कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
६ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
जुष्टं प्रोक्षामीति ॥२४॥ नानभ्युक्षितं संस्तीर्णमुपयोगं
लभेत ॥२५॥ नैधोऽभ्याधानम् ॥२६॥ नानुत्पूतं हविः॥२७॥
नाप्रोक्षितं यज्ञाङ्गम् ॥२८॥ तस्मिन्प्रक्षालितोपवातानि
निदधाति ॥२९॥ स्रुवमाज्यधानीं च ॥३०॥ विलीनपूत-
माज्यं गृहीत्वाधिश्रित्य पर्यग्नि कृत्वोदगुद्वास्य पश्चाद-
ग्नेरुपसाद्योदगग्राभ्यां पवित्राभ्यामुत्पुनाति॥३१॥विष्णो-
र्मनसा पूतमसि ॥३२॥ देवस्त्वा सवितोत्पुनातु ॥३३॥
अच्छिद्रेण त्वा पवित्रेण शतधारेण सहस्रधारेण सुप्वो-
त्पुनामीति तृतीयम् ॥३४॥ तूष्णीं चतुर्थम् ॥३५॥ शृतं
हविरभिघारयति मध्वा समञ्जन्घृतवत्कराथेति ॥३६॥
अभिघार्योदञ्चमुद्वासयत्युद्वासयाग्नेः शृतमकर्म हव्यमा-
सीद् पृष्ठममृतस्य धामेति ॥३७॥ पश्चादाज्यस्य निधाया-
लङ्कृत्य समानेनोत्पुनाति ॥३८॥ अदारसृदित्यवेक्षते ॥३९॥
॥२३॥ बिछाये हुओं का “हविषां त्वा०” मंत्र से प्रोक्षण करे ॥२४॥
बिछाये हुए कुश विना अभ्युक्षण के काम के योग्य नहीं होते ॥२५॥
बिना अभ्युक्षण के समिद् का आधान भी नहीं हो सकता है॥२६॥ विना
उत्पवन के हवि—नहीं हो सकती है। और न विना प्रोक्षण के यज्ञ का
अङ्ग ही हो सकता है ॥२७।२८॥ उस प्रक्षालित एवं उत्पवन किये उप-
करणों को यज्ञ के लिये आसादन करे। स्रुव और आज्यधानी को भी
॥२९।३०॥ पिघले हुए शुद्ध घृत को अग्नि पर चढ़ाकर गर्म कर और
पर्यग्नि करके तथा शुद्ध जल से उद्वासन करके अग्नि के पश्चिम भाग में
धर कर उत्तराग्र पवित्रे से केश, कीट, आदि से रहित कर देवे-जिसका
मंत्र “विष्णोर्मनसा पूतमसि०” इत्यादि मंत्र पढ़ कर उत्पवन्न तीसरी
बार करे। और चौथी बार विना मंत्र के करे ॥३१।३२।३३।३४।३५॥
गर्म किये हुए आज्य को “मध्वा०” इत्यादि मंत्र से अभिघार दे कर
“उद्वासयत्यु०” इत्यादि मंत्र से उत्तर की ओर उद्वासन करे ॥३६।३७॥
आज्य के पीछे धर कर अलङ्कृत्य कर के “समानेन०” से उत्पवन करे
॥३८॥ “अदार सृद्०” मंत्र से उठ कर देखे ॥३९॥
उत्तिष्ठतेत्यैन्द्रम् ॥४०॥ अग्निर्भूम्यामिति तिसृभिरुपस-
मादधात्यस्मै क्षत्राण्येतमिध्ममिति वा ॥४१॥२॥
युनज्मि त्वा ब्रह्मणा दैव्येन हव्यायास्मै वोढवे जात-
वेदः । इन्धानास्त्वा सुप्रजसः सुवीरा ज्योग्जीवेम बलि-
हृतो वयं त इति ॥१॥ दक्षिणतो जाङ्ग्यायनमुदपात्रमुप-
साद्याभिमन्त्रयते तथोदपात्रं धारय यथाग्रे ब्रह्मणस्पतिः ॥
सत्यधर्मा अदीधरद्देवस्य सवितुः सव इति ॥२॥ अथो-
दकमासिञ्चति, इहेत देवीरमृतं वसाना हिरण्यवर्णा अन-
वद्यरूपाः । आपः समुद्रो वरुणश्च राजा संपातभागान्
हविषो जुषन्ताम् ॥ इन्द्र प्रशिष्टा वरुणप्रसूता अपः
समुद्राद्दिवमुद्वहन्तु । इन्द्रप्रशिष्टा वरुणप्रसूता दिव-
स्पृथिव्याः श्रियमा वहन्त्विति ॥३॥ ऋतं त्वा सत्येन प-
रिषिञ्चामि जातवेद इति सह हविर्भिः पर्युक्ष्य जीवाभि-
राचम्योपोत्थाय वेदप्रपद्भिः प्रपद्यत ओं प्रपद्ये भूः प्रपद्ये
भुवः प्रपद्ये स्वः प्रपद्ये जनत्प्रपद्य इति ॥४॥ प्रपद्य पश्चा-
हस्तीर्णस्य दर्भानास्तीर्याहे दैधिषव्योदतस्तिष्ठान्यस्य सदने
भाषार्थ—“उत्तिष्ठत०” से ऐन्द्रहवि को देखे ॥४०॥ “अग्निर्भूम्यां०”
इत्यादि तीन ऋचाओं से आधान करे । या “अस्मै क्षत्राण्येत०” से
इध्म को देखे ॥४१॥४२॥ यह दूसरी कण्डिका समाप्त हुई ॥ २ ॥
“युनज्मिन्त्वे०” इन पाँच ऋचाओं से इध्म का आधान करे । और
काँसे का पात्र लाकर “तथोदपात्रं धारय०” इत्यादि मंत्र से अभिमंत्रण
करे ॥१॥२॥ अन्य जल से “इहेत देवी०” इत्यादि मंत्रों को पढ़ कर
आसिंचन करे ॥३॥ “ऋतं त्वा सत्येन०” इत्यादि से हवि के साथ पर्युक्षण
कर के “जीवास्थ०” इत्यादि चार मंत्रों से एक बार जल भक्षण करे,
कर्त्ता और ब्रह्मा जल से आचमन करे॥ उपोत्थाय वचन से मंत्र की प्रतीति
कराई गई है । और “वेदप्रपद्भिः” से प्रपद् करे ॥ “ओं प्रपद्ये भूः०”
इत्यादि से प्रपद् करावे ॥४॥ प्रपद् कराके पश्चिम भाग में बिछाये हुए
८ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
सीद योऽस्मत्पाकतर इति ब्रह्मासनमन्वीक्षते ॥५॥
निरस्तः पराग्वसुः सह पाप्मना निरस्तः सोऽस्तु योऽस्मा-
