कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
( १६ )
१४ सू० । बलास ( क्षय रोग Consumption ) रोग के निवारण
का मंत्र ।
१६ सू० । चक्षु रोग ( Ophthalmia ) आरोग्य का मंत्र टीकाकार
गण इस सूक्त को चक्षु रोग में सरिसों का ( mustard ) व्यवहार सूचित
होता है । कौशिक इस सूत्र के मंत्र में ( ३०।१।७ ) इस सम्बन्ध में
विस्तृत व्यवस्था दृष्ट होती है । इस मंत्र के उच्चारण के साथ सरिसों वृक्ष
के यंत्र, सरसों के तैल सिक्त करके बान्ध देवे, सरसों के पत्ते का रस
सेवन करने को देवे । और पत्ते को पीस कर नेत्र के ऊपर प्रलेप करे ।
२० सू० । तक्षण ( १म का० २५ सू० । )
२१ सू० केशवृद्धि के मंत्र । ६ ठा काण्ड १३७ और १३ श सू० में
नितत्नी नामक लता को केश बढ़ाने के लिये की गई है इस नितत्नी
लता का स्वरूप स्थिर नही हुआ है । मंत्र में यहां तक कहा गया है जो
यह लता को जमदग्नि अपनी कन्या के लिये मट्टी से उखाड़ा था । इस
लता को सम्बोधन करके कहते हैं—“हे लते ! तू पुरातन केश को दृढ़
कर, नये केश को उत्पादन कर, और वर्तमान केशों को घन कर दो
( ६।१३६।२ ) । छठे काण्ड में ३० सू० में “शमी वृक्ष” ( Drosopis
spicogera or Acun sum ) केश बढ़ाने के लिये बुलाया
गया है ।
२४ सू० । शोथ ( Dropsry ) वक्षः पीड़ा ( heart disease ) इस
पीड़ा के लिये स्रोत ( सोते के ) के जल की व्यवस्था की गयी है ।
१ का० ८३ सूक्त में भी शोथका और भी एक मंत्र है । कौशिक सूत्र
( ३२।१४ ) २५ सू० शरीर के ऊपर गण्डमाला का मंत्र है । कौशिक सूत्र
( ३०।१४ ) ८३ सू० में एक और मंत्र है । ५७ सू० में गण्डमाला की
चिकित्सा में जालस गोमूत्र व्यवहृत हुआ है । ३० सू० में केश वृद्धि
के लिये शमी वृक्ष को बुलाया गया है । ( २१ सू० ) ३७ सू० रोग का
मूल कारण अप्सरा, गन्धर्व सबको दूर करने के लिये “अजशृङ्गी” को
( Odinapinata ) आह्वान किया गया है । ४४ सू० । देह से अत्यधिक
स्राव निवारण का मंत्र १म काण्ड, २रा सू० । ५७ सू० गण्डमाला की
दवा इस सूक्त में कही गयी है । जालस् अर्थात् गोमूत्र इस रोग में
व्यवहृत होता है । कौशिक सूत्र (२२।११।१३) में वर्णित है जो गण्डमाला
पर गोमूत्र का फेन लेपन करे । ( २५।८३ सू० देखो । ८०म सू० पक्षा-
घात आरोग्य करने में सूर्य को इस सूक्त से स्तव किया गया है । ८३ म
( १७ )
सू० इस सू० में अपची गण्डमाला (केशव और सायन) रोग के आरो-
ग्यार्थ मंत्र विहित हुआ है। २५ सू० देखो। ८५म सू० में यक्ष्मा रोग को
दूर करने के लिये “वरण” वृक्ष के (भरणी Luffa foctidas or
Caratoena roseburgeict) यन्त्र धारण की व्यवस्था कियी है।
कौशिक' सूत्र में (२६।३३।३७) यह बन्धन प्रक्रिया सविस्तर वर्णित है।
९० सू०। इस सू० में—“शूल रोग” (कौलिक) निवारण कल्प में
मंत्र है। इस सू० में किसी भी दवा का नाम नहीं है। केवल मंत्र की
सहायता से प्राचीन लोग इस रोग को आरोग्य करते थे। ९१ सू० में
जल मिश्रित यव (barley) 'सब रोगों में प्रयुज्य होती—इस सूक्त
में लिखा है। ९५ सू० में तक्षण कां० १।२५ सू० १०२ सू० तक्षण—१
काण्ड २५ सू० १०९ क्षुत रोग की चिकित्सा में पिप्पली का (papper
carm) व्यवहार सूचित होता है। ४ थे कां० में १२ सू० १११ सू० में
पागलपन की दवा है। ११६ सू० में तक्षण—१ म काण्ड, २५ सू०। १२७
सू०। इस सूक्त में “चोपद्रु वृक्ष” सब रोगों के प्रशमनार्थ उल्लेख किया
गया है। १३६–१३७ इन दो सूक्तों में केश वृद्धि के लिये नितत्नी नामक
लता को सम्बोधन किया गया है। २१ सू० देखो।
सप्तम काण्ड ॥ ७ ॥
५६ सू० सर्प विष का मंत्र—५ म काण्ड १३ सू० ७४।७६ सू० इन
दो सू० में—“जायान्य” नामक अर्बुद की चिकित्सा का मंत्र है। ८३
सू० में शोथ रोग का मंत्र है।
चतुर्दश काण्ड ॥ १४ ॥
३८ सू०। २ काण्ड। ४ सू० देखो।
उनविंश काण्ड ॥ १६ ॥
३५ सू०। २ रा काण्ड और ४ था सू० देखो। इस सू० में गुग्गूल
का (Beclelleum) मीठे गगनपूर का रोग नाशक की शक्ति का वर्णन
है। ३९ सू० में कुष्ठवृक्ष की आराधना का मंत्र है। इस स्थान में कुष्ठवृक्ष
को सब प्रकार के रोग जैसे—ज्वर, कास, रोग इत्यादि आरोग्य करने
के लिये बुलाया गया है। १ म काण्ड २५ सू०।
( १८ )
उपरि उल्लिखित तालिका देखने से पता लगता है जो, प्राचीन हिन्दुओं
की चिकित्सा सम्बन्धी ज्ञान का उत्तम आभास पाया जाता है । अथर्व-
