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सर्वकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

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पृष्ठ 53

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २१

अम्बयो यन्ति शम्भुमयो भू हिरण्यवर्णा निस्सालां
ये अग्नयो ब्रह्म जज्ञानमित्येका तदेव मृगारसूक्तानि ॥१॥
उत्तमं वर्जयित्वाऽप नः शोशुचदघं पुनन्तु मा सस्रुषोर्हि-
मवतः प्रस्रवन्ति वायोः पूतः पवित्रेण शं च नो मयश्च
नोऽनडुह्यस्थवं प्रथमं मह्यमापो वैश्वानरो रश्मिभिर्यमो
मृत्युविश्वजित्संज्ञानं नो यद्यन्तरिक्षे पुनर्मैत्विन्द्रियं
शिवा नः शं नो वातो वात्वग्निं ब्रूमो वनस्पतीनिति ॥ २॥
पृथिव्यै श्रोत्रायेतिन्त्रिः प्रत्यासिञ्चति ॥३॥ अम्बयो यन्ति
शम्भुमयो भू हिरण्यवर्णाः शांतातीयं शिवा नः शं नो
वातो वात्वग्निं ब्रूमो वनस्पतीनिति ॥४॥ पृथिव्यै श्रोत्रा-
येति त्रिः प्रत्यासिञ्चति ॥५॥ इति शान्तियुक्तानि ॥६॥
उभयतः सावित्र्युभयतः शं नो देवी ॥७॥ अहतवासाः
कंसे शान्त्युदकं करोति ॥ ८ ॥ अतिसृष्टो अपां वृषभ
इत्यपोऽतिसृज्य सर्वा इमा आप ओषधय इति पृष्ट्वा

“अम्बयो यन्ति” इत्यादि एक और “अग्नेर्मन्व०” इत्यादि ये “मृगार
सूक्त” हैं ॥१॥ पहिले को छोड़ कर “अपनः” इत्यादि यह मृगारसूक्त है
“पृथिव्यै श्रोत्राय” से तीन बार आसिंचन करे ॥२॥३॥ “अम्बयो यन्ति
इत्यादि शान्तिगण हैं । इन सब सूक्तों से कौशिक का कहा बृहत् शान्ति-
गण है ॥४॥ “पृथिव्यै श्रोत्रियाय”० से तीन बार प्रत्यासिञ्चन् करे
अर्थात् शान्त्युदक के मध्य में शान्ति जल डाले फिर “पृथिव्यै श्रोत्राय”
से अग्नि का पर्युक्षण करे । पूर्व गण को शांतियण कहते हैं, और उत्तर
भी शान्ति शब्द वाच्य हैं-दोनों की संज्ञा-पूर्वोत्तरा है ॥ शान्ति के आदि
एवं अन्त में “सावित्री” और “शन्नो देवी” पढ़ना चाहिये ॥५॥६॥७॥
अखण्ड चीरेदार नये वस्त्र पहन कर काँसे के पात्र में शान्ति के जल
को करे “अतिसृष्टो” इत्यादि से जल छोड़कर । ओषधियों के लाने
वाले से कर्ता पूछे कि ‘ये सब ओषधियाँ हैं ? आ० कहे “सब है।”
तब कर्ता ब्रह्मा से पूछे कि ये सब जल ओषधियाँ हैं ? ब्रह्मा जल को