न्द्वेष्टि यश्च वयं द्विष्म इति दक्षिणा तृणं निरस्यति
॥६॥ तदन्वालभ्य जपतीदमहमर्वाग्वसोः सदने सीदा-
म्यृतस्य सदने सीदामि सत्त्यस्य सदने सीदामीष्टस्य
सदने सीदामि पूर्त्तस्य सदने सीदामि मामृषदैव बर्हिः
स्वासस्थं त्वाध्यासदेयमूर्णम्रदमनभिशोकम् ॥७॥ विमृ-
ग्वरीमित्युपविश्यासनीयं ब्रह्मजपं जपति बृहस्पति-
र्ब्रह्मा ब्रह्मसदन आसिष्यते बृहस्पते यज्ञं गोपाय यदुदुद्गत
उन्निवतः शकेयमिति ॥८॥ दर्भैः स्रुवं निर्मृज्य निष्ष्टं
रक्षो निष्ष्टा अरातयः प्रत्युष्टं रक्षः प्रत्युष्टा अरातय
इति प्रतप्य
शं त्वा गृह्णे सहस्रपोषायेति तृतीयम् ॥१३॥ ओं
जनच्छं त्वा गृह्णेऽपरिमितपोषायेति चतुर्थम् ॥१४॥
राजकर्माभिचारिकेष्वमुष्य त्वा प्राणाय गृह्णेऽपानाय
व्यानाय समानायोदानायेति पञ्चमम् ॥१५॥ अग्नावग्नि-
र्हृदा पूतं पुरस्ताद्युक्तो यज्ञस्य चक्षुरिति जुहोति ॥१६॥
पश्चादग्नेर्मध्यदेशे समानत्र पुरस्ताद्धोमान् ॥१७॥ दक्षि-
णेनाग्निमुदपात्र आज्याहुतीनां सम्पातानानयति ॥१८॥
पुरस्ताद्धोम आज्यभागः संस्थितहोमः समृद्धिः शान्ता-
नामिति ॥१९॥ एतावाज्यभागौ ॥२०॥ ॥३॥
वृष्णे बृहते स्वविदे अग्नये शुल्कं हरामि त्विषीमते ।
स न स्थिरान्बलवतः कृणोतु ज्योक् नो जीवात्वे
दधात्वग्नये स्वाहेत्युत्तरपूर्वार्द्धे आग्नेयमाज्यभागं
जुहोति॥१॥दक्षिणपूर्वार्द्धे सोमाय त्वं सोम दिव्यो नृचक्षाः
सुगा अस्मभ्यं पथो अनुख्याः । अभि नो गोत्रं विदुष इव
नेषोऽछा नो वाचमुशतीं जिगासि सोमाय स्वाहेति ॥२॥
को, “ओं जनच्छं०” इत्यादि से चौथे को पकड़े ॥११॥१२॥१३॥१४॥
राजकर्म और आभिचारिक कर्मों में “अमुष्य त्वा०” इत्यादि से पञ्चम
को पकड़े ॥१५॥ “अग्नावग्निर्हृदा०” इत्यादि से अविधिकर्म होने से एक
एक स्रुव करके आज्यधानी से आज्य की आहुतियाँ देवे ॥१६॥ अग्नि के
पश्चात् मध्य देश में समान ही पुरस्ताद्धोम, अग्नि के दक्षिण भाग में
जलपात्र आज्याहुतियों के संपातों को लावे अर्थात् हुतशेषों को लावे ॥
पुरस्ताद्धोम, आज्य भाग, संस्थित होम, समृद्धि होम, और शान्त होमों
के बचे होमों को उदपात्र में रक्खे और इन आज्यभाग की दो आहुतियों
को भी ॥१७॥१८॥१९॥२०॥ यह तीसरी कण्डिका समाप्त हुई ॥ ३ ॥
“वृष्णे बृहते०” इत्यादि मंत्र से अग्नि के उत्तर पूर्वार्द्ध में आग्नेय
आज्य भाग की आहुति देवे ॥१॥ और दक्षिण पूर्वार्द्ध में “त्वं सोम
दिव्यो०” इत्यादि से आहुति करे ॥२॥ पुरस्ताद्धोम और आज्यभाग के
२
१० अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
मध्ये हविः ॥३॥ उपस्तीर्याज्यं संहताभ्यामङ्गुलिभ्यां
द्विर्हविषोऽवद्यति मध्यात्पूर्वार्द्धाच्च ॥४॥ अवत्तमभिघार्य
द्विर्हविः प्रत्यभिघारयति ॥५॥ यतो यतोऽवद्यति तदनु-
पूर्वम् ॥६॥ एवं सर्वाण्यवदानानि ॥७॥ अन्यत्र सौविष्ट-
कृतात् ॥८॥ उदेनमुत्तरं नयेति पुरस्ताद्धोमसंहतां पूर्वाम्
॥९॥ एवं पूर्वा पूर्वा संहतां जुहोति ॥१०॥ स्वाहान्ताभिः
प्रत्यूचं होमाः ॥११॥ यामुत्तरा मग्नेराज्यभागस्य जुहोति
रक्षोदेवत्या सा यां दक्षिणतः सोमस्य पितृदेवत्या सा
॥१२॥ तस्मादन्तरा होतव्या देवलोक एव हूयन्ते ॥१३॥
यां हुत्वा पूर्वामपरां जुहोति सापक्रामन्ती स पापी-
यान्यजमानो भवति ॥१४॥ यां परां परां संहतां जुहोति
साभिक्रामन्ती स वसीयान् यजमानो भवति ॥१५॥
होम के मध्य भाग में प्रधान हवि की आहुतियाँ देवे ॥३॥ आज्य को
उतार कर स्रुव से उपस्तरण मिली हुई दो अङ्गुलियों से ( मध्यमा और
प्रदेशिनी से ) स्रुच में एक स्रुव धर कर दो अङ्गुलियों से अवदान करे
पूर्वार्द्ध मध्य से ॥४॥ अवदान को अभिघार कर दो बार आहुति कर
के पुनः अभिघार देवे ॥५॥ जैसे २ अवदान करे उसी क्रम से उस हवि
का ढार देवे ॥६॥ इसी प्रकार उक्त अवदान नियम से प्रत्येक ऋचा से
अवदान करे ॥७॥ सौविष्ट कृत को छोड़ कर अन्यत्र समझना ॥८॥
“उदेनमुत्तरं नय०” इस प्रथम ऋचा से पुरस्ताद्धोम देश की आहुति
देवे ॥९॥ इस २ प्रकार पूर्व २ देश में मिली हुई पूर्व २ आहुतियाँ देवे
॥१०॥ प्रत्येक आहुति के स्वाहान्त मंत्र के साथ करे ॥११॥ अग्नि के
उत्तर भाग में जो आज्य भाग की आहुति होती है वह रक्षो देवता के
लिये जानो । जो दक्षिण भाग में सोम की आहुति होती है वह पितरों