वेद में जिन सब रोगों की चिकित्सा या जिन सब भेषजों का रोग
नाशक क्षमता मन्त्रों में सूचित हुई है उन्हीं सब रोग और भेषज के
सम्बन्ध में कौशिक सूत्र में विस्तृत वर्णन है ।
और देशव्यापी अद्भुत या अलौकि-सामूहिक दैविक घटना होने
की सूचना-प्रकृति के विपरीत कार्यों से वर्षों, महीनों, दिनों पहिले से
होती है । इसका भी विशेष उपयोगी वर्णन आया है । यह कौ० सू०
अनेकों उपकारी उपदेश रत्नों से पूरित सबको देखने तथा रखने योग्य है।
भवदीय—
उदयनारायण सिंह ।
❀ श्रीगणेशाय नमः ❀
❖ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ❖
अथ विधिं वक्ष्यामः॥ १ ॥ स पुनराम्नायप्रत्ययः
॥ २ ॥ आम्नायः पुनर्मन्त्राश्च ब्राह्मणानि च ॥ ३ ॥ तद्यथा
ब्राह्मणविधिरेवं कर्मलिङ्गा मन्त्राः॥ ४ ॥ तथान्यार्थाः ॥५॥
तथा ब्राह्मणलिङ्गा मन्त्राः॥ ६॥ तदभावे सम्प्रदायः ॥७॥
प्रमुक्तत्वाद्ब्राह्मणानाम् ॥ ८ ॥ यज्ञं व्याख्यास्यामो देवानां
पितॄणां च ॥ ९ ॥ प्राङ्मुख उपांशु करोति ॥१०॥ यज्ञो-
पवीती देवानाम् ॥११॥ प्राचीनावीती पितॄणाम् ॥१२॥
भाषार्थः—वेद की संहिता भाग को पढ़ लेने के अनन्तर वेदमंत्रों से यज्ञ,
संस्कार आदि का विधान हुआ है। अब उस विधि को कहते हैं। अर्थात्
शान्तिक, पौष्टिक, आभिचारिक और अद्भुत कर्म संहिताविधि में उप-
दिष्ट है। यह कर्म तीन प्रकार का है। विधिकर्म, अविधिकर्म और
उच्छ्रय कर्म। इनमें से विधिकर्म तीन प्रकार का है।—प्रत्यक्ष, अनुमान
और शब्द ॥१॥ उक्त विधि का ज्ञान वेद से होता है। और वेद में विधि
ज्ञापक मंत्र हैं और ब्राह्मण ग्रन्थ में वेद मंत्रों का कर्मों में विनियोग है
॥२॥ जैसे ब्राह्मण विधि हैं उसी प्रकार कर्म-लिङ्ग मंत्र हैं ॥३॥४॥
इसके अभाव में वेदाचार्यों की परम्परा से यज्ञादिकों के करने की
प्राचीन प्रथा भी प्रमाण है ॥५॥६॥७॥ आचार्यों के पठन-पाठन के विश्शृ-
ङ्खल होने और पढ़ाने की परम्परा नष्ट होने और प्रमाणों की विस्मृति
होने से यज्ञादि करने की प्रक्रिया ने विकृत रूप धारण कर लिया है ॥८॥
अतएव देवताओं एवं पितरों के यज्ञों का उपदेश करेंगे ॥९॥ पूर्व मुख
होकर देवकार्य उपांशु ( बिना मंत्र बोले ) करे ॥१०॥ देवकार्य करने में
यजमान यज्ञोपवीती होकर करे और पितृकार्य में प्राचीनावीती हो
करे ॥११॥१२॥
२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
प्रागुदग्वा देवानाम् ॥१३॥ दक्षिणा पितॄणाम् ॥१४॥
प्रागुदगपवर्गं देवानाम् ॥१५॥ दक्षिणप्रत्यगपवर्गं पितॄ-
णाम् ॥१६॥ सकृत्कर्म पितॄणां त्र्यवरार्धं देवानाम् ॥१७॥
यथादिष्टं वा ॥१८॥ अभिदक्षिणमाचारो देवानां प्रसवयं
पितॄणाम् ॥१९॥ स्वाहाकारवषट्कारप्रदाना देवाः ॥२०॥
स्वधाकारनमस्कारप्रदानाः पितरः ॥२१॥ उपमूललूनं बर्हिः
पितॄणाम् ॥२२॥ पर्वसु देवानाम् ॥२३॥ प्रयच्छ पर्शु-
मिति दर्भाहाराय दात्रं प्रयच्छति ॥२४॥ ओषधीर्दन्तु
पर्वन्नित्युपरि पर्वणां लूत्वा तूष्णीमाहृत्योत्तरतोऽग्नेरुप-
सादयति ॥२५॥ नाग्निं विपर्यावर्तेत ॥२६॥ नान्तरा
यज्ञाङ्गानि व्यवेयात् ॥२७॥ दक्षिणं जानु प्रभूज्य जुहोति
पूर्व या उत्तर मुख करके दैवकर्म और दक्षिण की ओर मुख कर
के पितृकर्म करे ॥१३॥१४॥ दैवकर्म की समाप्ति पूर्व या उत्तर
दिशा में और दक्षिण या पश्चिम दिशा में पितृकर्म की समाप्ति करे
॥१५॥१६॥ पितरों का कर्म एक ही बार होता है। और तीन अवरार्ध
कर्म देवताओं का होता है ॥१७॥ या आदेशानुसार कर्म करे ॥१८॥
दहिने हाथ को सम्मुख करके दैवकर्म करे और अपसव्य होके पितृकर्म
करे ॥१९॥ देवताओं के नाम के अन्त में स्वाहा, वषट् जोड़कर (चतुर्थी
विभक्ति के पीछे ) देवताओं को हवन आदि करे ॥२०॥ और पितरों के
लिये “स्वधा” और “नमः” लगाकर पिण्डादि देवे ॥२१॥ मूल सहित कुश
पितरों के लिये (जड़ के पास से टूटा) ॥२२॥ और जो कुश गिरहों पर
से टूटा हो उसका व्यवहार देवकार्य में करे ॥२३॥ “प्रयच्छ पर्शुम्”
इत्यादि मंत्र पढ़ के दाँत वाला अस्त्र कुश को काट कर लाने के लिये
देवे ॥२४॥ “ओषधीर्दान्तुपर्वन्०” मंत्र पढ़कर कुश के गिरहों पर से
काटकर तूष्णीं लावे और अग्नि के उत्तर भाग में धर देवे ॥२५॥ एवं
यजमान या उसकी पत्नी या ब्रह्मा कार्य समाप्त होने पर अग्नि के विरुद्ध
मुख होके न जावे ॥२६॥ यज्ञ की वेदी की ओर अङ्गों को न फैलावे
॥२७॥ दहिने जानु को भूमि पर टेक कर आहुति देवे ॥२८॥ चतुर्दशी
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ३
