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सर्वकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

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पृष्ठ 38

६ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
जुष्टं प्रोक्षामीति ॥२४॥ नानभ्युक्षितं संस्तीर्णमुपयोगं
लभेत ॥२५॥ नैधोऽभ्याधानम् ॥२६॥ नानुत्पूतं हविः॥२७॥
नाप्रोक्षितं यज्ञाङ्गम् ॥२८॥ तस्मिन्प्रक्षालितोपवातानि
निदधाति ॥२९॥ स्रुवमाज्यधानीं च ॥३०॥ विलीनपूत-
माज्यं गृहीत्वाधिश्रित्य पर्यग्नि कृत्वोदगुद्वास्य पश्चाद-
ग्‍नेरुपसाद्योदगग्राभ्यां पवित्राभ्यामुत्पुनाति॥३१॥विष्णो-
र्मनसा पूतमसि ॥३२॥ देवस्त्वा सवितोत्पुनातु ॥३३॥
अच्छिद्रेण त्वा पवित्रेण शतधारेण सहस्रधारेण सुप्वो-
त्पुनामीति तृतीयम् ॥३४॥ तूष्णीं चतुर्थम् ॥३५॥ शृतं
हविरभिघारयति मध्वा समञ्जन्घृतवत्कराथेति ॥३६॥
अभिघार्योदञ्चमुद्वासयत्युद्वासयाग्नेः शृतमकर्म हव्यमा-
सीद् पृष्ठममृतस्य धामेति ॥३७॥ पश्चादाज्यस्य निधाया-
लङ्कृत्य समानेनोत्पुनाति ॥३८॥ अदारसृदित्यवेक्षते ॥३९॥
॥२३॥ बिछाये हुओं का “हविषां त्वा०” मंत्र से प्रोक्षण करे ॥२४॥
बिछाये हुए कुश विना अभ्युक्षण के काम के योग्य नहीं होते ॥२५॥
बिना अभ्युक्षण के समिद् का आधान भी नहीं हो सकता है॥२६॥ विना
उत्पवन के हवि—नहीं हो सकती है। और न विना प्रोक्षण के यज्ञ का
अङ्ग ही हो सकता है ॥२७।२८॥ उस प्रक्षालित एवं उत्पवन किये उप-
करणों को यज्ञ के लिये आसादन करे। स्रुव और आज्यधानी को भी
॥२९।३०॥ पिघले हुए शुद्ध घृत को अग्नि पर चढ़ाकर गर्म कर और
पर्यग्नि करके तथा शुद्ध जल से उद्वासन करके अग्नि के पश्चिम भाग में
धर कर उत्तराग्र पवित्रे से केश, कीट, आदि से रहित कर देवे-जिसका
मंत्र “विष्णोर्मनसा पूतमसि०” इत्यादि मंत्र पढ़ कर उत्पवन्न तीसरी
बार करे। और चौथी बार विना मंत्र के करे ॥३१।३२।३३।३४।३५॥
गर्म किये हुए आज्य को “मध्वा०” इत्यादि मंत्र से अभिघार दे कर
“उद्वासयत्यु०” इत्यादि मंत्र से उत्तर की ओर उद्वासन करे ॥३६।३७॥
आज्य के पीछे धर कर अलङ्कृत्य कर के “समानेन०” से उत्पवन करे
॥३८॥ “अदार सृद्०” मंत्र से उठ कर देखे ॥३९॥