के लिये जानो ॥१२॥ इसलिये मध्य में आहुति देवे—यह आहूति देव
लोक ही में होती है जानो ॥१३॥ जिस आहुति करके—पूर्वा अपरा
आहुति होती है, वह अपक्रामन्ती नाम की आहुति है जिसके करने से
यजमान पापी होता है ॥१४॥ जो परा परा मिली आहुति होती है
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ११
यामनग्नौ जुहोति सान्धा तया चक्षुर्यजमानस्य मीयते
सोऽन्धंभावुको यजमानो भवति ॥१६॥ यां धूमे जुहोति
सा तमसि हूयते सो ऽरोचको यजमानो भवति ॥१७॥
यां ज्योतिष्मति जुहोति तया ब्रह्मवर्चसी भवति तस्मा-
ज्ज्योतिष्मति होतव्यम् ॥१८॥ एवमस्मै क्षत्रमग्नीषोमा-
विह्यग्नीषोमीयस्य ॥१९॥४॥
अग्नीषोमा सवेदसा सहूती वनतं गिरः । सं देवत्रा
बभूवथुः ॥ युवमेतानि दिवि रोचनान्यग्निश्च सोम
सक्रतू अधत्तम् । युवं सिन्धूँरभिशस्तेरवद्यादग्नीषोमा-
वमुञ्चतं गृभीतान् ॥ अग्नीषोमा य आहुतिं यो वां
दाशाद्धविष्कृतिम् । स प्रजया सुवीर्यं विश्वमायुर्व्य-
श्नवत् ॥१॥ इन्द्राग्नी रोचना दिवः परि वाजेषु भूषथः ।
तद्वां चेति प्रवीर्यम् ॥ श्रथद्वृत्रमुत सनोति वाज-
मिन्द्रा यो अग्नी स हुरी सपर्यात् । इरज्यन्ता वस्व्व्यस्य
भूरेः सहस्तमा सहसा वाजयन्ता ॥ इन्द्राग्नी अस्मान्
रक्षतां यौ प्रजानां प्रजावती । स प्रजया सुवीर्यं विश्व-
मायुर्व्यश्नवत् ॥ गोमद्धिरण्यवद्वसु यद्वामश्वावदीमहे ।
उसको अभिक्रामन्ती कहते हैं-उससे यजमान ईश्वर ( शक्तिशाली )
होता है ॥१५॥ जो आहुति अग्नि बुत जाने पर भस्म में होती है उसका
करने वाला यजमान नेत्र से दृष्टि हीन होता है ॥१६॥ जो धूमयुक्त अग्नि
में आहुति करता है वह गुणयुक्त होता हुआ भी प्रकाश रहित होता है
॥१७॥ जो ज्वालायुक्त अग्नि में आहुति करता है वह यजमान ब्रह्म-
वर्चस्वी होता है अतएव ज्वालायुक्त अग्नि में आहुति देवे ॥१८॥ इसी
प्रकार “अस्मै क्षत्रम्०” इत्यादि से अग्नीषोमीय देवताओं की आहुतियाँ
देवे ॥१९॥ यह चौथी कण्डिका पूरी हुई ॥४॥
“अग्नीषोमा०” इत्यादि से लेकर “तद्वानेमहि स्वाहा” तक के मंत्रों
१२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
इन्द्राग्नीतद्द्वेनेमहि स्वाहेति ॥२॥ ऐन्द्राग्नस्य हविषोऽमा-
वास्यायाम् ॥३॥ प्राक्स्विष्टकृतः पार्वणौ होमौ समृद्धि-
होमाः काम्यहोमाश्च ॥४॥ पूर्णापश्चादिति पौर्णमास्याम्
॥५॥ यत्ते देवा अकृण्वन् भागधेयमित्यमावास्यायाम् ॥६॥
आकूत्यै त्वा स्वाहा। कामाय त्वा स्वाहा । समृद्धे
त्वा स्वाहा। आकूत्यै त्वा कामाय त्वा समृद्धे त्वा स्वाहा।
ऋचा स्तोमं समर्धय गायत्रेण रथन्तरम्। बृहद्गायत्रवर्तनि
स्वाहा॥७॥ पृथिव्यामग्नये समनमन्निति सन्नतिभिश्च ॥८॥
प्रजापते न त्वदेतान्यन्य इति च॥९॥ उपस्तीर्याज्यं सर्वेषा-
मुत्तरतः सकृत्सकृदवदाय द्विरवत्तमभिघारयति ॥१०॥ न
हवींषि ॥११॥ आ देवाना मपि पन्थामगन्मयच्छक्रवाम तद्-
[L
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १३
असि । अयासा मनसा कृतोऽस्यास्यं हव्यमूहिषे । अया
नो धेहि भेषजं स्वाहेत्यों स्वाहा भूः स्वाहा भुव स्वाहा
स्वः स्वाहों भूर्भुवःस्वःस्वाहेति ॥१२॥१३॥
यन्मे स्कन्नं मनसो जातवेदो यद्वा स्कन्दद्धविषो
यत्र यत्र । उत्प्रुषो विप्रुषः संजुहोमि सत्याः सन्तु यज-
मानस्य कामाः स्वाहेति ॥१॥ यन्मे स्कन्नं यदस्मृतीति
च स्कन्नास्मृति होमौ ॥२॥ यदद्य त्वा प्रयतीति संस्थि-
तहोमाः ॥३॥ मनसस्पत इत्युत्तमं चतुर्गृहीतेन ॥४॥
बर्हिराज्यशेषेऽनक्ति पृथिव्यै त्वेति मूलमन्तरिक्षाय त्वेति
मध्यं दिवे त्वेत्यग्रम् ॥५॥ एवं त्रिः ॥६॥ सं बर्हिरक्तमि-
त्यनुप्रहरति यथा दैवतम् ॥७॥ स्रुवमग्नौ धारयति ॥८॥
यदाज्यधान्यां तत्संस्रावयति संस्रावभागास्तविषा
बृहन्तः प्रस्तरेष्ठा बर्हिषदश्च देवाः । इमं यज्ञमभि विश्वे
गृणन्तः स्वाहा देवा अमृता मादयन्तामिति ॥९॥ स्रुवो
ऽसि घृतादनिशितः । सपत्नक्षयणो दिवि षीद । अन्त-
इत्यादि मंत्रों से आहुतियाँ देवे ॥१२॥१३॥ यह पाँचवी कण्डिका समाप्त
हुई ॥५॥
“यन्मे स्कन्नं०” इत्यादि से आज्य की आहुति देवे॥१॥“यन्मे स्कन्नं०”
और “अस्मृति” द्वारा स्कन्न और अस्मृति होम करे ॥२॥ “यदद्य०” से
संस्थित होम की आहुति करे ॥३॥ “मनसस्पते०” से संस्थित होम