॥२८॥ या पूर्वा पौर्णमासी सानुमतिर्योत्तरा सा राका
॥२९॥ या पूर्वामावास्या सा सिनीवाली योत्तरा सा
कुहूः ॥३०॥ अद्योपवसथ इत्युपवत्सद्भक्तमश्नाति ॥३१॥
मधुलवणमांसमाषवर्जम् ॥ ३२ ॥ ममाग्ने वर्च इति
समिध आधाय व्रतमुपैति ॥३३॥ व्रतेन त्वं व्रतपत इति
वा ॥३४॥ ब्रह्मचारी व्रत्यधः शयीत ॥३५॥ प्रातर्हुतेऽग्नौ
कर्मणे वां वेषाय वां सुकृताय वामिति पाणी प्रक्षाल्या-
परेणाग्नेर्दर्भान्नास्तीर्य तेषूत्तरमानडुहं रोहितं चर्म प्राग्-
ग्रीवोत्तरलोम प्रस्तीर्य पवित्रे कुरुते ॥ ३६ ॥ दर्भावप्र-
च्छिन्नाग्रान्तौ प्रक्षाल्यानुलोममनुमार्ष्टि विष्णोर्मनसा पूते
स्थ इति ॥ ३७ ॥ १ ॥
त्वं भूमिमस्त्येष्योजसा त्वं वेद्यां सीदसि चारुरध्वरे।
त्वां पवित्रमृषयो भरन्तस्त्वं पुनीहि दुरितान्यस्मदिति
युक्त पौर्णमासी को अनुमति और परिवा युक्त पौर्णमासी को राका कहते
हैं ॥२९॥ चतुर्दशी युक्त अमावास्या को सिनीवाली और परिवा युक्त
अमावास्या को कुहू कहते हैं ॥३०॥ चतुर्दशी युक्त पौर्णमासी पूर्वा कह-
लाती है और परिवा युक्त उत्तरा कहलाती है। इसी प्रकार पूर्वा अमावास्या
को उपवास करे एवं उत्तरा अमावास्या को यज्ञ करे ॥ और उपवास करने
वाला भात खावे ॥ और क्षार लवण, मांस, उड़ीद को न खावे ॥३१॥३२॥
“ममाग्ने वर्च०” इत्यादि पढ़कर समिध लेवे एवं व्रत करे ॥३३॥ या
“व्रतेन त्वं व्रतपत०” से करे ॥३४॥ व्रत करनेवाला ब्रह्मचारी भूमि पर
सोवे, खाट आदि पर नहीं ॥३५॥ प्रातःकाल की आहुतियाँ अग्नि में
डालकर “कर्मणे वां०” इत्यादि मंत्र से लाल रंग के बैल के चर्म को पूर्व
की ओर गला और ऊपर को लोम भाग करके बिछाकर कुश के पवित्रे को
बनावे ॥३६॥ कुशों के प्रान्त भाग को तोड़कर जल से प्रक्षालन कर
“विष्णोर्मनसा पूते स्थ०” मंत्र से अनुमार्जन करे ॥३७॥ यह प्रथम
कण्डिका समाप्त हुई ॥१॥
“त्वं भूमि मत्स्येष्योजसा०” इत्यादि मंत्र से पवित्रे को चमड़े और
४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
पवित्रे अन्तर्धाय हविर्निर्वपति देवस्य त्वा सवितुः प्रसवे-
ऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्यामग्नये जुष्टं निर्वपामीति
॥१॥ एवमग्नीषोमाभ्यामिति ॥२॥ इन्द्राग्निभ्यामित्यमावा-
स्यायाम् ॥३॥ नित्यं पूर्वमाग्नेयम् ॥४॥ निरुप्तं पवित्राभ्यां
प्रोक्षत्यमुष्मै त्वा जुष्टमिति यथादेवतम् ॥ ५ ॥ उलूख-
लमुसलं शूर्पं प्रक्षालितं चर्मण्याधाय व्रीहीनुलूखल ओप्या-
वघ्नंस्त्रिर्हविष्कृता वाचं विसृजति हविष्कृदा द्रवेहीति
॥६॥ अपहत्य सुफलीकृतान्कृत्वा त्रिः प्रक्षाल्य तण्डु-
लानग्ने चरुर्यज्ञियस्त्वाध्यरुक्षदिति चरुमधिदधाति ॥७॥
शुद्धाः पूता इत्युदकमासिञ्चति ॥८॥ ब्रह्मणा शुद्धा इति
तण्डुलान् ॥९॥ परित्वाग्ने पुरं वयमिति त्रिः पर्यग्नि
करोति ॥१०॥ मेक्षणेन त्रिः प्रदक्षिणमुदायौति ॥११॥
अत ऊर्ध्वं यथाकामम् ॥१२॥ उत्तरतोऽग्नेरुपसादयती-
व्रीहियों के भीतर धर कर "देवस्य त्वा" इत्यादि मंत्र से हवि का निर्वपण
करे ॥१॥२॥३॥ सदैव पहिले आग्नेयविधि को करना चाहिये ॥४॥ निरुप्त
हवि को पवित्रे से "अमुष्मै त्वा०" ( जिस देवता के नाम हवि
करना हो उसका नाम लेकर ) मंत्र से प्रोक्षण करे ॥५॥ पुनः उलूखल,
मुसल, सूप, जो प्रक्षालन किये हुए हों, उनको चमड़े में धरकर
धान्यों को ओखरी में डालकर तीन बार कूट कर "हविष्कृदा द्रवेहि०"
से वाक् संयम करे । और व्रीहि को कूट छाट कर सूप से फटक कर
साफ करके चावलों को तीन बार प्रक्षालन कर "अग्ने चरुर्यज्ञियस्त्वा०"
इत्यादि मंत्र से चरु को आग पर चढ़ावे और "शुद्धाः पूताः०" से जल
सिक्त करे ॥६॥७॥८॥ "ब्रह्मणा शुद्धा०" से चावलों को जल से सींचे ।
"परित्वाग्ने०" इत्यादि मंत्र से तीन बार चरु का पर्यग्नि करण करे ॥९॥
॥१०॥ मेक्षण द्वारा तीन बार प्रदक्षिण चलावे ॥११॥ इसके पश्चात्
घोटना, या न घोटना या प्रदक्षिण करना, या न करना—अपनी इच्छा
पर है करे या न करे ॥१२॥ अग्नि के उत्तर भाग में इध्मों को और इसके
ध्मम् ॥१३॥ उत्तरं बर्हिः ॥१४॥ अग्नये त्वा जुष्टं प्रोक्षा-
मीतीध्मम् ॥१५॥ पृथिव्या इति बर्हिः ॥१६॥ दर्भमुष्टिम-
भ्युक्ष्य पश्चादग्नेः प्रागग्रं निदधात्यूर्णम्रदं प्रथस्व स्वासस्थं
देवेभ्य इति ॥१७॥ दर्भाणामपादाय ऋषीणां प्रस्तरोऽसोति
दक्षिणतोऽग्नेर्ब्रह्मासनं निदधाति ॥१८॥ पुरस्तादग्ने-
