कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
पृष्ठ 91, कुल 361 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ५९
धारयमाणो दक्षिणेनावकिरन्व्रजति ॥२॥ सव्येन तितउ-
प्रश्नौ दक्षिणेन ज्यां द्रुघ्नीम् ॥३॥ प्रैषकृदग्रतः ॥४॥ यत्रैनं
व्याधिर्गृह्णाति तत्र तितउप्रश्नी निदधाति ॥ ५ ॥ ज्यां च
॥६॥ आव्रजनम् ॥७॥ घृतं नस्तः ॥८॥ पञ्चपर्वणा ललाटं
संस्तभ्य जपत्यमूर्या इति ॥ ९ ॥ पञ्चपर्वणा पांसुसिक्त-
ताभिः परिकिरति ॥१०॥ अर्मकपालिकां बध्नाति ॥११॥
पाययति ॥१२॥ चतुर्भिर्दूर्वाग्रैर्दधिपललं पाययति ॥१३॥
अनुसूर्यमिति मन्त्रोक्तस्य लोममिश्रमाचमयति ॥ १४ ॥
पृष्ठे चानीय ॥ १५ ॥ शङ्कुधानं चर्मण्यासीनाय दुग्धे
में रोग पैदा हुआ हो) छींटे ॥ इसी प्रकार बायें हाथ से छलनी और
मुंजकी पगड़ी को धारण करता हुआ (कर्ता) दहिने हाथ धनुष को ॥३॥
प्रैषकृत हो आगे २ चले ॥४॥ चलता हुआ जहाँ रोग अच्छा हो जावे वहाँ
पर छलनी, मुंज की पगड़ी और धनुष को धर देवे । जहाँ जाना बन्द
हो जावे अर्थात् रोगी को आगे कर के जिस स्थान में रोग उत्पन्न
हुआ हो वहाँ जाकर "जरायुज०" सूक्त पढ़कर मुंज की पगड़ी वपन कर
देवे ॥ एवं धनुष को तूष्णीं छोड़ देवे । वात ज्वर, कटिभङ्ग, शिरो रोग,
वात गुल्म, वात विकार, सब ही वात की बीमारी में यह दवा काम
करेगी । शिर की बीमारी में घी को अभिमंत्रित कर रोगी के नाक
में नस्य देवे ॥८॥ "जरा युज०" इत्यादि सूक्त से पाँच गिरह वाले डंडे
को अभिमंत्रित करके रोगी के ललाट में लगा कर खड़ा कर "अमूर्या"
इत्यादि का जप करे । शिरो रोग, कटिभङ्ग या वात गुल्म में रोगों की
दवा समाप्त हुई ॥९॥ शरीरमें किसी स्थान से या शरीर के बाहर रुधिर
स्राव हो उसकी दवा-पाँच गाठ वाले बांस के दण्डे को रुधिर वहन स्थान
में लगाकर "अमूर्या" सूक्त का जप करे और गली की धूलि को लेकर
उसे अभिमंत्रित कर रुधिर व्रण में डाले और केदार की सूखी मट्टी को
उक्त मंत्र से अभिमंत्रित कर रुधिर स्थान में बांधे ॥ ११ ॥ और इसी
को पिलावे ॥ १२ ॥ एवं चार दूर्वा के अग्रभाग से दधि पललको
पूर्वोक्त मंत्र से अभिमंत्रित कर रोगी को पिलावे ॥ १३ ॥ लाल वर्ण की
गौ के रोम जल में मिला कर उससे आचमन करे ॥१४॥ (हृद् रोग की