के अन्त में चतुर्गृहीत द्वारा आहुति देवे ॥४॥ वेदि के पास के स्तरण को
लाकर आज्य शेष जो आज्यधानी में रहे उसको “पृथिव्यै०” से मूल
को “अन्तरिक्षाय त्वा०” से मध्य को “दिवे त्वा०” से अग्रभाग को
सिक्त करे ॥५॥ इसी प्रकार तीन बार करे ॥६॥ “सं बर्हिरक्तं०” इत्यादि
से यथा दैवत देवे ॥७॥ स्रुव को अग्नि में स्थापन करे ॥८॥ जो आज्य-
धानी में हो उसे “संस्रावभागा हविषा०” इत्यादि से संस्रव होम करे
॥९॥ और “स्रुवोऽसि०” इत्यादि से पूर्व भाग में दण्ड की भाँति स्रुवको
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रिक्षे सीद पृथिव्यां सीदोत्तरोऽहं भूयासमधरे मत्सपला
इति स्रुवं प्राग्दण्डं निदधाति ॥१०॥ विमुञ्चामि
ब्रह्मणा जातवेदसमग्निं होतारमजरं रथस्पृतम् । सर्वा
देवानां जनिमानि विद्वान् यथाभागं वहतु हव्यमग्नि-
रग्नये स्वाहेति समिधमादधाति ॥११॥ एधोऽसीति
द्वितीयां समिद्सोति तृतीयाम् ॥१२॥ तेजोऽसीति मुखं
विमार्ष्टि ॥१३॥ दक्षिणेनाग्निं त्रीन्विष्णुकमान् क्रमते
विष्णोः क्रमोऽसीति दक्षिणेन पादेनानुसंहरति सव्यम्
॥१४॥ सूर्यस्यावृतमित्यभिदक्षिणमावर्तते ॥१५॥ अग-
न्मस्वरित्यादित्यमीक्षते ॥१६॥ इन्द्रस्य वचसा वयं मित्र-
स्य वरुणस्य च । ब्रह्मणा स्थापितं पात्रं पुनरुत्थापयाम-
सीत्यपरेणा
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १५
परिषिञ्च्योदञ्चि हविरुच्छिष्टान्युद्वासयति ॥२०॥ पूर्ण-
पात्रं दक्षिणा ॥२१॥ नादक्षिणं हविः कुर्वीत यः कुरुते
कृत्यामात्मनः कुरुत इति ब्राह्मणम् ॥२२॥ अन्वाहार्यं
ब्राह्मणान् भोजयति ॥२३॥ यद्वै यज्ञस्यानन्वितं भवति
तदन्वाहार्येणान्वाहियते॥२४॥ एतदन्वाहार्यस्यान्वाहार्य-
त्वम् ॥२५॥ ईड्या वा अन्ये देवाः सपर्य्येण्या अन्ये देवाः।
ईड्या देवा ब्राह्मणाः सपर्य्येण्याः ॥२६॥ यज्ञेनैवेड्यान्
प्रीणात्यन्वाहार्येण सपर्य्येण्यान् ॥२७॥ तेऽस्योभे प्रीता-
यज्ञे भवन्तीति॥२८॥ इमौ दर्शपूर्णमासौ व्याख्यातौ॥२९॥
दर्शपूर्णमासाभ्यां पाकयज्ञाः ॥३०॥ अथाप्यपरो हवन-
योगी भवति ॥३१॥ कुम्भीपाकादेव व्युद्धारं जुहुयात्
का आधान करे एवं “सत्यं त्वर्तेन०” इत्यादि से जल का छीटा दे उत्तर
की ओर जल के साथ बची हवि को कर्त्ता स्वीकार करे । पुनः ब्रह्मा और
कर्त्ता के पोषणों के योग्य पूर्णपात्र ( धान्यादि से भरा ) दक्षिणा में देवे
॥१९॥२०॥२१॥ बिना दक्षिणा के हवन न करे। क्योंकि जो ऐसा करता
है वह मानो अपना नाश करता है—ऐसा ब्राह्मणग्रंथ का वचन है ॥२२॥
ब्राह्मणों को ओदनादि भोजन करावे ॥२३॥ जो पदार्थ यज्ञ के अनुकूल
होता है वही श्रद्धापूर्वक व्यवहृत होता है अर्थात् यज्ञार्थ लाया जाता है
॥२४॥ यह अन्वाहार्य्य का अन्वाहार्य्यत्व है ॥२५॥ ईड्य वा पूज्य अन्य
देवता होते हैं और सपर्य्येण्य अन्य देवता होते हैं ।। जिनमें यज्ञ से
सत्कार योग्य देवगण होते हैं और वस्त्र, भोजन, धन, सेवा आदि से
पूजने योग्य ब्राह्मण होते हैं। अतएव यज्ञों द्वारा देवगण को और भोजनादि
द्वारा ब्राह्मणों को प्रसन्न करना चाहिये । ये दोनों ही ( देव, ब्राह्मण )
यजमान द्वारा यज्ञ में प्रसन्न होते हैं तब ही यज्ञों का फल यजमान को
होता है ॥२६॥२७॥२८॥ इन दोनों दर्श और पौर्णमास का व्याख्यान हुआ
और दर्श पौर्णमास द्वारा पाकयज्ञ सब कहे गये ॥२९॥३०॥ इसके अन-
न्तर दूसरा भी हवन योग्य है अर्थात् आग्नेय और अग्नीषोमीय के अति-
रिक्त अन्य भी यज्ञ हैं ॥३१॥ कुम्भीपाक से ही लेकर आहुतियाँ देवे ॥
१६ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
॥ ३२ ॥ अधिश्रयणपर्यग्निककरणाभिघारणोद्वासनालङ्क-
रणोत्पवनैः संस्कृत्य ॥३३॥ अथापि श्लोकौ भवतः ॥
आज्यभागान्तं प्राक् तन्त्रमूर्ध्वं स्विष्टकृता सह । हवींषि
यज्ञ आवापो यथा तन्त्रस्य तन्तवः । पाकयज्ञान् समा-
साद्यैकाज्यानैकबर्हिषः । एकस्विष्टकृतः कुर्यान्नानापि
सति दैवतेति ॥३४॥ एतेनैवामावास्यो व्याख्यातः ॥३५॥
ऐन्द्राग्नोऽत्र द्वितीयो भवति ॥ ३६ ॥ तयोर्व्यतिक्रमे
त्वमग्ने व्रतपा असि कामस्तदग्र इति शान्ताः ॥३७॥६॥
अश्नात्यनादेशे स्थालीपाकः ॥ १ ॥ पुष्टिकर्मसु सारू-
पवत्से ॥२॥ आज्यं जुहोति ॥३॥ समिधमादधाति ॥४॥
अधिश्रयण, पर्यग्निकरण, अभिघारण, उद्वासन, अलङ्करण, और