रास्तीर्य तेषां मूलान्यपरेषां प्रान्तैरवच्छादयन्परिसर्पति
दक्षिणेनाग्निमा पश्चार्धात् ॥१९॥ परिस्तृणीहीति सम्प्रे-
ष्यति ॥२०॥ देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां
पूष्णो हस्ताभ्यां प्रसूतः प्रशिषा परिस्तृणामीति ॥२१॥
एवमुत्तरतोऽयुजो धातून्कुर्वन् ॥२२॥ यत्र समागच्छन्ति
तद्दक्षिणोत्तरं करोति ॥२३॥ स्तीर्णं प्रोक्षति हविषां त्वा
उत्तर में बर्हि को धरे ॥१३॥१४॥ “अग्नये त्वा०” इत्यादि मंत्र से इध्मों का
प्रोक्षण करे ॥१५॥ “पृथिव्या ०” से कुश का प्रोक्षण करे ॥१६॥ “ऊर्ण म्रदं
प्रथस्व०” इत्यादि मंत्र से दाभ की मुष्टि को अभ्युक्षण करके अग्नि के
पश्चिम भाग में पूर्वाग्र धरे ॥१७॥ और कुशों को लाकर “ऋषीणां ०”
मंत्र से अग्नि के दक्षिण भाग में ब्रह्मा का आसन धरे ॥१८॥ अग्नि के
आगे कुशों को इस प्रकार बिछावे जिसमें. कुशों की जड़ सब अन्य कुशों
के प्रान्त भाग को ढाकते हुए रहें और दक्षिण अर्थात् वेदि के मध्य
प्रदेश से लेकर बिछावे—जिसमें सब कुशों के अन्त भाग को ढाकता
हुआ अग्नि के दक्षिण भाग तक और वेदि के पश्चिम भाग तक बिछ
जावें ॥१९॥ तब ब्रह्मा कर्त्ता को “परिस्तृणीहि०” संप्रेषण करे ॥२०॥
“देवस्य त्वा०” इत्यादि से वेदि के स्तरण के लिये कुश की मुट्ठी को पकड़
कर बिछावे ॥२१॥ जिस प्रकार वेदि के दक्षिणार्द्ध में संप्रेषणादि द्वारा
स्तरण किया है उसी प्रकार वेदि के उत्तरार्द्ध में भी संप्रेषणादि से स्तरण
करना चाहिये । दक्षिण भाग में जितनी मुट्ठियाँ हों उतनी ही उत्तरभाग
में करे । उत्तर भाग में बे जोड़ ( विषम ) कहा गया है, इससे दक्षिण
भाग में एकत्र समझने के लिये जानो ॥२२॥ दक्षिण उत्तर भाग के
स्तरणों का संगम जहाँ हो वह दक्षिण उपकारि कार्य उत्तर का जानो
६ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
जुष्टं प्रोक्षामीति ॥२४॥ नानभ्युक्षितं संस्तीर्णमुपयोगं
लभेत ॥२५॥ नैधोऽभ्याधानम् ॥२६॥ नानुत्पूतं हविः॥२७॥
नाप्रोक्षितं यज्ञाङ्गम् ॥२८॥ तस्मिन्प्रक्षालितोपवातानि
निदधाति ॥२९॥ स्रुवमाज्यधानीं च ॥३०॥ विलीनपूत-
माज्यं गृहीत्वाधिश्रित्य पर्यग्नि कृत्वोदगुद्वास्य पश्चाद-
ग्नेरुपसाद्योदगग्राभ्यां पवित्राभ्यामुत्पुनाति॥३१॥विष्णो-
र्मनसा पूतमसि ॥३२॥ देवस्त्वा सवितोत्पुनातु ॥३३॥
अच्छिद्रेण त्वा पवित्रेण शतधारेण सहस्रधारेण सुप्वो-
त्पुनामीति तृतीयम् ॥३४॥ तूष्णीं चतुर्थम् ॥३५॥ शृतं
हविरभिघारयति मध्वा समञ्जन्घृतवत्कराथेति ॥३६॥
अभिघार्योदञ्चमुद्वासयत्युद्वासयाग्नेः शृतमकर्म हव्यमा-
सीद् पृष्ठममृतस्य धामेति ॥३७॥ पश्चादाज्यस्य निधाया-
लङ्कृत्य समानेनोत्पुनाति ॥३८॥ अदारसृदित्यवेक्षते ॥३९॥
॥२३॥ बिछाये हुओं का “हविषां त्वा०” मंत्र से प्रोक्षण करे ॥२४॥
बिछाये हुए कुश विना अभ्युक्षण के काम के योग्य नहीं होते ॥२५॥
बिना अभ्युक्षण के समिद् का आधान भी नहीं हो सकता है॥२६॥ विना
उत्पवन के हवि—नहीं हो सकती है। और न विना प्रोक्षण के यज्ञ का
अङ्ग ही हो सकता है ॥२७।२८॥ उस प्रक्षालित एवं उत्पवन किये उप-
करणों को यज्ञ के लिये आसादन करे। स्रुव और आज्यधानी को भी
॥२९।३०॥ पिघले हुए शुद्ध घृत को अग्नि पर चढ़ाकर गर्म कर और
पर्यग्नि करके तथा शुद्ध जल से उद्वासन करके अग्नि के पश्चिम भाग में
धर कर उत्तराग्र पवित्रे से केश, कीट, आदि से रहित कर देवे-जिसका
मंत्र “विष्णोर्मनसा पूतमसि०” इत्यादि मंत्र पढ़ कर उत्पवन्न तीसरी
बार करे। और चौथी बार विना मंत्र के करे ॥३१।३२।३३।३४।३५॥
गर्म किये हुए आज्य को “मध्वा०” इत्यादि मंत्र से अभिघार दे कर
“उद्वासयत्यु०” इत्यादि मंत्र से उत्तर की ओर उद्वासन करे ॥३६।३७॥
आज्य के पीछे धर कर अलङ्कृत्य कर के “समानेन०” से उत्पवन करे
॥३८॥ “अदार सृद्०” मंत्र से उठ कर देखे ॥३९॥
उत्तिष्ठतेत्यैन्द्रम् ॥४०॥ अग्निर्भूम्यामिति तिसृभिरुपस-
मादधात्यस्मै क्षत्राण्येतमिध्ममिति वा ॥४१॥२॥
युनज्मि त्वा ब्रह्मणा दैव्येन हव्यायास्मै वोढवे जात-
वेदः । इन्धानास्त्वा सुप्रजसः सुवीरा ज्योग्जीवेम बलि-
हृतो वयं त इति ॥१॥ दक्षिणतो जाङ्ग्यायनमुदपात्रमुप-
साद्याभिमन्त्रयते तथोदपात्रं धारय यथाग्रे ब्रह्मणस्पतिः ॥
सत्यधर्मा अदीधरद्देवस्य सवितुः सव इति ॥२॥ अथो-
दकमासिञ्चति, इहेत देवीरमृतं वसाना हिरण्यवर्णा अन-
वद्यरूपाः । आपः समुद्रो वरुणश्च राजा संपातभागान्
