कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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१२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
इन्द्राग्नीतद्द्वेनेमहि स्वाहेति ॥२॥ ऐन्द्राग्नस्य हविषोऽमा-
वास्यायाम् ॥३॥ प्राक्स्विष्टकृतः पार्वणौ होमौ समृद्धि-
होमाः काम्यहोमाश्च ॥४॥ पूर्णापश्चादिति पौर्णमास्याम्
॥५॥ यत्ते देवा अकृण्वन् भागधेयमित्यमावास्यायाम् ॥६॥
आकूत्यै त्वा स्वाहा। कामाय त्वा स्वाहा । समृद्धे
त्वा स्वाहा। आकूत्यै त्वा कामाय त्वा समृद्धे त्वा स्वाहा।
ऋचा स्तोमं समर्धय गायत्रेण रथन्तरम्। बृहद्गायत्रवर्तनि
स्वाहा॥७॥ पृथिव्यामग्नये समनमन्निति सन्नतिभिश्च ॥८॥
प्रजापते न त्वदेतान्यन्य इति च॥९॥ उपस्तीर्याज्यं सर्वेषा-
मुत्तरतः सकृत्सकृदवदाय द्विरवत्तमभिघारयति ॥१०॥ न
हवींषि ॥११॥ आ देवाना मपि पन्थामगन्मयच्छक्रवाम तद्-
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