उत्पवन आदि संस्कार करके आहुति देवे ॥ ३२॥३३ ॥ यहाँ दो श्लोक
गोपथ ब्राह्मणों के हैं । आज्य भाग के अन्त के होम पूर्वतन्त्र स्विष्ट
कृत के सहित हवियों के यज्ञ, यह आवाप (प्रधान) है । और
जैसे तन्त्र की सन्तति वा सूत्र स्वरूप है। यदि पाक यज्ञ के करने
में ऐसा अवसर आ पड़े कि एक आज्य हो और अनेक बर्हि । (हवि
रखने के कुश के पात्र) हों तो एक ही स्विष्टकृत की आहुति करे ।
चाहे भिन्न २ अनेक दैवत हवन क्यों न हों ॥३४॥ इसीके द्वारा अमा-
वास्या में कर्त्तव्य ऐन्द्राग्नि की व्याख्या हुई जानो ॥३५॥ यहाँ ऐन्द्राग्न
दूसरा है जानो ॥३६॥ इन दोनों के व्यतिक्रम होने पर “त्वमग्ने व्रतपा
असि”, “कामस्तदग्र०” से शान्ता नाम की आहुति करनी चाहिये ॥३७॥
यह छठी कण्डिका पूरी हुई ॥ ६ ॥
इस संहिता विधि में जहाँ २ “अश्नाति” या “आशयति” करके कहा
गया है वहाँ २ स्थालीपाक की विधि जानना ॥ १ ॥ जैसे पुष्टि कर्मों में
“सारूपवत्सा” स्थालीपाक समझना ॥२॥ जहाँ “जुहोति” कहा गया है
परन्तु हवन करने का विधान नहीं किया गया वहाँ घृत समझना ॥३॥
जहाँ होम का विधान हो परन्तु होतव्य (किस वस्तु का होम करे
सो नहीं लिखा है) वहाँ आज्य की आहुति करे ॥ ३ ॥ जहाँ केवल
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १७
आवपति व्रीहियवतिलान् ॥ ५॥ भक्षयति क्षीरौ-
दनपुरोडाशरसान् ॥ ६॥ मन्थौदनौ प्रयच्छति ॥ ७॥
पूर्वं त्रिषप्तीयम् ॥ ८ ॥ उदकचोदनायामुदपात्रं प्रतीयात्
॥ ९॥ पुरस्तादुत्तरतः संभारमाहरति ॥ १० ॥ गोरनभि-
प्रापाद्वनस्पतीनाम् ॥ ११ ॥ सूर्योदयतः ॥ १२ ॥ पुरस्ता-
दुत्तरतोऽरण्ये कर्मणां प्रयोगः ॥ १३ ॥ उत्तरत्त उदकान्ते
प्रयुज्य कर्माण्यपां सूक्तैराप्लुत्य प्रदक्षिणमावृत्याप
उपस्पृश्यानवेक्षमाणाग्राममुदाव्रजन्ति ॥ १४॥ आश्यब-
न्ध्याप्लवनयानभक्ष्याणि सम्पातवन्ति ॥ १५ ॥ सर्वा-
ण्यभिमन्त्र्याणि ॥ १६ ॥ स्त्रीव्याधितावा पुतावसिक्तौ
समिद् का आधान लिखा है परन्तु यह नही लिखा है कि अमुककाष्ठ आदि
हो। वहाँ होम के योग्य काठ ग्रहण करना चाहिये ॥४॥ व्रीहि (धान्य),
जौ, और तिलों का आवपन करे अर्थात् अग्नि में डाल कर आहुति करे॥
॥५॥ जहाँ “भक्षयति” का विधि हो वहाँ क्षीरोदन, पुरोडाश, रसों को
भक्षण करे करावे ॥६॥ जहाँ “प्रयच्छति” का विधान हो वहाँ मन्थ
और ओदन देवे ॥७॥ “पूर्व त्रिषप्तीयम्” कहने से “ये त्रिषप्ता०” इस
सूक्त को लेवे ॥८॥ जहाँ उदक का संस्कार कहा गया हो वहाँ जलपात्र
का संस्कार समझना ॥९॥ निवास स्थान से संभार लाकर वेदि के
पूर्व उत्तर भाग में घरे ॥१०॥ जहाँ वनस्पतियों के पास के फूल, पत्र,
आदि लाने का विधान हो, और उसके मिलने में कठिनता हो तो
गौशाला के पास के वानस्पत्य के प्रयोजनीय अंश को लेवे ॥११॥ सूर्य
के उदय समय संभार आदि को लावे ॥१२॥ निवास स्थान के पूर्व या
उत्तर-जंगल में कर्म करे ॥१३॥ सब ही कर्म जल के उत्तर भाग में कर
के “अम्बयो यन्ति शम्भुमयो भू हिरण्यवर्णादयः कृष्णं नियानं सस्रुषी-
र्हिमवतः प्रस्स्रवन्ति वायोः पूतः०” ये जलसूक्त हैं। जलसूक्तों से नहा कर
परिक्रमा कर जल को स्पर्श कर के पीछे न देखते हुए ग्राम को
जावे ॥१४॥ “आश्य” आदि सबों में सम्पात् का अभिमंत्रण होता है।
यज्ञार्थ सब ही पदार्थों का अभिमंत्रण करे ॥१५॥१६॥ स्त्री, रुग्ण पुरुष,
३
१८ ़अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
शिरस्तः प्रक्रम्याप्रपदात्प्रमार्ष्टि ॥ १७ ॥ पूर्वं प्रपाद्य
प्रयच्छति ॥ १८ ॥ त्रयोदश्यादयस्तिस्रो दधिमधूनि
वासयित्वा बध्नाति ॥ १९ ॥ आशयति ॥२०॥ अन्वार-
ब्धायामभिमन्त्रणहोमाः ॥ २१ ॥ पश्चादग्नेश्चर्मणि
हविषां संस्कारः ॥ २२ ॥ आनडुहः शकृत्पिण्डः ॥२३॥
जीवघात्यं चर्म ॥२४॥ अकर्णोऽश्मा ॥२५॥ आप्लवनावसे-
चनानामाचामयति च ॥२६॥ सम्पातवतामश्नाति न्यङ्क्ते
वा ॥ २७॥ अभ्याधेयानां धूमं नियच्छति ॥ २८ ॥ शुचि-
ना कर्मप्रयोगः ॥२९॥७॥
पुरस्ताद्धोमवत्सु निशाकर्मसु पूर्वाह्ने यज्ञोपवीती
शालानिवेशनं समूहहत्युपवत्स्यद्भक्तमशित्वा स्नातोऽ-
हतवसनः प्रयुङ्क्ते ॥१॥ स्वस्त्ययनेषु च ॥ २॥ इज्यानां
इनमें से स्त्री तो जल में गोता लगाकर स्नान करे और रुग्ण पुरुष शिर