हविषो जुषन्ताम् ॥ इन्द्र प्रशिष्टा वरुणप्रसूता अपः
समुद्राद्दिवमुद्वहन्तु । इन्द्रप्रशिष्टा वरुणप्रसूता दिव-
स्पृथिव्याः श्रियमा वहन्त्विति ॥३॥ ऋतं त्वा सत्येन प-
रिषिञ्चामि जातवेद इति सह हविर्भिः पर्युक्ष्य जीवाभि-
राचम्योपोत्थाय वेदप्रपद्भिः प्रपद्यत ओं प्रपद्ये भूः प्रपद्ये
भुवः प्रपद्ये स्वः प्रपद्ये जनत्प्रपद्य इति ॥४॥ प्रपद्य पश्चा-
हस्तीर्णस्य दर्भानास्तीर्याहे दैधिषव्योदतस्तिष्ठान्यस्य सदने
भाषार्थ—“उत्तिष्ठत०” से ऐन्द्रहवि को देखे ॥४०॥ “अग्निर्भूम्यां०”
इत्यादि तीन ऋचाओं से आधान करे । या “अस्मै क्षत्राण्येत०” से
इध्म को देखे ॥४१॥४२॥ यह दूसरी कण्डिका समाप्त हुई ॥ २ ॥
“युनज्मिन्त्वे०” इन पाँच ऋचाओं से इध्म का आधान करे । और
काँसे का पात्र लाकर “तथोदपात्रं धारय०” इत्यादि मंत्र से अभिमंत्रण
करे ॥१॥२॥ अन्य जल से “इहेत देवी०” इत्यादि मंत्रों को पढ़ कर
आसिंचन करे ॥३॥ “ऋतं त्वा सत्येन०” इत्यादि से हवि के साथ पर्युक्षण
कर के “जीवास्थ०” इत्यादि चार मंत्रों से एक बार जल भक्षण करे,
कर्त्ता और ब्रह्मा जल से आचमन करे॥ उपोत्थाय वचन से मंत्र की प्रतीति
कराई गई है । और “वेदप्रपद्भिः” से प्रपद् करे ॥ “ओं प्रपद्ये भूः०”
इत्यादि से प्रपद् करावे ॥४॥ प्रपद् कराके पश्चिम भाग में बिछाये हुए
८ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
सीद योऽस्मत्पाकतर इति ब्रह्मासनमन्वीक्षते ॥५॥
निरस्तः पराग्वसुः सह पाप्मना निरस्तः सोऽस्तु योऽस्मा-
न्द्वेष्टि यश्च वयं द्विष्म इति दक्षिणा तृणं निरस्यति
॥६॥ तदन्वालभ्य जपतीदमहमर्वाग्वसोः सदने सीदा-
म्यृतस्य सदने सीदामि सत्त्यस्य सदने सीदामीष्टस्य
सदने सीदामि पूर्त्तस्य सदने सीदामि मामृषदैव बर्हिः
स्वासस्थं त्वाध्यासदेयमूर्णम्रदमनभिशोकम् ॥७॥ विमृ-
ग्वरीमित्युपविश्यासनीयं ब्रह्मजपं जपति बृहस्पति-
र्ब्रह्मा ब्रह्मसदन आसिष्यते बृहस्पते यज्ञं गोपाय यदुदुद्गत
उन्निवतः शकेयमिति ॥८॥ दर्भैः स्रुवं निर्मृज्य निष्ष्टं
रक्षो निष्ष्टा अरातयः प्रत्युष्टं रक्षः प्रत्युष्टा अरातय
इति प्रतप्य
शं त्वा गृह्णे सहस्रपोषायेति तृतीयम् ॥१३॥ ओं
जनच्छं त्वा गृह्णेऽपरिमितपोषायेति चतुर्थम् ॥१४॥
राजकर्माभिचारिकेष्वमुष्य त्वा प्राणाय गृह्णेऽपानाय
व्यानाय समानायोदानायेति पञ्चमम् ॥१५॥ अग्नावग्नि-
र्हृदा पूतं पुरस्ताद्युक्तो यज्ञस्य चक्षुरिति जुहोति ॥१६॥
पश्चादग्नेर्मध्यदेशे समानत्र पुरस्ताद्धोमान् ॥१७॥ दक्षि-
णेनाग्निमुदपात्र आज्याहुतीनां सम्पातानानयति ॥१८॥
पुरस्ताद्धोम आज्यभागः संस्थितहोमः समृद्धिः शान्ता-
नामिति ॥१९॥ एतावाज्यभागौ ॥२०॥ ॥३॥
वृष्णे बृहते स्वविदे अग्नये शुल्कं हरामि त्विषीमते ।
स न स्थिरान्बलवतः कृणोतु ज्योक् नो जीवात्वे
दधात्वग्नये स्वाहेत्युत्तरपूर्वार्द्धे आग्नेयमाज्यभागं
जुहोति॥१॥दक्षिणपूर्वार्द्धे सोमाय त्वं सोम दिव्यो नृचक्षाः
सुगा अस्मभ्यं पथो अनुख्याः । अभि नो गोत्रं विदुष इव
नेषोऽछा नो वाचमुशतीं जिगासि सोमाय स्वाहेति ॥२॥
को, “ओं जनच्छं०” इत्यादि से चौथे को पकड़े ॥११॥१२॥१३॥१४॥
राजकर्म और आभिचारिक कर्मों में “अमुष्य त्वा०” इत्यादि से पञ्चम
को पकड़े ॥१५॥ “अग्नावग्निर्हृदा०” इत्यादि से अविधिकर्म होने से एक
एक स्रुव करके आज्यधानी से आज्य की आहुतियाँ देवे ॥१६॥ अग्नि के
पश्चात् मध्य देश में समान ही पुरस्ताद्धोम, अग्नि के दक्षिण भाग में
जलपात्र आज्याहुतियों के संपातों को लावे अर्थात् हुतशेषों को लावे ॥
पुरस्ताद्धोम, आज्य भाग, संस्थित होम, समृद्धि होम, और शान्त होमों
के बचे होमों को उदपात्र में रक्खे और इन आज्यभाग की दो आहुतियों
को भी ॥१७॥१८॥१९॥२०॥ यह तीसरी कण्डिका समाप्त हुई ॥ ३ ॥
“वृष्णे बृहते०” इत्यादि मंत्र से अग्नि के उत्तर पूर्वार्द्ध में आग्नेय
आज्य भाग की आहुति देवे ॥१॥ और दक्षिण पूर्वार्द्ध में “त्वं सोम
दिव्यो०” इत्यादि से आहुति करे ॥२॥ पुरस्ताद्धोम और आज्यभाग के
२
१० अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
मध्ये हविः ॥३॥ उपस्तीर्याज्यं संहताभ्यामङ्गुलिभ्यां
द्विर्हविषोऽवद्यति मध्यात्पूर्वार्द्धाच्च ॥४॥ अवत्तमभिघार्य
द्विर्हविः प्रत्यभिघारयति ॥५॥ यतो यतोऽवद्यति तदनु-
पूर्वम् ॥६॥ एवं सर्वाण्यवदानानि ॥७॥ अन्यत्र सौविष्ट-
कृतात् ॥८॥ उदेनमुत्तरं नयेति पुरस्ताद्धोमसंहतां पूर्वाम्
