कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपृषत्यादित्यो रोहितः ॥४२॥ पृषतों गां ददाति ॥४३॥
पृषत्या क्षीरौदनं सर्वहुतम् ॥४४॥ पुष्टिकर्मणामुपधानोप-
स्थानम् ॥ ४५ ॥ सलिलैः सर्वकामः सलिलैः सर्वकामः
॥४६॥७॥२४॥ इत्यथर्ववेदे कौशिकसूत्रे तृतीयोऽध्यायः
समाप्तः ॥३॥
अथ भेषज्यानि ॥१॥ लिङ्ग्युपतापो भैषज्यम् ॥२॥
वचनादन्यत् ॥३॥ पूर्वस्योदपात्रेण सम्पातवताऽङ्क्ते ॥४॥
वलीर्विमार्ष्टि ॥ ५ ॥ विद्या शरस्यादो यदिति मुञ्जशिरो
रज्वा बध्नाति ॥ ६ ॥ आकृतिलोष्टवल्मीकौ परि-
लिख्य पाययति ॥ ७ ॥ सर्पिषा लिम्पति ॥ ८॥ अपिध-
है ॥४२॥ ब्राह्मण को गौ देवे ॥४३॥ गौ के दूध में ओदन पकाकर क्षीरौ
दन से सर्वहुत करे ॥४४॥ पुष्टि कर्मों के आरम्भ एवं उपस्थान के मंत्र
कहे गये जानो ॥४५॥ सलिल गण के मंत्रों से सर्वकामनायें सिद्ध होती
हैं । सलिल गण के मंत्रों से सर्वकाम सिद्ध होते हैं ॥४६॥७॥२४॥ यह
चौबीसवी कण्डिका पूरी हुई ॥२४॥ और अथर्ववेद के कौशिकसूत्र के
तीसरे अध्याय का भाषानुवाद समाप्त हुआ ॥३॥
अब भैषज्य नाम रोगादि की दवा का वर्णन करेंगे ॥ रोग के समूल
नष्ट करने वाले उपायों का नाम भैषज्य है ॥ रोग दो प्रकार का है । एक
खान-पान के अपथ्य से, दूसरा'पूर्वजन्म कृत पाप से इनमें से खान-पान
के अपथ्य से हुए रोगों का प्रतीकार चरक, वाहड, सुश्रुत आदि वैद्यक ग्रन्थों
में उपदिष्ट उपायों से होता है और अशुभ वा पाप कृत कर्मों के कारण हुए
रोगों का उपशमन अथर्ववेद् विहित शान्तिक कर्मों से होता है ॥१॥२॥३॥
“ये त्रिषप्तीयेन ०” इत्यादि सूक्त से जलपात्र के जल से रोगी को प्रोक्षण करे
और मुख और अङ्ग वली का मार्जन करे ॥४॥५॥ “विद्या शरस्यादो यत्”
इत्यादि से ज्वरातिसार का रोगी मुञ्ज पुष्प मणि को मुंज की रस्सी से
बान्ध कर पहने ॥६॥ आकृति लोष्ट, दीमक की मट्टी को चूर्ण कर रोगी
को पिलावे और घी में डालकर उसका लेप करे ॥७॥ अतिसार और
बहुमूल की बीमारी में अतिसार वाले को दिशामार्ग में धसन करे एवं