॥ और इसी
को पिलावे ॥ १२ ॥ एवं चार दूर्वा के अग्रभाग से दधि पललको
पूर्वोक्त मंत्र से अभिमंत्रित कर रोगी को पिलावे ॥ १३ ॥ लाल वर्ण की
गौ के रोम जल में मिला कर उससे आचमन करे ॥१४॥ (हृद् रोग की

६० | अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।

सम्पातवन्तं बध्नाति ॥१६॥ पाययति ॥१७॥ हरिद्रौदन-
भुक्तमुच्छिष्टानुच्छिष्टेनाप्रपदात्प्रलिप्य मन्त्रोक्तानध-
'स्तल्पे हरितसूत्रेण सव्यजङ्घासु बद्धावस्नापयति
॥ १८ ॥ प्रपादयति ॥ १९ ॥ वदत उपस्थापयति ॥ २० ॥
क्रोड्लोमानि जतुना संदिह्य जातेरूपेणापिधाप्य ॥२१॥
नक्तं जाता सुपर्णो जात इति मन्त्रोक्तं शकृदा लोहितं
प्रघृष्यालिम्पति ॥२२॥ पलितान्याच्छिद्य ॥२३॥ मारुता-

दवा है) गौ के पीठ पर जल धर कर उससे आचमन करे ॥१५॥ चमड़े
को विस्तार करने के लिये शंकु स्थापन करे ( चमड़े में शङ्कु गाड़ देवे )
उस पर बैठे रोगी को दूध को चलाता हुआ शङ्कु को रोगी के शरीर में
बाँध देवे और दूध उस रोगी को पिला देवे ॥ १६ ॥ १७ ॥ हल्दी में
मिला पकाये हुए भात को रोगी को खाने को देकर उसका बचा हुआ
उच्छिष्ट और अनुच्छिष्ट को इकट्ठा करके उसका उबटन बना कर रोगी
के शिर से लेकर पैर तक उबटन लगा कर उस को खाट पर लेटा देवे ।
शुका, काष्ठमुसुक, और गोपीतिलका इन पक्षियों को वाम जंघा में
हरे रंग के सूत से बाँध कर खाट के नीचे बान्ध देवे ॥ यह मिर्गी की
दवा है। और जल से अभिमन्त्रित करके रोगी को स्नान करावे ॥१८॥
मन्थ को अभिमंत्रण करके उसे खाने को देवे ॥ सर्वत्र घर के द्वार पर
आगे रोगी को करके और उसे आगे प्रवेश करा कर और स्वयं प्रवेश
कर के तब भात को अभिमंत्रण कर रोगी के लिये खाने को दिया करे ।
जहाँ २ "प्रयच्छति" शब्द से कहा गया है वहाँ २ इसी प्रकार करे ।
"अनु सूर्य०" सूक्त से सूखे चन्दन को अभिमंत्रण करके गोपीतिलका
को जिस किसी में कहती हुई को देखे वहाँ उस रोगी को अभिमंत्रण
करे ॥ २० ॥ वृषभ के लोमों से सोने को लपेट कर धरे और उसे अभि-
मंत्रण कर के रोगी के वास्ते बान्ध देवे ॥ अपस्मार, विस्मय, हृद् रोग,
कामला, रोहिणक रोगों का भेषज्य समाप्त हुआ ॥ २१ ॥ अब श्वेत कुष्ठ
रोग के भेषज्य को कहते हैं। श्वेत कुष्ठ को गोबर से घस कर जब तक
उस में से रुधिर बाहर न हो उसको घसे, रुधिर निकलने पर भृङ्गराज
( भङ्गरिया ), हल्दी, इन्द्र वारुणी, नीलिका और पुष्पा इन पाँचो को

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ६१
न्यपिहितः ॥२४॥ यदग्निरिति परशुं जपंस्तापयति
क्वाथयत्यवसिञ्चति ॥२५॥ उप प्रागादित्युद्वीजमानस्य
शुक्लप्रसूनस्य वीरणस्य चतसृणामिषीकाणामुभयतः
प्रत्युष्टं बध्नाति ॥२६॥ त्रिविदग्धं काण्डमणिम् ॥२७॥
उल्मुके स्वस्त्यायम् ॥२८॥ मातृनाम्नोः सर्वसुरभिचू-
र्णान्यन्वक्तानि हुत्वा शेषेण प्रलिम्पति ॥२९॥ चतुष्पथे
च शिरसि दर्भेण्डेऽङ्गारकपालेऽन्वक्तानि ॥३०॥ तितउनि
प्रतीपं गाहमानो वपतीत्तरोऽवसिञ्चति पश्चात् ॥३१॥
पीस कर कुष्ठ को लेप करे ॥ २२ ॥ पलित को काट २ कर उसे घस कर
तब उस पर लेप करे ॥ २३ ॥ और “समुत्पतन्तु प्रनभस्व०” इत्यादि
का जप करे ॥ २४ ॥ अब ज्वर के भैषज्य को कहते हैं । नित्य ज्वर,
वेला ज्वर, सतत ज्वर, एकांतरित ज्वर, चातुर्थिक ज्वर, और ऋतुज्वर
में “यदग्निः” इस तक्मनाशन सूक्त से परशु को गर्म कर क्वाथ बनावे
और उस गर्म जल से रोगी को अवसिंचन करे ॥२५॥ जो घबड़ाता हुआ
निष्कारण डरता हो, और श्वेत कुष्ठ का रोगी-शरपत के चार इषीकाके
अग्र भाग को मणि के आकार बना कर उनको तीन स्थानों में जलाकर
उस मणि को रोगी को बान्ध देवे और उस काण्ड मणि को रात्रि में
“उप प्रागात्” सूक्तसे दो उल्मुकों को अभिमंत्रण करके घर्षण करे
फिर प्रातःकाल “स्वस्तिदा” सूक्त से दक्षिण पग को आगे कर चले ।
यह स्वस्त्ययन कर्म्म है ॥ बालक, युवा, स्त्री, पुरुषों को अकस्मत् उद्वेग
हो जाने पर या प्रलाप करे तो यह कर्म करे ॥२६॥२७॥२८ ॥ गन्धर्व,
राक्षस, अप्सरा, भूत और ग्रहादि के उपद्रवों का भैषज्य कहते हैं ॥
“मातृगण” सूक्त से सर्वौषधि के चूर्ण अन्वक्त कर आहुति करके शेष
से रोगी को लेप करे ॥ २९ ॥ और चौराहे पर रोगी के शिर पर दर्भ-
इन्दुक को धर कर उस पर खप्पर में अग्नि भर कर अग्नि को जला कर
तब प्रज्वलित अग्नि में घी चपोड़ी हुई सर्वौषधि की आहुति
करे ॥३०॥ रोगी की वल्लणिका को सर्वौषधि सहित हाथ में धर कर
नदी सम्मुख हो छलनी में सर्वौषधि चूर्ण को विलोडन करता
हुआ वपन करे और उसके पीछे दूसरा कोई रोगी को सूक्त जपता हुआ