॥९॥ एवं पूर्वा पूर्वा संहतां जुहोति ॥१०॥ स्वाहान्ताभिः
प्रत्यूचं होमाः ॥११॥ यामुत्तरा मग्नेराज्यभागस्य जुहोति
रक्षोदेवत्या सा यां दक्षिणतः सोमस्य पितृदेवत्या सा
॥१२॥ तस्मादन्तरा होतव्या देवलोक एव हूयन्ते ॥१३॥
यां हुत्वा पूर्वामपरां जुहोति सापक्रामन्ती स पापी-
यान्यजमानो भवति ॥१४॥ यां परां परां संहतां जुहोति
साभिक्रामन्ती स वसीयान् यजमानो भवति ॥१५॥
होम के मध्य भाग में प्रधान हवि की आहुतियाँ देवे ॥३॥ आज्य को
उतार कर स्रुव से उपस्तरण मिली हुई दो अङ्गुलियों से ( मध्यमा और
प्रदेशिनी से ) स्रुच में एक स्रुव धर कर दो अङ्गुलियों से अवदान करे
पूर्वार्द्ध मध्य से ॥४॥ अवदान को अभिघार कर दो बार आहुति कर
के पुनः अभिघार देवे ॥५॥ जैसे २ अवदान करे उसी क्रम से उस हवि
का ढार देवे ॥६॥ इसी प्रकार उक्त अवदान नियम से प्रत्येक ऋचा से
अवदान करे ॥७॥ सौविष्ट कृत को छोड़ कर अन्यत्र समझना ॥८॥
“उदेनमुत्तरं नय०” इस प्रथम ऋचा से पुरस्ताद्धोम देश की आहुति
देवे ॥९॥ इस २ प्रकार पूर्व २ देश में मिली हुई पूर्व २ आहुतियाँ देवे
॥१०॥ प्रत्येक आहुति के स्वाहान्त मंत्र के साथ करे ॥११॥ अग्नि के
उत्तर भाग में जो आज्य भाग की आहुति होती है वह रक्षो देवता के
लिये जानो । जो दक्षिण भाग में सोम की आहुति होती है वह पितरों
के लिये जानो ॥१२॥ इसलिये मध्य में आहुति देवे—यह आहूति देव
लोक ही में होती है जानो ॥१३॥ जिस आहुति करके—पूर्वा अपरा
आहुति होती है, वह अपक्रामन्ती नाम की आहुति है जिसके करने से
यजमान पापी होता है ॥१४॥ जो परा परा मिली आहुति होती है
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ११
यामनग्नौ जुहोति सान्धा तया चक्षुर्यजमानस्य मीयते
सोऽन्धंभावुको यजमानो भवति ॥१६॥ यां धूमे जुहोति
सा तमसि हूयते सो ऽरोचको यजमानो भवति ॥१७॥
यां ज्योतिष्मति जुहोति तया ब्रह्मवर्चसी भवति तस्मा-
ज्ज्योतिष्मति होतव्यम् ॥१८॥ एवमस्मै क्षत्रमग्नीषोमा-
विह्यग्नीषोमीयस्य ॥१९॥४॥
अग्नीषोमा सवेदसा सहूती वनतं गिरः । सं देवत्रा
बभूवथुः ॥ युवमेतानि दिवि रोचनान्यग्निश्च सोम
सक्रतू अधत्तम् । युवं सिन्धूँरभिशस्तेरवद्यादग्नीषोमा-
वमुञ्चतं गृभीतान् ॥ अग्नीषोमा य आहुतिं यो वां
दाशाद्धविष्कृतिम् । स प्रजया सुवीर्यं विश्वमायुर्व्य-
श्नवत् ॥१॥ इन्द्राग्नी रोचना दिवः परि वाजेषु भूषथः ।
तद्वां चेति प्रवीर्यम् ॥ श्रथद्वृत्रमुत सनोति वाज-
मिन्द्रा यो अग्नी स हुरी सपर्यात् । इरज्यन्ता वस्व्व्यस्य
भूरेः सहस्तमा सहसा वाजयन्ता ॥ इन्द्राग्नी अस्मान्
रक्षतां यौ प्रजानां प्रजावती । स प्रजया सुवीर्यं विश्व-
मायुर्व्यश्नवत् ॥ गोमद्धिरण्यवद्वसु यद्वामश्वावदीमहे ।
उसको अभिक्रामन्ती कहते हैं-उससे यजमान ईश्वर ( शक्तिशाली )
होता है ॥१५॥ जो आहुति अग्नि बुत जाने पर भस्म में होती है उसका
करने वाला यजमान नेत्र से दृष्टि हीन होता है ॥१६॥ जो धूमयुक्त अग्नि
में आहुति करता है वह गुणयुक्त होता हुआ भी प्रकाश रहित होता है
॥१७॥ जो ज्वालायुक्त अग्नि में आहुति करता है वह यजमान ब्रह्म-
वर्चस्वी होता है अतएव ज्वालायुक्त अग्नि में आहुति देवे ॥१८॥ इसी
प्रकार “अस्मै क्षत्रम्०” इत्यादि से अग्नीषोमीय देवताओं की आहुतियाँ
देवे ॥१९॥ यह चौथी कण्डिका पूरी हुई ॥४॥
“अग्नीषोमा०” इत्यादि से लेकर “तद्वानेमहि स्वाहा” तक के मंत्रों
१२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
इन्द्राग्नीतद्द्वेनेमहि स्वाहेति ॥२॥ ऐन्द्राग्नस्य हविषोऽमा-
वास्यायाम् ॥३॥ प्राक्स्विष्टकृतः पार्वणौ होमौ समृद्धि-
होमाः काम्यहोमाश्च ॥४॥ पूर्णापश्चादिति पौर्णमास्याम्
॥५॥ यत्ते देवा अकृण्वन् भागधेयमित्यमावास्यायाम् ॥६॥
आकूत्यै त्वा स्वाहा। कामाय त्वा स्वाहा । समृद्धे
त्वा स्वाहा। आकूत्यै त्वा कामाय त्वा समृद्धे त्वा स्वाहा।
ऋचा स्तोमं समर्धय गायत्रेण रथन्तरम्। बृहद्गायत्रवर्तनि
स्वाहा॥७॥ पृथिव्यामग्नये समनमन्निति सन्नतिभिश्च ॥८॥
प्रजापते न त्वदेतान्यन्य इति च॥९॥ उपस्तीर्याज्यं सर्वेषा-
मुत्तरतः सकृत्सकृदवदाय द्विरवत्तमभिघारयति ॥१०॥ न
हवींषि ॥११॥ आ देवाना मपि पन्थामगन्मयच्छक्रवाम तद्-
[L
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १३
असि । अयासा मनसा कृतोऽस्यास्यं हव्यमूहिषे । अया
नो धेहि भेषजं स्वाहेत्यों स्वाहा भूः स्वाहा भुव स्वाहा