से पैर तक जल से मार्जन करे ॥१७॥ पहिले प्रपादन फिर मन्थौदन को
देवे ॥१८॥ और त्रयोदशी आदि तीन तिथियों में दही, मधु, यज्ञ कराने
वाले को कर्ता खिलावे और वासित को बान्ध देवे ॥१९॥ इसके
पश्चात् अग्नि के पास जो चर्म है, उसमें हवि का संस्कार करे ॥२०॥
बैल के गोमय का पिण्ड बनावे । बलवान् जीवित पशु के चर्म को अर्थात्
गोलाकार सींगवाले पशु के चर्म को लाकर घरे ॥२१॥२२॥२३॥२४॥२५॥
आप्लवन, अवसेचन, का कारयिता कर्ता से आचमन करावे ॥ २६ ॥
आहुति के सम्पात को आँखों में आञ्जे या खावे ॥ २७ ॥ अभ्याधेय
पदार्थों के धूम को कारयिता स्वयं ग्रहण करे ॥२८॥ और कर्मों की समाप्ति
में पवित्रता से कर्म का प्रयोग करे । नित्य, नैमित्तिक, काम्य कर्मों
को स्नान कर के करे ॥२९॥३०॥ यह सातवी कण्डिका समाप्त हुई ॥७॥
पुरस्ताद्धोमवाले निशाकर्मों में पूर्वाह्न में यज्ञोपवीती होकर अग्नि-
शाला में बैठकर अग्नि का समूहन करे । उपवास रहकर, भात खाकर,
नहाकर, अखण्ड चीरे दार नये वस्त्र धारण कर-कर्म करने में प्रवृत्त होवे
ऐसा कोई आचार्य मानते हैं ॥१॥ स्वस्त्ययन कर्मों में भी ऐसा ही करे
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १९
दिश्यान् बलीन् हरति ॥ ३॥ प्रतिदिशमुपतिष्ठते ॥ ४ ॥
सर्वत्राधिकरणं कर्तुर्द्दक्षिणा ॥ ५ ॥ त्रिरुदकक्रिया ॥६॥
अनन्तराणि समानानि युक्तानि ॥७॥शान्तं संभारम् ॥८॥
अधिकृतस्य सर्वम् ॥९॥ विषये यथान्तरम् ॥१०॥ प्रयच्छ
पर्शुमिति दर्भलवनं प्रयच्छति ॥ ११ ॥ अरातीयोरिति
तक्षति ॥१२॥ यत्त्वा शिक इति प्रक्षालयति ॥१३॥ यद्य-
त्कृष्ण इति मन्त्रोक्तम् ॥ १४ ॥ पलाशोदुम्बरजम्बुकाम्पी-
लस्रग्वङ्गशिरीषस्रक्त्यवरणबिल्वजङ्गिडकुटकगर्हगलावल-
वेतसशिम्बलसिपुनस्यन्दनारणिकाश्मयोक्ततुन्युपूतदार-
वः शान्ताः ॥ १५ ॥ चितिप्रायश्चित्तिशमीशमका-
॥२॥ स्वस्त्ययन याग देवताओं के लिये प्रत्येक दिशाओं में बलि, उपहार
देवे और प्रति दिशा में उपस्थान करे ॥३॥४॥ सब ही यज्ञकर्त्ता क
दक्षिणा देवे ॥५॥ विधि कर्मों में जहाँ २ जल से कर्म करने का विधान
हो वहाँ २ जल क्रिया तीन बार करे ॥६॥ संहिता में जो २ सूक्त
अनन्तर कहे गये हैं, जिनके प्रयोजन समान हों उनको एकत्र कर प्रयोग
करे ॥७॥ सब ही शान्तकर्मों में शान्तसम्भार, दर्भ, समिद्, आदि ।
अभिचार कर्मों में रौद्र, आङ्गिरस, सम्भार जानना ॥८॥ सुच्, स्रुव,
समिद्, काष्ठ आदि मणि, द्रव्य काष्ठ करना चाहिये । मादानक शृत
क्षीरोदन खावे । और मादानक के चमसा में एक रूप रंग के वत्स के
गौ के दूध में क्षीरौदन पकावे । मंत्र कर्म में जहाँ द्रव्य का सन्देह हो
वहाँ निकृष्ट द्रव्य ग्रहण करे ॥९॥१०॥ “प्रयच्छ पर्शु०” से दर्भ काटने
का अस्त्र देवे ॥ ११ ॥ “अरातीयोः” से उलूखल, मुसल, काठ, एवं
अन्य कार्य के लिये लकड़ी काटे, चीरे-फाड़े ॥१२॥ “यत्त्वाशिक”
से प्रक्षालन करे ॥१३॥ “यद्यत्कृष्णः” से उलूखल मुसल को प्रक्षा-
लन करे ॥१४॥ पलाश, उदुम्बर, जम्बु, काम्पील, स्रक्, वंघ, शिरीष,
स्रक्त्य, वरण, बिल्व, जङ्गिड़, कुटक, गर्ह, गलावल, वेतस, शिम्बल,
सिपुन, स्यन्दन, अरणिकाष्ठ, अश्मयोक्त, तुन्यु, पूतदारु ये शान्त कर्म में
प्रयोजनीय हैं ॥१५॥ चिति, प्रायश्चित्ति, शमी, शमका, सवंशा, शाम्य-
' or 'प्रियङ्ग'?
Look at line 7:
प्रि - य - ङ्गु - श्या -
Wait, is the 'ु' there? Look at the bottom of 'ङ्ग': it curves down-left, exactly like 'ु'!
Wait, compare it with 'ङ्ग' without u: 'ङ्ग' normally ends with the bottom curve of 'ग'. But here it goes further down and loops!
Wait, look at line 8: "माका इति मिश्रधान्यानि ॥ २० ॥"
So the word is "श्यामाकाः" or "श्यामाका"!
And before it: "प्रियङ्गु" or "प्रियङ्ग"?
In Hindi: "प्रियङ्गु, श्यामा"!
Wait, look at the Sanskrit: "प्रियङ्गश्या-" or "प्रियङ्गुश्या-"?
Wait, in Hindi line 16: "प्रियङ्गु, श्यामा इन"
In Sanskrit: "प्रियङ्गश्या-" vs "प्रियङ्गुश्या-":
Look at the character: प्रि - य - ङ्ग - श्या. Wait, does it have an u-mātrā?
Look at 'ङ्गु' in line 7: wait, is there a 'ु'? Yes, there is a distinct loop/tail at the bottom of 'ग'!
