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सर्वकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

पृष्ठ 86, कुल 361 में से

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पृष्ठ 86

५४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
यान इति पर्यावर्तते ॥३०॥ नवभिः शन्तिवेति दशम्यो-
दायुषेत्युपोत्तिष्ठति ॥३१॥ उद्वयमित्युत्क्रामति ॥३२॥
उदीराणा इति त्रीणि पदानि प्राङ्गोदङ् बाह्येनोपनि-
ष्क्रम्य यावत्त इति वोक्षते ॥३३॥ उन्नताच ॥३४॥ पुर-
स्तादग्नेः सीरं युक्तमुदपात्रेण सम्पातवतावसिञ्चति ॥३५॥
आयोजनानामप्ययः ॥३६॥ यस्यां सदोहविर्धाने इति
जुहोति वरो म आगमिष्यतीति ॥३७॥ यस्यामन्नमुप-
तिष्ठते ॥३८॥ निधिं बिभ्रतीति मणिं हिरण्यकामः ॥३६॥
एवं वित्त्वा ॥४०॥ यस्यां कृष्णमिति वार्षकृतस्याचा-
मति शिरस्यानयते ॥४१॥ यं त्वा पृषती रथ इति द्यौः
को बिछा कर “विमृग्वरी०” इत्यादि से उसपर बैठे ॥२८॥ “यास्ते शिवा०’
इत्यादि से वस्त्र पर भलीभाँति बैठे ॥२९॥ “यच्छयान०” इत्यादि से
अपने स्थान को लौट जावे ॥३०॥ “सत्यं बृहत्” इत्यादि नौ और “शान्ति-
वा०” इत्यादि दशमी इन ग्यारह ऋचाओं से उपस्थान करे ॥३१॥
“उद्वयं” इत्यादि से शयन से उठ कर जावे ॥३२॥ “उदीराणा०” से
तीन पग पूर्व वा उत्तर बाहर निकल कर “यावत्त०” से देखे ॥३३॥ उँचे
स्थान पर चढ़कर वहाँ से देखे ॥३४॥ अग्नि के पूर्व भाग में हल को धर
कर जलपात्र से “सत्यं बृहत्०” इत्यादि सम्पात वाले मंत्र से जल का
सेचन करे ॥३५॥ कृषि कर्म की आयोजना करे ॥३६॥ “यस्यां सदोह-
विर्धाने०” इत्यादि तीन ऋचाओं से आज्य की आहुतियां देवे ।
तब उत्तर तंत्र की क्रिया करे ‘मुझे उत्कृष्ट फल की प्राप्ति हो” इत्यादि सर्व-
फलकाम पुरुष की सब कामनायें सिद्ध होंगी ॥३७॥ “यस्यामन्नं०”
इत्यादि से भूमि का उपस्थान करे ॥३८॥ “निधिं बिभ्रति०” इत्यादि दो
ऋचा से पृथिवी का उपस्थान करे ॥३९॥ ऐसा जानने वाला विधान
मणि, हिरण्य पाकर के भी उक्त दो मंत्रों से उपस्थान करे ॥४०॥ वर्षा-
काल में “यस्यां कृष्णं०” इत्यादि से नूतन जल को अभिमंत्रण करके
आचमन करे । इससे पुष्टि होती है और उस जल को शिरपर लावे ॥४१॥
“यं त्वा पृषती रथ०” इत्यादि । द्यौ पृषती नाम गौ है और आदित्य रोहित