स्वः स्वाहों भूर्भुवःस्वःस्वाहेति ॥१२॥१३॥
यन्मे स्कन्नं मनसो जातवेदो यद्वा स्कन्दद्धविषो
यत्र यत्र । उत्प्रुषो विप्रुषः संजुहोमि सत्याः सन्तु यज-
मानस्य कामाः स्वाहेति ॥१॥ यन्मे स्कन्नं यदस्मृतीति
च स्कन्नास्मृति होमौ ॥२॥ यदद्य त्वा प्रयतीति संस्थि-
तहोमाः ॥३॥ मनसस्पत इत्युत्तमं चतुर्गृहीतेन ॥४॥
बर्हिराज्यशेषेऽनक्ति पृथिव्यै त्वेति मूलमन्तरिक्षाय त्वेति
मध्यं दिवे त्वेत्यग्रम् ॥५॥ एवं त्रिः ॥६॥ सं बर्हिरक्तमि-
त्यनुप्रहरति यथा दैवतम् ॥७॥ स्रुवमग्नौ धारयति ॥८॥
यदाज्यधान्यां तत्संस्रावयति संस्रावभागास्तविषा
बृहन्तः प्रस्तरेष्ठा बर्हिषदश्च देवाः । इमं यज्ञमभि विश्वे
गृणन्तः स्वाहा देवा अमृता मादयन्तामिति ॥९॥ स्रुवो
ऽसि घृतादनिशितः । सपत्नक्षयणो दिवि षीद । अन्त-
इत्यादि मंत्रों से आहुतियाँ देवे ॥१२॥१३॥ यह पाँचवी कण्डिका समाप्त
हुई ॥५॥
“यन्मे स्कन्नं०” इत्यादि से आज्य की आहुति देवे॥१॥“यन्मे स्कन्नं०”
और “अस्मृति” द्वारा स्कन्न और अस्मृति होम करे ॥२॥ “यदद्य०” से
संस्थित होम की आहुति करे ॥३॥ “मनसस्पते०” से संस्थित होम
के अन्त में चतुर्गृहीत द्वारा आहुति देवे ॥४॥ वेदि के पास के स्तरण को
लाकर आज्य शेष जो आज्यधानी में रहे उसको “पृथिव्यै०” से मूल
को “अन्तरिक्षाय त्वा०” से मध्य को “दिवे त्वा०” से अग्रभाग को
सिक्त करे ॥५॥ इसी प्रकार तीन बार करे ॥६॥ “सं बर्हिरक्तं०” इत्यादि
से यथा दैवत देवे ॥७॥ स्रुव को अग्नि में स्थापन करे ॥८॥ जो आज्य-
धानी में हो उसे “संस्रावभागा हविषा०” इत्यादि से संस्रव होम करे
॥९॥ और “स्रुवोऽसि०” इत्यादि से पूर्व भाग में दण्ड की भाँति स्रुवको
An exact, line-by-line transcription of the page into Markdown in Unicode Devanagari:
रिक्षे सीद पृथिव्यां सीदोत्तरोऽहं भूयासमधरे मत्सपला
इति स्रुवं प्राग्दण्डं निदधाति ॥१०॥ विमुञ्चामि
ब्रह्मणा जातवेदसमग्निं होतारमजरं रथस्पृतम् । सर्वा
देवानां जनिमानि विद्वान् यथाभागं वहतु हव्यमग्नि-
रग्नये स्वाहेति समिधमादधाति ॥११॥ एधोऽसीति
द्वितीयां समिद्सोति तृतीयाम् ॥१२॥ तेजोऽसीति मुखं
विमार्ष्टि ॥१३॥ दक्षिणेनाग्निं त्रीन्विष्णुकमान् क्रमते
विष्णोः क्रमोऽसीति दक्षिणेन पादेनानुसंहरति सव्यम्
॥१४॥ सूर्यस्यावृतमित्यभिदक्षिणमावर्तते ॥१५॥ अग-
न्मस्वरित्यादित्यमीक्षते ॥१६॥ इन्द्रस्य वचसा वयं मित्र-
स्य वरुणस्य च । ब्रह्मणा स्थापितं पात्रं पुनरुत्थापयाम-
सीत्यपरेणा
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १५
परिषिञ्च्योदञ्चि हविरुच्छिष्टान्युद्वासयति ॥२०॥ पूर्ण-
पात्रं दक्षिणा ॥२१॥ नादक्षिणं हविः कुर्वीत यः कुरुते
कृत्यामात्मनः कुरुत इति ब्राह्मणम् ॥२२॥ अन्वाहार्यं
ब्राह्मणान् भोजयति ॥२३॥ यद्वै यज्ञस्यानन्वितं भवति
तदन्वाहार्येणान्वाहियते॥२४॥ एतदन्वाहार्यस्यान्वाहार्य-
त्वम् ॥२५॥ ईड्या वा अन्ये देवाः सपर्य्येण्या अन्ये देवाः।
ईड्या देवा ब्राह्मणाः सपर्य्येण्याः ॥२६॥ यज्ञेनैवेड्यान्
प्रीणात्यन्वाहार्येण सपर्य्येण्यान् ॥२७॥ तेऽस्योभे प्रीता-
यज्ञे भवन्तीति॥२८॥ इमौ दर्शपूर्णमासौ व्याख्यातौ॥२९॥
दर्शपूर्णमासाभ्यां पाकयज्ञाः ॥३०॥ अथाप्यपरो हवन-
योगी भवति ॥३१॥ कुम्भीपाकादेव व्युद्धारं जुहुयात्
का आधान करे एवं “सत्यं त्वर्तेन०” इत्यादि से जल का छीटा दे उत्तर
की ओर जल के साथ बची हवि को कर्त्ता स्वीकार करे । पुनः ब्रह्मा और
कर्त्ता के पोषणों के योग्य पूर्णपात्र ( धान्यादि से भरा ) दक्षिणा में देवे
॥१९॥२०॥२१॥ बिना दक्षिणा के हवन न करे। क्योंकि जो ऐसा करता
है वह मानो अपना नाश करता है—ऐसा ब्राह्मणग्रंथ का वचन है ॥२२॥
ब्राह्मणों को ओदनादि भोजन करावे ॥२३॥ जो पदार्थ यज्ञ के अनुकूल
होता है वही श्रद्धापूर्वक व्यवहृत होता है अर्थात् यज्ञार्थ लाया जाता है
॥२४॥ यह अन्वाहार्य्य का अन्वाहार्य्यत्व है ॥२५॥ ईड्य वा पूज्य अन्य
देवता होते हैं और सपर्य्येण्य अन्य देवता होते हैं ।। जिनमें यज्ञ से
सत्कार योग्य देवगण होते हैं और वस्त्र, भोजन, धन, सेवा आदि से
पूजने योग्य ब्राह्मण होते हैं। अतएव यज्ञों द्वारा देवगण को और भोजनादि
द्वारा ब्राह्मणों को प्रसन्न करना चाहिये । ये दोनों ही ( देव, ब्राह्मण )
यजमान द्वारा यज्ञ में प्रसन्न होते हैं तब ही यज्ञों का फल यजमान को