Wait, but look at 'तल':
Could it be "व्रीहियवगोधूमोपवाकातलप्रियङ्गश्या-" or "व्रीहियव
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २१
अम्बयो यन्ति शम्भुमयो भू हिरण्यवर्णा निस्सालां
ये अग्नयो ब्रह्म जज्ञानमित्येका तदेव मृगारसूक्तानि ॥१॥
उत्तमं वर्जयित्वाऽप नः शोशुचदघं पुनन्तु मा सस्रुषोर्हि-
मवतः प्रस्रवन्ति वायोः पूतः पवित्रेण शं च नो मयश्च
नोऽनडुह्यस्थवं प्रथमं मह्यमापो वैश्वानरो रश्मिभिर्यमो
मृत्युविश्वजित्संज्ञानं नो यद्यन्तरिक्षे पुनर्मैत्विन्द्रियं
शिवा नः शं नो वातो वात्वग्निं ब्रूमो वनस्पतीनिति ॥ २॥
पृथिव्यै श्रोत्रायेतिन्त्रिः प्रत्यासिञ्चति ॥३॥ अम्बयो यन्ति
शम्भुमयो भू हिरण्यवर्णाः शांतातीयं शिवा नः शं नो
वातो वात्वग्निं ब्रूमो वनस्पतीनिति ॥४॥ पृथिव्यै श्रोत्रा-
येति त्रिः प्रत्यासिञ्चति ॥५॥ इति शान्तियुक्तानि ॥६॥
उभयतः सावित्र्युभयतः शं नो देवी ॥७॥ अहतवासाः
कंसे शान्त्युदकं करोति ॥ ८ ॥ अतिसृष्टो अपां वृषभ
इत्यपोऽतिसृज्य सर्वा इमा आप ओषधय इति पृष्ट्वा
“अम्बयो यन्ति” इत्यादि एक और “अग्नेर्मन्व०” इत्यादि ये “मृगार
सूक्त” हैं ॥१॥ पहिले को छोड़ कर “अपनः” इत्यादि यह मृगारसूक्त है
“पृथिव्यै श्रोत्राय” से तीन बार आसिंचन करे ॥२॥३॥ “अम्बयो यन्ति
इत्यादि शान्तिगण हैं । इन सब सूक्तों से कौशिक का कहा बृहत् शान्ति-
गण है ॥४॥ “पृथिव्यै श्रोत्रियाय”० से तीन बार प्रत्यासिञ्चन् करे
अर्थात् शान्त्युदक के मध्य में शान्ति जल डाले फिर “पृथिव्यै श्रोत्राय”
से अग्नि का पर्युक्षण करे । पूर्व गण को शांतियण कहते हैं, और उत्तर
भी शान्ति शब्द वाच्य हैं-दोनों की संज्ञा-पूर्वोत्तरा है ॥ शान्ति के आदि
एवं अन्त में “सावित्री” और “शन्नो देवी” पढ़ना चाहिये ॥५॥६॥७॥
अखण्ड चीरेदार नये वस्त्र पहन कर काँसे के पात्र में शान्ति के जल
को करे “अतिसृष्टो” इत्यादि से जल छोड़कर । ओषधियों के लाने
वाले से कर्ता पूछे कि ‘ये सब ओषधियाँ हैं ? आ० कहे “सब है।”
तब कर्ता ब्रह्मा से पूछे कि ये सब जल ओषधियाँ हैं ? ब्रह्मा जल को
२२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
सर्वा इत्याख्यात ओं बृहस्पति प्रसूतः करवाणीत्यनु-
ज्ञाप्यों सवितृप्रसूतः भवानित्यनुज्ञातः कुर्वीत ॥९॥
पूर्वया कुर्वीतेति गार्ग्यपार्थश्रवसभागलिकाङ्कायनोपरि-
बभ्रवकौशिकजाटिकायनकौरुपथयः ॥ १० ॥ अन्यत-
रया कुर्वीतेति युवा कौशिको युवा कौशिकः ॥११॥९॥
इत्यथर्ववेदे कौशिकसूत्रे प्रथमोऽध्यायः समाप्तः ॥१॥
पूर्वस्य मेधाजननानि ॥१॥ शुकसारिकृशानां जिह्वा
बध्नाति ॥२॥ आशयति ॥३॥ औदुम्बरपलाशकर्कन्धूना-
मादधाति ॥४॥ आवपति ॥५॥ भक्षयति ॥६॥ उपाध्यायाय
भैक्ष्यं प्रयच्छति ॥ ७॥ सुप्तस्य कर्णमनुमन्त्रयते ॥ ८ ॥
उपसीदञ्जपति ॥९॥ धानाः सर्पिर्मिश्राः सर्वहुताः ॥१०॥
छूकर कहे-हाँ सब है । सब क्या ? चित्यादि सब मिल कर सब ओष-
धियों सहित गंगादिके सब नदियों का जल है । "ओं बृहस्पतिप्रसूतः
करवाणि" ऐसी मुझे अनुज्ञा हो "सवितृप्रसूतः भवानि" अनुज्ञा पाने
पर करो ॥ "बृहस्पति प्रसूतः" से करे यह मत गार्ग्य, पाथे, श्रवस,
भागलि, काङ्कायन, उपरि बभ्रव, कौशिक, जाटिकायन, कौरुपथि का है।
"सवितृप्रसूतः" से करे यह मत युवा कौशिक का है ॥८॥९॥१०॥११॥
यह नवमी कण्डिका समाप्त हुई ॥९॥ यह अथववेद के कौशिक सूत्र के
प्रथमाध्याय का भाषानुवाद समाप्त हुआ ॥१॥
पूर्व के (त्रिषप्रीयासूक्त) अनुवाक से मेधा जनन कर्म करे ॥१॥
मेधा चाहने वाले कंटारिका के पत्ते को "अयं मे वरण उरसि०" और
आज्यादि सूक्त से आज्याहुति के संपात से होमकर अपने गले में बाँधे
॥२॥ और कर्त्ता मेधा चाहने वाले को खवावे ॥३॥ उदुम्बर, पलाश,
बैर के बड़े फल, इनको लावे ॥४॥ और उसे आवपन करे ॥५॥ ये त्रि-
षप्ता०" इस सूक्त से क्षीरौदन खावे और रस को प्राशन करे ॥६॥
"ये त्रिषप्ता०" सूक्त से उपनयन के अनन्तर-ब्रह्मचारी-एकत्रित की हुई
भिक्षा को अभिमन्त्रण कर अध्यापक को समर्पण करे ॥७॥ रात में सोते
हुए अध्यापक के कान में अभिमंत्रण करे ॥८॥ जब २ उपाध्याय घर
तिलमिश्रा हुत्वा प्राश्नाति ॥ ११ ॥ पुरस्तादग्नेः कल्माषं
दण्डं निहत्य पश्चादग्नेः कृष्णाजिने धाना अनुमन्त्रयते ॥१२॥
सूक्तस्य पारं गत्वा प्रयच्छति ॥१३॥ सकृज्जुहोति ॥१४॥
दण्डधानाजिनं ददाति ॥१५॥ अहं रुद्रेभिरिति शुक्ल-
पुष्पहरितपुष्पे किंस्त्यनाभिपिप्पल्यौ जातरूपशकलेन
प्राक्स्तनग्रहात् प्राशयति ॥ १६॥ प्रथमप्रवदस्य मातु-
रुपस्थे तालुनि सम्पातानानयति ॥ १७ ॥ दधिमध्वाश-
यति ॥ १८ ॥ उपनीतं वाचयति वार्षशतकं कर्म ॥१९॥
त्वं नो मेघे द्यौश्च म इति भक्षयति ॥ २० ॥ आदित्य-
मुपतिष्ठते ॥२१॥ यदग्ने तपसेत्याग्रहायण्यां भक्षयति
॥ २२ ॥ अग्निमुपतिष्ठते ॥२३॥ प्रातरग्निं गिरावर्गराटेषु
को जाया करे तब २ ब्रह्मचारी जप किया करे ॥९॥ लावा, घी, मिला-
कर हवन करे ॥१०॥ तिल रें., घी मिलाकर हवन कर शेष हवि को
प्राशन करे ॥११॥ काले रंग के दण्ड को अग्नि के पीछे धर कर काले
रंग के मृग चर्म पर धाना धर कर उस का अनुमंत्रण करे ॥१२॥ सूक्त