होता है ॥२६॥२७॥२८॥ इन दोनों दर्श और पौर्णमास का व्याख्यान हुआ
और दर्श पौर्णमास द्वारा पाकयज्ञ सब कहे गये ॥२९॥३०॥ इसके अन-
न्तर दूसरा भी हवन योग्य है अर्थात् आग्नेय और अग्नीषोमीय के अति-
रिक्त अन्य भी यज्ञ हैं ॥३१॥ कुम्भीपाक से ही लेकर आहुतियाँ देवे ॥
१६ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
॥ ३२ ॥ अधिश्रयणपर्यग्निककरणाभिघारणोद्वासनालङ्क-
रणोत्पवनैः संस्कृत्य ॥३३॥ अथापि श्लोकौ भवतः ॥
आज्यभागान्तं प्राक् तन्त्रमूर्ध्वं स्विष्टकृता सह । हवींषि
यज्ञ आवापो यथा तन्त्रस्य तन्तवः । पाकयज्ञान् समा-
साद्यैकाज्यानैकबर्हिषः । एकस्विष्टकृतः कुर्यान्नानापि
सति दैवतेति ॥३४॥ एतेनैवामावास्यो व्याख्यातः ॥३५॥
ऐन्द्राग्नोऽत्र द्वितीयो भवति ॥ ३६ ॥ तयोर्व्यतिक्रमे
त्वमग्ने व्रतपा असि कामस्तदग्र इति शान्ताः ॥३७॥६॥
अश्नात्यनादेशे स्थालीपाकः ॥ १ ॥ पुष्टिकर्मसु सारू-
पवत्से ॥२॥ आज्यं जुहोति ॥३॥ समिधमादधाति ॥४॥
अधिश्रयण, पर्यग्निकरण, अभिघारण, उद्वासन, अलङ्करण, और
उत्पवन आदि संस्कार करके आहुति देवे ॥ ३२॥३३ ॥ यहाँ दो श्लोक
गोपथ ब्राह्मणों के हैं । आज्य भाग के अन्त के होम पूर्वतन्त्र स्विष्ट
कृत के सहित हवियों के यज्ञ, यह आवाप (प्रधान) है । और
जैसे तन्त्र की सन्तति वा सूत्र स्वरूप है। यदि पाक यज्ञ के करने
में ऐसा अवसर आ पड़े कि एक आज्य हो और अनेक बर्हि । (हवि
रखने के कुश के पात्र) हों तो एक ही स्विष्टकृत की आहुति करे ।
चाहे भिन्न २ अनेक दैवत हवन क्यों न हों ॥३४॥ इसीके द्वारा अमा-
वास्या में कर्त्तव्य ऐन्द्राग्नि की व्याख्या हुई जानो ॥३५॥ यहाँ ऐन्द्राग्न
दूसरा है जानो ॥३६॥ इन दोनों के व्यतिक्रम होने पर “त्वमग्ने व्रतपा
असि”, “कामस्तदग्र०” से शान्ता नाम की आहुति करनी चाहिये ॥३७॥
यह छठी कण्डिका पूरी हुई ॥ ६ ॥
इस संहिता विधि में जहाँ २ “अश्नाति” या “आशयति” करके कहा
गया है वहाँ २ स्थालीपाक की विधि जानना ॥ १ ॥ जैसे पुष्टि कर्मों में
“सारूपवत्सा” स्थालीपाक समझना ॥२॥ जहाँ “जुहोति” कहा गया है
परन्तु हवन करने का विधान नहीं किया गया वहाँ घृत समझना ॥३॥
जहाँ होम का विधान हो परन्तु होतव्य (किस वस्तु का होम करे
सो नहीं लिखा है) वहाँ आज्य की आहुति करे ॥ ३ ॥ जहाँ केवल
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १७
आवपति व्रीहियवतिलान् ॥ ५॥ भक्षयति क्षीरौ-
दनपुरोडाशरसान् ॥ ६॥ मन्थौदनौ प्रयच्छति ॥ ७॥
पूर्वं त्रिषप्तीयम् ॥ ८ ॥ उदकचोदनायामुदपात्रं प्रतीयात्
॥ ९॥ पुरस्तादुत्तरतः संभारमाहरति ॥ १० ॥ गोरनभि-
प्रापाद्वनस्पतीनाम् ॥ ११ ॥ सूर्योदयतः ॥ १२ ॥ पुरस्ता-
दुत्तरतोऽरण्ये कर्मणां प्रयोगः ॥ १३ ॥ उत्तरत्त उदकान्ते
प्रयुज्य कर्माण्यपां सूक्तैराप्लुत्य प्रदक्षिणमावृत्याप
उपस्पृश्यानवेक्षमाणाग्राममुदाव्रजन्ति ॥ १४॥ आश्यब-
न्ध्याप्लवनयानभक्ष्याणि सम्पातवन्ति ॥ १५ ॥ सर्वा-
ण्यभिमन्त्र्याणि ॥ १६ ॥ स्त्रीव्याधितावा पुतावसिक्तौ
समिद् का आधान लिखा है परन्तु यह नही लिखा है कि अमुककाष्ठ आदि
हो। वहाँ होम के योग्य काठ ग्रहण करना चाहिये ॥४॥ व्रीहि (धान्य),
जौ, और तिलों का आवपन करे अर्थात् अग्नि में डाल कर आहुति करे॥
॥५॥ जहाँ “भक्षयति” का विधि हो वहाँ क्षीरोदन, पुरोडाश, रसों को
भक्षण करे करावे ॥६॥ जहाँ “प्रयच्छति” का विधान हो वहाँ मन्थ
और ओदन देवे ॥७॥ “पूर्व त्रिषप्तीयम्” कहने से “ये त्रिषप्ता०” इस
सूक्त को लेवे ॥८॥ जहाँ उदक का संस्कार कहा गया हो वहाँ जलपात्र
का संस्कार समझना ॥९॥ निवास स्थान से संभार लाकर वेदि के
पूर्व उत्तर भाग में घरे ॥१०॥ जहाँ वनस्पतियों के पास के फूल, पत्र,
आदि लाने का विधान हो, और उसके मिलने में कठिनता हो तो
गौशाला के पास के वानस्पत्य के प्रयोजनीय अंश को लेवे ॥११॥ सूर्य
के उदय समय संभार आदि को लावे ॥१२॥ निवास स्थान के पूर्व या
उत्तर-जंगल में कर्म करे ॥१३॥ सब ही कर्म जल के उत्तर भाग में कर
के “अम्बयो यन्ति शम्भुमयो भू हिरण्यवर्णादयः कृष्णं नियानं सस्रुषी-
र्हिमवतः प्रस्स्रवन्ति वायोः पूतः०” ये जलसूक्त हैं। जलसूक्तों से नहा कर
परिक्रमा कर जल को स्पर्श कर के पीछे न देखते हुए ग्राम को
जावे ॥१४॥ “आश्य” आदि सबों में सम्पात् का अभिमंत्रण होता है।
यज्ञार्थ सब ही पदार्थों का अभिमंत्रण करे ॥१५॥१६॥ स्त्री, रुग्ण पुरुष,
३