को पढ़ लेने पर देवे ॥१३॥ धान को अजिन के द्वारा एक बार आहुति
देवे ॥१४॥ और उपाध्याय के लिये दण्ड धान अजिन देवे ॥१५॥ “अहं
रुद्रेभिः” इत्यादि से शंखपुष्पिका, अन्धपुष्पिका, शंखनाभि, पिप्पली
को सोने के शलाका से घस कर माँ के दूध पीने के पहिले बालक को
चटावे ॥ और बच्चे को भली भाँति वर्चस्वी बनाने के लिये और
मेधावि बनाने वाला पहिले माता के गोद में बच्चे को देकर “अहं रुद्रेभिः”
सू० से पाँच कर्मों को जात कर्म में करे और सम्पात को तालु पर डाले
॥१६॥१७॥ और दही मधु मिलाकर बच्चे को चटावे ॥१८॥ और बालक
के पास “अहं रुद्रेभिः” सूक्त एवं “आयातु मित्र” इत्यादि गण के अन्त के
वचन को पढ़े—जो बच्चे की आयुः सौ वर्ष की चाहे वह इस कर्म को करे
॥१९॥ “त्वं नो मेघे०” मंत्रों से भक्षण करावे ॥२०॥ आदित्य का उपस्थान
करे ॥२१॥ “यदग्ने तपसे०” इत्यादि से आग्रयण की पौर्णमासी को मेधा-
जनन कर्म कर के और बच्चे को शेष हवि भक्षण करावे ॥ २२ ॥ और
२४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
दिवस्पृथिव्या इति संह्राय मुखं विमार्ष्टि ॥२४॥१॥१०॥
पूर्वस्य ब्रह्मचारि साम्पदानि ॥१॥ औदुम्बर्यादयः ॥२॥
ब्रह्मचार्यावसथादुपस्तरणान्यादधाति ॥३॥ पिपीलिकोद्वापे
मेदोमधुश्यामाकेषीकतूलान्याज्यं जुहोति ॥ ४ ॥ आज्य-
शेषे पिपीलिकोद्वापानोप्य ग्राममेत्य सर्वहुतान् ॥ ५ ॥
ब्रह्मचारिभ्योऽन्नं धानास्तिलमिश्राः प्रयच्छति ॥६॥ एता-
निग्रामसाम्पदानि ॥ ७ ॥ विकारस्थूणामूलावत्तक्षणानि
समानामुपस्तरणानि ॥८॥ ग्रामीणेभ्योऽन्नम् ॥९॥ सुरां
सुरापेभ्यः ॥ १० ॥ औदुम्बर्यादीनि भक्षणान्तानि सर्व-
साम्पदानि ॥११॥ त्रिज्योतिःकुरुते॥१२॥ उपतिष्ठते॥१३॥
सव्यात्पाणिहृदयाल्लोहितं रसमिश्रमश्नाति ॥ १४॥
पृश्निमन्थः ॥ १५ ॥ जिह्वाया उत्साद्यमक्ष्योः परिस्तरण-
अग्नि का उपस्थान करे ॥२३॥ "प्रातरग्नि०" इत्यादि पढ़ कर सोते से उठ
कर मुख का प्रक्षालन करे ॥२४॥ १॥ यह दशमी कण्डिका पूरी हुई ॥१०॥
पौर्णमासी को निर्ऋति कर्म करके एक वार प्रातःकाल में ब्रह्मचारी
"त्रिषप्तीय०" सूक्त से साम्पद् कर्म करे ॥ उदुम्बर आदि १०।४
सूत्रोक्त अग्नि का आधान करे ॥२॥ ब्रह्मचारी अपने घर से तृणादि को
लाकर आधान करे ॥३॥ चूँटियों से फेकी वा निकाली हुई मट्टी के छिद्र
में मेद, मधु, श्यामक, शरपुष्प इनको आज्य के साथ आहुति देवे ॥४॥
आज्य शेष में पिपीलिका की मट्टी को थाली में धर कर ग्राम में आकर
एक वार हवन करे ॥५॥ ब्रह्मचारियों के लिये अन्न, और तिल मिला धान
देवे ॥६॥ पूर्व दिन में निर्ऋति कर्म करके ग्राम साम्पद् का अधिकार
होता है। समिद् का विकार, स्थूणा (खूँटी) के जड़, इनके अवतक्षण
(चीर, फाड़, कर, ) को यज्ञ के उपस्तरण करे ॥७।८॥ ग्रामीणों को
अन्न, सुरा पीने वाले को सुरा देवे ॥९।१०॥ औदुम्बर, पलाश, बैर
आदि और क्षीरौदन, पुरोडाश, रस ये सर्वकामनाओं के लिये हैं ॥११॥
तीनवार ज्योतिःकरै ॥१२॥ तब उपस्थान करे ॥१३॥ सव्य हाथ से लाल
सहजन को पानी में मिलाकर खावे ॥१४॥ गौ का मट्ठा ॥१५॥ मस्तु
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २५
मस्तृहणं हृदयं दूशं उपनह्य तिस्रो रात्रीः पल्पूलने
वासयति ॥१६॥ चूर्णानि करोति ॥१७॥ मैश्रधान्ये मन्थ
ओप्य दधिमधुमिश्रमश्नाति ॥ १८ ॥ अस्मिन् वसु यदा
बध्नन्नव प्राणानिति युग्मकृष्णलं वासितं बध्नाति ॥१९॥
सारूपवत्सं पुरुषगात्रं द्वादशरात्रं सम्पातवन्तं कृत्वा-
˙नभिमुखमश्नाति ॥ २० ॥ २ ॥ ११ ॥
कथं मह इति मादानकश्रुतं क्षीरौदनमश्नाति ॥१॥
चमसे सरूपवत्साया दुग्धे व्रीहियवाववधाय मूर्च्छयि-
त्वा मध्वासिच्याशयति ॥ २ ॥ पृथिव्यै श्रोत्रायेति
जुहोति ॥३॥ वत्सो विराज इति मन्थान्तानि ॥४॥ सहृ-
दयं तदू षु संजानीध्वमेह यातु·सं वः पृच्यन्तां सं वो
मनांसि संज्ञानं न इति सांमनस्यानि ॥ ५ ॥ उदकुलिजं
संम्पातवन्तं ग्रामं परिहृत्य मध्ये निनयति ॥६॥ एवं सुरा-
लङ्कक में धूलक आदि को पुराने वस्त्र में बांधकर तीन रात तक गौ के
गोबर में वासे और चौथे दिन पुराने वस्त्र सहित को चूर्ण करे ॥ और
मैश्रधान्ये में मथन को डालकर दधि, मधु मिलाकर खावे ॥१॥१६॥१७॥१८॥
“अस्मिन्वसु यदा बध्नन्नव प्राणान् इस मंत्र से उक्त प्रतीकों में कृष्णमणि
को वास कर सब कामना सिद्धि चाहने वाला इस को हाथ या गले में
बांधे ॥१९॥ एक वर्ण बच्चे वाली गौके दूध में पके ओदन को पुरुषाकृति
बनाकर १२ दिन तक उस पर दूध में पके ओदन को ढारे ॥२०॥२॥११॥
दूसरी कण्डिका पूरी हुई ॥२॥
सम्पत्ति चाहने वाला “कथमहं” इत्यादि मादानक वृक्ष के काठ से
पके क्षीरोदन को खावे ॥१॥ चमसा में सरूप वत्सा गौ के दूध में
व्रीहि, यव डालकर मूर्च्छना देकर उस में मधु देकर खावे ॥२॥ और
“पृथिव्यै श्रोत्राय०” से आहुति देवे॥३॥ “त्रिज्योतिः कुरुते” इत्यादि से
पृश्निमंथ-तक कर्म्म होते हैं ॥४॥ “सहृदयम्०” इत्यादि से सांमनस्य
कर्म कहे गये हैं ॥५॥ चूने वाले घड़े को बनाकर गाँव में भ्रमण करावे
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